गुरुवार, 24 अप्रैल 2014

स्टील सिटी में श्री जवाहर सिंह जी के साथ

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इलाहबाद पर पहुँचते पहुँचते रात हो गयी थी ,पक्का था कि अब सो जाना चाहिए क्यूंकि बहुत सुबह का जगा हुआ था ! इसी सोने सोने में मेजा रोड , विंध्याचल , मिर्ज़ापुर , चुनार , रॉबर्टसगंज और चुर्क स्टेशन निकल गए ! चोपन स्टेशन पर इसे रात को 10 बजे पहुँच जाना चाहिए था लेकिन जब हमारी आँख खुली और देखा कि ट्रेन चोपन पर रुकी हुई है , सुबह के 6 बजे हुए थे यानि 8 घण्टे देरी से चल रही थी ट्रेन ! चोपन पर मुंह हाथ धोकर चाय पी और पानी में भीगे चने का नाश्ता किया ! मुझे बुरी आदत है कि मैं बिना मुंह धोये चाय पीता हूँ , लेकिन यहाँ कम से कम मुँह तो धो लिया था ! चोपन पर ही पहली बार वी.आई.पी प्लेटफार्म भी देखा ! फोटो लगा है उसी वी.आई.पी प्लेटफार्म का ! ऐसा होता होगा वी.आई.पी प्लेटफार्म ? चोपन के बाद रेनुकूट होते हुए निकल चले विंढमगंज स्टेशन ! ये उत्तर प्रदेश में पड़ने वाला इस लाइन पर आखिरी स्टेशन है , इससे आगे फिर झारखण्ड शुरू हो जाता है ! नगर उंटारी झारखण्ड का इस ट्रैक पर पहला स्टेशन है ! जैसे जैसे झारखण्ड में आगे चलते गए वहां के हालात से परिचित होते चले गए ! इतनी गरीबी , इतना सूखा ! इतनी खाली खेत खलिहान ? छोटे छोटे खेत , जो उनकी जीवन चलाने के लिए किसी भी तरह से शायद काफी नहीं होते होंगे ! राजधानी में एयर कंडिशन्ड कमरों में बैठे हमारे माननीयों को इधर भी कुछ ध्यान देना होगा !


झारखण्ड को क्षमा याचना के साथ झाड़खण्ड कहना ज्यादा मुफीद होगा ! हर जगह बस नीरसता , खालीपन ! हाँ , मोटर साइकल्स जरूर दिखती रहीं ! एक जगह पड़ती है गढ़वा ! जब ट्रेन उस स्टेशन पर रुकी तो कई सारे लोगों ने अपने हाथ में बन्दूक थाम रखी थी, सुनते रहे थे कि ये नक्सल प्रभावित इलाका है ! तो क्या सच में नक्सली हैं ये ? लेकिन वहां का माहौल देखकर तो ऐसा नहीं लग रहा था ! जैसे ही ट्रेन रुकी , ज्यादातर वो लोग जिनके हाथ में बन्दूक थी , हमारे ही डिब्बे में चढ़ आये ! फूंक सरक गयी अपनी ! उन्होंने एक के लिए जगह मांगी हम पूरा ही खिड़की की तरफ सरक गए ! हालाँकि बाद में बातचीत में पता चला कि वो सादी वर्दी में झारखण्ड पुलिस के लोग थे ! ऐसे होते हैं पुलिस वाले ? न ढंग से दाढ़ी बनी हुई , न बाल ठीक से कटे हुए ! लेकिन सब जींस में थे और हट्टे कट्टे थे ! हमें क्या !

जमशेदपुर में स्पष्ट रूप से कहूँ तो देखने को कुछ भी नहीं है ! बस , टाटा का नाम जपते रहिये ! लेकिन इतना है की वहां के लोगों की पिकनिक बहुत सुन्दर बन जाती है ! यानी एक दिन आप बढ़िया गुजार सकते हैं ! सब कुछ टाटा का दिया हुआ है जमशेदपुर को ! शहर के नाम से लेकर बिजली पानी तक ! सब कुछ टाटा !

