बुधवार, 16 जनवरी 2019

Masroor Rock Temple : Kangda

मसरूर रॉक कट मंदिर
Date of Journey : Oct.2018
 
 
दशहरा की छुट्टियां और मौसम एकदम झक्कास !  कहीं न कहीं जाने का मन तो था और चार दिन की छुट्टियों का बेहतरीन उपयोग भी करना था । मथुरा - वृंदावन से लेकर विदिशा - भोपाल और ग्वालियर की बात चली लेकिन अंततः हिमाचल प्रदेश पर आकर सुई अटक गई और हिमाचल में भी कहीं और नहीं बल्कि वहीँ जहाँ हम पहले ही जा चुके थे यानि कांगड़ा । लेकिन कांगड़ा में वो जगहें देखने का प्लान बनाया जिन्हें पहले नहीं देख पाए थे और जो मन में बसे हुए थे । बहुत सारी ऐसी जगहें हैं लेकिन जाने से पहले ज्वाली के "बाथू की लड़ी " के मंदिरों को देखने जाना कैंसिल करना पड़ा क्योंकि वो अब पानी में डूब चुके थे और अब अप्रैल के आखिर में ही पानी से बाहर निकलेंगे । अब जो है और जितना है ,  उसी के अनुसार हमने अपनी यात्रा को प्लान किया । 


मुझे कांगड़ा जाने के लिए सबसे बेहतर ट्रेन 14035 धौलाधार एक्सप्रेस लगती है जो सराय रोहिला , दिल्ली से बुधवार की रात को 11 बजकर तीस मिनट पर निकलती है और सुबह आठ बजे के आसपास पठानकोट पहुँच जाती है । रात भर की जर्नी है और अगले दिन पठानकोट से कांगड़ा जाने वाली नैरो  गेज की ट्रेन ले लो लेकिन इस बार पता नहीं क्या हुआ कि नैरो गेज वाली ट्रेन बंद थी इसलिए हमें रोड से जाना पड़ा । पहले ये ट्रेन दिल्ली जंक्शन से चलती थी तीन -चार साल पहले लेकिन अब सराय रोहिल्ला से चलने लगी है और ये हमारे जैसे गाज़ियाबादी प्राणी के लिए परेशानी करता है । खैर दिल्ली से निकलकर सही समय पर पठानकोट पहुँच गए थे । स्टेशन से बाहर निकलकर करीब आधा किलोमीटर दूर ही बस स्टैंड है जहाँ से हमें मसरूर रॉक टेम्पल जाना है । मैंने पहले कांगड़ा जाने और फिर वहां से नगरोटा सुरियाँ होते हुए मसरूर जाने का प्लान किया था लेकिन नैरो गेज वाली ट्रेन नहीं जा रही तो कांगड़ा क्यों जाना ? वैसे अगर आप पठानकोट से कांगड़ा -पालमपुर वाली नैरो गेज ट्रेन से जा रहे हैं तो बेहतर है कि नगरोटा सुरियां स्टेशन पर उतर कर बाहर से लुंज या रानीताल जाने वाली कोई बस ले लें या ऑटो हायर कर लें । यही सबसे सस्ता -बढ़िया और टिकाऊ तरीका है मसरूर रॉक टेम्पल पहुँचने का । और अगर नैरो गेज ट्रेन बंद है तो फिर जैसे हम गए वैसे जाइये या गूगल मैप आपके पॉकेट में है , कुछ भी करिये लेकिन कुछ भी हम नहीं कर सकते थे क्यूंकि हमारी यात्रा हमेशा ही सार्वजनिक परिवहन से होती है और हमें ये भी देखना होता है कि बस वगैरह मिलेगी या नहीं , कितने बजे तक मिल जायेगी क्योंकि अकेले होता तो कैसे भी कहीं भी चल दो लेकिन एक बीवी और दो मुसटण्डों को भी साथ लेकर चलना है ! सोचना पड़ जाता है मालिक !!

अब आज हम जहाँ जा रहे हैं उसके बारे में भी कुछ बात हो जानी चाहिए । बहुत पहले से मैं मसरूर रॉक टेम्पल के बारे में नहीं जानता था लेकिन ज्वाली में "बाथू की लड़ी " मंदिर सर्च करते -करते जब यहाँ के फोटो देखे तो मन ललचा गया और इस जगह के बारे में जानकारी जुटानी शुरू कर दी । आखिर आज यहाँ पहुँच गया । कांगड़ा से करीब 35 किलोमीटर दूर 8 वीं शताब्दी में चट्टान काटकर बनाये गए मसरूर रॉक कट मंदिर आज भी अनजान से हैं। धौलाधार की खूबसूरत पहाड़ियों की गोद में बने ये मंदिर भगवान शिव , विष्णु और देवी को समर्पित हैं और कहीं - हिंदुत्व के शौर्य को व्यक्त करते हुए प्रतीत होते हैं । नागरा स्थापत्य शैली में बना ये मंदिर प्रांगण ऐसा लगता है जैसे किसी ने आधा -अधूरा बनाकर छोड़ दिया हो और तब से ऐसा ही पड़ा हो। हालाँकि जानकार लोग बताते हैं कि समय -समय पर आये भूकंप ने इन्हें तबाह कर दिया जिसका प्रभाव अब भी देखने को मिल जाता है ।

