मंगलवार, 14 दिसंबर 2021

Kakbhushundi Trek Uttarakhand Blog : Day 1 From Bhyundar to Kaagi

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गोविंदघाट की रात बड़ी ठण्डी थी लेकिन हम भी गुरूद्वारे से लंगर छककर, रजाई ओढ़ के सोये पड़े रहे।  सुबह -सुबह पांच बजे ही पवन चौहान जी के मोबाइल की घण्टी घरघराने लगी थी, मैंने सोचा -कि अलार्म होगा ! लेकिन पवन भाई ने फ़ोन उठाया और बात करने लगे ... बात करते करते उनके चेहरे के हाव भाव बदलते रहे। तब तक हम सभी चारों लोग जो इस कमरे में थे, जाग चुके थे।  फ़ोन डिसकनेक्ट हुआ तो पवन भाई बोले - योगी भाई मैं ट्रेक पर नहीं जा पाऊंगा ! मेरे चाचा जी के बेटे की डेथ हो गई है कल ... ओह ! भगवान उनकी आत्मा को शांति प्रदान करें !! 
हमें पवन भाई के लिए भी बहुत दुःख हो रहा था जो 10 दिन पहले ही गुवाहाटी से चलकर दिल्ली पहुँच गए थे और काकभुशुण्डि जाने के लिए बहुत उत्सुक थे लेकिन नियति है !! कोई क्या कर सकता है ? उन्हें भारी मन से जोशीमठ की तरफ जाने वाली पहली ही जीप पकड़ने को कहकर उनका सामान पैक कर दिया !! होई है वही जो राम रचि राखा ....  

अब हम कुल 7 लोग रह गए।  सात हम और सात ही पॉर्टर ! खर्चा भी थोड़ा बढ़ जाएगा ट्रैक का , खैर चलता है ! पवन भाई बस निकलने ही वाले थे कि उनका फ़ोन फिर बजा, इस बार मेरे लिए कॉल था ... उधर पंकज भाई थे फ़ोन पर ! पंकज मेहता - द ट्रैवलर ! मेरा नंबर शायद नेटवर्क में नहीं होगा इसलिए पवन भाई को लगा दिया - नेटवर्क की समस्या उनके फ़ोन में भी थी लेकिन इतना समझ आ गया कि वो भी इस ट्रेक पर हमारे साथ आ रहे हैं ! ये मेरे लिए और ग्रुप के लिए एक बेहद ही ख़ास खबर थी क्यूंकि मैं पंकज भाई का बहुत बड़ा वाला फैन रहा हूँ।  एक बार तो मैं और हरजिंदर भाई , पंकज के साथ मनाली से कारगिल होते हुए लद्दाख तक का प्लान कर चुके थे लेकिन कभी -कभी सबकुछ अपने मन का नहीं होता ....तो पंकज भाई के आने की खबर ने एक नया उत्साह भर दिया था।  
इनकी यही मेहनत हमें पहाड़ों में जरुरी सुविधा देती है 

इधर पवन भाई निकल रहे थे और उधर पंकज जी अपने एक और मित्र के साथ गोविंदघाट पहुँच रहे थे।  मुलाकात हुई उनकी भी और अन्ततः पंकज भाई करीब 9 बजे के आसपास हमे मिल गए।   

भ्यूंडार गाँव से पहले ये बहुत ही सुन्दर water Fall देखने को मिलता है 

नाश्ता करने के बाद हमारी टीम को पुलना गाँव तक जीप से जाना था जो गोविंदघाट से करीब तीन किलोमीटर दूरी पर होगा।  लगातार जीप भर -भर के निकल रही थीं . . ज्यादातर यंग एज के लड़के -लड़कियां  ट्रैकिंग पैंट और जैकेट पहनकर पीठ पर बैग लटकाये चले आ रहे हैं।  सभी की आँखों पर काला चश्मा चढ़ा हुआ है ! असल में ये रास्ता वैली ऑफ़ फ्लॉवर (फूलों की घाटी ) और हेमकुंड साहिब के लिए भी जाता है मगर इस वक्त अभी तक हेमकुण्ड साहिब के दर्शन तो बंद हैं तो फिर ये सब ? कहाँ जा रहे हैं ! निश्चित ही वैली ऑफ़ फ्लॉवर वाले लोग हैं ये !!   इस ट्रेक पर महिलाओं की इतनी बड़ी संख्या देखकर मैंने और हरजिंदर भाई ने इस ट्रेक का नया नामकरण किया था - वैली ऑफ़ फीमेल्स !!  

पुलना में जीप से उतरने के बाद अब भ्यूंडार गाँव की तरफ चलते जाना है , हमें भी और वैली ऑफ़ फीमेल्स सॉरी सॉरी वैली ऑफ़ फ्लॉवर्स वालों को भी।  भ्यूंडार से हमारा रास्ता अलग हो जाएगा लेकिन पुलना से निकलते ही इन वैली ऑफ़ फ्लॉवर जाने वालों की पोल खुलने लगी थी .. महिलाओं के अपने पर्सनल बैग बेचारे पतियों के हाथ में थे और लड़कियों के बैग ... लिखने की जरूरत नहीं !! पानी की बोतल भी अब उन्हें भारी लगने लगी थी और साथ चल रहा लड़का जैसे उनका असिस्टेंट और फोटोग्राफर बन गया हो ! खैर , ये दौर भी यादगार होता है और जीवनभर के लिए मीठी -मीठी यादें छोड़ जाता है।  मित्रों के साथ घूमना अलग अंदाज़ देता है !!  
मैं , त्रिपाठी जी और हनुमान जी 
पंकज भाई और एक मित्र तो 9 बजे के आसपास ही गोविंदघाट पहुँच गए थे लेकिन अभी पंकज भाई के दो मित्र और आने वाले थे।  मतलब अब हम कुल 11 जने हो जाएंगे ट्रैक पर जाने वाले और 7 पॉर्टर होंगे तो कुल 18 लोग होंगे। पंकज भाई और उनके मित्र गोविंदघाट में ही रुके रहे , अपने दो और मित्रों को साथ लेने के लिए और बाकी सब दो अलग अलग जीप से पुलना पहुँच के आगे बढ़ चुके थे।  इन रास्तों पर 2007 में एक बार पहले भी आ चूका हूँ अपनी धर्मपत्नी के साथ।  तब हेमकुंड साहिब गए थे हम दोनों लेकिन पता नहीं क्यों , रास्ते जाने पहचाने से नहीं लग रहे थे।  बड़ा बदलाव आ गया है 2013 की आपदा के बाद।  