जमशेदपुर पहुँचते ही श्री जवाहर सिंह जी और मित्र सुशील शर्मा को सूचित कर दिया ! टाटा नगर पहुँचते पहुँचते हमारी ट्रेन 10 घंटे लेट हो चुकी थी ! ये 12 अप्रैल का दिन था जो ख़त्म हो रहा था ! सुशील से बात हुई तो मिलने का प्रोग्राम भी फिक्स हुआ और हम करीब 9 बजे रात को उसके यहां जा धमके ! खाना वाना खा पीकर होटल पहुंचे ही होंगे कि श्री जवाहर सिंह जी का फोन आ गया कि कल मैंने शिफ्ट बदल ली है , अब मैं शाम को कंपनी जाऊँगा ! पक्का हो गया कि अगले दिन श्री जवाहर सिंह जी के यहां जाना है !

अगले दिन यानी 13 अप्रैल को अपना कॉलेज का काम ख़त्म करके करीब दोपहर 2 बजे हम श्री जवाहर जी के यहां पहुँच गए ! खाना खाया , बल्कि ज्यादा खाया क्यूंकि श्रीमती जवाहर सिंह जी ने खाना ही इतना स्वादिष्ट बनाया था ! अब बस यही सोच थी कि ए.सी. की ठण्डक में एक नींद ले ली जाए लेकिन समय इजाजत नहीं दे रहा था इसलिए वहां से जुबिली पार्क के लिए निकल चले !



भारतीय रेलवे का वी आई पी प्लेटफार्म




भारतीय रेलवे का वी आई पी प्लेटफार्म






ट्रेन से दिखता हिंडालको प्लांट


बहुत सुन्दर स्टेशन है ये
उत्तर प्रदेश का इस लाइन पर आखिरी स्टेशन
झारखण्ड का इस लाइन पर पहला स्टेशन
नक्सलवाद से प्रभावित लातेहार

शायद बड़ा भाई काना रहा होगा उसी के नाम पर बड़का काना यानी बरकाकाना
झाड़खण्ड
झाड़खण्ड

यहाँ रांची के लिए ट्रेन बदल सकते हैं
जमशेदपुर से बिलकुल पहले का स्टेशन ! बंगाल में पुरुलिया की तरफ की गाड़िया इधर से निकलती हैं

मुरी पर हालत खराब सी हो गयी थी बैठ बैठे ट्रैन में 








                                                           आखिर टाटा नगर पहुँच ही गए



                                               आदरणीय श्री जवाहर सिंह जी के साथ


विश्व प्रसिद्द मैनेजमेंट इंस्टिट्यूट 


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शुक्रवार, 18 अप्रैल 2014

स्टील सिटी जमशेदपुर में

जमशेदपुर जाने का कोई प्रोग्राम पहले से नहीं था लेकिन जब पता चला कि कुछ लोग बाहर जा रहे हैं कॉलेज के विज्ञापन के लिए तो मैंने भी अपना नाम लिखवा दिया और जमशेदपुर जाने का कार्यक्रम बन गया ! दो बातें एक साथ हो गयीं ! एक तो कॉलेज का काम हो गया दूसरा मेरा जमशेदपुर देखने और घूमने का मौका भी तैयार हो गया ! जैसे ही प्रोग्राम फाइनल हुआ , मैंने अपने मित्र सुशील शर्मा और ब्लॉगर मित्र श्री जवाहर सिंह जी को तुरंत सूचित कर दिया ! उन्हें सूचित करने के तुरंत बाद का काम था कि ट्रेन में टिकेट देखा जाए , और मिला भी ! इधर से जब देखा कि जम्मू तवी से टाटा नगर ( जमशेदपुर ) जाने वाली मुरी एक्सप्रेस में स्लीपर क्लास में अलीगढ से 17 सीट उपलन्ध हैं , तुरंत आरक्षण करा लिया ! असल में मैं जब अमृतसर से जनवरी में लौटा था तो इस ट्रेन ने हमें बिलकुल ठीक समय पर गाजियाबाद उतार दिया था इसलिए यही सोचा था कि ये बेहतर रहेगी लेकिन आखिर में ये अति आत्मविश्वास ले डूबा और ये ट्रेन टाटानगर पहुँचते पहुँचते 10 घंटे लेट हो गयी ! खैर ! ये अच्छा रहा कि लौटने के लिए इस ट्रेन को वरीयता नहीं दी , उधर से हमें आरक्षण मिला ओडिशा से आने वाली ओडिशा सम्पर्क क्रांति एक्सप्रेस में !


