बुधवार, 9 अक्तूबर 2019

Tomb of I'timād-ud-Daulah : Agra

एत्माउद्दौला का मक़बरा : आगरा
यात्रा : अप्रैल -2019


दिल्ली की सर्दी और आगरा की गर्मी , दोनों सगी बहनें हैं। मारती हैं तो खींच -खींच के मारती हैं ! एक सर्द थपेड़े मारती है तो दूसरी लू के थपड़े मारती है लेकिन हमारी रोज़ी -रोटी उत्तर प्रदेश में है तो ये सब तो झेलना ही पड़ेगा। आप एकदम से ज्ञान देंगे कि गर्मी में आगरा जाना ही क्यों ? तो भैया जी , कॉलेज जब -जहाँ भेजेगा जाना ही पड़ेगा और इस बार कॉलेज ने अप्रैल -2019 में भेज दिया आगरा। मुफ्त आना -मुफ्त जाना और मुफ्त रुकना और सोने पे सुहागा ये कि मुफ्त खाना ! ऐसे में तो मैं साइबेरिया और अंटार्टिका भी चला जाऊँगा , यहाँ तो बस 40 डिग्री का टेम्प्रेचर ही सहन करना था और वो भी एक दिन ! हमारे यहाँ ब्रज भाषा में कहावत है एक -दान की बछिया के दांत नहीं गिने जाते ! जैसी मिल जाए घर में बाँध लो। तो जब हमें मुफ्त की यात्रा मिल रही है तो हम क्यों इस मुए टेम्परेचर को बीच में आने दें ?

तो जी अप्रैल के तीसरे वीक में हम मुंह और सर पर गमछा बांधे भगवन टाकीज चौराहे पर इस इंतज़ार में थे कि मौसम कुछ मेहरबानी कर दे तो रामबाग की तरफ का ऑटो पकड़ लें लेकिन मौसम तो आज जैसे मुंबई के शेयर बाजार की तरह चढ़ता ही जा रहा था। अभी और चढ़ेगा क्यूंकि अभी तो कुल जमा डेढ़ -पौने दो बजा है ! आसपास खाना खाने में वक्त व्यतीत कर लिए तो बज गया ढाई और अब ज्यादा इंतज़ार होगा नहीं हमसे इसलिए 10 रुपल्ली में रामबाग पहुँच लिए। आगरा की बस्तियों के नाम मुझे पहले से ही बहुत पसंद हैं - रामबाग तो एकदम सभ्य और संस्कारी नाम है ! गधा पाड़ा , हाथी पाड़ा , टेढ़ी बगिया , घटिया आज़म खां ! कौन लाया होगा ऐसे मधुर -मधुर नाम ? एक भारत रत्न उसके लिए भी बनता है जिसने इतने सुन्दर और संस्कारी नाम दिए हैं इस शहर की बस्तियों को !!

रामबाग से एत्माउद्दौला जाने का सोचा था लेकिन डायरेक्ट ऑटो या बस नहीं मिल रही थी। मिलती भी नहीं है शायद तो जो मिलेगा उसी से चल देंगे। एक मिल गया , थोड़ी पहले उतार देगा। कोई बात नहीं ! जहाँ वो उतारेगा वहां से एत्माउद्दौला मुश्किल से 300 -350 मीटर ही रह जाता है और ये दूरी कोई मायने भी नहीं रखती। मैंने कौन सा पांवों में मेहंदी सजाई हुई है जो दिक्कत होती ? एक कोल्ड ड्रिंक की बोतल ली और चल भैया एत्माउद्दौला देखने। आगरा में एक साल गुजारा है आगरा कॉलेज में , तब नहीं देखा था इसे लेकिन तब 20 साल पहले घूमने के बारे में इतना सोचता भी नहीं था , नहीं तो मैं साइकिल से ही हो आता। एत्माउद्दौला पहुँच गया हूँ और टिकट ले लिए है। 30 रूपये का टिकट मिला है अकेले का और एडल्ट हूँ इसलिए पूरा टिकट लगा है। अब यहाँ तक आ गए हैं , अंदर जाने के लिए टिकट भी खरीद लिया है तो ये बताना और जानना भी जरुरी हो जाता है कि एत्माउद्दौला में ऐसा क्या है जो मैं इतनी गर्मी में यहाँ चला आया हूँ ?

