मंगलवार, 21 मार्च 2017

Places to visit around Kashmiri gate : Delhi

सोच के चलिए कि आप पुरानी दिल्ली में हैं और आपके पास चार -पांच घंटे हैं ! आपकी ट्रेन के समय में चार -पांच घंटे बाकी हैं , तो क्या करेंगे आप ? दो चीजें हैं , या तो आप स्टेशन पर बैठकर चाय पीते हुए , अखबार मैगजीन पढ़ते हुए टाइम पास करेंगे या फिर मोबाइल में गेम खेलेंगे ! मुफ्त का Wi -Fi मिल गया तो अपने फोन के सारे एप्प्स अपडेट करेंगे और नेट चलाएंगे ! लेकिन इन सबके अलावा अगर आप चाहते हैं कि इस "स्पेयर टाइम " में कुछ देख लिया जाए , दिल्ली का इतिहास खंगाल लिया जाए तो कश्मीरी गेट बस स्टैंड और मेट्रो स्टेशन के आसपास बहुत कुछ है देखने लायक जो आपको 1857 से लेकर 1947 तक की यादें ताजा कर देगा ! तो चलना चाहेंगे आप ? मेरे जैसे "आवारा" आदमी के साथ चलते हुए आपको एक बारी गुस्सा तो आएगा कि कहाँ ले आया लेकिन जब आप वहां पहुंचेंगे तो आपको विश्वास दिलाता हूँ कि आपको निराश नहीं होना पड़ेगा ! तो निकलते हैं कश्मीरी गेट मैट्रो स्टेशन से बाहर और देखते हैं कि कहाँ कहाँ जा सकते हैं ! मैं यहाँ बेस मेट्रो स्टेशन लेकर चल रहा हूँ और उसी के आधार पर वृतांत लिख रहा हूँ :



Kashmiri gate (कश्मीरी गेट) :
सबसे पास में कश्मीरी गेट है ! जैसे ही आप मैट्रो स्टेशन से बाहर आते हैं , गेट नंबर 1 से तो बाहर रिट्ज सिनेमा हॉल है उसके सामने ही कश्मीरी गेट है ! बड़ा कंफ्यूजन हो रहा है , वहां एक लिखित पत्थर पर लिखा है कि इसे शाहजहां ने बनवाया जबकि इन्टरनेट पर उपलब्ध आंकड़े कहते हैं कि इसे सन 1835 ईसवी में मिलिट्री इंजीनियर रॉबर्ट स्मिथ ने बनवाया ! दिल्ली को दीवारों से घेरने के लिए उसने चार गेट बनवाये जिसमें कश्मीरी गेट उत्तर दिशा में बनवाया गया और क्योंकि यहीं से कश्मीर के लिए रोड निकलती थी इसलिए इसका नाम "कश्मीरी गेट " हुआ ! वहां निर्माण कार्य चल रहा था इसलिए मुझे अंदर नही जाने दिया और बाहर से ही फोटो खींच लिए ! कश्मीरी गेट को सन 1857 के आंदोलन में आंदोलनकारियों को शहर में रोकने के लिए उपयोग में लाया गया और धीरे धीरे इस जगह को अंग्रेजों ने खाली कर के सिविल लाइन्स में अपने ठिकाने बना लिए ! चलेंगे सिविल लाइन भी !


James Church (जेम्स चर्च) :
कश्मीरी गेट से आगे चलते जाइये , ये लुथिअन रोड है ! मेट्रो से जब आप बाहर आते हैं तो कश्मीरी गेट जाने के लिए रोड क्रॉस करने होती है और अब जेम्स चर्च जाने के लिए फिर से रोड क्रॉस करनी पड़ेगी ! कश्मीरी गेट सीधे हाथ पर है जबकि चर्च बाएं हाथ पर है ! मैं शनिवार दिनांक 18 मार्च 2017 को गया था ! दोपहर का समय होगा 3 बजे के आसपास का , पूरे चर्च में और उसके आसपास सफाई चल रही थी , अंदर जाने के लिए मना करने लगा चौकीदार ! रिक्वेस्ट मारी तो सिर्फ इस शर्त पर अंदर जाने दिया कि चर्च में अंदर नही जाऊँगा , कोई बात नही मुझे कौन सा पूजा करनी है ! इनका कल चर्च लगेगा , संडे है न कल !