11 अप्रैल को सुबह 5 :30 बजे की ट्रेन मुरी एक्सप्रैस पकड़नी थी तो इसका मतलब था कि मुझे कम से कम 4 बजे जागना पड़ता , और इतनी जल्दी मैं शायद साल दो साल में एक दो बार ही जग पाता होऊंगा , पक्का था कि मैं नहीं जग सकता इतनी जल्दी ! इसलिए बेग़म साहिबा को कह दिया कि मुझे ठीक 4 बजे फोन करें ! ससुर साब को भी कहा कि मुझे 4 बजे फोन करके जगा दें ! मकान मालिक को भी कहा कि दरवाजे पर आकर खटखट कर दें और कहें कि योगी अब जग जा , 4 बज गए ! आप सोच रहे होंगे , अजीब बेवकूफ है ! इतने सारे लोगों से कहने की क्या जरुरत थी , अलार्म लगा देता ! असल में मुझे अलार्म कभी जगा ही नहीं पाता ! वो शायद मेरे लिए नहीं है ! हाँ अगर कोई 2-3 बार फोन कर दे तो तुरंत बैठ जाता हूँ और फिर जाग भी जाता हूँ ! आलस बड़ी चीज है !


खैर जैसा कि अक्सर होता है जागते जागते 4 की जगह साढ़े चार बज गए ! लेकिन ये भी होता है कि जब समय कम होता है तो काम स्पीड से भी होता है और वही हुआ ! ठीक 5 बजे तैयार और ऑटो वाले को फोन किया कि आजा भैया , मैं तैयार हूँ !

पाँच बजकर 10 मिनट पर गाज़ियाबाद स्टेशन पर पहुँच गया , मुझे सबसे पहले टिकट लेना था क्यूंकि मेरे पास आरक्षण अलीगढ से था , तो गाजियाबाद से अलीगढ जाने के लिए जनरल टिकेट लेकर प्लेटफॉर्म नम्बर 3 पर पहुँच गया ! थोड़ी देर में घोषणा हुई , मुरी एक्सप्रेस 2 घण्टे की देरी से चल रही है ! ओह ! 10 अप्रैल को गाज़ियाबाद में चुनाव हुआ था , तो सोचा समय गुजारने के लिए अखबार ही ले लेता हूँ ! अखबार खोला ही था कि  एक पुलिस वाला आ गया।  अंदर का पेज निकाल देना ! ये आदत मुझे बड़ी बुरी लगती है , लेकिन उस दिन स्टेशन पर चुनाव की वजह से बहुत से पुलिस वाले जमा थे , उनकी संख्या देखकर ही सहम गया मैं और बिना कुछ कहे अन्दर के चार पेज उसे निकाल दिए ! 7 :30 बज गए तो लगा कि अब ट्रेन आने वाली है , अखबार लपेटकर बैग में डाल दिया लेकिन तभी फिर घोषणा हुई , अमृतसर के रास्ते जम्मू तवी से आने वाली , कानपूर इलाहबाद के रास्ते टाटानगर को जाने वाली 18110 मुरी एक्सप्रेस अपने निर्धारित समय से 2 घण्टे 30 मिनट की देरी से चल रही है ! जल भुन गया मैं ! एक तो इतनी सुबह आके बैठ गया हूँ और ट्रेन  है कि आने को ही राजी नहीं ! खैर 8 बजे ट्रेन आ पहुंची ! अपने आरक्षित डिब्बे और आरक्षित सीट पर जाकर बैठ गया ! न किसी ने पूछा , न कोई टीटी आया ! अलीगढ से तो अपना राज था ही सीट पर ! अलीगढ से ही सौरभ सारस्वत को भी आना था ! वो भी आ गया और आते ही , वो खाना खोल  लिया जो वो लेकर आया था घर से ! मेरे जैसे भुक्कड़ को और क्या चाहिए था ?