बहुत ही खूबसूरत रास्ते हैं , जंगलों से होते हुए और पत्थरों को जोड़ जोड़कर इस तरह का रास्ता बना दिया है कि किसी को रात में चलते हुए भी भटकने  का अंदेशा न रहे। भ्यूंडार तक शानदार वाटर फॉल्स और मनमोहक  हरियाली को देखते हुए हम सब 12 बजे के आसपास भ्यूंडार गाँव पहुँच के चाय पी रहे थे और कुछ मित्र अपना मोबाइल फ़ोन भी चार्जिंग में लगाए पड़े थे।  उनमे मैं भी एक था ! जिस दुकान में हम चाय खींच रहे थे वहीँ एक साहब Satellite Phone लेकर बैठे थे , सभी ने 2 -2 मिनट बात कर ली अपने घर। हम सभी के फ़ोन के नेटवर्क लगभग गायब हो चुके थे।  दो बार चाय पी चुके और यहाँ बैठे बैठे हमे दो घंटे से ज्यादा हो चुके थे लेकिन पीछे से न पॉर्टर आये अभी तक न पंकज भाई और उनके मित्र।  सोचा चलो धीरे धीरे आगे बढ़ते हैं , वो लोग सब गढ़वाली हैं , हमें पकड़ लेंगे।   

भ्यूंडार गाँव पार कर गए और फिर उस जगह एक दुकान में लस्सी पीने बैठ गए जो दो नदियों के संगम पर है।  ये जो संगम है दो  नदियों का.... इसमें एक है काकभुशुण्डि नदी जो हाथी पर्वत से निकलती है और दूसरी है लक्ष्मण गंगा या पुष्पावती नदी जो फूलों की घाटी से निकलती है।  हमे क्यूंकि काकभुशुण्डि जाना है तो काकभुशुण्डि नदी को ही फॉलो करना होगा।  इस जगह से सीधे हाथ पर काकभुशुण्डि नदी दिखाई देने लगती है और शुरुआत में एक जंगल से होकर रास्ता जाता है।  अगर नदी का किनारा सही अवस्था में है तो आप किनारे-किनारे भी जा सकते हैं।


भ्यूंडार गाँव cross करने के बाद ! यहाँ काकभुशुण्डि नदी और पुष्पावती नदी मिलती हैं 

  संगम से एकदम सामने वाला रास्ता पुष्पावती नदी के साथ-साथ हेमकुंड साहिब और घांघरिया की तरफ चला जाता है।  हमारा यही लास्ट पॉइंट था जहाँ बैठ के हम पंकज भाई वगैरह का  इंतज़ार करते रहे और जैसे ही वो तीन बजे के करीब हमारे पास पहुंचे , हमने फर्स्ट गियर डाल के भगवान भोलेनाथ का नाम लेकर अपनी गड्डी स्टार्ट कर दी , मतबल काकभुशुण्डि की तरफ का रास्ता पकड़ लिया ! समझा करो यार। ..समत्ते ई नहीं हो आप ....




फाइनल लिस्ट फिर बदल गई है एक बार और अब यही फाइनल रहेगी........ देखिये एक बार :
1. योगी सारस्वत ​
2 . हरजिंदर सिंह 
3. डॉ अजय त्यागी 
4 . कुलवंत सिंह 
5 . हनुमान जी गौतम 
6 . सुशील कुमार 
7. मणि त्रिपाठी जी 
8. ​​पंकज मेहता 
9. बद्रीनाथ डोभाल 
10. पुरुषोत्तम कंवर 
11. कमलेश मैखुरी मैखुरी 


 शुरुआत में , जैसा मैंने ऊपर लिखा कि जंगल से होकर रास्ता है।  ऐसा रास्ता नहीं है कि आप चलते ही जाओ लेकिन हाँ , जंगल इतना घना नहीं है इसलिए किसी जंगली जानवर का डर नहीं रहता।  करीब  एक -डेढ़  घण्टा जंगल में चलने के बाद फिर से नदी के पाट पर उतर गए और पाट क्या एकदम खुला मैदान सा सामने था जहाँ छोटे -छोटे पत्थर और बालू -कंकड़ी ही दिखाई दे रहे थे। यहाँ नदी बस जल की एक बड़ी सी धारा बन के बह रही थी।  थोड़ा आराम किया तो गाइड से पता चला कि यहाँ किसी अँगरेज़ ने तप किया था इसलिए इस जगह को अँगरेज़ गुफा कहते हैं। जब ये रास्ता भ्यूंडार गांव क्रॉस कर के काकभुशुण्डि नदी के किनारे -किनारे होकर था तब इस रास्ते मे जंगल के एकदम नीचे रुकने की एक जगह हुआ करती थी जिसे -रूपढूंगी बोलते हैं । रूपढूंगी में एक टिन की हट हुआ करती थी जो अब बहुत जर्जर अवस्था मे है । अंग्रेज गुफा से ही हम इस देख पाए पीछे की तरफ ।



  अंग्रेज गुफा जंगल खत्म होते ही मिल जाती है लेकिन अब वहां गुफा जैसा कुछ नहीं है । वास्तव में यहां कोई गुफा थी भी नही कभी ...एक अंग्रेज जो शायद इटली का रहने वाला था वो यहां एक बड़े से पत्थर पर बैठकर तपस्या में लीन रहा करता था जिससे इस जगह का नाम अंग्रेज गुफा पड़ गया । रहने-खाने का उसने अपना कोई ठिकाना बनाया हुआ होगा जो समय के साथ इन पत्थरों में मिल गया ।  



