सोमवार, 10 सितंबर 2018

Adi Kailsh Yatra - Fifth Day ( Om Parvat to Nabi Village )

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नाभीढांग , कैलाश मानसरोवर जाने वाले यात्रियों के ठहरने का भारत में अंतिम "स्टॉप" है जहाँ से आगे यात्री लगभग नौ किलोमीटर दूर लिपुलेख दर्रा पार कर तिब्बत में प्रवेश कर जाते हैं। नाभीढांग पर कोई स्थाई निवासी नहीं है और न आईटीबीपी का स्थाई कैंप है। यहां यात्रा के समय में ITBP अपना कैंप बना लेती है और उनके साथ ही गुंजी के कुछ लोग भी आ जाते हैं और अपना "होटल " खोल लेते हैं। नाभीढांग में KMVN का गेस्ट हाउस भी है और फ़ोन की लैंडलाइन सुविधा भी उपलब्ध है हालाँकि कॉल रेट 6 रूपये प्रति मिनट है लेकिन सुविधा मिल रही है अपने घर बात करने की , ये ज्यादा मायने रखता है !


हम कल शाम को पांच बजे के आसपास नाभीढांग पहुँच गए थे और सीधे अशोक सिंह गुंज्याल के "दिव्यांश " छान में पहुँच गए। चार -पांच छान और भी हैं यानि रुकने -खाने की कोई दिक्कत नहीं। कोठारी जी , KMVN के रेस्ट हाउस में रुके थे क्यूंकि उन्हें "इंग्लिश टॉयलेट " की जरुरत पड़ती है। हरजिंदर तेज चलने वालों में और सबसे पहले पहुँचने वालों में हैं इसलिए जब तक मैं और जोशी जी पहुंचे , हरजिंदर भाई ठिकाना तलाश चुके थे और ठिकाना मात्र 150 Rs प्रति व्यक्ति प्रति दिन के हिसाब से था। इतना सस्ता और कहीं संभव है ? लेकिन चाय अलग होगी , मैगी अलग होगी। कोई नहीं , वो भी यहाँ कुछ कमाने के लिए ही बैठे हैं। गर्मागर्म चाय पीने के बाद भी अभी लग रहा था कि अभी आसपास की जगहों को देखने का पर्याप्त है तो निकल चले अपना कैमरा उठाये। यहां एक सीमा से आगे नहीं जा सकते और वो सीमा मंदिर के आसपास ही खत्म हो जाती है। मंदिर न ज्यादा बड़ा है न ज्यादा खूबसूरत लेकिन इसके बनने की कहानी रोचक है। एक बार कोई मंत्री जी हेलीकाप्टर से परिवार सहित मर्यादा भंग करते हुए ओम पर्वत के ऊपर से निकल रहे थे , हालाँकि पायलट ने उन्हें बताया था कि ओम पर्वत के बिल्कुल ऊपर से जाना सुरक्षित नहीं है क्यूंकि ऐसा करना धार्मिक मान्यता के भी विरुद्ध होगा और ओम पर्वत से निकलने वाली किरणें भी हेलीकाप्टर को नुक्सान पहुंचा सकती हैं लेकिन मंत्री जी को धुन सवार थी कि ओम पर्वत के बिल्कुल ऊपर से ही जाना है और जैसे ही वो ओम पर्वत के बिल्कुल ऊपर पहुंचे , हेलीकॉप्टर लड़खड़ाने लगा और नीचे गिर गया। सौभाग्य से मंत्री जी और उनका परिवार तो बच गया लेकिन हेलीकॉप्टर तहस -नहस हो गया। खुद के और परिवार के जिन्दा बच जाने का एहसान उन्होंने भगवान का मंदिर उसी जगह बनाकर उतारा जिस जगह उनका हेलीकाप्टर गिरा था। उस हेलीकाप्टर को भी आप उसी स्थिति में पड़ा हुआ यहां देख सकते हैं और हमारी तरह इस पर चढ़कर खूब फोटो खींच सकते हैं।

खाना खाने अशोक सिंह गुंज्याल के किचन में ही बैठ गए और बातें चलने लगीं। दोनों पति -पत्नी हंसमुख और मेहनती हैं जिनका बेटा दिव्यांश भी इन्हीं के साथ यहीं इस ऊंचाई पर रहता है। ये वो ऊंचाई है जहां अच्छे अच्छे तुर्रमखां आने से डरते हैं और बहुत से ऑक्सीजन की कमी की वजह से घरों से ही नहीं निकलते , यहां 4550 मीटर की ऊंचाई पर दिव्यांश अकेला ही बालक है और हर यात्री के साथ -साथ वहां पोस्टेड हर ITBP जवान का लाडला है। उसे देखकर ऐसा लगा जैसे हर जवान उसमें अपने बच्चों की शक्ल तलाश रहा हो , मुझे भी उस बच्चे को और उसकी शैतानियों को देखकर अपने दोनों बच्चों की याद आ गई थी। लेकिन इसकी शैतानियां मेरे बच्चों की शैतानियों से ज्यादा , बहुत ज्यादा थीं और शायद हिम्मत भी। हम जहाँ एक -एक पैर गिन गिन के उठाते वहीँ ये बच्चा दिव्यांश , बार -बार अपना रिक्शा नीचे से ऊपर ले जाता और वहां से खूब तेज स्पीड में नीचे लेकर आता। न थकान न जोश में कमी। बचपन की पूरी मस्ती। अशोक जी की पत्नी बहुत हसमुख और अच्छी महिला हैं , खाना बहुत टेस्टी बनाती हैं। मूल रूप से नेपाल की रहने वाली क्रांति खूब अच्छी हिंदी बोलती हैं और समझती हैं और उन्होंने दुकान में जरूरत का लगभग हर सामान लगाया हुआ है। फ़ोन और कैमरा चार्जिंग की सुविधा अभी तक हर जगह मिली है और यहां भी उपलब्ध है।

