बुधवार, 28 दिसंबर 2016

ताक धिना धिन ताके से.......Part- III

अगर आपको ये उर्दू कहानी पढ़ने में आनंद आ रहा है और आप इसे शुरू से पढ़ना चाहते हैं तो आपको यहाँ क्लिक करना पड़ेगा !! और अगर पिछले अंक से पढ़ना चाहते  हैं तो यहाँ क्लिक करें !! आइये आगे पढ़ते हैं :...............

ख़रगोश बोला -
मियाँ लड़के मत रो !
मैं तुम्हारी मदद करूँगा
मैं बकरी को पहाड़ से उतार कर लाऊंगा

अब ख़रगोश पहाड़ पर चढ़ने लगा
ख़रगोश बकरी के पास पहुंचा
बकरी को बुलाया
बकरी नहीं आई
वो ऊपर चढ़ने लगी !!

अब ख़रगोश डरा
दिल में सोचा
पहाड़ ऊंचा है
नीचे दरिया है
कहीं बकरी गिर न जाए !
दरिया में डूब न जाए !
ये सोच कर खरगोश लड़के के पास आया
लड़के के पास आकर जोर से चिल्लाया -

ताक धिना धिन ताके से
मामा कुंवर मर गई फ़ाक़े से !!



फिर जोर जोर से रोने लगा !!
अब लड़का भी खरगोश के साथ रोने लगा

दोनों के रोने की आवाज़ से जंगल गूँज उठा
पास के किसी पेड़ पर एक गिलहरी रहती थी
वो रोने की आवाज़ सुन कर पेड़ पर से उतरी -
पहले लड़के के पास आई
उसे घूर कर देखा
फिर खरगोश के पास आई
उसे घूर कर देखा
दोनों से पूछा -

भैया , क्यों रो रहे हो ?
जंगल में खैर तो है ?
दोनों बोले :
बहन गिलहरी क्या बतायें -
मामा कुंवर की बकरी नहीं मानती
वो पहाड़ पर से नीचे नहीं उतरती
हम डरते हैं
कहीं पहाड़ पर से गिर न जाए !
नीचे दरिया है
उस में डूब न जाए
फिर दोनों दहाड़ मार कर रोने लगे
और चिल्लाने लगे -

ताक धिना धिन ताके से
मामा कुंवर मर गई फ़ाक़े से !!


गिलहरी बोली -
भैया , मत रोओ
मैं बकरी को पहाड़ पर से उतार लाऊंगी
बकरी पहाड़ पर से नहीं गिरेगी
बकरी दरिया में नहीं डूबेगी
ये कह कर गिलहरी पहाड़ पर चढ़ने लगी

गिलहरी बकरी के पास पहुंची
बकरी को बुलाया
वो और ऊपर चढ़ गई
अब गिलहरी दहाडें मारकर रोने लगी
और दिल में सोचा -
पहाड़ ऊंचा है
नीचे दरिया है
कहीं बकरी गिर न जाये
कहीं बकरी डूब न जाये

अब गिलहरी जोर जोर से रोने लगी -
वो लड़के और ख़रगोश के पास आई
दोनों के पास आकर बैठी
तीनों मिल कर बोले -

ताक धिना धिन ताके से
मामा कुंवर मर गई फ़ाक़े से !!


वहां पास कहीं एक गीदड़ रहता था
उसने लड़के , ख़रगोश और गिलहरी की आवाज़ सुनी
पहले वो लड़के के पास आया
उसे घूर कर देखा
फिर वो खरगोश के पास आया
उसे घूर कर देखा
फिर वो गिलहरी के पास आया
उसे घूरकर देखा
तीनों से पूछा -

तुम क्यों रो रहे हो ?
जंगल में खैर तो है ?
तीनों बोले :
चचा गीदड़ ! खैर नहीं है !
मामा कुंवर की बकरी पहाड़ पर चढ़ गई है
पहाड़ ऊँचा है
उस के नीचे दरिया बहता है
बकरी कहीं पहाड़ से गिर न जाये
बकरी कहीं दरिया में डूब न जाये
इसलिए हम रोते हैं
फिर तीनों जोर चीखे :

ताक धिना धिन ताके से
मामा कुंवर मर गई फ़ाक़े से !!