एत्माउद्दौला को बेबी ताज भी कहा जाता है और कभी कभी ज्वेल बॉक्स " भी कहते हैं। ये एक मुग़लकालीन मक़बरा है जिसे जहांगीर की बेगम नूरजहां ने अपने पिता मिर्ज़ा गयास बेग की याद में बनवाया था। मिर्ज़ा जो हैं वो जहांगीर के दरबार में कोई मंत्री भी थे और पहुँच वाले मंत्री रहे होंगे नहीं तो कौन ससुर , अपने ससुर के लिए इतना खर्च करेगा ? इतिहासकार बताते हैं कि मिर्ज़ा ग्यास , जहांगीर के प्रधानमंत्री हुआ करते थे और साथ में वित्त मंत्री का भी अतिरिक्त प्रभार था इनके पास। वैसे मिर्ज़ा साब भी पर्शियन अमीर थे और वहां से भगा दिए गए थे। हो सकता है कुछ मालपानी वहां से ले आये हों , भागते भागते ! मिर्ज़ा साब को उनके दामाद जहांगीर ने " एत्माउद्दौला " यानी सरकार का मजबूत स्तम्भ ( Pillar of State ) का खिताब दे रखा था इसलिए मिर्ज़ा साब एत्माउद्दौला के रूप में ज्यादा प्रसिद्ध हो गए। अच्छा हाँ , ये जो मिर्ज़ा साब थे मिर्ज़ा गयासुद्दीन , ये मुमताज़ महल के दादा भी थे। मुमताज़ महल , वो ही ताजमहल वाली बेगम जो शाहजहां के 14 वें बच्चे को पैदा करते -करते स्वर्ग सिधार गयी थी और जिसकी याद भी शाहजहां रोता रहता था। वैसे मुमताज़ महल का असली नाम अर्जुमंद बानो था और उसके बाप का नाम अबुल हसन आसफ़ खान जबकि माँ का नाम Plondregi Begum या दीवानजी बेगम था ! नूरजहां , मुमताज़ की बुआ हुई और ये नूरजहां बहुत ही होशियार और चतुर महिला थीं। इन्होने अपने पिता की याद में ही मक़बरा नहीं बनवाया यहाँ आगरा में , बलि जहांगीर की याद में भी लाहौर में एक मक़बरा बनवा दिया जिसे जहांगीर का मक़बरा (Tomb of Jahangir ) कहते हैं। जहांगीर के मकबरे में ही पहली बार पच्चीकारी Pietra Dura ) का उपयोग किया गया है। वैसे अगर दोनों मकबरे का निर्माणकाल देखें तो दोनों लगभग साथ ही बने थे , लाहौर का भी और आगरा का भी ! एक दो साल का ही अंतर रहा है दोनों में !

एत्माउद्दौला को लोग ऐसा मानते हैं की ताजमहल बनाने का आईडिया शाहजहां को इसे देखकर ही आया था इसीलिए इसे बेबी ताज कह देते हैं। एत्माउद्दौला के मकबरे कोभी यमुना किनारे बनाया गया है। जब आप अंदर जाते हैं तो लाल पत्थर के बड़े -बड़े गेट दीखते हैं जिन्हें शायद मेहराब कहते हैं। मुख्य मकबरा एक चौकोर चबूतरे पर बना हुआ है जो मार्बल से बना है। अंदर मिर्ज़ा ग्यास और उनकी पत्नी अस्मत बेगम की कब्रें हैं जिनके आसपास दीवारों पर बहुत सजावट की गयी है।

किसी को जिन्दा रहे रोटी नहीं मिलती
ये दोनों मरके भी घी पी रहे हैं

मुख्य मकबरा का जो चबूतरा है , उसके चारों तरफ सुन्दर बगीचा है जो इसकी खूबसूरती में चार चांद लगा देता है। वैसे चांद एक ही है लेकिन बाकी तीन चाँद कहावत कहने वाले ने लगा दिए होंगे। मेरी तरफ से दो चार और लगा देता , कौन सा चांद मेरे पिताजी ने खरीद लिया था। मुख्य मकबरे में पता नहीं ज्यादा गर्मी नहीं लगी मुझे जबकि बाहर सूरज मुझे जला डालने पर तैयार था। कुछ इस तरह की डिज़ाइन की गयी है कि मिर्ज़ा साब और उनकी बेगम को मरने के बाद भी कब्र में गर्मी न लगे। इसे कहते हैं -गर्मी में ठण्ड का कूल कूल एहसास ! मजेदार बात ये भी है कि इसे नूरजहां ने ही डिज़ाइन किया था। इसके चारों कोनों पर करीब तेरह मीटर ऊँचे षट्कोणीय ( 13 meters high hexagonal towers ) लगे हैं और जो बीच में छतरी सी दिख रही है वो इन दोनों पति -पत्नी की कब्र के बिलकुल ऊपर बनाई गई है।

अब घूम लेते हैं और फोटो लेते हैं। हाँ अपना कैमरा नहीं था उस दिन अपने पास इसलिए सभी फोटो मोबाइल से लिए गए हैं !

