गुरुवार, 10 नवंबर 2016

First Time in Kumaun : Ghaziabad to Ranikhet

थोड़ा ये सोचिये कि आप सरकारी नौकरी की लाइन में लगे हो और जैसे ही आपके आगे लगे आदमी का नंबर आता है और वो सलेक्ट हो जाता है फिर आपका नंबर है , आपके अंदर की ख़ुशी चरम सीमा पर है , आपने जो सपने संजोये हुए हैं उनको हकीकत बनने में बस कुछ ही पल बचे हैं , लेकिन तभी सामने इंटरव्यू लेने वाला आदमी कह दे - हो गया भाई ! फुल हो गया , अब कोई जगह नही ! जाओ , जाओ सब ! क्या हाल होगा ? क्या गुजरेगी ? खैर इतना बड़ा तो मेरे साथ इस यात्रा में नही हुआ लेकिन हुआ जरूर !

करीब 20 दिन पहले जैसलमेर से चलकर काठगोदाम तक जाने वाली रानीखेत एक्सप्रेस में रिजर्वेशन कराया था ! विचार इस तरह का था कि एक नवम्बर की रात को गाज़ियाबाद से चलकर सुबह 5 या 5 ;30 बजे तक काठगोदाम पहुँच जाएंगे तो नींद भी मिल जायेगी और अगला दिन पूरा घूम लेंगे ! गाज़ियाबाद स्टेशन पर इस ट्रैन का टाइम रात को 11 :30 बजे का है ! मतलब 5 -6 घंटे की नींद मिल जाती काठगोदाम तक पहुँचते पहुँचते ! गाज़ियाबाद से काठगोदाम जाने के लिए दो ही ट्रैन हैं , एक सुबह और एक रात को ! एक नवम्बर को ही मेरा जापानी भाषा का फाइनल टेस्ट भी था जो 3 :30 से 5 :30 होना था और फिर दिल्ली से गाज़ियाबाद पहुँचने में भी समय लगता है तो ये सब सोचकर ही रात वाली ट्रेन का आरक्षण कराया था ! जब आरक्षण कराया था तब वेटिंग 56 और 57 थी लेकिन 31 अक्टूबर को ये 27 , 28 आ गयी तो उम्मीद होने लगी कि शायद कन्फर्म हो जाएगा ! एक नवम्बर को शाम 7 बजते बजते वेटिंग 9 और 10 हो गयी तो घर फ़ोन करके कह दिया -तैयारी करो ! चलेंगे ! बच्चे तुरंत तैयार होने लगे लेकिन 9 बजे के आसपास जब चेक किया तो चार्ट तैयार हो चूका था और हमारी वेटिंग ज्यूँ की त्युं 9 और 10 पर लटकी पड़ी थी ! एक मन आया कि जाना कैंसिल कर दें लेकिन बच्चों ने जिद करी तो फिर आख़िरकार लगभग साढ़े नौ बजे घर से निकल पड़े ! जल्दी ही ऑटो लेकर मोहन नगर पहुंचे तो बस सामान ही उतारा होगा कि जयपुर डिपो की राजस्थान की बिल्कुल खाली बस आकर रुकी , जैसे ही हमने पूछा - हल्द्वानी ? तुरंत दरवाज़ा खुला और रानीखेत की यात्रा शुरू हो गयी ! पहली कुमाऊं की यात्रा !

आज भाई दूज का दिन था लेकिन भीड़ का कोई नामोनिशान नही दिखाई दे रहा था ! मुरादाबाद जाकर बस में कुछ लोग आये और सीट भरने लगीं लेकिन हम अपनी अपनी सीटों पर सोये पड़े रहे , न किसी ने उठाया न हम उठे ! रामपुर में कुछ और लोग आये लेकिन हम यहां भी 'सुरक्षित ' रहे ! ज्यादातर भीड़भाड़ रुद्रपुर तक थी और रास्ता NH -24 पर एकदम मस्त ! रुद्रपुर पहुंचकर ड्राइवर -कंडक्टर ने चाय पी तो मैंने भी एक कप चाय खींच ली , बच्चे गहरी नींद में सोये रहे ! रुद्रपुर से निकले ही होंगे कि बस जितना आगे बढ़ती उतने ही ज्यादा हिचकोले लगने लगते ! बहुत ज्यादा गढ्ढे थे और इतनी बुरी रोड कि शायद इतनी बुरी रोड किसी गांव की भी नही होगी ! ये शायद उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड के बीच फाँसी हुई है इसलिए इस रोड का इतना बुरा हाल हुआ पड़ा है ! रुद्रपुर से बिलासपुर तक लगता ही नही कि हम किसी रोड पर चल रहे हैं बल्कि सच कहूँ तो ऐसा लगता है कि मोबाइल के गेम की जो मंगल गृह का रास्ता है उस पर चल रहे हैं !