जारी रहेगी : 



गुरुवार, 22 दिसंबर 2016

Kausani : A well known hill station

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हेड़ाखान मंदिर से लौटकर फिर से होटल पहुंचे , सामान उठाया और फिर से चल दिए रोडवेज बस स्टैंड की तरफ ! इधर से उधर होते रहे , कभी नीचे की तरफ जाओ कभी ऊपर की तरफ आओ ! कौसानी की कोई बस नही थी उस वक्त तो किसी ने बताया कि यहाँ से सोमेश्वर चले जाओ , लेकिन सोमेश्वर की भी न आई बस न जीप ! कुछ देर में एक जीप वाला आया और बोला - कहाँ जाएंगे ? सोमेश्वर ! सोमेश्वर तो नहीं लेकिन आपको बिन्ता छोड़ दूंगा वहां से आपको सोमेश्वर की जीप मिल जायेगी ! चल भैया ! बिन्ता में कोई मेला लगा था , छोटी सी रोड और उसके दोनों तरफ मेला , जैसे तैसे जीप निकल पाई ! जैसे ही जीप से उतरे , सामने ही सोमेश्वर की जीप लगी थी ! इस समय चार बजे थे ! सोमेश्वर से एक रास्ता द्वाराहाट के लिए भी जाता है और एक बैधनाथ धाम के लिए भी ! बैधनाथ में मंदिरों की एक पूरी श्रृंखला है , मैंने देखा नहीं कभी लें जाऊँगा जरूर ! शाम को सात बजे के आसपास हम कौसानी के अनाशक्ति आश्रम में थे , वो ही अनाशक्ति आश्रम जहाँ कभी गाँधी जी रुके थे हिमालय दर्शन के लिए ! एक दिन का 400 रुपया किराया है उसका , पहले कभी मुफ्त चलता होगा अब नहीं है ! अब किराया देना पड़ता है ! कौसानी का जो मुख्य बाजार है , वैसे तो एक ही बाजार है उसे चाहे मुख्य कह लो और कुछ और ! तो जो गोल चक्कर है उसके बराबर में ऊपर की तरफ सीढियां जाती हैं , बस सीधे चलते जाओ , अनाशक्ति आश्रम मिल जाएगा ! रानीखेत से भी ज्यादा ठण्ड थी यहाँ ! लेकिन अब हमारे पास गर्म कपडे हैं , कोई दिक्कत नहीं !


पुराने ज़माने के कमरे बने हुए हैं , लकड़ी के ! हाँ , वाशरूम पश्चिमी स्टाइल के हैं ! चाय दे गया था कोई और बता गया था कि खाना अगर खाना चाहें तो 9 बजे भोजनालय में आ जाइयेगा ! खाना बहुत सिंपल लेकिन बहुत ही स्वादिष्ट ! जब सब लोग लाइन में बैठे तब पता चला कि इस आश्रम में हमारे अलावा और लोग भी ठहरे हुए हैं ! दाल चावल सब्जी रोटी ! कुछ भी अलग नही लेकिन बहुत अच्छा लगा ! जो आदमी थोड़ी देर पहले मेनेजर था , वो ही अब खाना भी परोस रहा था ! मल्टी टैलेंटेड !! चलते हैं , अब सोयेंगे !


सुबह ठीक 6 बजे कुण्डी खटक गयी दरवाज़े की , चाय देने आया था ! दो चाय लेकर उसे आठ बजे फिर से चार चाय लाने को बोल दिया और चाय पीकर फिर सो गए ! थके - हारे बच्चे भी सोये पड़े थे , फ़ोन घनघनाया ! सर - कॉलेज की बस नहीं आई ? मैडम मैं कौसानी में हूँ ! नींद ख़राब हो गयी ! नौ बजे तक सब तैयार होकर नाश्ता करने पहुंचे तो नाश्ता खत्म हो चुका था , चलो बाहर करेंगे !