सेंट जेम्स चर्च को "स्किनर चर्च " भी कहते हैं जिसे सन 1836 ईसवी में कर्नल जेम्स स्किनर ने बनवाया था ! इस चर्च में भारत के तब के वाइसराय तब तक आते रहे जब तक कि सन 1931 में रकाबगंज में दूसरा चर्च नही बन गया ! चर्च के पीछे ही तब के दिल्ली के कमिश्नर विलियम फ़्रेज़र का मकबरा भी है ! इस चर्च के टॉप पर लगे क्रॉस और कॉपर बॉल वेनिस के चर्च जैसे हैं , हालाँकि इन्हें 1857 के ग़दर में तोड़ दिया गया था लेकिन फिर से उसी रूप में व्यवस्थित कर दिया गया ! अच्छी जगह है , कुछ देर देखने लायक !


Nicholson Cemetery (निकोल्सन समेट्री) :
मैं परेशान हुआ इस जगह को ढूंढने में , इसलिए नही चाहता कि आप भी मेरी तरह परेशान हों ! दो तीन तरीके से आप यहाँ बिना किसी झंझट के , बिना किसी से कुछ पूछे पहुँच सकते हैं ! पहले बात तो ये कि अगर आप मेट्रो स्टेशन से बाहर निकलते हैं तो गेट नंबर -1 से मत निकलिए बल्कि गेट नंबर -4 से बाहर निकलिए ! जैसे ही आप बाहर निकलेंगे , चार कदम चलकर सीधे हाथ पर ही निकोल्सन सीमेट्री है ! सिमेट्री मतलब कब्रिस्तान ! आप कहोगे मैं पागल हूँ क्या ? कब्रिस्तान क्यों गया ? अघोरी या तांत्रिक नही हुआ :-) ! दूसरा तरीका है पैदल पैदल पैरों को कष्ट देते हुए "ओबेरॉय अपार्टमेंट " पहुंचिए , उसके पीछे ही ये कब्रिस्तान है ! और हाँ , किसी को पूछने की जरूरत आ भी जाए तो सिमेट्री मत पूछिए , ईसाई कब्रिस्तान पूछिए ! ISBT बस स्टैंड के सामने से चलते जाइये , बाएं हाथ की तरफ बस रूट 883 का स्टैंड है यहाँ ! बता दिया , मन करे तो जा सकते हैं , कोई दिक्कत नही आएगी ! अब जरा इसके इतिहास की भी बात कर लेते हैं और उनके इतिहास , उनकी सत्ता , उनकी हनक की भी बात कर लेते हैं जो यहाँ चिरनिद्रा में सोये पड़े हैं !