नदी हमारी विपरीत दिशा से बहती हुई आ रही है और हमारे दाएं अपने धवल श्वेत रूप में लगातार बहती हुई बहुत ही सुंदर दिख रही है जैसे कोई नवयौवना अपने मे ही खोई हुई ...चंचलता से इठलाती हुई सी चली जा रही हो । नदी के जल में गंदगी का कोई नामोनिशान नही है ...यही नदी है जो हाथी पर्वत से निकल कर काकभुशुण्डि का नाम धर लेती है और फिर भ्यूंडार में जा के , फूलों की घाटी से निकलने वाली पुष्पावती नदी में मिल जाती है । 
 

मुश्किल से आधा घण्टा ही नदी के पट पर चले होंगे  ...कि फिर पट छोड़कर ऊपर की ओर जंगल मे घुसना पड़ा । बेहतरीन और अनजान से फूल खिले हैं हर तरफ ...सफेद ..पीले ...नीले...लाल लेकिन हम में से कोई भी इनका नाम नहीं जानता । जंगल घना है अब, पहले वाले के मुकाबले। कारण शायद ये रहा होगा कि वो भ्यूंडार गांव के एकदम नजदीक था और ये थोड़ा दूर तो लोग लकड़ियां काटने यहां तक नहीं आते होंगे ...हालांकि ये जंगल भी उसी जंगल का अगला हिस्सा है जो हमें शुरुआत में ही मिला था।  गाइड ने एक जगह रुककर एक बड़ा और खड़ा पत्थर दिखाया -यहां भी एक अंग्रेज ने तपस्या की थी ...इस जगह को भी अंग्रेज गुफा कहा जाता है। लेकिन ये घने जंगल मे है और निश्चित रूप से ये वाला अंग्रेज, उस नीचे वाले अंग्रेज से ज्यादा हिम्मत वाला रहा होगा।  




                                             



कहीं -कहीं पगडंडी दिख जाती है तो अगले 100-200 मीटर का रास्ता तय हो जाता है उसी के सहारे। रास्तों में बहुत बड़ी-बड़ी घास उगी हुई है जिसमे कुछ छोटी हाइट वाले मित्र बिल्कुल ही छुप से गए हैं जबकि कुलवंत भाई , हरजिंदर भाई , हनुमान जी और कुछ कुछ मेरे जैसे लोगों की बस गर्दन चमक रही है ...हम में से जो आगे चल रहे हैं वो पहले अपनी स्टिक से रास्ता बनाते हैं फिर सब एक लाइन से एक दूसरे के पीछे चलते जा रहे हैं । जोश हाई है ...पहला ही दिन है बेटा अभी 








 साढ़े पांच बजे हैं और हमें एक ऐसी जगह मिल गई है जहां हम कुछ टेंट नीचे और कुछ ऊपर लगा सकते हैं। लेकिन पंकज भाई हमसे आगे जाकर थोड़ी दूर तक नजर मार के आये हैं तो उन्हें एक और जगह दिख रही है जो ज्यादा बड़ी है और खुला मैदान सा है। हम अपने झोले -डंडे फिर से उठा लेते हैं और अपने से भी बड़ी-बड़ी घास में से होते हुए अंततः आज हम अपने गंतव्य कागी या कार्ग़ी (Kaagi or Kargi) तक पहुंच गए हैं। यहां वन विभाग का बनाया हुआ एक कमरा है जिसमें कीचड़ भरी हुई है ..आसपास घास है जिसे समतल करके टेण्ट लगाने शुरू कर दिए हैं। उधर दूसरी तरफ चाय और फिर खाना तैयार हो रहा है। 


 रात को खाने से पहले मैँ सबके टेण्ट में होता हुआ , सबके हालचाल लेता हुआ पंकज मेहता जी और उनके मित्रों के साथ गप्प लगाने के लिए उनके टेण्ट में घुस जाता हूँ। वहीं हरजिंदर भाई और डॉक्टर साब को भी बुला लेता हूँ। हरजिंदर भाई और मैँ रजनीतिक विचारधारा में नदी के दो छोर हैं ...लेकिन हम दोनों बहुत प्यारे मित्र हैं। मैँ ट्रैकिंग में उनका साथ मिलने पर बहुत आश्वस्त हो जाता हूँ कि अब कोई दिक्कत नहीं ...पंकज भाई का परिचय में पहले ही लिख चुका हूँ। ये दुनिया ऐसी ही है ..हम गप्पएँ लगा रहे हैं और बाकी टेण्ट के निवासी खर्राटे मार रहे हैं। 12 बजने को हैं रात के ...पंकज का मन अब भी नहीं है सोने का लेकिन उनके मित्र शायद सोने के इच्छुक हैं इसलिए मैं हरजिंदर को इशारा करता हूँ और हम दोनों बाहर आकर अपने अपने टेण्ट में घुस जाते हैं ....



फिर मिलते हैं जल्दी ही .....


बुधवार, 8 दिसंबर 2021

Kakbhushundi Trek Uttarakhand Blog

काकभुशुण्डि ! 