कौसानी की एक बात बड़ी अजीब सी लगी , इसका आधा हिस्सा अल्मोड़ा जिले में है और आधा हिस्सा बागेश्वर जिले में पड़ता है ! आप अगर अनाशक्ति आश्रम में हैं तो आपको रात में बागेश्वर का बहुत खूबसूरत नजारा देखने को मिलता है !!

सबसे पहले हिंदी के महान कवि सुमित्रा नंदन पन्त जी का घर देखने चलते हैं , पास में ही है ! वैसे कौसानी में सब कुछ पास में ही है ! उसके बाद चाय बागान देखने चलते हैं , हम सब पहली बार चाय के बागान देखेंगे ! वैसे मेरी ये समझ में नहीं आया कि वैसे तो सब चीज के बाग होते हैं जैसे सेब के बाग , आम के बाग़ तो चाय के बाग़ को ही बागान क्यों कहते हैं ? बताइयेगा ! कार वाला 400 रूपये मांग रहा है , शेयर्ड जीप जाती नहीं , या जाती भी होगी तो हमें नहीं मालुम ! आखिर उसी से 250 रूपये में बात हो गयी ! हमें आज ही वापस लौटना है गाजियाबाद ! तो बागान देखकर सामान उठाकर चलते बनेंगे ! बच्चों की तबियत गड़बड़ा गयी है , नहीं तो हमारा तो रिजर्वेशन काठगोदाम से 6 नवम्बर का है और आज 4 ही नवम्बर है ! रिजर्वेशन कैंसिल करा दूंगा ! बच्चों का ख्याल पहले है , पैसे की बात बाद में ! लेकिन इस ट्रिप में मैंने दोनों तरफ का रिजर्वेशन कराया था , इधर से जाने का रेलवे ने कन्फर्म नहीं किया और उधर से हमने कैंसिल कर दिया ! हिसाब बराबर ! चलो जी , वापस गाज़ियाबाद चलते हैं !!


राम राम !!



ये कीनो हैं , संतरे नहीं












बताइये कितने बन्दर हैं इस तस्वीर में ? तीन या पांच







इसमें पन्त जी के साथ अमिताभ बच्चन के पिता जी भी हैं


          



















शॉल बनाने की मशीन


शॉल बनाने की मशीन

थोड़ा ट्राय करके देखते हैं

थोड़ा ट्राय करके देखते हैं ! मैं क्यों पीछे रह जाऊं
बाय बाय रानीखेत -कौसानी !! प्यारा सा पुष्प आपके लिए , मेरी तरफ से नाव वर्ष की शुभकामनाएं









शुक्रवार, 2 दिसंबर 2016

ताक धिना धिन ताके से.......Part- II

अगर आपको ये उर्दू कहानी पढ़ने में आनंद आ रहा है और आप इसे शुरू से पढ़ना चाहते हैं तो आपको यहाँ क्लिक करना पड़ेगा !! आइये आगे पढ़ते हैं :





बकरी बहुत दूर तक पहाड़ चढ़ती रही
लड़का खेलता रहा
कभी कभी मुंह उठाकर चिल्लाती " म्हें म्हें "
फिर हरी हरी घास चरने लगती
दोपहर तक चरती रही
एक तालाब में से पानी पीया !!
जब बकरी का पेट भर चुका
तो उसे शरारत सूझी
वो दूर जंगल में भाग गई
बकरी के पीछे लड़का भागा
वो बकरी को बुलाता रहा
मगर बकरी जंगल में भागती जा रही थी
वो दूर जंगल में भाग गई
लड़का उसके पीछे दौड़ता रहा और चिल्लाता रहा :