इन मंदिरों को एक विशालकाय चट्टान ( Monolithic Rock ) से काटकर शिखर सहित बनाया गया था तथा इसके सामने ही एक कुण्ड भी बनाया गया था । कुण्ड हिन्दू मंदिरों का आवश्यक अंग माना गया है हालाँकि आज की स्थापत्य कला में कुण्ड देखने को नहीं मिलते , संभव है जगह की कमी एक वजह हो । शुरुआत में पूरा मसरूर रॉक मंदिर प्रांगण एक वर्गाकार प्लेटफार्म पर बनाया गया था लेकिन अब ऐसा कुछ नजर तो नहीं आया । मुख्य मंदिर के दोनों तरफ छोटे मंदिर बनाये गए थे जिन्हें मण्डला स्थापत्य कहा जाता है । इनमें मंडप नहीं बनाया जाता । इन मंदिरों को सबसे पहले सन 1913 में हेनरी शटलवर्थ दुनियां के सामने लेकर आये थे जिसके बाद ASI ने आगे का काम देखा।

Masrur temple: symmetry of design

At first, it seems an extravagant and confused mass of spires,
doorways and ornament. The perfect symmetry of the design,
all centering in the one supreme spire, immediately over the
small main cell, which together form the vimana,
can only be realized after a careful examination of each part
in relation to the other.

—Henry Shuttleworth, 1913
Courtesy : wikipedia

पठानकोट से कांगड़ा वाली बस से बत्ती मिल उतर गए । ये जगह बत्तीस मील ( 32 Miles ) है लेकिन पंजाबी लहजे में बिगड़ते -बिगड़ते बत्ती मिल हो गई । बत्ती मिल से आपको रानीताल और लुंज जाने वाली बस मिल जाती है ,  हालाँकि थोड़ा इंतज़ार करना पड़ सकता है । लुंज से तीन किलोमीटर और आगे एक पॉइंट हैं जहाँ से मसरूर दो किलोमीटर और है । लुंज से नगरोटा सुरियाँ -कांगड़ा वाली बस पकड़िए या कार हायर कर लीजिये । पीर बिन्दली वो​ जगह है जहाँ आपको बस उतारेगी , वहां कुछ कार खड़ी रहती हैं जो 250 -300 रूपये में जाना -आना कर देते हैं । मसरूर रोड से हटकर है इसलिए बहुत ज्यादा सार्वजनिक बस सेवा उपलब्ध नहीं है लेकिन दो या शायद तीन बस वहां तक जाती हैं।

मंदिर के प्रांगण के पास और अंदर चाय-नाश्ता मिल जाता है। गाडी खड़ी की भी पर्याप्त जगह है। तो अब और ज्यादा नहीं बस फोटो देखिये और प्रसन्न रहिये


मसरूर रॉक टेम्पल की मुख्य शहरों से दूरियां :
दिल्ली से - 465 KM
पठानकोट से - 83 KM
कांगड़ा से - 35 KM
धर्मशाला से - 45 KM
रानीताल से -23KM
 
 
 
​पठानकोट बस स्टैंड पर जात यात्रा करके लौटते श्रद्धालु
बत्ती मिल से दूरियां

मसरूर मंदिर जाने के लिए यहाँ उतरिये
मसरूर मंदिर















सामने मुख्य मसरूर मंदिर





 
 

राम -राम !! मिलते हैं जल्दी ही

शुक्रवार, 4 जनवरी 2019

Ashok Pillar : New Delhi

 अशोक स्तम्भ : दिल्ली

आज हम जो चीजें करते हैं वो सैकड़ों साल के बाद इतिहास में तब्दील हो जाती हैं और फिर उस समय के इतिहासकार अपने अपने अनुसार उसकी व्याख्या करते हैं। . सटीक या फ़र्ज़ी ये सोचनीय। . विषय हो सकता है किन्तु इतिहास होता बड़ा रोमांचक और रुचिकर है , मेरे लिए तो होता है। आपके लिए भी होता ही होगा। खैर इतिहास की बात हो और दिल्ली की बात न हो ? ऐसा संभव नहीं ! जिस तरह से उत्तराखंड के हर पत्थर में भगवान विराजते हैं उसी तरह दिल्ली के हर पत्थर में एक इतिहास मिलता है। अशोका से लेकर मुगलों तक और तोमर शासकों से लेकर आज के युग तक।