नाम सुनते हैं तो एकदम से रामायण में पहुँच जाते हैं। संत तुलसीदास जी ने रामचरितमानस के उत्तरकाण्ड में लिखा है कि काकभुशुण्डि परमज्ञानी रामभक्त हैं। 

रावण के पुत्र मेघनाथ ने राम जी से युद्ध करते हुये राम को नागपाश से बाँध दिया था। देवर्षि नारद के कहने पर गरूड़, जो कि सर्पभक्षी थे, ने नागपाश के समस्त नागों को प्रताड़ित कर राम को नागपाश के बंधन से छुड़ाया। राम के इस तरह नागपाश में बँध जाने पर राम के परमब्रह्म होने पर गरुड़ को सन्देह हो गया। गरुड़ का सन्देह दूर करने के लिये देवर्षि नारद उन्हें ब्रह्मा जी के पास भेजा। ब्रह्मा जी ने उनसे कहा कि तुम्हारा सन्देह भगवान शंकर दूर कर सकते हैं। भगवान शंकर ने भी गरुड़ को उनका सन्देह मिटाने के लिये काकभुशुण्डि जी के पास भेज दिया। अन्त में काकभुशुण्डि जी ने राम के चरित्र की पवित्र कथा सुना कर गरुड़ के सन्देह को दूर किया। 


  एक व्यक्ति ज्ञानप्राप्ति के लिये लोमश ऋषि के पास गया। जब लोमश ऋषि उसे ज्ञान देते थे तो वह उनसे अनेक प्रकार के तर्क-कुतर्क करता था। उसके इस व्यवहार से कुपित होकर लोमश ऋषि ने उसे शाप दे दिया कि जा तू  कौआ हो जा। वह तत्काल कौआ बनकर उड़ गया। शाप देने के पश्चात् लोमश ऋषि को अपने इस शाप पर पश्चाताप हुआ और उन्होंने उस कौए को वापस बुला कर राममन्त्र दिया तथा इच्छा मृत्यु का वरदान भी दिया। कौए का शरीर पाने के बाद ही राममन्त्र मिलने के कारण उस शरीर से उन्हें प्रेम हो गया और वे कौए के रूप में ही रहने लगे तथा काकभुशुण्डि के नाम से विख्यात हुए। 

अब ऐसा माना जाता है कि काकभुशुण्डि जी और गरुड़ का वार्तालाप आज भी अनवरत जारी है और जिस ताल के किनारे ये दोनों वार्तालाप में मगन रहते हैं उसे काकभुशुण्डि ताल कहा जाता है जहाँ तक पहुंचना असंभव तो नहीं किन्तु बहुत मुश्किल जरूर है।  उत्तराखंड के चमोली जनपद में स्थित ये ताल जितना पवित्र है उतना ही सुन्दर भी।  इसका हरे रंग का पानी और त्रिकोण जैसी इसकी शेप बहुत आकर्षित करती है।  मैंने इससे पहले सतोपंथ लेक को इस रूप में देखा है।  करीब 5000 मीटर की ऊंचाई पर स्थित काकभुशुण्डि लेक , शिव को समर्पित मानी जाती है और ऐसा कहा जाता है कि जो कौआ यहाँ आकर इस ताल में मरता है , उसे मोक्ष की प्राप्ति होती है। 
 

इस ट्रेक पर जाने के लिए समय का बहुत अड़ंगा लगता रहा।  शायद वो साल 2018 का था और जनवरी या शायद फरवरी का महीना था -दिल्ली से राजीव कुमार जी का फ़ोन आया : योगी भाई काकभुशुण्डि ट्रेक करने का मन है ? पहले कभी जिस जगह का नाम तक न सुना हो वहां जाने के लिए एकदम से हाँ कैसे कह सकता था लेकिन राजीव जी की अगली बात ने हाँ करा दी , बोले बीनू भाई भी जा रहे हैं ! मतबल ये कि बीनू भाई अगर जा रहे हैं तो मुझे फिर सोचने की जरूरत ही नहीं ! बीनू बाबा हम उम्र और बहुत ही शानदार ट्रेक्कर हैं , उनके साथ अच्छी जमती है लेकिन अक्खड़ हैं ! मगर ये अक्खड़पन मुझे अच्छा लगता है और दूसरी बात -सतोपंथ के ट्रेक पर बीनू बाबा मुझे ताश के गेम में हरा हरा के मेरे सारे ड्राई फ्रूट्स लपेट गए थे , मुझे वो भी बदला लेना है :) बीनू बाबा नहीं गए और फिर मैं भी नहीं गया। .. फिर राजीव जी भी नहीं गए और मैं काकभुशुण्डि के बजाय आदि कैलाश  ट्रेक पर निकल गया।  

2019 में भी राजीव जी को फिर काकभुशुण्डि याद आया लेकिन बात नहीं बनी और मैं चला गया श्रीखण्ड  यात्रा पर और वो चले गए मध्यमहेश्वर ! 2020 कोरोना के नाम रहा और 2021 का अगस्त आते ही राजीव जी ने इस बार न कुछ कहा , न पूछा और काकभुशुण्डि ट्रैक के लिए एक Whats App ग्रुप तैयार कर के मुझे जोड़ दिया।  लग रहा था इस बार तो राजीव जी काकभुशुण्डि जाकर ही मानेंगे ! अभी लोचा था -बीनू बाबा नहीं जा रहे !

 अंततः अपना फाइनल हुआ 3 सितम्बर की रात को गाजियाबाद से निकलेंगे और पांच सितम्बर से ट्रैक शुरू कर देंगे।  हमारे साथ इस ट्रैक में होंगे -राजीव जी , सचिन सिद्धू भाई, शशि चढ्ढा जी , हरजिंदर भाई , सुशील भाई , कुलवंत जी , विजय यादव जी , गुवाहाटी से पवन जी , डॉ अजय त्यागी जी और लखनऊ निवासी 65 वर्षीय त्रिपाठी जी।  लेकिन रुकिए , अभी गाजियाबाद से निकलने का दिन नहीं आया .. मतलब सितम्बर शुरू नहीं हुआ है ! कुछ विकेट गिरने लगे हैं और 2 सितम्बर की रात तक कई विकेट गिर गए।  अब तक गाइड से जो बात की थी कि 11 -12 लोग होंगे ही , उसने उसी हिसाब से पॉर्टर तैयार कर लिए।  कुल सात पॉर्टर और गाइड ! लेकिन लोग रह गए आठ !! जितने हम , उतने वो मतलब ट्रैक का बजट बढ़ जाएगा ! 