ताक धिना धिन ताके से
मामा कुंवर मर गई फ़ाक़े से 



अब बकरी पहाड़ पर चढ़ने लगी
वो पहाड़ बहुत ऊँचा था
उस पहाड़ के नीचे दरिया था
वो दरिया गहरा भी था
और चौड़ा भी था
और तेज़ भी था
लड़का डरने लगा !!
कहीं बकरी पहाड़ पर से न गिर पड़े
दरिया में डूब न जाए
लड़का बकरी को बुलाने के लिए ऊपर चढ़ा
लड़का ज्यों ज्यों ऊपर चढ़ता गया
बकरी और ऊपर चढ़ती गई
लड़के के पाँव में पत्थर लगा
लड़के के पाँव से खून निकलने लगा
लड़का थक गया था
वो एक पत्थर पर बैठ गया
और रोने लगा
जोर जोर से चिल्लाने लगा -

ताक धिना धिन ताके से
मामा कुंवर मर गई फ़ाक़े से


वहां पास ही झाड़ियां थीं
उन झाड़ियों में से एक खरगोश निकला
वो खरगोश सफ़ेद था
बड़ा खूबसूरत था
उस के लंबे लंबे कान थे
वो झाड़ियों में से फुदकता फुदकता निकला
वो लड़के के पास आया
उसे घूर कर देखा
उससे पूछा :
लड़के ! लड़के ! ! तुम क्यों रोते हो ?
जंगल में खैर तो है ?
लड़का बोला -

ताक धिना धिन ताके से
मामा कुंवर मर गई फ़ाक़े से


फिर लड़के ने जवाब दिया
मियां खरगोश क्या बताऊँ
मामा कुंवर की बकरी पहाड़ पर चढ़ गई है
मैं उसे बुलाता हूँ
वो आती नहीं
डर है कहीं पहाड़ पर से न गिरे
नीचे दरिया है
गिर कर दरिया में न डूब जाए
अब क्या करूँ ?
लड़का फिर चिल्लाया :

ताक धिना धिन ताके से
मामा कुंवर मर गई फ़ाक़े से


ज़ारी रहेगी :

शुक्रवार, 25 नवंबर 2016

Hedakhan Temple : Ranikhet

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आशियाना पार्क , रानीखेत के बच्चों के लिए बहुत ही शानदार पिकनिक स्पॉट होगा , लेकिन उस समय शाम के साढ़े पांच या छह बजे कोई भी बच्चा उधर नही दिखाई दिया , बस दो बच्चे , वो भी ​दूसरे शहर के , उस पार्क की शोभा बढ़ा रहे थे , या ये कहा जाए कि वो दो बच्चे ही पार्क को "पार्क' बनाये हुए थे और ये दो बच्चे थे , हर्षित और पाई ! हाहाहा !

ये जगह शहर के निचले वाले हिस्से में है और हमारा होटल ऊपर वाले हिस्से में था , ऐसे कुछ अजीब सा लग रहा है कहने में ! ऐसे कहता हूँ , आशियाना पार्क रानीखेत के सरकारी बस स्टैंड की तरफ है और हमारा होटल प्राइवेट बस स्टैंड की तरफ था ! अब ठीक है ! तो अब हमें हल्की सी चढ़ाई चढ़ते हुए अपने होटल तक पहुंचना है , लेकिन थकान की वजह से ये हल्की सी चढ़ाई ही भारी लग रही थी !!



चाय पीते हैं बढ़िया सी ! काली मिर्च और लोंग , अदरक डाल के ! बना दे भाई दो चाय ! खाना अपने होटल में ही खा लेंगे ! सात बजे तक हम वापस होटल के अपने कमरे के कम्बल में घुस चुके थे , आठ बजे खाने का बुलावा आया तो ठण्ड के मारे हिम्मत नही हो रही थी , बाहर निकलने की ! भूख तो लगी है , चलते हैं !