आगरा का प्रसिद्ध St. John's College , कभी कभी बैडमिंटन खेलने जाता था मैं यहाँ Agra College से

पहुँच गए एत्माउद्दौला
















चीनी का रोज़ा के पास यमुना किनारे बनी मुगलकालीन छतरियां






चीनी का रोज़ा
सैकड़ों साल पहले की बनी इमारत की छत में अभी तक चमक बाकी है

जाते -जाते.........................................

शुक्रवार, 6 सितंबर 2019

Trip of Dharmshala & Mcleodganj - Himachal


 DOJ : October -2018 


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बैजनाथ मंदिर के सुन्दर दर्शन करने के बाद अगली मंजिल चामुण्डा माता के दर्शन की थी। मंदिर के पास ही बस स्टैंड है और जिस बस से पालमपुर से यहाँ आये थे उसी से वापस हो लिए। ड्राइवर बस स्टैंड में से बस बाहर निकाल रहा था और हम पास के ही रेस्टोरेंट से अपना सामान उठा रहे थे , उसने हमें देख लिया होगा तो जोर से पूछने लगा ? वापस जाओगे क्या ? बिल्कुल जाएंगे भाई ! वो भी खुश और हम भी खुश ! खुश रहने का पैसा थोड़े ही लगता है ? पालमपुर में रुकने -घूमने का कोई विचार नहीं था इसलिए एक डेढ़ घंटे की बैजनाथ -पालमपुर की सड़क यात्रा संपन्न होते ही पालमपुर से धर्मशाला की बस पकड़ ली। धर्मशाला से करीब 12 -13 किमी पहले ही चामुंडा माता का मंदिर है जो समुद्र तल से करीब 1000 मीटर की ऊंचाई पर है। ये मंदिर भी कांगड़ा जिले में आता है। मंदिर के मुख्य गेट के पास बस से उतरते -उतरते सात -साढ़े सात बज गए थे और अँधेरा घिर आया था। थोड़ी ठण्ड थी क्यूंकि अक्टूबर का महीना था। कुछ चाय -पानी हो जाए पहले ! मंदिर के मुख्य प्रवेश के पास ही चार -पांच बढ़िया रेस्टोरेंट हैं , जहाँ खाना -नाश्ता मिल जाता है। हल्की सी पेट पूजा करके अब ज़रा होटल -रुकने की व्यवस्था देखी जाए !



बच्चों को रेस्टोरेंट में ही छोड़कर आसपास के होटल देखे , मेरे बजट से महंगे थे। महंगे होंगे ही , ये आलिशान बिल्डिंग जो बनाई हुई हैं लेकिन ये मेरे जैसे के लिए नहीं हैं। मैं होटल लेते समय उसकी बिल्डिंग कभी नहीं देखता बल्कि मुझे मिलने वाली बेसिक सुविधाएं देखता हूँ - जैसे सुबह की चाय छह बजे देनी होगी ! सर्दियों का मौसम है तो गीजर होना चाहिए या गरम पानी लाकर दे दे और सफाई। बस और मुझे क्या चाहिए ? टीवी नहीं चाहिए , फ़ोन नहीं चाहिए ? क्यों चाहिए आखिर ? इनसे बचने के लिए ही तो घूमता हूँ बच्चों के साथ और इन्हें ही साथ रखूँगा तो क्या फायदा ? ऐसे मौकों पर हम सब चारों अपना -अपना "टैलेंट" दिखा लेते हैं। खैर एक धर्मशाला मिली , रूम भी मिला गीजर सहित लेकिन एक शर्त पर सुबह 8 बजे तक खाली करना पड़ेगा क्यूंकि उस धर्मशाला में अगले दिन कोई शादी थी। मिला कितने का ? 300 रूपये का ! लेकिन बाद में लोचा हुआ इसमें और क्या लोचा हुआ वो बाद में बात करते हैं। तो जी आठ बजे करीब दर्शन को पहुँच गए माँ चामुंडा के दर पे और गिनती के लोग ही आते -जाते दिख रहे थे। अचानक हमारे ही कॉलेज के एक प्रोफेसर अपनी धर्मपत्नी के साथ आते हुए दिखे , नमस्कार हुई ! बात हुई फिर वो धर्मशाला की तरफ और हम मंदिर में अंदर की तरफ। बहुत ही सुलभ दर्शन हुए और खूब समय गुजारने का अवसर मिला मंदिर में। चामुंडा मंदिर के पास ही बाण गंगा नदी बहती है और ऐसा माना जाता है कि चामुण्डा माता के दर्शन , बाणगंगा में स्नान के बाद ही करने चाहिए लेकिन इतनी ठण्ड में और रात में न स्नान का कोई तुक था और न हमें पता था ! हिन्दू होना मुझे इसीलिए गर्व का एहसास कराता है क्योंकि आप कुछ चीजें अपने हिसाब से भी कर सकते हैं , इतनी छूट मिलती है और बिना नहाये दर्शन करने से मेरा "हिंदुत्व " खतरे में नहीं आएगा। चामुण्डा मंदिर सहित अब हम हिमाचल की पांच देवियों के दर्शन का सौभाग्य प्राप्त कर चुके हैं। कांगड़ा देवी मंदिर , ज्वाला जी मंदिर , चिंतपूर्णी मंदिर , बगुलामुखी मंदिर और अब चामुंडा मंदिर दर्शन ! धन्य हुए हम !!

