मंगलवार, 25 अगस्त 2015

​वसुधारा फॉल :माणा

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वसुधारा फॉल पहुँचते पहुँचते बुरी हालत हो गयी लेकिन वहां पहुंचकर जो आनद मिला उसे शायद कभी शब्दों में बयान न किया जा सके। कुल मिलाकर उस वक्त वहां हमसे पहले छह लोग थे। एक परमानेंट वाले बाबा , एक चलते फिरते बाबा और चार लोग और जिनमें दो महिलाएं थीं ! उन चार लोगों में से दो लोग अपनी मॉउंटेनीरिंग में काम आने वाली स्टिक और बड़ा सा कैमरा लेकर बैठे थे। थोड़ी दूर थे वो हमसे ! हम जाते ही परमानेंट वाले बाबा के आश्रम में पहुँच गए। असल में SLET के छात्र मुझसे पहले पहुँच गए थे और वो बाबा के आश्रम के बाहर चाय पी रहे थे। मैं पहुंचा तो मुझे भी गिलास भर के चाय दी। मैंने चाय देखते ही कहा -अरे ये तो बिलकुल पिंक है !! बाबा गुस्सा हो गए ! हम्म बहुत बड़े अँगरेज़ हो ? गुलाबी नही कह सकते !! खैर उन बाबा ने ही बाद में बताया कि इसमें शंखपुष्पी और जाने क्या क्या मिलाया हुआ है इसलिए गुलाबी हो गयी है ! इतनी बर्फ में चाय मिल जाए तो मजा ही अलग है ! परमानेंट बाबा इसलिए कहा क्योंकि वो वहां दिसंबर तक रहते हैं और फिर वापिस नीचे आ जाते हैं बाकी लोग , बाकी बाबा चलते फिरते रहते हैं ! SLET के छात्र इधर उधर घूमते रहे और मैं अकेला बाबा के पास बैठा रहा ! बाबा ने पूछा उम्र क्या हो गयी ? मैंने मोबाइल पकड़ रखा था और उसमें कुछ देख रहा था , बाबा बोले - मोबाइल में अपनी उम्र देख रहे हो ? मजेदार बाबा !!

वहीँ एक और बाबा मिले जिन्हे मैंने चलते फिरते बाबा लिखा है ! ये असल में तीन चार दिन से यहां थे और दो दिन से भूखे थे ! किसी ने इन्हे चार पराठे खिला दिए और इनका मन तृप्त हो गया ! फोटो में दिखेंगे आपको ! बाबा से फुर्सत पाकर अब इधर उधर के फोटो लेने शुरू किये और धीरे धीरे उन लोगों के पास पहुँच गया जो इधर बहुत देर से आराम फरमा रहे थे और अपने कैमरे को ट्राइपॉड पर रखकर बस बैठे बैठे ही फोटो खींचे जा रहे थे ! ओह , ग्लव्स भी हैं ! पूरी तैयारी के साथ आये हैं लेकिन वसुधारा फॉल के पास तक नही जा रहे ? हिम्मत नही हो रही !! वसुधारा फॉल को कोई कोई वसुंधरा फॉल भी कहते हैं ! हालाँकि मैं सिर्फ वसुधारा फॉल तक ही गया लेकिन इसके लगभग पांच किलोमीटर आगे अलकापुरी है जो धन के देवता कुबेर का निवास स्थान माना जाता है ! यहां से सतोपंथ और बलाकुन चोटियां स्पष्ट दिखाई देती हैं ! सतोपंथ वो जगह है जहां पांडवों ने मोक्ष प्राप्त किया था ! पांडव इसी रास्ते से स्वर्ग के लिए गए थे और उनके प्रस्थान के रास्ते को स्वर्गरोहिणी कहा जाता है !

वसुधारा फॉल पर उस महिला की मौत की खबर ने सबको सतर्क कर दिया था या ये कहूँ कि सबको डरा दिया था। इसलिए कच्ची बर्फ पर चलकर फॉल तक जाने की कोई हिम्मत नही दिखा पा रहा था ! SLET के छात्र भी एक साथ बैठे जाने क्या रणनीति बना रहे थे और इतने में मैंने अपने आपको वहां जाने के लिए प्रोत्साहित कर लिया ! भगवान का नाम लिया और पहला कदम बढ़ा दिया ! 445 फुट यानि लगभग 145 मीटर ऊँचे फॉल को देखने का लोभ छोड़ ही नही पा रहा था ! वहां जो रास्ता था वो ये बता रहा था कि लोग मुझसे पहले वहाँ गए हैं लेकिन वो शायद सुबह गए होंगे और दोपहर बाद बर्फ और भी कमजोर हो जाती है इसलिए खतरा और भी ज्यादा था ! बीच रास्ते में पता नही कैसे बर्फ मेरे जूतों में घुस गयी ! लेकिन अगर यहाँ जूता खोलूंगा तो संतुलन गड़बड़ा जाएगा , पांच मिनट में ही पैर एक तरह से गल सा गया ! उधर जाकर ही बर्फ निकाली ! बर्फ कहाँ वो तो अब पानी बन चुकी थी ! फॉल के बिलकुल जड़ में खड़े होकर फोटो लेने का मजा ही कुछ अलग था लेकिन यहां तक पहुँचने के लिए कितनी बार भगवान को याद कर लिया होगा ! एक जगह बिलकुल खाली खाली जगह सी दिखी ! दूर से हाथ मारा -बर्फ पूरी टूट गयी ! बच गया ! कहीं पैर पड़ जाता तो लेने के देने पड़ जाते ! ज्यादा हिम्मत वाले लोग उस फॉल के नीचे नहाकर भी आते हैं लेकिन मैं इतना हिम्मत वाला नही था या फिर फैमिली की फ़िक्र !! पीछे मुड़कर देखा -SLET के छात्र अलविदा कहने को हाथ उठा रहे थे और मैं अभी उनसे बहुत दूर था ! उन्होंने वहां तक आने की हिम्मत नही दिखाई ! सही किया !! 

