बुधवार, 8 अप्रैल 2015

चन्दरू की दुनियाँ - पाँचवीं किश्त

गतांक से आगे

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चन्दरु का चेहरा गुस्से और शर्म से लाल हो गया। रगों और नसों में खून रेंगने लगा। ​जैसे उसका हलक खून से भर गया हो। वो कुछ बोल नही सका , मगर उसे देखकर लगता था जैसे वो बोलने की कोशिश कर रहा हो। वो उस ​मोटी​ दीवार को तोड़ देगा जो उसकी रूह का अहाता किये हुए थी। उसके चेहरे को देखकर लगता था जैसे वो अभी चीख कर कहेगा -तुम भी ! तुम भी ! पारो तुम भी !! मगर खून उसके हलक में भर गया था। उसके कान किसी बढ़ते हुए तूफ़ान की आवाजें सुन रहे थे और उसका सारा बदन थर थर काँप रहा था। गोया कोई आखिरी कोशिश किसी लोहे की दीवार से टकराकर टूट गयी थी। और वो सिर झुकाकर अपने गाहकों की तरफ मुतवज़्ज़ो हो गया।

मगर उस बेचैन पाज़ेब की खनक अभी तक उसके दिल में थी। पारो और उसकी सहेलियां नए ठेले वाले के गिर्द जमा होकर नए नए किस्म की चांट खाए जा रही थीं और बीच बीच में तारीफें करती जा रही थीं। उन सब में पारो की आवाज़ सबसे ऊंची थी। हाय ! कैसी लज़ीज़ चांट है ! कैसे बराबर के मसाले हैं ! उस मुए ( नाम न लेकर केवल इशारा किया ) पुराने ठेले वाले को तो चाँट बनाने की तमीज ही नही है ! अब तक झूठी प्लेटों में चाँट खिलाता रहा है ! अरे ! उसके हाथ तो देखो ....... .! पारो ने चमक कर ​चन्दरु की तरफ इशारा किया। कैसे गंदे और गलीज़ ……। मालूम होता है सात दिन से नहाया नहीं ! एक नेपकिन तक तो नही है उसके पास ! जब हाथ पोंछने के लिए मांगो , वही अपना गंदा मैला तौलिया आगे कर देता है। ऊंह ....... ! पारो के पतले पतले होंठ नफरत से सिकुड़ गए। मैं तो उस चाँट वाले के ठेले पर थूकूँ भी न !


उसके आगे ​चन्दरु कुछ न सुन सका। एक लाल आंधी उसकी आँखों में छा गई। वो गूंगे की सी एक वहशतज़दा चीख के साथ अपना ठेला छोड़कर आगे बढ़ा और उसने नए ठेले वाले को जा लिया। और उससे गुत्थम गुत्था हो गया। लड़कियां चीख मारकर पीछे हट गयीं। ​चन्दरु नए ठेले वाले और उसके छोकरे दोनों पर भारी साबित हुआ। ​चन्दरु एक वहशी जानवर की तरह लड़ रहा था। उसने नए ठेले वाले को मार मार कर उसका भुर्ता बना दिया। उसके ठेले के सारे कांच तोड़ डाले। छोकरे की पिटाई की। नया ठेले वाला मय अपने साजो सामान के सड़क पर औंधा दिया। फिर सड़क के बीच खड़ा होकर ज़ोर ज़ोर से हांफने लगा।


पुलिस आई और उसे गिरफ्तार करके ले गई। अदालत में उसने अपने जुर्म का इक़बाल कर लिया। अदालत ने उसे दो माह कैद की सज़ा दी और पांच सौ रुपया जुर्माना। जुर्माना न चार माह कैद बामुशक्कत। सिद्धू हलवाई ने जुर्माना नहीं भरा। और दूसरा कौन था जो जुर्माना अदा करता ? ​

चन्दरु ने पूरे छह माह की जेल काटी !

जेल काटकर ​चन्दरु फिर सिद्धू हलवाई के घर पहुँच गया। कोई दूसरा उसका ठिकाना भी नही था। सिद्धू हलवाई पहले तो उसे देर तक गालियां देता रहा और उसकी हिमाकत पर उसे बुरा भला सुनाता रहा और देर तक ​चन्दरु सिर झुकाये खामोशी से सब कुछ सुनता रहा। अगर वो गूंगा भी  न होता तो किस से कहता ? उसका जुर्म ये नही था कि उसने एक ठेले वाले को मारा था ! उसका जुर्म ये था कि उसने एक पाज़ेब की खनक सुनी थी।


जब सिद्धू हलवाई ने खूब गालियां देकर अपने दिल की भड़ास निकाल ली तो उसने उसे फिर काम पर लगा दिया। आखिर क्या करता ? ​चन्दरु बेहद ईमानदार , मेहनती और अपने काम में माहिर था। अब जेल काट के आया है तो थोड़ी सी अक़्ल भी आ गयी होगी कि कानून को अपने हाथ में लेने का क्या नतीजा होता है ! उसने खूब अच्छी तरह समझा बुझाकर दो तीन दिन फिर से ​चन्दरु को उसी अड्डे पर ठेला देकर रवाना कर दिया। ​चन्दरु की गैरहाजिरी में सिद्धू ने एक अच्छा काम किया था। उसने ​चन्दरु के ठेले पर नया रंग रोगन करा दिया था। कांच भी लगवा दिया था। पत्तलों की जगह कुछ सस्ती किस्म की चीनी की प्लेटें और कुछ चम्मचें भी रख दिए थे।

​चन्दरु छह माह के बाद फिर से ठेला लेकर रवाना हुआ। आठवीं , दसवीं और ग्यारहवीं सड़क पार करके लेनिंग रोड के नाके पर आया। यूनियन बैंक से घूमकर टेलीफोन एक्सचेंज के पास पहुंचा। उसने देखा जहां पर पहले उसका ठेला था अब उस जगह उस नए ठेले वाले ने कब्ज़ा कर लिया था। वही छोकरा है। वही ठेले वाला है। उस ठेले वाले ने घूर कर ​चन्दरु को देखा। ​चन्दरु ने अपनी नजरें चुरा लीं। उसने नए ठेले वाले से कुछ फासले पर एक्सचेंज के एक तरफ अपना ठेला रोक दिया और ग्राहकों का इंतज़ार करने लगा।






कहानी आगे ज़ारी रहेगी :
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