Masroor Rock Temple : Kangda


अगली सुबह धर्मशाला में चिल्ल -पों ने जल्दी ही नींद खोल दी। जिस परिवार की यहाँ शादी थी , उस परिवार के बहुत से सदस्य रात को ही यहाँ आ गए थे और भीड़ हो गयी थी जिसके कारण "माहौल " बन गया था। चाय मिल गयी तो शरीर एक्टिव हुआ और फिर सुबह साढ़े सात बजे झोला -डण्डा उठाकर मैनेजर के रूम में चाभी और किराया देने पहुंचे। रात जो आदमी यहाँ था , उसकी जगह अब कोई दूसरा व्यक्ति वहां बैठा था। पांच सौ का नोट थमाया और उसने हमें आधिकारिक रूप से Check Out कर दिया लेकिन बाकी के 200 रूपये नहीं लौटाए ! मैंने पूछा -क्यों ? बोला , 500 रूपये का ही था किराया। खूब बहस हुई। .. मैं इतनी आसानी से नहीं छोड़ सकता था मुझे कोई दिक्कत नहीं थी अगर उसने 500 किराया कल ही बताया होता ! लेकिन 300 रुपया बताकर 500 रुपया लेना गलत था और अब हमें वापस चाहिए थे बचे हुए पैसे। आखिर उस आदमी को , जो रात यहाँ था , उसे बुलाया गया और हमें 200 रूपये वापस मिले। अब आज की मंजिल धर्मशाला से निकलकर धर्मशाला और मैक्लॉडगंज की तरफ थी। यहाँ से 12 -13 किमी होगा धर्मशाला और बाहर निकलते ही लगभग पांच मिनट के अंदर ही हमें हिमाचल रोडवेज की बस मिल गयी। अगले एक घंटे में हम एक छोटे , शांत , अत्यंत खूबसूरत शहर और जाने -माने हिल स्टेशन "धर्मशाला " की सड़कों से होते हुए वहां के बस स्टैंड में प्रवेश कर चुके थे। सर्दियों में ये शहर और भी खूबसूरत हो जाता है जैसे किसी नवयौवना ने सौलह श्रृंगार कर लिए हों ! आज सोलह श्रृंगार तो नहीं थे धर्मशाला के लेकिन छह -सात तो करे ही होंगे ! काजल -बिंदी -लिपिस्टिक -नेल पोलिश तो आज भी लगाईं ही होगी। लेकिन अभी धर्मशाला को हमारा और थोड़ा सा इंतज़ार करने दो , पहले मैक्लॉडगंज चलते हैं। हर 15 मिनट में धर्मशाला से मैक्लॉडगंज के लिए बस मिल जाती है। धर्मशाला के बस स्टैंड में ही 20 -30 रूपये में सामान रखा और मैक्लॉडगंज की बस ले ली। इतना सामान लेकर चलने की जरुरत ही क्या है जब शाम तक हमें यहीं वापस लौटना है !