मैं जैसे तैसे निकोल्सन सिमेट्री के गेट पर पहुँच गया ! गेट धीरे से खोला तो सामने सरकारी नल पर एक महिला और एक लड़की कपडे धो रहे थे ! मैं बायीं तरफ एक छतरी के नीचे बनी सीमेंट की कुर्सियों पर बैठ गया ! कुर्सियां ही कहेंगे न उन्हें ? जो पार्क में भी लगी रहती हैं , रेलवे स्टेशन पर भी होती हैं ! मुझे और नाम नही पता , आपको पता हो तो बता देना , अभी के लिए कुर्सी ही कह देता हूँ ! तो जी मैं उधर बैठ गया और अपने कैमरे की मेमोरी खाली करने लगा ! जैसलमेर और मुरैना के फोटो अभी तक पड़े थे ! पानी के दो घूँट मारकर खड़ा हुआ तो गाडी में से एक आदमी निकल कर आया , कुछ नही कहा , न उसने न मैंने ! सोया पड़ा होगा ! कैमरा लेकर फोटो खींचने लगा तो उनमे से एक औरत बोली -यहाँ फोटो नही खींच सकते ! मना है , बोर्ड देख लो ! बोर्ड पर फोटो लेने के मनाही लिखी थी ! मैंने कहा तो फिर नेट पर फोटो कैसे आ जाते हैं ? बोली -वो अँगरेज़ खींच लेते हैं , उन्हें फोटो लेने की इजाजत होती है ! वाह ! देश मेरा , जमीन मेरी और अँगरेज़ फोटो खींच सकता है मैं नही ! ऐसा मन में कहा और चल दिया ! आगे मत जाओ - मना है ! हाँ , नही जा रहा बस इधर उधर होकर आता हूँ ! चल दिया मैं आगे की तरफ ! अब तू रोक के दिखा ! आज ही निकोल्सन की आत्मा का परिचय तेरी आत्मा से करा दूंगा ! हालाँकि ऐसी नौबत नही आई और वो अपने काम में लग गई मैं अपने काम में ! अपना काम मतलब फोटो खींचने में ! आगे एक माली और एक आदमी और मिला ! इतने बड़े कब्रिस्तान में बस दो ही लोग ! उनमें से भी एक अपने पूर्वजों की आत्मा से मिलने आया था !


जनरल जॉन निकोल्सन 35 साल की उम्र में 1857 में मार दिया गया था ! उसी की याद में ये कब्रिस्तान बनवाया गया था जहां ऊपर की तरफ ब्रिटिश लोगों की कब्र हैं और नीचे हिंदुस्तानी ईसाईयों की ! ऊपर जो कब्र हैं उन पर बहुत कुछ लिखा हुआ है जैसे कोई प्रेम सन्देश , जन्म तिथि , मरण तिथि ! कुछ छोटे छोटे बच्चों की भी कब्र हैं जो इमोशनल कर देती हैं ! ऊपर एक भारतीय ईसाई की भी कब्र है जो यसुदास रामचंद्र की है जो दिल्ली कॉलेज में गणित के प्रोफेसर रहे ! इन कब्रों पर लिखे सन्देश देखकर आँखें भर आती हैं लेकिन इन कब्रों को जो अलग अलग रूप दिए गए हैं वो बहुत आकर्षित करते हैं ! भारतीय ईसाईयों की कब्र ज्यादातर एक ही रूप में हैं , एक काला मार्बल का आयताकार टुकड़ा कुछ लिखकर सीमेंट से लगा दिया गया है ! एक कुत्ते या शायद भेड़ की कब्र देखकर जरूर आश्चर्य हुआ लेकिन वो बहुत दूर थी और रास्ते में बेतरतीब झाड़ियां , इसलिए उसकी केवल फोटो ही ले पाया , ज्यादा मालूमात नहीं है मुझे उसके बारे में !

तो तैयार ? इस भुतहा जगह जाने के लिए !!

आइये फोटो देखते हैं : 

ये फोटो नेट से उठाई है ! मालुम नही किसकी है





James Church @ Kashmiri Gate , Delhi

James Church @ Kashmiri Gate , Delhi, It is believed that its Cross & Copper ball are replica of Venice Church



Nicolson Cemetery @ Civil Line , Near Kashmiri Gate



ये एक बच्चे की कब्र है जिसने उदास कर दिया

ये भारतीय ईसाईयों की कब्र हैं





ये भारतीय ईसाईयों की कब्र हैं







This Grave belons to Indian Mathematician Yesudas Ramchandra



Look at its shape & design




This  grave is of Sheep or dog ??







मंगलवार, 14 मार्च 2017

Places to visit in Morena

मध्य प्रदेश में घूमने लायक बहुत कुछ है और बहुत जगह हैं लेकिन मुरैना की तरफ शायद ही कोई देखना पसंद करता हो ! आदमी ग्वालियर तक जाकर वापस आ जाता है और मुरैना की तरफ मुंह उठाकर भी नहीं देखता ! इसका मतलब ये नही कि मुरैना में कुछ है ही नहीं ? बहुत कुछ है मित्रो , लेकिन लाइमलाइट में नहीं है इसलिए कोई जाता नहीं ! तो ये जो पोस्ट है ये पूर्ण रूप से मुरैना पर ही केंद्रित रहेगी ! क्या क्या है देखने को ? कैसे जाएँ ? कहाँ रुक सकते हैं ? ये सब बातें होंगी आज , आज इस पोस्ट में !