चोला स्टेशन , यहाँ आपको हमेशा बंदरों की फ़ौज़ दिखेगी
यहाँ आप कासगंज और मथुरा के लिए ट्रेन बदल सकते हैं

मुलायम सिंह यादव का गृह जिला

सौरभ सारस्वत
सौरभ सारस्वत ने ही बीवी से बात करते हुए मुझे भी क्लिक कर दिया


रेलवे लाइन के बीच में लिखा फतेहपुर आकर्षित करता है

इलाहबाद पहुँचते पहुँचते रात हो गयी 


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मंगलवार, 18 मार्च 2014

" ये दिल्ली " देखी है आपने ?

जब भी कभी हम दिल्ली के विषय में या वहाँ घूमने , देखने की जगहों के विषय में बात करते हैं तब बस कुछ गिने चुने नाम ही जहन में आते हैं जैसे लाल किला , जंतर मंतर , क़ुतुब मीनार ! लेकिन सच कहा जाए तो दिल्ली में देखने को इतना कुछ है कि आप विस्मित हो जायेंगे कि अरे ! इतना सब कुछ है यहाँ , इसके बारे में तो हमें पता ही नहीं था ! लेकिन इसमें आपकी कोई गलती नहीं है , असल में हमारा ध्यान उधर ही जाता है जिधर सरकार चाहती है ! मतलब जिन जगहों को सरकार ने सुधार दिया है , जहां व्यवस्था कर दी गयी है , जो प्रचलित हैं हम वहीँ तक जा पाते हैं ! लेकिन अगर आप इंटरनेट पर सर्च करेंगे तो एक बड़ा खजाना आपके हाथ लगेगा ऐसी जगहों का जहाँ आप एक बार जरुर जाना चाहेंगे ! मैंने कोशिश करी है आपको ऐसी ही जगहों के विषय में बताने की और आपको वहाँ तक इंटरनेट के माध्यम से ले जाने की ! आइये चलते हैं:


महाराज अग्रसेन की बावली :
 
पहले जमाने में राजा महाराजा पानी इकठ्ठा करने के लिए सीढ़ी दार कुँए बनवाया करते थे जिनमें पानी को महीनों तक सुरक्षित रखा जा सके । इन्हीं सीढ़ीदार कुओं को बावली कहा जाता है । पश्चिम भारत में यानि राजस्थान और गुजरात में बहुत सी बावली आज भी हैं लेकिन दिल्ली में बहुत कम ! दिल्ली में खारी बावली का नाम प्रचलित है , लेकिन दरयागंज के इलाके में स्थित यह बावली अब गायब है ! लेकिन नाम चलता है खारी बावली ! अब वहाँ प्रकाशकों की दुकानें और प्रतिष्ठान हैं ! एक है राजाओं की बावली जो दिल्ली के मेहरौली इलाके में है , इसको बहुत ढूँढा लेकिन असफल रहा । बस फिर एक ही बावली मिली , महाराज अग्रसेन की बावली ! ऐसा कहा जाता है कि इस बावली को महाराज अग्रसेन (उग्रसेन भी कहा जाता है ) ने बनवाया था और चौदहवीं शताब्दी में अग्रवाल समाज ने इसका पुनुर्द्धार कराया !