हल्द्वानी ! अभी तो रात के साढ़े तीन ही बजे हैं , बड़ी जल्दी ! उतर के खड़े हुए कि एक भाईसाब आये , कहाँ अल्मोड़ा ? न भाई , रानीखेत जाएंगे ! उसने किसी और को आवाज़ दी , उसने आते ही कहा चलिए बस वो लगी है ! बढ़िया ! लेकिन पहले फ्रेश हो लें ! पीछे की सीट मिली , कोई दिक्कत नही ! सब अपनी नींद पूरी कर चुके हैं , अब मैं सो लूंगा ! तीन -चार घण्टे तो लगेंगे ही रानीखेत तक , इतने में नींद का असर कम हो ही जायेगा ! लगभग सुबह 7 बजे रानीखेत पहुँच गए और जाते ही होटल लेकर सो गए ! बस में कितना भी सो लो , नींद पूरी नही होती जबकि ट्रेन में पैर फैलाकर सो जाने से शरीर को आराम मिल जाता है ! दोपहर 12 बजे के आसपास जगे , नहाना किसी को नही है ! सबको रात की ठण्ड ने कंपकपा दिया है ! हाथ मुंह चुपड़ के चल दिया बाहर ! पहले चौबटिया गार्डन चलेंगे !
चौबटिया गार्डन , रानीखेत से 10 -12 किलोमीटर दूर राजकीय उद्यान है जहां सेब आदि फलों के पेड़ हैं लेकिन हम जीप से पहले चौबटिया के जीप स्टैंड तक गए क्योंकि भूख भी लग रही थी ! वहां पेट पूजा करके पैदल पैदल ही पीछे की तरफ यानी रानीखेत की तरफ आर्मी के लोगों के घरों और गलियों को पार करते हुए चल दिए ! रास्ते में एक छोटा सा पार्क दिखा तो बच्चे वहां मस्ती मारने लगे ! यहां एक बात कहता चलूँ - मेरे दोनों बेटों को भारतीय सेना और सैनिक बहुत आकर्षित करते हैं और वो सैनिकों से बहुत प्रभावित रहते हैं ! जब हम चौबटिया के जीप स्टैंड से गार्डन की तरफ आ रहे थे तो , रानीखेत कैंटोनमेंट एरिया होने और कुमायूं रेजीमेंट का मुख्यालय होने की वजह से , बहुत से सैनिक वहां ऑन ड्यूटी भी थे और सड़क पर भी थे , उन्हें देखकर दोनों बच्चे "जय हिन्द " कहते हुए सल्यूट करते जा रहे थे ! दो तीन सैनिकों से हाथ भी मिलाया , जो उनके लिए अविश्मरणीय रहेगा ! जय हिन्द , जय हिन्द की सेना !!

चौबटिया गार्डन में लोग जरूर थे लेकिन न सेब के पेड़ों पर सेब थे और न पत्ते ! बस सूखे सूखे बिना पत्ते के पेड़ ! लेकिन सीढ़ीदार खेत जरूर थे जिनको देखने की मेरी वाइफ और बच्चों की तीव्र इच्छा थी ! खूब फोटो खिंचवाए यहां और एप्पल जैम भी ले लिया ! चाय बिना पिए कैसे काम चलता , ये तो आपको पता ही है ! है , न ? तो जी अगली पोस्ट कुछ दिन में लिखता हूँ तब तक आप भी चाय शाय पी आओ जी !

​चौबटिया में भी चर्च है ! लेकिन 1884 का है जब यहां अंग्रेज़ रहते होंगे




ये सूखे पेड़ तेरे  ... .... बागों में बहार नहीं है
मन भवन सीढ़ीदार खेत

इंतज़ार अच्छा होता है..........................कभी कभी


इतना गुस्से में क्यों है यार..............................पाई



 मिलते हैं जल्दी ही:



बुधवार, 28 सितंबर 2016

Lakshmi Van to Badrinath Return

अगर आपको ये यात्रा वृतांत शुरू से पढ़ने का मन हो तो आप यहां क्लिक करिये, पहले ही पोस्ट से पढ़ पाएंगे !