How to Reach (कैसे जाएँ ) : 
मुरैना मध्य रेलवे ( Central Railway ) लाइन पर दिल्ली , मुम्बई , झांसी से बढ़िया तरह से जुड़ा हुआ है ! दिल्ली से रात 10 -11 बजे की कोई ट्रेन लीजिये और सुबह सुबह 5 बजे तक आप मुरैना में होंगे ! मैं दक्षिण एक्सप्रेस से गया था जो हज़रत निजामुद्दीन से रात को 11 बजे निकलती है और सुबह साढ़े चार बजे पहुंच जाती है ! नजदीकी एयरपोर्ट ग्वालियर में है जो मुरैना से लगभग 40 किलोमीटर दूर है !

Where to Visit (कहाँ कहाँ घूमें) :

आप जब मुरैना पहुँचते हैं तो स्टेशन से बाहर आकर ऑटो/ टेम्पो पकड़िये और नूराबाद पहुँच कर नूरमहल अर्थात गुना बेगम का महल देखिये और आगे की सोचिये !

Noorabad :

हालाँकि ये जगह बहुत सुन्दर नहीं है लेकिन जब आप यहां आये हैं तो देखने में आई बुराई भी नहीं है ! ये मुरैना के नूराबाद टाउन में है , नूराबाद को जहांगीर के समय में बसाया गया था और ये महल , गयासुद्दीन की बेगम गुना बेगम को समर्पित है ! और पढ़ें .... . ... .... 

morena.nic.in से साभार

Bateshwar Temples : 

नूराबाद से बटेश्वर मंदिर समूह करीब 10 -12 किलोमीटर दूर है तो बेहतर होगा आप , मुरैना से या नूराबाद से ही गाडी किराये पर ले लें ! पूरी जानकारी आपको इन पोस्ट में मिल जायेगी ! भगवान शिव को समर्पित ये मंदिर समूह फिर से बनाया गया है और इन मंदिरों को फिर से बनाने का पुण्य कार्य डॉ के के मुहम्मद ने दस्यु सम्राट निर्भय सिंह के साथ मिलकर किया है ! और पढ़ें .... . ... ....


Gadhi Padhawali Fort :


आइये बटेश्वर मंदिर से आगे गढ़ी पड़ावली फोर्ट चलते हैं । रास्ते के दोनों तरफ खुदाई में निकली टूटी हुई मूर्तियों को तरीके से लगाकर सुंदर और आकर्षक रूप दिया है । सामने ही दो तगड़े शेर ( शायद एक शेर -एक शेरनी हैं ) इस फोर्ट की सुरक्षा में तैनात दिखाई पड़ते हैं ! इस फोर्ट में ज्यादातर पुराने - खुदाई में निकले पत्थरों का उपयोग किया गया है ! इस फोर्ट को मंदिर के रूप में ASI के अनुसार 10 वीं शताब्दी में बनाया गया था और 18 वीं शताब्दी में धौलपुर के राणा ने इस मंदिर के पास में ही एक छोटा किला भी बना लिया ! छोटे किले को "गढ़ी " कहा जाता है और इसीलिए इस फोर्ट का नाम "गढ़ी पड़ावली " कहा जाता है ! आगे पढ़िए .... . ... ....