इस ट्रिप में एक बहुत बड़ी गड़बड़ हुई थी ! मैं सोच रहा था कि ठण्ड ज्यादा नही होगी इसलिए अपनी बहुत हल्की सी हाफ जैकेट लेकर गया था और लता ( मेरी पत्नी ) ने बस गर्म सूट लिए थे , या ये कहूँ कि मैंने ही फ़ोर्स किया था कि बस इतना ही ले चल , काहे को वज़न बढ़ाना ? बच्चों के भी सर्दी के हलके कपडे ही लिए थे लेकिन जब ठण्ड का एहसास हुआ तो मुझे बच्चों के लिए , अपने लिए और वाइफ के लिए फिर से गर्म कपडे लेने पड़ गए और मेरा बजट बहुत ऊपर पहुँच गया ! खैर कपडे ही हैं , काम ही आएंगे !


अगली सुबह यानि 3 नवम्बर का हमारा प्रोग्राम सबसे पहले UPAT गोल्फ कोर्स जाने का था ! आठ बजे तो बिस्तर में से मुंह निकल पाया , वो भी लता का , मेरा मुंह बिस्तर में से हमेशा ही लता के बाद निकलता है और मेरे बाद दोनों बच्चों का ! ऐसे करते करते 9 बज गए ! नहाने का कोई मतलब नही इस ठण्ड में , मुंह हाथ चुपड़ लिए और बालों में कंघी मार ली , बन गए बाबू जी !!

अब फिर से नीचे जाना पड़ेगा , वो ही सरकारी बस स्टैंड पर ! वहीँ मजखाली जाने के लिए जीप मिलती हैं और वो जीप ही गोल्फ कोर्स पर उतार देती हैं , या फिर आप अपनी गाडी बुक करके ले जाओ , 250 -300 रूपये में ! शेयर्ड जीप में इधर से 15 रूपये प्रति सवारी लगी और उधर से 10 रूपये प्रति सवारी में ही आ गए , यानि upat गोल्फ कोर्स तक जाने आने के लगे कुल 50 रूपये , तो क्यों 250 रूपये खर्च करे जाएँ ? कोई पागल कुत्ते ने काटा है ?

बढ़िया -शानदार रास्ता बना हुआ है और आगे जाकर ये रास्ता द्वाराहाट होते हुए कर्णप्रयाग को चला जाता है , सीधे हाथ पर मजखाली के लिए एक सिंगल रोड निकल जाती है ! पूरे रास्ते कुमायूं रेजिमेंट का कोई न कोई प्रतिष्ठान बना हुआ है ! अच्छा लगता है ! हम उम्मीद कर रहे थे कि गोल्फ कोर्स में कोई न कोई तो गोल्फ खेलते हुए मिल ही जाएगा , लेकिन यहां तो कोई नही खेल रहा , हाँ गाय जरूर चर रही हैं और एक दो बच्चे अपनी माँ-बाप के साथ बैडमिंटन खेल रहे हैं ! बच्चे भी मस्ती मारने लगे , चीड़ के लंबे लंबे पेड़ों से घिरा ये गोल्फ कोर्स वास्तव में बहुत खूबसूरत लगता है ! त्रिशूल पीक के कुछ फोटू यहां से भी खेंच लिए और चल दिए वापस ! एक दो घंटे की बच्चों की मौजमस्ती का पूरा मामला है यहां ! पूरे फील्ड में घूमते रहो , लोटपोट होते रहो ! कौन सा बच्चों को कपडे धोने हैं , उनकी माँ जिंदाबाद !! माँ जिंदाबाद थी , जिंदाबाद है और जिंदाबाद रहेगी !!