इस बावली तक पहुँचने के लिए बहुत बेहतर रास्ता मण्डी हाउस मेट्रो स्टेशन से बाहर निकलकर बाराखम्बा रोड से निकलने वाले हैली रोड पर है । यह पूरा इलाका नई दिल्ली के कनॉट प्लेस के आसपास का है । नजदीक ही जंतर मंतर है इसलिए ढूंढने में ज्यादा परेशानी नहीं होती । सुन्दर जगह है आप को अच्छा लगेगा वहाँ पहुंचकर , हालाँकि आजकल ये ऐतिहासिक स्थल से ज्यादा लव पॉइंट ज्यादा मालुम पड़ता है ।

नेशनल म्यूजियम ऑफ़ नेचुरल हिस्ट्री :
मण्डी हाउस मेट्रो स्टेशन के ही नजदीक एक और स्थान है जो आपका मन मोह लेगा ! ये है नेशनल म्यूजियम ऑफ़ नेचुरल हिस्ट्री । ये म्यूजियम और दूसरे म्यूजियम से कुछ हटकर है । इस म्यूजियम में आप जीवन से जुड़े तथ्य और आस पास की जलवाऊ , पशु पक्षियों से मानव के रिश्ते को बहुत ही सटीक तरीके से प्रस्तुत किया गया है ! इस म्यूजियम में वृक्ष बचाने के लिए हुए चिपको आंदोलन को भी चित्रों के माध्यम से बेहतर तरीके से परिभाषित किया है !

मण्डी हाउस से निकलकर आप जैसे ही तानसेन मार्ग पर पहुंचेंगे तो सामने ही आपको फिक्की बिल्डिंग दिखाई देगी , उसी बिल्डिंग में स्थित है ये अपने तरह का विचित्र म्यूजियम । इस म्यूजियम को के के बिरला ने पूर्व प्रधानमन्त्री श्रीमती इंदिरा गांधी के कहने पर बनवाया ! असल में सन 1972 ईस्वी में प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी , आज़ादी के 25 वर्ष पूरे होने के उपलक्ष में कुछ विशेष करना चाहती थीं और इसके लिए उन्होंने भारतीय जीवन और भारतीय व्यक्ति के जंगल और वन्य जीवों से सम्बन्ध को दिखाने के लिए एक प्रोजेक्ट शुरू करने के विषय में सोचा और उसका प्रतिफल है ये आज का म्यूजियम !

ज़हाज महल :
ज़हाज़ महल वास्तव में मुसाफिरों के लिए एक सराय के रूप में बनाया गया था ! महरौली इलाके में स्थित ज़हाज़ महल को 1452 से लेकर 1526 ईस्वी तक चले लोधी सल्तनत में बनवाया गया ! उस वक्त अफगानिस्तान , अरब , इराक आदि मुस्लिम देशों से हिन्दुस्तान आने वाले तीर्थयात्रियों के लिए रुकने के स्थान के रूप में बनवाया गया जहाज महल , इसके चारों ओर बने जलाशय में इसकी परछाई जहाज की तरह की दीखती थी , इसलिए इसे जहाज महल कहा गया । 

ज़हाज़ महल , हर साल अक्टूबर में होने वाले प्रोग्राम "फूल वालों की सैर " के लिए भी विख्यात है । इस कार्यक्रम में फूल विक्रेता फूलों से बने पंखों को सजाकर महरौली से यात्रा प्रारम्भ करते हैं और सर्वप्रथम योगमाया के मंदिर में श्रद्धा पूर्वक फूलों से बना पंखा अर्पित करते हैं, वहाँ से चलने के बाद ये यात्रा हज़रत कुतुबुद्दीन बख्तियार काकी की मज़ार पर चादर और फूल अर्पित करने के साथ समाप्त होती है ! इस यात्रा को अकबर शाह द्वितीय ने सन 1820 में शुरू कराया लेकिन सन 1942 में अंग्रेज़ों ने इस पर प्रतिबन्ध लगा दिया ! फिर सन 1961 ईस्वी में प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने इस प्रथा को दोबारा शुरू किया जो बदस्तूर जारी है । इस कार्यक्रम में अक्टूबर में विभिन्न प्रदेशों के लोक कलाकार अपनी अपनी प्रस्तुति जैसे नृत्य , नाटक और कवालियों का कार्यक्रम पेश करते हैं ! 