​राजीव जी भी साथ नहीं जा पाए क्यूंकि उन्हें लगा ये बारिश का वीक है , वो सही थे लेकिन फिर मेरे कॉलेज में क्लासेज शुरू हो रही थीं और इतनी लम्बी छुट्टी लेना संभव नहीं होता। फाइनल लिस्ट देखिये एक बार :
1. योगी सारस्वत ​
2 . हरजिंदर सिंह 
3. डॉ अजय त्यागी 
4 . कुलवंत सिंह 
5 . हनुमान जी गौतम 
6 . पवन चौहान 
7 . सुशील कुमार 
8. मणि त्रिपाठी जी 

मिलना तय हुआ जोशीमठ और गाइड एवं पॉर्टर से मिलना तय हुआ रुद्रप्रयाग ! जोशीमठ में ही सब राशन और बाकी जरूरतों का सामान खरीद लिया।  100 मैग्गी के पैकेट , दाल , चावल का बोरा , ड्राई फ्रूट्स और बहुत सारा ... दुकानदार खुश हो गया।  बोला -सर इतनी बिक्री तो मेरी 15 दिन में भी नहीं होती जितनी आज आप लोगों ने करा दी ! रुला तो हर कोई सकता है .. कोशिश किसी के चेहरे पर मुस्कान लाने की करते रहनी चाहिए।  

काकभुशुण्डि ट्रैक ! दो रास्तों से किया जा सकता है -पहला रास्ता गोविंदघाट से भ्यूंडार होते हुए  काकभुशुण्डि ताल तक जा सकते हैं और दूसरा रास्ता : विष्णुप्रयाग के पास स्थित पैंका गाँव से काकभुशुण्डि ताल तक जा सकते हैं।  लेकिन क्योंकि हमें पूरा ही सर्किट करना था इसलिए हमने भ्यूंडार के रास्ते से जाकर पैंका गाँव उतरने का निर्णय लिया।  हम 4 सितम्बर की गोविंदघाट की ठंडी रात को रजाई  में दुबके ....आने वाले कुछ दिनों के ख्वाब मन में बसाये सो गए ! हम यानि कुल 15 लोग !! 

कल की बात कल करेंगे .....




मिलेंगे जल्दी ही

शनिवार, 9 अक्टूबर 2021

Waterfalls in and around Mirzapur Uttar Pradesh

मिर्ज़ापुर (यूपी )  के वाटरफॉल्स  :

कोरोना की भयानक दूसरी लहर के बाद ये पहला ब्लॉग लिख रहा हूँ।  न जाने कितनों ने अपनी जान गंवाई , कितने अनाथ हो गए और कितने ही माँ-बाप असहाय हो गए !! उन सभी पुण्यात्माओं को अपने शब्दों के माध्यम से नमन और भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित करता हूँ !! 

मिर्ज़ापुर ! नाम तो सुना ही होगा ऐसे या वैसे ! वैसे सुना है तो परिभाषा को बदलना होगा आपको और ऐसे सुना है तो सही सुना है। वैसे मतलब फिल्म के नाम की वजह से और ऐसे मतलब -विंध्यवासिनी मंदिर , अष्टभुजा मंदिर और कालीखोह मंदिर की वजह से तो मिर्ज़ापुर प्रसिद्ध है ही लेकिन रुकिए -------मिर्ज़ापुर सिर्फ इतना नहीं है ! मिर्ज़ापुर की असली खूबसूरती , असली खजाना तो मिर्ज़ापुर शहर के बाहर निकल के है ! अहा - अद्भुत , अनजाना सा , अकल्पनीय और अविश्वसनीय सा लेकिन किसी से मिर्ज़ापुर के विषय में बात कर के तो देखिये , वो एकदम से कहेगा -अच्छा वो ! फिल्म वाला मिर्ज़ापुर !! 

आज मंदिरों की बात नहीं लिख रहा , आज मिर्ज़ापुर की प्राकृतिक धरोहरों को आपके सामने लाने की कोशिश कर रहा हूँ और ये कोशिश सफल तभी होगी जब आप कम से कम एक बार तो मिर्ज़ापुर होकर आएंगे।  और  अभी तक आप मिर्ज़ापुर नहीं गए हैं तो एक बार जाकर देखिये , मिर्ज़ापुर की सुंदरता आपका मन मोह लेगी ! न न... मैं शहर की बात नहीं कर रहा , मैं शहर के बाहर जंगलों में स्थित यहाँ के खूबसूरत प्राकृतिक  झरनों की बात कर रहा हूँ जो एक -दो नहीं , पांच -दस नहीं , 22  हैं ! जी हाँ बाईस वाटरफॉल्स मौजूद हैं मिर्ज़ापुर के आसपास के जंगलों में। लेकिन ये वाटरफॉल्स केवल मानसून के मौसम में ही सक्रिय रहते हैं और सही तरह से जिन्दा भी रहते हैं , जैसे -जैसे मॉनसून ख़त्म होता है ये सांस लेना बंद कर देते हैं और फरवरी -मार्च आते आते लगभग सभी वाटरफॉल्स मृतप्राय हो जाते हैं।  तो अगर आपको इन वाटरफॉल्स को देखना है , पूरे यौवन पर देखना है तो निश्चित रूप से आपको मॉनसून में ही इधर का रुख करना होगा।  

Outside Railway Station : Varanasi Cantt

दो साल से इधर नजर थी लेकिन कोविड की वजह से मुश्किल हो रहा था जाना , अंततः जुलाई 2021 में अवसर मिल गया और तुरंत बनारस के अपने अनन्य मित्र संदीप भाई द्विवेदी जी को सूचना दे दी , वो स्वयं मेरे साथ इन वाटरफॉल्स को देखने की इच्छा जता चुके थे।  