अशोक से आप बहुत अच्छी तरह से परिचित होंगे , अशोक ! राजा अशोक ! अशोक महान ! उसी अशोक के दो स्तम्भ दिल्ली में आज भी मिल जाते हैं लेकिन जब आप किसी दिल्ली के स्थाई निवासी से इस बारे में पूछेंगे ! दिल्ली में अशोक स्तम्भ कहाँ है ? वो तपाक से जवाब देगा -कुतुबमीनार में ! क़ुतुब मीनार और लाल किले के अलावा दिल्ली का आदमी और कोई जगह जानता ही नहीं ? या बताना नहीं चाहता ? लेकिन क़ुतुब मीनार में जो स्तम्भ है वो लौह स्तम्भ है मतलब आयरन पिलर ! शायद वो भी मौर्या काल का ही है लेकिन बाकी दो स्तम्भ जिनके विषय में आज बात करनी है वो पत्थर के हैं।

वर्तमान में पूरे भारत में कुल 20 अशोक स्तम्भ मौजूद हैं जिनमें से दो दिल्ली में स्थित हैं। एक फ़िरोज़शाह कोटला फोर्ट में स्थापित है जबकि दूसरा हिन्दू राव हॉस्पिटल के बिल्कुल सामने गोल चक्कर के पास स्थित है जहाँ से कमला नेहरू रिज़ शुरू होता है। ये दोनों स्तम्भ शुरू से ही दिल्ली में स्थापित नहीं किये गए थे बल्कि 14 वीं शताब्दी में फ़िरोज़ शाह तुग़लक़ इन्हें क्रमशः अम्बाला के पास टोपरा से और मेरठ से लाया था इसीलिए कभी -कभी फोर्ट स्थित स्तम्भ को दिल्ली-टोपरा स्तम्भ और हिन्दू राव हॉस्पिटल वाले को दिल्ली -मेरठ स्तम्भ भी कहते हैं। आपने देखे भी होंगे आते -जाते लेकिन कभी रुककर फोटो नहीं लिया होगा , उसके बारे में जानने की जरुरत महसूस नहीं की होगी , पढ़ा भी नहीं होगा। आज जान लीजिये और मौका मिलते ही हो भी आइये उधर।

दिल्ली -टोपरा पिलर , हरियाणा के यमुनानगर के टोपरा कलां से दिल्ली लाया गया था और फ़िरोज़शाह फोर्ट में सबसे ऊँचे स्थान पर स्थापित किया गया था। इस स्तम्भ की ऊंचाई करीब 43 फुट यानी 13 मीटर है। हालाँकि बिल्कुल इसकी जड़ में जाने का कोई रास्ता अब नहीं है इसलिए दूर से ही फोटो लेना होता है। फोर्ट में इसके अलावा और भी जगहें हैं देखने लायक लेकिन मेरा मुख्य उद्देश्य इस स्तम्भ को देखना ही था। 
दिल्ली -मेरठ पिलर को मेरठ से लाया गया था और इसको लाने के लिए 42 पहियों वाली गाड़ी लगाईं गई थी। यहाँ लाकर इसे नॉर्थर्न रिज़ पर लगाया गया था लेकिन फर्रुखसियार के शासन में एक विस्फोट में ये पांच टुकड़ों में टूट गया। पाँचों टुकड़ों को एशियाटिक सोसाइटी कोलकाता भेजा गया जहाँ से ये 1866 में आये लेकिन वापस इन्हें फिर से स्थापित करने में 21 साल लग गए और फिर जाकर 1887 में पुनः स्थापित किया जा सका। वर्तमान में इस स्तम्भ की ऊंचाई 10 मीटर है। 

इन दोनों ही स्तम्भ पर ब्राह्मी लिपि में अशोक के धर्म सन्देश लिखे गए हैं जिन्हें 1837 में जेम्स प्रिंसेप ने डिकोड किया था। उन्होंने ही बताया कि ओरिजिनल स्तम्भ के ऊपर कुछ और मूर्तियां लगी हुई थीं जो समय के साथ टूट गयीं या उन्हें तोड़ दिया गया। 

हिन्दूराव हॉस्पिटल के सामने स्थित अशोक स्तम्भ



फ़िरोज़शाह कोटला ( फोर्ट ) के अंदर स्थित अशोक स्तम्भ



फ़िरोज़शाह कोटला फोर्ट का एक द्रश्य

फ़िरोज़शाह कोटला ( फोर्ट ) के अंदर स्थित अशोक स्तम्भ

शनिवार, 22 दिसंबर 2018

Paintings on Metro Pillars-II : Ghaziabad

आज इस विषय पर लिखने को कुछ है नहीं इसलिए केवल और केवल आपको चित्र ही दिखा सकता हूँ। आशा करता हूँ आपको पसंद आएंगे............आपको ये चित्र , ये कलाकारी पसंद आई ? और भी फोटो देखना चाहते हैं तो यहाँ क्लिक करके देख सकते हैं:



Its Vertical Garden




















शहीदों की चिताओं पर लगेंगे .........हर वर्ष मेले



फिर मिलते हैं जल्दी ही