हालाँकि नाश्ता खा के ही निकले थे रानीखेत से लेकिन अब भूख भी लगी है ! चलते हैं वापस ! अब हेड़ाखान मंदिर चलेंगे , और फिर एक गड़बड़ हुई , अब फिर हमें नीचे से ऊपर की तरफ आना पड़ेगा ! क्योंकि हेड़ाखान मंदिर के लिए जीप प्राइवटे बस स्टैंड से मिलती हैं ! चलते हैं पैदल पैदल , क्या कर सकते हैं ? यहां न तो ऑटो रिक्शा मिलेगा न साइकिल रिक्शा ! पैरों को ही मसक्कत करनी पड़ेगी ! चल मेरे भाई !!

पास में ही है हेड़ाखान मंदिर , मुश्किल से 6 -7 किलोमीटर दूर होगा रानीखेत से ! हेड़ाखान मंदिर जिस गांव में है उस गाँव का नाम अजीब सा है "चिड़िया नौला " ! ये चिड़िया नाला रहा होगा शायद जो बदलते बदलते चिड़िया नौला हो गया होगा ! और चिड़िया नाला भी क्यों रहा होगा ? शायद कोई नाला होगा और उस नाले के आसपास कुछ पेड़ रहे होंगे जिन पर चिड़िया चहचहाती होंगी , तो अगर किसी को वो जगह बतानी होती होगी तो कह देता होगा -चिड़िया वाला नाला और लो जी हो गया चिड़िया नाला या चिड़िया नौला !! वैसे भारत में जगहों के नाम भी ऐसे ही मिल जाते हैं , गन्दा नाला , चौड़ा नाला , गधा पाड़ा , टेढ़ी बघिया , तिरछी कुटिया ! हेड़ाखान मंदिर के लिए प्राइवेट बस स्टैंड से जीप मिल जाती हैं , जहां जीप आपको उतारेगी उसके पास ही हेड़ाखान मंदिर है !

गाँव से एकदम बाहर जरूर है लेकिन अच्छा बना है , इस मंदिर के बिल्कुल सामने कुमायूं विकास निगम का गेस्ट हाउस भी है , शायद "हिमाद्री " के नाम से है ! मंदिर के बाहर स्टेट बैंक ऑफ़ इंडिया का ATM भी है , जो  बढ़िया हालात में है ! मंदिर तो जैसा है , वो है ही लेकिन मंदिर के पास वाले बंगले बहुत ही शानदार हैं ! ये मंदिर बाबा हेड़ाखान को समर्पित है जो यहीं के रहने वाले थे और अपनी युवा अवस्था में घोर तप किया था ! ज्यादा मुझे नही मालूम उनके बारे में ! आपको पता चले तो शेयर करियेगा , और हाँ अब फोटू खेंचते हैं फिर निकलते हैं , सामने ही रेस्टोरेंट सा कुछ है , खाएंगे पियेंगे ! पियेंगे मतलब चाय पियेंगे ! दो चार आसपास अंग्रेज़ लोग भी दिखाई दे रहे हैं , दो पुरुष दो महिला ! मतलब उन लोगों को भी बाबा हेड़ाखान में रूचि है ? या सिम्पली प्रकृति का आनंद लेने के लिए घूम रहे हैं ? चलो जी चलते हैं , कल फिर आपसे मुलाकात होगी !! तब तक राम राम !!








भारतीय सेना में शामिल होने के लिए बहुत मेहनत चाहिए , तैयारी चल रही है




नए रंगरूट की तरह "कैप " उछाल कर जश्न मनाया जा रहा है

एक सैनिक को पहाड़ भी चढ़ने होते हैं


प्रैक्टिस चल रही है , फुल ऑन
















ये पहाड़ छू लेने की चाहत है

कुछ विशेष लगा ?
हेड़ाखान मंदिर का प्रवेश द्धार


























हेड़ाखान मंदिर से दिखाई देती ' त्रिशूल ' चोटी

हमारे यहां इसे ' कनेर ' बोलते हैं


ये हाइड्रेंजिया का फूल है , ऐसा कुछ फेसबुक मित्रों ने बताया


पेड़ पर भले धूल जमी हो लेकिन , कीनो तो साफ़ हैं