Banaras Hindu University Gate : Varanasi 

बनारस पहुँचते ही एक गड़बड़ हो गई ! मुझे वाराणसी कैंट स्टेशन उतरना था लेकिन सुबह -सुबह 6 बजे अधखुली आँखों से वाराणसी कैंट से पहले के स्टेशन "बनारस " उतर गया।  परेशानी ख़ास नहीं थी क्यूंकि मुश्किल से दोनों स्टेशन के बीच की दूरी 7 -8 किलोमीटर ही होगी किन्तु , वाराणसी कैंट स्टेशन पर मेरा स्टूडेंट आशीर्वाद पाल सुबह से इंतज़ार कर रहा था और मैं गलती से एक स्टेशन पहले उतर गया :) फिर आशीर्वाद को फोन कर के सब कहानी बताई और वो बनारस स्टेशन आ गए कुछ देर में ही।  उधर संदीप भाई को तैयार होकर निकलने को कह दिया और मैं होटल से नहा धोकर जा पहुंचा BHU गेट , अपने एक और पाठक अमृतांशु श्रीवास्तव से मिलने।  BHU के अंदर मैं पहले जा चुका हूँ इसलिए अंदर जाने का कोई मतलब नहीं था , तब तक "आलू बॉन्डा " उदरस्थ कर लेते हैं , वैसे भी सुबह से चाय -चाय करते करते आंतें जल गई होंगी।  

Ganga Ghat : Kashi 

Rudra Convention Centre : Varanasi 

आगे बढ़ने से पहले मैं आपको वो 22  वाटरफॉल्स बताता हूँ जो मिर्ज़ापुर और उसके आसपास मौजूद हैं।  इन वाटरफॉल्स के बारे में जब "होमवर्क " कर रहा था तब केवल मुझे 15 वाटरफॉल्स के बारे में पता था लेकिन कुछ संदीप भाई का ज्ञान और कुछ स्थानीय लोगों का ज्ञान जब अपने कालीन भैया , चंद्रेश कुमार जी  के ज्ञान के साथ मिश्रित कर के जो प्रोडक्ट प्राप्त हुआ वो 22 वाटरफॉल्स का था।  तो अब एक लिस्ट तैयार हुई है इन 22  वाटरफॉल्स की : 

  आप चाहें तो मेरा ये वीडियो देख सकते हैं : 

Top 15 Waterfalls in Uttar Pradesh :  https://www.youtube.com/watch?v=N7onkbm5z3A

1 .  लखनिया दरी 
2.   सिद्धनाथ दरी 
3 .   राजदरी 
4 .   देवदरी 
5 .   विंढम फॉल 
6 .   टांडा फल 
7 .   जोगिया दरी 
8 .   सिसली फॉल 
9 .   चूना दरी 
10 . खड़ंजा फॉल 
11 . बकरियां फॉल 
12 . कुशियारा फॉल 
13 . खजूरी डैम वॉटरफॉल 
14 . जोगदहवा वॉटरफॉल 
15 . लतीफशाह डैम 
16 . मुक्खा फॉल 
17 . अलोपी दरी 
18.  नौका दरी 
19 . बद्री (बदरिया ) दरी 
20 . पंचशील की दरी (ठाड़े पत्थर ) 
21. नौगढ़ वाटर फॉल 
22 . नकटी दरी 

अब इतने सारे वाटरफॉल्स को न तो एक -चार दिन की ट्रिप में देखा जा सकता है और न ये संभव है।  आपको कम से कम एक सप्ताह चाहिए होगा इन सब जगहों तक पहुँचने के लिए।  मैं जो वाटरफॉल्स घूम पाया , पहले उनका जिक्र करेंगे फिर बाकी बचे हुए सभी वाटरफॉल्स तक पहुँचने का रास्ता और बाकी detail लिखूंगा।  

सिद्धनाथ दरी (Sidhanath Dari ) : चुनार रोड पर बनारस से करीब 50 किलोमीटर की दूरी पर स्थित सिद्धनाथ दरी बहुत जबरदस्त वॉटरफॉल है जहाँ बनारस और आसपास के लोग परिवार सहित पिकनिक मनाने जाते हैं।  शनिवार -रविवार को खूब भीड़ रहती है और रोड से बमुश्किल 100 मीटर अंदर ये वॉटरफॉल बहुत ही शानदार दिखता है लेकिन साफ़ -सफाई बिलकुल नहीं है।  आसपास यहाँ सैकड़ों छोटी -छोटी दुकानें "उग" आती हैं मानसून के मौसम में !



पंचशील की दरी (ठाड़े पत्थर ) Panchsheel ki Dari (Thade Patthar ) : इसी रोड पर राजगढ़ से कुछ और आगे चलकर है पंचशील की दरी वॉटरफॉल लेकिन ये खूबसूरत होने के बावजूद इतना famous नहीं है ! इसका एक कारण ये हो सकता है कि रोड से करीब तीन किलोमीटर हटकर है जहाँ  आप सिर्फ पैदल जा सकते हैं या अपना two wheeler ले जा सकते हैं।  कार भी हमे करीब दो किलोमीटर पहले ही खड़ी करनी पड़ी थी।  जंगलों के बीच से होकर गुजरता रास्ता एक बिलकुल सुनसान इलाके में लेकर जाता है इसलिए मैं अकेले जाने की सलाह नहीं दूंगा ! दो -तीन लोग हों तो बिलकुल जाइये और इस लगभग छुपे स्थान का आनंद लीजिये ! 



पहले दिन हम ये दो ही वाटरफॉल्स देख पाए और वापस लौट चले बनारस की तरफा।  अभी थोड़ा समय था , मौका भी था तो भगवान शिव के 'काशी -विश्वनाथ " दर्शन को क्यों न जाते ? 