आज 17​ जून ​2016​ है । हम सतोपंथ से वापस लौटकर लक्ष्मी वन तक आ गये थे कल शाम को । पैर में कल बहुत दर्द था जो आज भी बना हुआ है । आज सच कहूं तो जल्दी से जल्दी बद्रीनाथ पहुंच जाने का मन कर रहा है लेकिन उड़ के तो नहीं जा सकते । हालांकि एक हैलीकॉप्टर उड़ान भरता हुआ इधर हमारे ऊपर चक्कर मार के गया है लेकिन वो हमारे लिये नहीं, सैनिकों के लिये रहा होगा । आज मन नहीं लग रहा । चलते हैं धीरे धीरे । आठ बजे निकल लिये यहां से । एक एक कदम गिन गिन के चलता रहा, फिर से वो ही नजारे देखने को मिल रहे हैं लेकिन न वो पहले वाला जोश है और न पहले वाली उत्सुकता । फिर से चमटोली बुग्याल पार कर लिया लेकिन चुपके चुपके । थोड़ा मुडकर पीछे की तरफ उस गुफा को देखा जहां हमने बैठकर पराठे खाये थे तीन दिन पहले । फिर से उस आदमी की दुकान दिखाई दी जहां हमारे साथ गये पॉर्टरों ने चाय पी थी, और जहां से उनका एक साथी बीमार होने की वजह से वापस लौट गया था ।

चलते चलते तेज ढलान पर उतर कर धन्नो ग्लेशियर पार कर लिया । लेकिन ग्लेशियर आज उस दिन से भी ज्यादा खतरनाक नजर आ रहा है, डर लग रहा है । गिरने के चांस ज्यादा हैं क्योंकि उतरते समय शरीर का पूरा वजन पंजों पर आ जाता है जो नीचे की तरफ धकेलता है । 

मैं ये देख रहा हूं कि सब लोग लगभग साथ ही चल रहे हैं । संदीप भाई भी अपनी स्पीड को रोक कर चल रहे हैं । आनंद वन पार कर लिया है और अब बस मेरे लिये एक जगह और है जिसे मैं अपने लिये खतरनाक मानकर चल रहा हूं । वो ही जगह जहां जाते समय मेरा पैर फिसल गया था । लेकिन अभी वो जगह कुछ आगे है । तब तक संदीप भाई और पॉर्टरों के साथ पैर फैलाकर थोड़ा आराम ले लेता हूं । अभी दोपहर के बारह बजे हैं और बद्रीनाथ सिर्फ चार किलोमीटर दूर रह गया है । मतलब कोई जल्दी नहीं । बस पहुंचना ही तो है । संदीप भाई थैंक्यू, बडा वाला, मेरा साथ निभाने के लिये । कमल भाई को तो थैंक्यू कह चुका हूं । आ गये माता मूर्ति मंदिर । यानि माणा   , भारत का अंतिम गॉव सामने दिखाई दे रहा है और वहां कोई मेला लगा हुआ है । पता लगा आज वहां उत्तराखण्ड के सीएम हरीश रावत पहुंचने वाले हैं । अब सब साथ वाले आगे पीछे हो गये हैं, कुछ पुल पार करके माणा ही चले गये हैं । मैं यहीं बैठ के उत्तराखण्ड की संस्कृति को निहार लेना चाहता हूं , न हिम्मत बची है न ताकत । एक लोकल आदमी से पता किया तो उसने बताया कि वहां " जेठ पुजै " नाम का कोई संस्कृतिक कार्यक्रम चल रहा है । चलते हैं, धीरे धीरे । बद्रीनाथ का मंदिर वो रहा , दिखाई दे रहा है । फिर से शीश झुकाता चलूं , भगवान के लिये जिसने मुझे इतनी हिम्मत और शक्ति प्रदान की , जिसके चलते मैं इस यात्रा को सकुशल संपन्न कर पाया । जय बद्री विशाल की । होटल पहुंचता हूं । 

तीन बजे होटल के बाहर चाय पीकर चलूंगा । कहाँ तो प्लान था कि सतोपंथ के बाद हेमकुण्ड भी जाऊंगा लेकिन पैर की मोच ने सब प्लान गडबड़ कर दिया और अब सुबह पहली बस से हरिद्धार और फिर गाजियाबाद निकल जाऊंगा । 

बोलो बद्री विशाल की जय !!