Baijnath Shiva Temple : Himachal Pradesh


धर्मशाला से मक्लॉडगंज का रास्ता सच में बेहद खूबसूरत है। हरे -भरे पहाड़ों के ऊपर चमकती बर्फ राजा के सिंहासन में लगे मुकुट की मानिंद जब चमकती है तो उसे हाथ बढ़ाकर छू लेने और महसूस कर लेने का किसका मन नहीं होगा। और प्रकृति का असली आनंद , असली स्वाद भी तो इसी में है कि आप जिस प्रकृति का आनंद आज उठा पा रहे हैं , कल आपके बच्चे उस आनंद को जी पाएं , इसके लिए जरुरी है ये संवेदना भी बनी रहे कि आप प्रकृति को जितना चाहें चूमें , आनंद लें , महसूस करें लेकिन उसका सत्यानाश न करें। प्रकृति को प्रेमिका के रूप में देखिये , उसका इश्क़ , उसकी मौजूदगी , उसकी आँखों की भाषा को समझिये आपको परम आनंद आएगा लेकिन जैसे ही आप प्रेमिका पर टूट पड़ेंगे , आपको क्षणिक स्वाद तो निश्चित रूप से आएगा लेकिन संभव है आपको या आपकी अगली पीढ़ी को भारी पड़ जाए। अगली पीढ़ी दूर की बात है , इसी पीढ़ी को भारी पड़ने लगा है जिसका नजारा मैक्लोडगंज की सडकों पर रेंगती गाड़ियां और भौं -भौं करते कुत्ते की आवाजें निकालती हुई गाड़ियों की रेलम पेल दिखी। हर सड़क ठसाठस भरी हुई , जैसे आज ही का दिन आखरी है सबकी जिंदगी का। ऐसी जगहों को तो बख्श दो हे रहीसों की औलादो ! कभी -कभी सार्वजनिक परिवहन की सुविधा का उपयोग करेंगे तो कोई औकात नहीं खराब होगी तुम्हारी ! बख्श दो मेरे भाई ! प्रकृति को तो कम से कम बख्श दो !!

मैक्लॉडगंज की संकरी सडकों पर भीड़ के मारे बच्चों के साथ पैदल चल पाना भी मुश्किल हो रहा था तब इस भीड़ की चिराँध से बचने के लिए थोड़ी देर बैठकर चाय -परांठा खा लेना ही बेहतर विकल्प नजर आ रहा था। परांठा जो दिल्ली में 20 -25 में मिल जाता है वो 80 रूपये का दिया साले ने ! मैं उसे श्राप देकर आया मन ही मन में -जा तेरे चार परांठे जल जाएँ और तेरा रायता कल सुबह तक खराब हो जाए !! तूने एक पंडित से ज्यादा पैसे लिए हैं , जा ! तेरे बाथरूम से तेरा नहाने का मग गायब हो जाए ! पता नहीं उस पर मेरे श्रापों का कोई असर हुआ या नहीं !!

मैक्लोडगंज सुन्दर है ! बेशक ! लेकिन शहर से बाहर ! अंदर भीड़ बहुत होती है इसलिए सुंदरता , भीड़ के घूंघट में छुप जाती है। हमें तो बस भृगु मंदिर और भागसूनाग फॉल देखना था और लौटते हुए दलाईलामा का मंदिर। पैदल ही रास्ता नापना शुरू कर दिया। एक -डेढ़ किलोमीटर तो होगा भृगु मंदिर बस स्टैंड से। बाजार से होते हुए चलते गए। रास्ते में एक अँगरेज़ भाईसाब खड़े खड़े गिटार बजा रहे थे और पैसे मांग रहे थे ( माँगना गलत शब्द होगा -कमा रहे थे ) ! माँगना तो भारतीयों के साथ लगाया जाता है न ? वो अँगरेज़ था , उसकी चमड़ी गोरी थी इसलिए वो अँगरेज़ था या अँगरेज़ था इसलिए उसकी चमड़ी गोरी थी ? वो आप जानो !! लेकिन अँगरेज़ गिटार बजा रहा है तो हमें दरियादिली दिखानी ही होती है इसलिए वहां 100 -100 के नोट भी उसे देने में न हिचक न सिद्धांत। उसे भिखारी भी नहीं कहेंगे , भिखारी शब्द तो भारतीय के साथ लगाएंगे न !! उसे तो कलाकार कहा जाएगा कलाकार !! क्योंकि वो अँगरेज़ है और उसकी चमड़ी गोरी है ! उसे भिखारी कैसे कहेंगे ? है न !! भिखारी उसे कहते हैं जिसे एक रुपया देते हुए भी हम पचास गालियां दें !! ये तो कलाकार है ! कलाकार !! यू ब्लडी इण्डियन पीपल कांट अंडरस्टैंड थिस थ्योरी ऑफ़ थिंकिंग ! यू ....यू.. कांट डिफ़्फरेंशिएट बिटवीन अ भिखारी एंड ए कलाकार !! यू कॉमन पीपल विल नेवर अंडरस्टैंड दिस !!