अगले दिन बारिश ने अपना रौद्र रूप दिखा दिया।  सुबह 9 बजे शुरू हुई बारिश ने रुकने का नाम नहीं लिया और डेढ़ घण्टे तक अनवरत जारी रही।  ये डेढ़ घण्टा मैं , BHU गेट के सामने एक तिरपाल के नीचे खड़ा , बारिश रुकने  इंतज़ार में पूड़ी -जलेबी की खुशबु लेता रहा क्यूंकि पेटपूजा तो पहले ही कर चुका था।  

लगभग आधा दिन जा चुका था।  संदीप भाई और उनके मित्र के साथ आज हमारी गाडी नौगढ़ की तरफ दौड़ रही थी।  क्या खूबसूरत रास्ता है अप्रतिम !! हमने कई बार गाडी रोक -रोक के प्राकृतिक नजारों का न सिर्फ  आनंद लिया बल्कि खूब फोटोग्राफी और वीडियोग्राफी भी की।  इसकी सुंदरता का अंदाज़ा आप इस बात से लगा सकते हैं कि यहाँ पहली बार आने वाले लोगों की गाड़ियों की छत खुली हुई थी और  गाड़ियों  स्पीड बमुश्किल 10 किलोमीटर प्रति घण्टा रही होगी।  नव विवाहित जोड़े , खुली गाडी में धीरे -धीरे चलते हुए प्रकृति का आनंद उठा रहे थे।  कुछ देर के लिए सही , कुछ ही महीनों के लिए सही ये क्षेत्र शिमला -कुफरी -चैल जैसा हरा भरा दिखता है !  राजदरी-देवदरी वॉटरफॉल पहुँच गए लेकिन गाड़ियों की लम्बी लाइन लगी है अंदर जाने के लिए।   




राजदरी-देवदरी वॉटरफॉल (Rajdari Devdari Watefall )  : बनारस से करीब 70 किलोमीटर दूर ये दोनों वाटरफॉल्स शायद एकमात्र ऐसे वाटर फाल्स हैं जिनकी एंट्री टिकट लगती है 50 रूपये।  अत्यंत ही खूबसूरत ये दोनों वाटरफॉल्स लगभग एक किलोमीटर की दूरी पर हैं लेकिन दोनों का एंट्री गेट एक ही है और टिकट भी दोनों की एक ही है।  लेकिन मौसम में भयंकर भीड़ होती है , हाँ सार्वजनिक परिवहन की कोई व्यवस्था नहीं है इसलिए चंदौली / वाराणसी से अपना वाहन लेकर जाना बेहतर रहेगा।  रास्ता बहुत ही खूबसूरत है और अगर समय हो तो राजदरी -देवदरी से थोड़ा आगे नौगढ़ की तरफ होकर आइयेगा जहाँ आपको "Watch Tower " देखने को मिलेगा जिस पर चढ़कर आप यहाँ की अद्भुत प्राकृतिक छटा का आनंद उठा सकते हैं।  लौटने में संदीप भाई का बताया हुआ "छान पत्थर " वॉटरफॉल खोजने में हमें दो घंटे लग गए मगर  छानपत्थर कहीं नहीं मिला लेकिन इस दरम्यान मिर्ज़ापुर के गाँवों और "Real India " को देखने का एक अवसर जरूर मिला।  

PC: Chandresh Kumar 

PC: Chandresh Kumar 

PC: Chandresh Kumar 

लौटते हुए संदीप भाई ने , यहाँ की प्रसिद्ध और एकदम खूबसूरत "छातो वैली" (Chhatto Valley) का भी एक चक्कर लगवा दिया।  क्या गजब की जगह है छातो वैली ! जो मॉनसून के मौसम में सुंदरता और हरियाली के मामले में किसी भी हिल स्टेशन से होड़ करती हुई दिखती है।  छोटी -छोटी water streams इसकी सुंदरता में और बढ़ोत्तरी कर देती हैं।  हमारे पास समय की कमी थी और आज का सूरज डूबने की तरफ बढ़ रहा था इसलिए हम नौका दरी तक नहीं जा पाए।  आपके पास समय हो तो आप वहां जरूर जाइयेगा।  

दूसरा दिन खत्म हो चुका था और मैं रॉबर्ट्सगंज की बस पकड़ के निकल चुका था।  संदीप भाई का उपहारस्वरूप दिया हुआ "बनारसी गमछा" और  रसमलाई का डिब्बा अभी भी बैग की शोभा बढ़ा रहे थे जिनमें से मैंने रसमलाई रॉबर्ट्सगंज पहुँचते ही निपटा दी :)  बीच में मेरा एक दिन का  सोनभद्र  के रॉबर्ट्सगंज स्थित चंद्रकांता महल / विजयगढ़ फोर्ट और सलखन फॉसिल्स पार्क का भी प्लान था जिसका ब्लॉग बाद में लिखूंगा।  तो सोनभद्र से निपटकर मैं चल दिया मिर्ज़ापुर ! रात हो चुकी थी और करीब 11 बजे का टाइम था।  भूख के मारे बुरा हाल था मेरा , बंद होते खाने के होटलों  में से एक "पप्पू ढाबे " के आधे गिरे शटर को दोबारा ऊपर कराया -बोला ! एक ही सब्जी बची है ? मैंने कहा -दही है ? हाँ है ! बस फिर सब्जी हो न हो कोई बात नहीं -बस चार रोटी खिला दे ! पेट की गुड़गुड़ शांत हुई तो भारी बारिश से लबालब हुए मिर्ज़ापुर की गंध फेंक रही सडकों पर होटल लेने के लिए ऑटो में चक्कर काटता रहा।  जेल के सामने एक धर्मशाला मिली - दसवीं शताब्दी की बनी हुई प्रतीत होती थी ! लकड़ी की शहतीरों से बने कमरे और हवा का कोई प्रबंध नहीं ! पंखा अपनी अंतिम सांसें गिन रहा था। ..... नहीं भाई ! मैं नहीं रह पाऊंगा यहाँ ! इससे बेहतर तो मैं रेलवे स्टेशन पर जाकर रात गुजार लूंगा !! बोलै -थोड़े ज्यादा पैसे खर्च करोगे ? कितने ? 300 रुपया !! तो ये कमरा कितने का था जो अभी दिखाया !! 100 रूपये का !! मैं मन में बहुत हँसा ! 100 रूपये का। .... कहाँ चला आया मैं !! 300 रूपये का ऊपर की मंजिल पर कमरा मिल गया , हॉल टाइप ! तीन बेड पड़े थे जिन पर गंदे से गद्दे पड़े थे।  आज की रात नींद नहीं आएगी। ... सामने जेल का गेट दिखाई दे रहा था।  चादर मंगवाई। . सड़ी हुई सी थी इसलिए वापस कर दी , अपनी ही बिछा लूंगा।  मच्छरों ने हमला बोल दिया लेकिन शरीर की थकान , मच्छरों के हमले से ज्यादा तारी थी।  सो गया !! 