नोट : इस यात्रा को संपन्न कराने में मेरे साथ गये लोगों का बहुत सहयोग रहा जिनके लिये मैं सदैव उनका आभारी रहूंगा । बीनू भाई जैसा मस्तमौला आदमी इसी यात्रा में मिला , अमित भाई जैसे गुणी गुरू के संपर्क में रहकर कुछ सीखने की कोशिश करी , सुशील जी कैलाशी, संजीव जी, सुमित नौटियाल भाई धन्यवाद एक बेहतरीन यात्रा में साथ देने के लिये । कमल भाई पूरी यात्रा में साथ बने रहने के लिये धन्यवाद । और एक बडा धन्यवाद गज्जू भाई और उनकी टीम को जिसके सतत सहयोग से ही ये यात्रा सकुशल संपन्न हो सकी । 

इस यात्रा के कुछ सलेक्टिव फोटो 









ये माणा में कोई सांस्कृतिक प्रोग्राम चल रहा है

सतोपंथ यात्रा का आज औपचारिक समापन हो रहा है !! जय बद्री विशाल


इस यात्रा के बाद बीच बीच में " New  Delhi to Thiruvanathpuram by Passenger Train " की यात्रा कर आया हूँ ! ये यात्रा आपको पसंद आएगी या नहीं , मैं नही जानता लेकिन मेरे जीवन की यादगार यात्रा होगी ! इसके माध्यम से आपको दिल्ली से लेकर त्रिवेंद्रम तक पड़ने वाले सभी छोटे बड़े रेलवे स्टेशन के विषय में पढ़ने को मिलेगा और इसके साथ ही इस रुट पर आने वाले सभी धार्मिक , दर्शनीय स्थलों की सैर सपाटा भी होती रहेगी ! तो हाथ उठाइये , कौन कौन साथ रहेगा ?



शनिवार, 10 सितंबर 2016

Satopanth to Swargarohini and Return

अगर आपको ये यात्रा वृतांत शुरू से पढ़ने का मन हो तो आप यहां क्लिक करिये, पहले ही पोस्ट से पढ़ पाएंगे !


शानदार सुबह है आज ! अंग्रेजी कैलेण्डर  के अनुसार आज 16 जून 2016 का दिन है , होता रहे लेकिन मेरे लिए आज हिन्दू कैलेण्डर ज्यादा मायने रखता है ! आज एकादशी है , जी , एकादशी ! और आज के दिन त्रिदेव भगवान शिव , विष्णु और ब्रह्मा जी स्नान करने आएंगे इस पवित्र सरोवर "सतोपंथ " में ! न तो मैं दिव्यात्मा हूँ और न हमारे ग्रुप में मुझे कोई लगा , जिसे इन तीनों भगवान में से किसी एक के भी दर्शन हुए हों !

रात बीनू भाई की तबियत कुछ गड़बड़ा गयी तो उन्होंने सुबह सुबह ही वापस उतर जाने का प्लान बना लिया और बीनू भाई के साथ सुमित भी उतर जाएंगे ! आठ बजे के आसपास वो दोनों चाय नाश्ता लेकर नीचे की तरफ चल दिए ! कुछ ने स्वर्गारोहिणी की तरफ जाने की हिम्मत नही दिखाई और वहीँ आराम किया ! आखिर मैं , अमित तिवारी , जाट देवता संदीप भाई , सुशील जी और विकास नारायण , गाइड गज्जू भाई को लेकर स्वर्गारोहिणी की तरफ बढ़ चले ! सतोपंथ से मुश्किल से 500 मीटर चलने के बाद बहुत ही खतरनाक धार पर चलना पड़ा ! इतनी शार्प धार कि बाएं तरफ फिसले तो लुढकते लुढकते जान जाएंगी और दाएं तरफ कैसे भी शरीर का बैलेंस बिगड़ा तो बर्फ में बने छोटे छोटे गड्ढे अपने में दबा लेंगे ! बस जैसे तैसे उस पॉइंट तक पहुंचे जहां एक लाल रंग की झंडी लगी थी , जो ये बता रही है कि आप स्वर्गारोहिणी पहुँचने वाले हो लेकिन वास्तव में स्वर्गारोहिणी अभी यहां से 1 -1. 5 किलोमीटर दूर होगी ! अमित भाई हमेशा तेज चलते हैं तो स्वाभाविक बात है कि वो सबसे पहले वहां पहुँच गए और जब तक हम लोग पहुंचे वो स्वर्गारोहिणी की तरफ कदम बढ़ा चुके थे ! इस लाल झण्डी से लेकर स्वर्गारोहिणी तक "चन्द्र कुण्ड " " सूर्य कुण्ड " और " विष्णु कुण्ड " नाम के तीन कुण्ड देखने को मिलेंगे लेकिन हमारी हिम्मत आगे का रास्ता देखकर खत्म हो रही है ! आगे बहुत - बहुत कठिन रास्ता नजर आ रहा है जिस पर जगह जगह बड़े बड़े क्रेवास , बोल्डर दिखाई दे रहे हैं ! हम बस अमित भाई को जाते हुए देख रहे हैं और उनके पीछे गज्जू भाई को !