भृगु मंदिर चल दिए और आधा घण्टा गुजार के भागसूनाग फॉल चलते हैं। करीब डेढ़ -दो किलोमीटर पैदल पक्का रास्ता है। आप ना भी जाना चाहें तो मंदिर के पास से भी दिखाई देता है ये फॉल लेकिन मैं कहूंगा जाना चाहिए। आराम आराम से हल्की -हल्की चढ़ाई चढ़ते हुए एक घंटे में फॉल तक पहुँच जाएंगे। फॉल उन लोगों को बहुत अच्छा लग सकता है जिन्होंने इससे पहले कोई फॉल नहीं देखा लेकिन क्यूंकि मैंने बहुत सारे और इससे कई गुना बड़े और भी फॉल देखे हैं तो मुझे कुछ ख़ास पसंद नहीं आया लेकिन इसका मतलब ये बिलकुल नहीं कि फॉल अच्छा नहीं है ! खूबसूरत है और मैक्लोडगंज का फेमस आकर्षण है।

फॉल से लौटते हुए दलाईलामा मंदिर पहुँच गए जो मैक्लोडगंज में धर्मशाला की तरफ से घुसते ही एक नीचे की तरफ जा रही रोड पर है जबकि भागसूनाग फॉल तक जाने के लिए आपको पूरा टाउन पार करके जाना पड़ता है। दलाईलामा मंदिर की तरफ जो रोड जा रही है उसके दोनों तरफ दुकानें हैं। मुझे लगता है ये दुकानें सिर्फ विदेशियों के लिए ही बनी हैं। 100 खरीददारों में से शायद ही कोई इंडियन होगा उन दुकानों में। अगर कोई भारतीय वहां था भी तो वो बस रंगीन चश्मा या हैट के ही दाम -कीमत पूछना चाहता था। जबकि वहां बुद्ध , गणेश सब बिकने के लिए रखे थे। बिकेंगे , झाड़ पौंछकर ड्रेसिंग रूम में सजेंगे। सही जगह बिठाया जा रहा है भगवान को !!

तीन बजने को हैं तो अब धर्मशाला के लिए निकल चलो। बस पकड़ी और साढ़े चार बजे धर्मशाला के बस स्टैंड से अपना सामान उठाते हुए हिमाचल के एकमात्र स्टेडियम और धर्मशाला के बेहद खूबसूरत आकर्षण क्रिकेट स्टेडियम को देखने दौड़ चले। टिकट लगता है यार उसमें अंदर जाने के लिए। याद नहीं 40 का था या 50 रूपये का। एक ही स्टैंड पब्लिक के लिए खोला गया है जिसकी सीटें टूटी पड़ी हैं। पवेलियन को दूर से देख सकते हैं लेकिन अगर आप वहां हैं और धर्मशाला घूमने गए हैं तो ये जगह जरूर देखिएगा। बहुत ही खूबसूरत स्टेडियम बना है। मैच भले ही कम होते हैं लेकिन परिवार के साथ यहाँ बैठना अच्छा लगेगा।

धर्मशाला से निकलने में ही फायदा है क्यूंकि हमारी ट्रेन है पठानकोट से आज ही रात को ! तो हिमाचल की ये दूसरी यात्रा आज समाप्त करते हैं इस वायदे के साथ कि फिर मिलेंगे जल्दी ही कोई और - कहानी लेकर !! तब तक सभी मित्रों को जय राम जी की !! और चंद्रयान -2 के चन्द्रमा की सतह पर सफलतापूर्वक उतरने की बहुत बहुत शुभकामनाएं !! जय हिन्द !! 

Musician or a Beggar ?
Bhrigu Mandir : Mcleodganj



Way to Bhagsunag Fall
 Bhagsunag Fall







Dalai Lama Mandir Road : Mcleodganj



Gods are for sell here which one would u pick ?

Amazing & Beautiful souvenirs




 


Inside The Dalai Lama Mandir



Inside The Dalai Lama Mandir




Now moving to Dharmshala
Cricket Stadium in Dharmshala !! It looks most beautiful stadium of India