बुधवार, 2 दिसंबर 2015

ज्योतिसर :कुरुक्षेत्र

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ब्रह्म सरोवर और उसके आसपास के स्थानों को देखने के बाद अब सीधा ज्योतर्सर के लिए जाना था ! और इसके लिए मुख्य सड़क तक आना था जहां से ऑटो या बस मिल सके ! कुरुक्षेत्र रेलवे स्टेशन से लगभग 10 किलोमीटर की दूरी पर , कुरुक्षेत्र -पेहोवा रोड पर एक छोटी सी जगह है ज्योतिरसर ! कुरुक्षेत्र में आपको अलग अलग समाज की धर्मशालाएं दिखाई देती हैं ! जितनी भी दिखीं उनमें "जाट धर्मशाला " बहुत ही बड़ी है ! बहुत लम्बी चौड़ी ! और भी धर्मशालाएं हैं ! जाट धर्मशाला के पास में ही बिरला गीता मंदिर भी है , लेकिन जा नही पाया !

मुख्य रोड पर आकर दो चार ऑटो वालों को रोका और पूछा -ज्योतिरसर ? आगे बढ़ा ले जाते ! कोई जवाब नही ! एक बुजुर्ग बोले - बस से चले जाओ , बस भी जाती है ! अब बस भी लिस्ट में शामिल हो गयी लेकिन इसी बीच एक ऑटो आया और उससे बात हुई तो बोला इधर से तो आप पहुँच जाओगे लेकिन फिर लौटने में परेशानी होगी और देर भी होगी ! बात करते करते उससे ज्योतिरसर के अलावा "शेख चिल्ली का मक़बरा " "हर्ष का टीला "और भद्रकाली मंदिर देखने का किराया 200 रुपया तय हुआ और निकल गए ज्योतिरसर की तरफ !



 भगवद् गीता के जन्म का साक्षी वट वृक्ष

 


लगभग तीन बजे मैं ज्योतिरसर की पवित्र भूमि पर था ! ये वो जगह है जहाँ भगवान कृष्णा ने अर्जुन को उसके कर्तव्य को याद दिलाया था और भगवान श्री कृष्णा ने यहीं अर्जुन को अपने विराट रूप के दर्शन कराये थे ! छोटे छोटे मंदिरों की ये श्रंखला बहुत सुन्दर तो नही कही जा सकती लेकिन आपकी भावना यहां मायने रखती है ! वो वट वृक्ष अब भी यहां उपस्थित है जहां भगवान श्री कृष्णा ने गीता का उपदेश दिया ! ये वट वृक्ष ( Banyan Tree ) उस समय का साक्षी है ! ज्योतिरसर मतलब प्रकाश पुंज या प्रकाश की अथाह राशि ! इस मंदिर के पास में ही एक सरोवर यानी ताल है और उस पर पैदल यात्रियों के लिए आने जाने के लिए एक छोटा सा पुल बना हुआ है ! मैं जब इधर उधर घूम रहा था तब भगवद् गीता का सबसे विख्यात श्लोक :

यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिः भवति भारत
अभ्युत्थानम् अधर्मस्य तदा आत्मानम् सृजामि अहम्
परित्राणाय साधूनाम् विनाशाय च दुष्कृताम्
धर्म संस्थापन-अर्थाय सम्भवामि युगे युगे।


कोई बहुत ही सुन्दर आवाज में सुना रहा था ! सच कहूँ तो उसकी आवाज की भूरि भूरि प्रशंसा करूँगा ! इतनी मधुर और इतनी साफ़ ! मैं उसे देखने लग गया लेकिन पता नही कहा से आवाज़ आ रही थी ? ओह ! वो व्यक्ति उस पुल के नीचे पानी में मुंह लगाए बार बार वो ही श्लोक दोहरा रहा था और धीरे धीरे लोग उसके पास तक पहुँच रहे थे ! मैं भी पहुँचता लेकिन उससे पहले ही वो वहां से उठ गया ! जब वो बाहर आया तो लोग उसे पैसे देने लगे ! लेकिन उसने एक रुपया भी किसी से स्वीकार नही किया और धीरे धीरे करके चला गया ! कभी दोबारा मिला तो जरूर सुनना चाहूंगा ! आप भी यदि कभी जाते हैं उधर तो एक बार उसे जरूर सुनियेगा ! सच कहूँगा -इतनी मधुर आवाज आपने कभी नही सुनी होगी ! प्रतिभाएं कहाँ कहाँ मिल जाती हैं ?


इस परिसर में भगवान श्री कृष्णा और अर्जुन की रथ वाली प्रतिमा संगमरमर से बनाई गयी है जो बहुत ही खूबसूरत है और ज्यादातर लोग इन्ही दो जगहों पर फोटो खिचवाते हैं ! एक वो वट वृक्ष के पास और एक इस कांच में बंद संगमरमर के रथ के साथ !











संगमरमर से बने रथ पर भगवान श्री कृष्णा और अर्जुन विराजमान हैं !!


संगमरमर से बने रथ पर भगवान श्री कृष्णा और अर्जुन विराजमान हैं !!


संगमरमर से बने रथ पर भगवान श्री कृष्णा और अर्जुन विराजमान हैं !!





थोड़ा सा ध्यान से देखिये इस फोटो को , इसमें वो व्यक्ति पुल के नीचे दिखाई दे रहा है जो अपनी मधुर आवाज में गीता श्लोक गा  रहा था


 भगवद् गीता के जन्म का साक्षी वट वृक्ष


 भगवद् गीता के जन्म का साक्षी वट वृक्ष








छोटे छोटे मंदिरों में लगी प्रतिमाएं


छोटे छोटे मंदिरों में लगी प्रतिमाएं

बाल गोपाल



















                                                                                                    
                                                                                                        आगे यात्रा जारी रहेगी :



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