इस जगह तक आसानी से पहुँचा जा सकता है ! राजीव चौक मेट्रो स्टेशन से येलो लाइन जो गुडगाँव तक जाती है , वो मेट्रो लीजिये और छतरपुर मेट्रो स्टेशन उतरिये ! लगभग 10 मिनट की वाल्किंग डिस्टेंस पर है ज़हाज़ महल ! इस जगह को अंधेरिया मोड़ भी कहते हैं !

तो आज बस इतना ही ! कुछ और जगहें आएँगी इस लिस्ट में थोडा इंतज़ार करिये !






दिल्ली के आईटीओ पर लगी हनुमान जी की मूर्ति

महाराज अग्रसेन की बावली
महाराज अग्रसेन की बावली
महाराज अग्रसेन की बावली
महाराज अग्रसेन की बावली

नेशनल म्यूजियम ऑफ़ नेचुरल हिस्ट्री  में  एक सींग वाला गैंडा
जानवरों की खाल से बने कपडे , जिन्हें पहनकर हम इतराते हैं
अपने स्वार्थ के लिए हमने पेड़ों को भी नहीं बक्शा
चिपको आंदोलन को दिखाते चित्र
​चिपको आंदोलन को दिखाते चित्र
ज़हाज महल
ज़हाज महल
ज़हाज महल


                                                     



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गुरुवार, 6 मार्च 2014

​ अमृतसर से लौटकर पार्ट-2


इस यात्रा वृतान्त को शुरू से पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करिये !

जलियाँवाला बाग़ में शहीदी कुआं देखकर उस वक्त का मंज़र आँखों में एक काल्पनिक तस्वीर बनाने लगा और अपने पुरखों पर गर्व से सीना फूल गया । वो भी लोग थे जो देश और हमारी खातिर अपने प्राणों का बलिदान कर गए , न परिवार देखा न दौलत । नमन , ऐसे महान सपूतों को । शहीदी कुआं में , जनरल डायर के सिपाहियों की गोलियों से बचकर भाग रहे लोग एक एक कर गिरते चले गए और उसी में समा गए । वहीँ कुछ ऐसी दीवारें हैं जिन पर आज भी जनरल डायर के सिपाहियों द्वारा चलाई गयी गोलियों के निशाँ दीखते हैं । अब इस हत्याकांड की यादों को जिन्दा रखने के लिए एक स्मारक बना दिया है सरकार ने । उस दिन 26 जनवरी थी , इस उपलक्ष्य में वहाँ कोई कार्यक्रम भी हो रहा था ।