आपने टीवी चैनलों पर स्वर्गारोहिणी पर्वत को जरूर देखा होगा जिसमें वो स्वर्ग की सीढियां दिखाते हैं , वो मुझे नही लगता कि वहां तक जाते होंगे बल्कि इसी झण्डी पर रूककर यहीं से अपना कैमरा ज़ूम करके उन सीढ़ियों की शूटिंग कर लेते होंगे , उनके कैमरे वैसे भी बहुत बढ़िया क्वालिटी और बहुत ज्यादा ज़ूम के होते हैं ! हमारे चैनल वालों में न इतनी हिम्मत है और न इतनी फिटनेस कि वो ऐसे रास्तों को नाप भी सकें , जहां हर कदम मौत "क्रेवास " के रूप में "ट्रैप " लिए हुआ आपका इंतज़ार कर रही है ! हमारे टीवी चैनल वाले बस राजनीतिक बहस कर सकते हैं , कि केजरीवाल ने क्या कहा ? मोदी ने क्या कहा ? अब चैनल वालों को किसने क्या किया से ज्यादा इस बात की फ़िक्र रहती है कि किसने क्या कहा ? लेकिन फिर भी बेहतर है कभी कभी तो ये ऐसे दुर्गम स्थानों की यात्रा करा ही देते हैं !!

स्वर्गारोहिणी वो जगह है जहां से युद्धिष्ठर अपने कुत्ते के साथ शरीर सहित स्वर्ग गए थे , और यहां उनके लिए स्वर्ग से स्वयं धर्मराज उन्हें लेने आये थे ! इस पर्वत पर जहां हमेशा बर्फ होती है , तीन - चार सीढ़ियों जैसी आकृति दिखाई देती है और उन्हें हम स्वर्ग की सीढियां मानकर नमन कर लेते हैं ! हमने भी वहीँ झण्डी वाली जगह से दूर से , हाथ जोड़कर इन सीढ़ियों को नमन कर लिया और अमित भाई को उस रास्ते पर आगे जाते हुए देखकर वापस मुड़ आये !

वापस सतोपंथ आकर कुछ खाया , दो लोग पहले ही नीचे की ओर जा चुके थे , अमित भाई स्वर्गारोहिणी की तरफ चले गए , बाकी हम जितने भी बचे , सब नाश्ता पानी लेकर सतोपंथ को अलविदा कह रहे थे ! मैंने मुड़ मुड़कर दो तीन बार उस पवित्र ताल को देखा और अपने आपको थोड़ा सा गौरवान्वित महसूस किया ! भगवान को धन्यवाद देने का मन किया तो सबसे पीछे कुछ देर रुककर , उस पवित्र ताल और उस परमपिता परमेश्वर के सम्मान के लिए अपना सिर झुकाकर नमन किया ! सुबह के साढ़े नौ या दस बजे होंगे ! वापस चलते हैं ! और वापसी में लक्ष्मी वन तक उतर जाने का मन है !