उधर एक वीडियो बनाया ! कई सारे फोटो खींचे और चल दिया ! मैं अभी वापिस पहुंचा था कि उन चार में से एक मेरे पास आया ? डर नही लगा आपको ? मैं कैसे कहता कि नही लगा ? बहुत डर लगा था लेकिन हिम्मत से और भगवान की कृपा से संभव हो पाया ! वो केरल के रहने वाले थे ! धीरे धीरे करके एक ने हिम्मत दिखाई और जब वो उस पार पहुँच गया तब दूसरा स्टार्ट हुआ ! मैं उन्हें देखते हुए वापिस आकर एक जगह बैठ गया ! भगवान को धन्यवाद दिया और अपने खींचे हुए फोटो देखने लगा !!

145 फुट की ऊंचाई से गिरता वसुधारा फॉल

145 फुट की ऊंचाई से गिरता वसुधारा फॉल ! थोड़ा और पास




145 फुट की ऊंचाई से गिरता वसुधारा फॉल ! थोड़ा और पास
145 फुट की ऊंचाई से गिरता वसुधारा फॉल ! थोड़ा और पास

ये पीछे वाले बाबा , जिन्हे चार पराठे मिले तो इनकी आत्मा तृप्त हो गयी
ये मोबाइल नंबर काम करता है क्या वसुधारा फॉल पर ?
एक फोटो तो मेरा भी बनता है !!












 आगे जारी है :

शुक्रवार, 21 अगस्त 2015

माणा से वसुधारा फॉल की ओर

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माणा पार करने के बाद मेरा अगला लक्ष्य वसुधारा फॉल तक जाने का था ! वसुधारा फॉल यहां माणा से करीब 7 किलोमीटर दूर है और बद्रीनाथ से 10 किलोमीटर होगा ! क्योंकि वसुधारा फॉल पर रुकने का कोई ठिकाना उपलब्ध नहीं है इसलिए वापस भी लौटना ही पड़ेगा अन्यथा एक रात उधर बिताने का अपना अलग ही आनंद होता ! आज लगभग 20 किलोमीटर की ट्रैकिंग हो जाएगी ! भीम शिला पार करते ही पत्थरों से बना एक रास्ता दिखने लगता है। पैदल का ही रास्ता है यानि आप को ट्रैकिंग ही करनी पड़ेगी ! थोड़ी दूर ही पहुंचा होऊंगा दो लड़के आराम फरमाते हुए मिले ! उनके पीछे ही मैं भी चल दिया ! आगे तीन और मिले , वो इन्ही के साथी थे ! ये असल में संत लोंगोवाल इंजीनियरिंग कॉलेज(SLET )  , संगरूर पंजाब के इंजीनियरिंग के छात्र थे ! इनमें से एक वर्किंग में था जो सरदार था ! दो तीन का नाम याद आ रहा है ! सिख युवक का नाम बिलावल था और जो इस ग्रुप को लीड कर रहा था वो चमोली , उत्तराखंण्ड का ही भूपेंद्र नेगी था ! पूरा ग्रुप एकदम अच्छा ! इंजीनियरिंग के बच्चे और इंजीनियरिंग का मास्टर मिल जाएँ तो ज्यादा औपचारिकताएं नही रहती ! एक तरह से कुछ देर बाद में भी इसी ग्रुप का हिस्सा हो गया ! ये सात किलोमीटर ज्यादा से ज्यादा दो घंटे का रास्ता होना चाहिए था लेकिन हमें पूरा साढ़े तीन घंटे लग गए ! जो जब जहां होता वो बैठ जाता , कोई वहीँ रास्ते के किनारे अपनी नींद निकाल लेता ! डेढ़ दो किलोमीटर तक रास्ता दीखता है ! पत्थर तरीके से लगाकर रास्ता बनाया हुआ है फिर कहीं कहीं रास्ता दिखता है और थोड़ा और आगे जाकर रास्ता ख़त्म ! छोटी छोटी पगडंडियां बनी हुई हैं ! रास्ते में कोई लौटता हुआ मिल गया , उससे पूछने लगे अभी कितना दूर है वसुधारा ? कोई कहता अभी तीन किलोमीटर , अभी दो घंटे का रास्ता और है ! 