बॉर्डर पर पहुंचे तो गाडी को पहले ही पार्क करना पड़ा , बोले आगे जाने की मनाही है , और इशारा करते हुए बोले वो रहा आपका कमान गढ़ गेट । असल में कामनगढ़ गेट पर ही हमें श्री भूपेंद्र सिंह जी मिला था जो हमें आगे लेकर जाते ! कामनगढ़ गेट पर महिला सिपाही तैनात थी , हमने उनसे भूपेंद्र जी के विषय में पूछा तो उन्होंने इशारा कर दिया कि वो आ रहे हैं , शायद साहू साब ने उन्हें बता दिया होगा । खैर ! भपेंद्र सिंह हमें एक एक चीज , एक एक जगह दिखाते हुए चलते गए और हम अपने आपको धन्य मानते हुए ख़ुशी ख़ुशी हर जगह को देखते गए और सोचते गए कि अगर हम बिना जानकारी के आते तो शायद वो जगहें देखना सम्भव नही हो पाता जिंहें हमने आज देखा । सबसे बढ़िया जगह हमें वो लगी जिसे वो जीरो पॉइंट कहते हैं और जहां से भारत और पाकिस्तान की सीमाओं का निर्धारण होता है ! वहाँ एक पत्थर लगा है जिस पर एंगल बना है , उसी एंगल के अनुरूप सीमा का निर्धारण किया गया है वहाँ । एक एक जगह जानकारी देती हुई और जोश जगाती हुई । करीब 3 :30 बजे गणतंत्र दिवस के कार्यक्रम शुरू हो गए थे और हम अपनी सीट पर आकर बैठ गए । अमृतसर और आसपास से आये बच्चों ने बेहतर कार्यक्रम आयोजित किये । वहीँ न्यूज़ नेशन की कोई रिपोर्टर भी उन प्रोग्राम्स को कवर करने आई थी ! करीब 5 बजे शाम को मुख्य परेड शुरू हुई ! परेड से पहले से ही दौनो ओर से जिंदाबाद के नारे गूँज रहे थे ! इधर वंदे मातरम् , भारत माता की जय , हिंदुस्तान जिंदाबाद और उधर से एक ही आवाज समझ में आ रही थी पाकिस्तान जिंदाबाद ! पूरी ताकत लगाकर बोल रहे थे दौनों ओर के लोग । इसका असर ये हुआ कि मेरे बच्चे अमृतसर से लौटने के बाद भी करीब 15 - 20 दिन तक यही नारे लगाते रहे ! एक कहता हिंदुस्तान। । दूसरा कहता जिंदाबाद !  कभी कभी मैं भी इनके देश प्रेम में शामिल हो जाया करता हूँ ।  

परेड की शुरुआत BSF के बैंड से हुई जो शायद गणतंत्र दिवस के उपलक्ष्य में बजाया गया होगा । उसके बाद BSF के दो सिपाही पूरी तरह से अत्याधुनिक हथियारों से लैस होकर आये फिर दो महिला सिपाहियों ने भारतीय नारी की शक्ति का परिचय दिया और फिर धीरे धीरे भारतीय सीमा सुरक्षा बल के जवानों ने अपनी चुस्ती फुर्ती और ताकत का वो प्रदर्शन किया जिसके लिए वो जाने जाते हैं । जय हिन्द !

करीब 5 : 30 बजे परेड ख़त्म हुई और हम सीधे श्री भूपिंदर सिंह से अनुमति लेकर गाडी में बैठे और सीधे दुर्ग्याणा मंदिर होते हुए वापस रेलवे स्टेशन ! 7 :30  बजे की ट्रेन थी , राउरकेला मुरी एक्सप्रेस । अगली सुबह 6 बजे गाजियाबाद और फिर वापिस 8 बजे अपने काम पर यानि कॉलेज में !

जय हिन्द , जय हिन्द की सेना !


जलियाँवाला बाग़ में स्थित शहीदी कुआँ

जलियाँवाला बाग़ में स्थित शहीदी कुआँ

जलियाँवाला बाग़ 


जलियाँवाला बाग़ में आज भी गोलियों के निशान बाकी हैं

जलियाँवाला बाग़ में स्थित स्मारक 

वाघा बॉर्डर पर भारत की महिला शक्ति

वाघा बॉर्डर पर भारत की शान को दिखता वीर सैनिक

वाघा बॉर्डर 

वाघा बॉर्डर पर पाकिस्तान के सैनिक से आँख मिलाता वीर सिपाही

वाघा बॉर्डर पर भारत और पाकिस्तान के झंडे उतारते समय




वाघा बॉर्डर पर भारत के वीर सैनिक ,परेड करते हुए

यह दृश्य आँखों में समा जाता है