Chaunsath Yogini Mandir :


मध्य प्रदेश के मुरैना जिले में स्थित चौंसठ योगिनी मंदिर भारत के उन गिने चुने योगिनी मंदिरों में से एक है जो आज भी ठीक हालात में हैं ! इस मंदिर को " एकत्त्तरसो महादेव मंदिर" भी कहा जाता है ! इस मंदिर के अलावा दो योगिनी मंदिर ओडिशा में हैं और एक मंदिर मध्य प्रदेश के ही जबलपुर में है ! भारत के संसद भवन जैसा दिखने वाला ये मंदिर लगभग 30 मीटर की ऊंचाई पर है और 100 सीढियां चढ़कर आपको मंदिर के मुख्य द्वार तक पहुंचना होता है ! पूरी तरह से गोलाकार आकृति में बने इस मंदिर में 64 कक्ष हैं और बीच में एक मंडप है जो मुख्य मंदिर माना जाता है ! इन 64 कक्ष में पहले भगवान् शिव और योगिनी की मूर्तियां लगी हुई थी लेकिन कुछ मूर्तियों के चोरी हो जाने के कारण सभी मूर्तियों को वहां से हटा कर भारत के विभिन्न संग्रहालयों में भेज दिया गया और अब ये कक्ष ( Chamber ) खाली नजर आते हैं ! इस मंदिर का मुख्य द्वार बहुत छोटा सा है और जिस तरह पहले गाँव में दरवाज़े होते थे कुछ इसी तरह का बना हुआ है ! ऐसा माना जाता है कि 1920 में बने हमारे संसद भवन को भी इसी के आधार पर डिजाईन किया गया है ! और पढ़िए .... . ... ....



Kakanmath Temple :

सुहानियां , जिसे पहले सिंफनिया कहते थे , से करीब दो किलोमीटर दूर बावड़ीपुरा गांव के खेतों के बीच बने इस मंदिर को कच्छपघाट ( कछवाहा ) राजा "कीर्तिराज " ने 11 वीं शताब्दी में बनवाया था ! उस समय में सुहानियां इन राजाओं की राजधानी हुआ करता था ! मूलरूप से भगवान शिव को समर्पित इस मंदिर को खजुराहो मंदिरों की बनावट के आधार पर अपनी रानी "ककनवती " के अनुरोध पर बनाया था ! इस मंदिर की सबसे बड़ी खासियत ये है कि इस मंदिर को बनाने के लिए किसी भी प्रकार का सीमेंट या गारा प्रयोग नही किया गया है ! किसी भी तरह के एडहेसिव (Adhesive ) के बिना बनाया गया शायद ये दुनिया का पहला और एकमात्र मंदिर होगा ! आगे पढ़िए .... . ... ....










ये बता सकते हैं क्या है ?




हर एक मूर्ति खंडित है !! Each & Every Statue is damaged 

What an Engineering ! Sir Ji

What an Engineering ! Sir Ji


हर एक मूर्ति खंडित है !! Each & Every Statue is damaged



ओह !








हर एक मूर्ति खंडित है











Kutwar Village : 

आप सोच रहे होंगे , इस गांव में ऐसा क्या है ! ये असल में महाभारत के समय का गांव है जो हस्तिनापुर के जैसा ही महत्त्व रखता है ! कहते हैं यहीं कुंती को भगवान सूर्य ने वरदान दिया था जिससे उन्हें कर्ण पैदा हुए ! भगवान सूर्य के रथ के निशान आज भी मौजूद बताये जाते हैं ! ऐसा माना जाता है कि सूर्य देव अपना रथ लेकर यहीं कुँवारी नदी के किनारे अपना रथ लेकर आये थे और उनके रथ के घोड़ों के निशान अभी भी मिलते हैं ! नदी का नाम भी शायद "कुँवारी " कुंती के नाम पर ही रखा गया होगा ! कुटवार गाँव को "कुंतलपुर " भी कहते हैं ! आगे पढ़ें..............

दैनिक भास्कर से साभार

Where to stay (कहाँ रुकें) : 

मुरैना हालाँकि छोटा शहर है और एक भी फाइव स्टार होटल नहीं है लेकिन हम जैसे लोगों के रुकने के लिए बहुत सारी धर्मशालाएं , छोटे छोटे गेस्ट हाउस उपलब्ध हैं ! 





मुरैना यात्रा समाप्त हो रही है !! ******सबको राम राम******************************