हालाँकि मुझे बहुत ज्यादा ज्ञान नहीं है लेकिन फिर भी इतना आभास हो रहा था कि धूप की किरणें बर्फ से टकराकर रिफ्लेक्ट हो  रही हैं ! इसी के कारण स्किन जलने लगी थी ! हालाँकि आँखों पर चश्मा चढ़ा रखा था और मुंह पर गमछा लपेटा हुआ था लेकिन फिर भी नाक खुली रह गयी और घर लौटकर मालुम हुआ कि नाक पर एक पपड़ी जम गयी है ! ओह ! चार पांच दिन लग गए सही होने में ! बड़ा अजीब सा मौसम होता है ! सुबह सर्दी थी और जैकेट पहननी पड़ी थी और अब इतनी गर्मी है कि जैकेट उतार के कंधे पर लटकानी पड़ी और कुछ कदम चलते ही पानी की जरुरत पड़ने लगी ! मेरे पास बस पानी की एक ही बोतल थी और उसमें से भी एक बार दो लोगों को जो अलग से जा रहे थे उन्हें पिला चुका था ! पानी की कमी होने लगी थी ! किसी से पूछा पानी कहाँ मिल जाएगा ? बोले वसुधारा फॉल पर एक बाबा का आश्रम है वहीँ पानी मिल पायेगा ! एक एक घूंट पानी बचाने लगे ! सब के पास लगभग खतम होने को था ! 

रास्ते में एक ग्लेशियर मिला ! सब उस को पार करने में डर रहे थे ! डरना जरुरी भी था क्योंकि जब मैं घर से चला था उससे एक दिन पहले अखबार में ये खबर आई थी कि वसुधारा फॉल जाते हुए एक महिला ग्लेशियर से फिसल गयी और उसकी मौत हो गयी थी ! कुछ खतरे ऐसे होते हैं जिनके बारे में अगर आप अनभिज्ञ हैं तो आपको डर नही लगेगा लेकिन जानबूझकर आप ऐसे खतरे नही ले सकते ! मैंने ही हिम्मत दिखाई और मैं धीरे धीरे करके पार हो गया ! उन लड़कों में भी हिम्मत आ गयी और जैसे तैसे वो भी पार कर गए ! रास्ता सिर्फ इतना था कि आप एक ही पैर जमा सकते हैं दूसरा पैर आपको आगे ही रखना पड़ेगा ! जय बद्रीविशाल ! ग्लेशियर मैंने पहले भी पार किये हैं ! हेमकुण्ड साहिब जाते हुए इससे भी ज्यादा बड़ा और लंबा ग्लेशियर पार किया है लेकिन उन पर रास्ता ज्यादा चौड़ा था और लोग भी ज्यादा थे ! यहां एक दो एक दो लोग ही दीखते हैं ! आगे बढ़ते गए ! पानी बिलकुल ख़त्म हो चुका था ! गले सूखने लग गए थे ! एक जगह साफ़ सुथरी बर्फ मिली ! उसमें से पानी नीचे की तरफ गिर रहा था , मैंने बोतल भर ली ! बच्चे कहने लगे - सर ये पानी नुकसान कर जाएगा ! भाई पहले पानी पीना जरुरी है , नही तो जान पर बन आएगी ! नुकसान करेगा बाद में देखा जाएगा ! उन्होंने भी अपनी अपनी बोतल भर ली ! जिंदगी मिल गयी !



बर्फ तो है लेकिन मैली हो चुकी है
भाईसाब योगी सारस्वत




ये SLET के छात्रों की मंडली





इस बर्फ से धीरे धीरे कर के नीचे पानी बह रहा था उसी से अपनी बोतल भर ली









ये दूसरी तरफ की पहाड़ियां जिन पर बर्फ का नामोनिशान भी नहीं ! कोई प्लीज बताइये ऐसे क्यों होता है की पहाड़ पर एक तरफ तो इतनी बर्फ और दूसरी  तरफ बिलकुल भी नही ?




​​ये ग्लेशियर जिसे पास करने में बड़ी दिक्कत हुई
सरदार जी सबसे बाद में आये

ऐसा रास्ता है ! पथरीला ! कुछ दूर चलने के बाद ये भी गायब हो जाता है


इसमें एक गुफा सी थी , इस पत्थर के नीचे ! थोड़ी देर वहां बैठे रहे

ये आईटीबीपी की कोई बटालियन है ! नीचे वापस आते हुए दिखे






                                                                                              यात्रा जारी रहेगी :