आज का दिन इधर अपना आखरी दिन था।  सुबह -सुबह विन्ध्वासिनी देवी मंदिर के दर्शन निकल पड़ा।  वहां से टांडा फॉल जाने का सोचा लेकिन ऑटो वाला 500 रूपये मांग रहा था इसलिए विंढम की तरफ बढ़ चला।  

विंढम वॉटरफॉल (Wyndham Waterfall) : उत्तर प्रदेश का शायद सबसे Famous Waterfall होगा विण्ढ़म वॉटरफॉल।  मिर्ज़ापुर से लगभग  13 किलोमीटर दूर बछराकलां के पास विण्ढ़म फॉल का नाम यहाँ कभी 13 वर्षों तक जिलाधिकारी रहे अंग्रेज़ अधिकारी पी विण्ढ़म  के नाम पर है जिनका जिक्र जिम कॉर्बेट ने भी अपनी किताब में किया है।  बहुत ही सुन्दर और शानदार वॉटरफॉल है ये और आसपास के लोगों के लिए "प्रिय पिकनिक स्पॉट" भी है।  फॉल के बाहर खाने -पीने की दुकानें हैं और रोड से वॉटरफॉल तक का करीब एक किलोमीटर का रास्ता देखने लायक है।   




खड़ंजा वॉटरफॉल (Khadanja Waterfall) : विंढम फॉल से बाहर रोड पर आकर आप जब मिर्ज़ापुर की तरफ करीब तीन किलोमीटर लौटेंगे तब आपको खड़ंजा वॉटरफॉल का बोर्ड दिखाई देगा।  Main Road से भी तीन किलोमीटर और अंदर होगा ये वॉटरफॉल लेकिन कोई Public Transport उपलब्ध नहीं है।  या तो अपना कोई वाहन हायर करके ले जाइये या फिर मेरी तरह किसी से लिफ्ट लीजिये। वॉटरफॉल ज्यादा सुन्दर नहीं है इसलिए अगर समय की कमी हो तो आप skip कर सकते हैं यहाँ जाना लेकिन हाँ ! रास्ता बहुत खूबसूरत है।  

लखनिया दरी (Lakhaniya Dari) : लखनिया दरी , मैं 2014 में एक बार जा चुका हूँ इसलिए न तो इस बार इतना वक्त निकाल पाया और न ही इस जगह को प्राथमिकता में रखा।  बनारस से रॉबर्ट्सगंज वाले रास्ते पर , अहरौरा से थोड़ा सा  आगे है ये वाटर फॉल।  रोड से थोड़ा यानी करीब एक किलोमीटर हटकर होगा जहाँ खूब भीड़भाड़ रहती है।  थोड़ा फिसलने से बचने का प्रयास करें और बच्चों का विशेष ध्यान रखें।  बनारस से करीब 55 किलोमीटर और चुनार से 35 किलोमीटर दूर पड़ता है ये वॉटरफॉल। कोशिश करियेगा कि भारी बारिश के बीच यहाँ न जाएँ क्योंकि कई बार यहाँ हादसे होते रहे हैं।  चूना दरी और बद्री दरी वॉटरफॉल भी इसके आसपास ही हैं जबकि करीब 15 किलोमीटर दूर लतीफशाह डैम है।  समय इजाजत दे तो आप एक और वॉटरफॉल जा सकते हैं जिसका मैंने लिस्ट में नाम नहीं दिया है और वो है -डूंगिया वॉटरफॉल ( Dungia Waterfall ) 

टाण्डा वॉटरफॉल (Tanda Waterfall) : बनारस से तो ये वॉटरफॉल दूर है करीब 80 किलोमीटर लेकिन मिर्ज़ापुर से बस 14 किलोमीटर ही है और बहुत ही शानदार दृश्य बनता है बारिश के मौसम में।  आसपास के लोग पिकनिक मनाने के लिए पहुँचते हैं लेकिन Public Transport नहीं मिलता आसानी से।  यहाँ जाएँ तो बोकरिया फॉल मत छोड़ना।  

अलोपी दरी (Alopi Dari) : अलोपी दरी बहुत ही खूबसूरत वॉटरफॉल है जहाँ नाममात्र की जनता पहुँचती है।  मिर्ज़ापुर के मड़िहान क्षेत्र के जंगलों में स्थित ये वॉटरफॉल अभी तक भीड़भाड़ से बचा हुआ है।  रोड से करीब 3 किलोमीटर अंदर है ये वॉटरफॉल और यहीं अलोपी माता का एक मंदिर भी है।  जब जाएँ तो अगरबत्ती का पैकेट भी ले जाएँ यहाँ जलाने के लिए।  Public transport नहीं है इसलिए अपने वाहन से जाएँ तो बेहतर ! यहीं पास में ही जोगिया दरी वॉटरफॉल भी है और थोड़ा और आगे जाकर  Jamithwa Dari भी है।  

मुक्खा वॉटरफॉल (Mukkha Fall) : रॉबर्ट्सगंज और घोरावल रोड पर एक जगह आती है सुकृत , यहाँ से करीब 3 किलोमीटर हटकर एक बहुत शानदार वॉटरफॉल है -मुक्खा वॉटरफॉल।  पब्लिक ट्रांसपोर्ट न के बराबर है इसलिए या तो आप गाडी हायर करके जाएँ या फिर घोरावल से ऑटो किराए पर ले जा सकते हैं।  

बाकी जो वाटरफॉल्स हैं वो कम प्रसिद्ध हैं और बहुत सुन्दर भी नहीं हैं इसलिए लिखने का कोई प्रयोजन नहीं बनता।  आप चाहें तो गूगल मैप में जाकर उनकी लोकेशन पता कर सकते हैं और विस्तृत जानकारी ले सकते हैं।  

बहुत धन्यवाद !! अगले मानसून में संभवतः मैं भी आपको इन जगहों पर भटकता हुआ मिल जाऊं फिर से ........