ओह ! सतोपंथ से नीचे उतरते ही पाँव फिसल गया और मुड़ गया है ! बहुत दर्द हो रहा है , चलना एकदम मुश्किल ! आयोडेक्स लगा लिया , कपड़ा भी बाँध लिया लेकिन दर्द कम नही हो रहा ! चलने की स्पीड बहुत कम है लेकिन क्योंकि हम उतर रहे हैं इसलिए ज्यादातर दबाव एड़ी पर नही , पंजों पर आ रहा है ! एक दो बुजुर्ग से लोगों को नीचे की तरफ से आते हुए देखता हूँ तो हौसला और भी बढ़ जाता है ! कुछ महिलाएं भी अपना स्टेमिना आजमा रही हैं या फिर अपनी श्रद्धा को पुनः परिभाषित कर रही हैं , वो ही जानें ! चक्रतीर्थ निकल गया है , जहां हम एक रात पहले रुके थे लेकिन आज अभी और चलना है और अभी टाइम भी बहुत है अपने पास ! मुश्किल से दोपहर के 12 बज रहे होंगे ! लेकिन जैसे ही चक्रतीर्थ वाली पहाड़ी से नीचे की तरफ उतरने लगा , बारिश होने लगी ! तुरन्त बैग में रखा पोंचू निकाला , लेकिन जल्दी जल्दी में पोंचू की बांह फट गयी ! जिस दिन यहां से गुजरे थे , मौसम बिलकुल साफ़ था , और यहां संजीव त्यागी जी ने स्नान भी किया था , लेकिन आज सब जगह पानी ही पानी था , रास्ता भी नही दिख रहा था तो फिर से ऊपर चढ़ना पड़ा , जहां बड़े बड़े पत्थर थे ! एक बार आगे चल रहे लोगों ने हाथ हिलाकर कुशल क्षेम भी पूछ ली , लेकिन फिर उसके लगभग आधा घंटे तक कोई नही दिखा , मैं इतनी भयंकर बारिश में अकेला ही चलता रहा ! अब तक का सबसे कठिन समय था ये इस यात्रा का ! पैर में भयानक दर्द , ऊपर से भयानक बारिश और रास्ते का कोई अंदाज़ा नही ! परेशानी के बादल जल्दी ही छंट गए , ऊपर बारिश बंद हो गयी और नीचे कमल भाई दूर बैठे इंतज़ार करते हुए दिखाई दे गए ! बाकी लोग आगे जा चुके हैं ! सब लक्ष्मी वन पर मिल जाएंगे ! धीरे धीरे चलते हुए , अलका पूरी पहुँच गए ! पीछे से अमित भाई भाई अपनी घोड़े वाली चाल से चले आ रहे थे ! उनका जूता खून से भरा हुआ था ! वो जब स्वर्गारोहिणी गए थे तब उन्हें भयंकर चोट लग गयी और उनका पैर फट गया था , लेकिन बंदे की चाल पर कोई फर्क नही पड़ा ! थोड़ी देर में ही हमसे आगे निकल गए !

मैं और कमल भाई आराम आराम से चलते रहे , एक जगह आकर दो तीन टेंट दिखाई दिए जिनमें शायद कपल थे , उनकी आवाज़ सुनकर ऐसा ही महसूस हो रहा था ! उसी गुफा के पास जहां बीनू भाई को गुफा में बिल्ली दिखाई दी थी ! वो लक्ष्मी वन दिखाई दे रहा है , आज भारी बारिश की वजह से छोटे छोटे झरने भी पूरी तेजी से बह रहे हैं और उन्हें पार करना मुश्किल सा हो गया है !

लक्ष्मी वन पहुँच गए हम भी , जहां पहले से और लोग भी आये हुए हैं ! हाँ , बीनू बाबा और सुमित नौटियाल यहां नही हैं , वो लोग आज ही बद्रीनाथ तक उतर गए होंगे ! शाबाश ! एक ही दिन में 28 किलोमीटर ! बढ़िया ! लक्ष्मी वन पर कल एक नए बाबा ने ठिकाना बना लिया है जिनका आश्रम अभी निर्माणाधीन है ! थका हुआ हूँ , जल्दी खा पीकर सोना चाहता हूँ !! 


फिर मिलेंगे जल्दी ही:


स्वर्गारोहिणी
इन रास्तों पर ऐसे चोर बहुत मिलते हैं

इन रास्तों पर ऐसे चोर बहुत मिलते हैं

स्वर्गारोहिणी


रास्ता दिख रहा है कहीं ? अमित भाई इसी रास्ते से गए थे स्वर्गारोहिणी





पीछे स्वर्गारोहिणी है
सीढियां दिखी क्या ?








ये फिर से सहस्त्रधारा पहुँच गए
ये फिर से सहस्त्रधारा पहुँच गए

हम स्वर्गारोहिणी तो नही पहुँच पाए , झंडी पकड़ के ही फोटो खिंचवा लेते हैं
ये तसवीरें हमेशा याद रहेंगी !!