आज 16 जून है और साल 2018 चल रहा है। हम यहाँ नाभीढांग में हैं ओम पर्वत के दर्शन करने आये हैं और इस वक़्त हम तीन लोग , मैं , हरजिंदर सिंह और भरत जोशी जी , अशोक सिंह गुंज्याल के छान में इस इंतज़ार में रजाइयों में सिकुड़े पड़े हैं कि ओम पर्वत के ऊपर से बादल हटें तो हमें दर्शन का सौभाग्य मिल सके लेकिन आज शायद सूर्य देवता हमसे नाराज हैं। और हमसे ही क्या , नाभीढांग आये हुए आदि कैलाश के अन्य यात्रियों और कैलाश मानसरोवर यात्रियों से भी नाराज हैं इसीलिए आज पूरा दिन नजर नहीं आये। पूरा दिन बस रजाई में पड़े -पड़े ही गुजारना पड़ा। यहां आये हैं और ओम पर्वत के दर्शन के बिना वापस चले जाएँ ये संभव नहीं , हालाँकि मौसम विभाग ने 14 जून से 18 जून तक भारी बारिश की भविष्यवाणी की थी पूरे उत्तराखंड में लेकिन बारिश तो नहीं हुई हाँ आज बादल जरूर रहे। थोड़े से बादल हटते तो दूर नाग पर्वत के थोड़े से दर्शन हो जाते तो कभी पास में ही स्थित त्रिशूल पर्वत के दर्शन हो जाते। ये त्रिशूल पर्वत अलग है जिस पर त्रिशूल की शेप जैसी उभर आती है। इस दरम्यान कोठारी जी भी हमारे ही "आश्रम " में आ गए और उनके आने का बड़ा फायदा ये हुआ कि ताश के नए गेम "नाभि " का आविष्कार हो गया। ये गेम कुछ और था लेकिन इसके दूसरे रूप को हमने विकसित किया और यहां नाभीढांग में विकसित हुआ इसलिए कोठारी जी ने इसका नामकरण " नाभि " कर दिया और जैसा कि होता आया है , मैं ही इस गेम को हारा। बार -बार -लगातार ! लेकिन खेलने में जो मजा आया वो हार -जीत से ज्यादा था।

आज का दिन बस ताश खेलकर ही गुजरा। कभी -कभी समय ऐसे भी गुजरना चाहिए - न कोई मंजिल हो न कोई लक्ष्य हो -न कोई जिम्मेदारी हो -न कोई काम हो। बस खाओ पियो और पड़े रहो :) अजगर की तरह। शाम हुई तो कुछ और लोग हमारी वाली "खोली " में घुस आये। ये घोड़े -खच्चर वाले लोग थे जिन्होंने आते ही "चकती " निकाल ली और चकती खत्म करते -करते पहले उनमें कुछ तू -तू मैं -मैं हुई और फिर जो उन्होंने गढ़वाली या कुमायूंनी या नेपाली कोई गाना गाया। भाषा समझ नहीं आई लेकिन उनका जोश , उनके सुर ने दिल खुश कर दिया। रूमसेला ... रूमसेला .......ओ रूमसेला ऐसे कुछ बोल थे उनके। जिसमें रूमसेला का मतलब उन्होंने भगवान विष्णु बताया और ये गाना भगवान विष्णु को ही समर्पित था। जहां तक मेरा ब्लॉग पहुंचे तो प्लीज कोई बताइयेगा इस गाने के बारे में।

आज 17 जून है और हमें यहाँ नाभीढांग में दूसरा दिन है। सुबह अच्छी है लेकिन अभी भी सूरज पूरी तरह से बाहर नहीं आया। हम तो नल्ले हैं पड़े रहेंगे लेकिन आदि कैलाश के जो यात्री KMVN से आये हैं उन्हें आज वापस लौटना होगा और कैलाश मानसरोवर यात्री भी शायद सुबह चीन की तरफ प्रस्थान कर गए थे। भारी मन से हम उन्हें बिना ॐ पर्वत के दर्शन करते हुए जाकर देखते रहे लेकिन वो क्या कर सकते थे ? जाना ही था उन्हें वापस नीचे लेकिन हमारे पास अभी कुछ समय और बाकी था। हालाँकि हमें भी ओम पर्वत के बहुत अच्छे और स्पष्ट दर्शन नहीं हो पाए लेकिन ॐ का नीचे का हिस्सा कुछ दिखने लगा था और फिर बादल आ गए , इस बार और गहरे बादल थे जो उम्मीदों को तोड़ रहे थे। अब और ज्यादा यहाँ रुक पाना संभव नहीं था हमारे लिए तो चल पड़े राही अगली मंजिल की तरफ। और आज की मंजिल वापस गुंजी भी हो सकती है , नबी गाँव भी। कोई लक्ष्य तय नहीं किया था बस इतना था कि आज जहाँ तक पहुँच पाएं , पहुँच जाएंगे।

नाभीढांग से वापसी में उतराई थी और ज्यादा फोटो भी नहीं खींचने थे इसलिए कालापानी से नाभीढांग तक जाते हुए जहाँ हमें करीब छह घण्टे लगे थे उतरने में मुश्किल से तीन घण्टे लगे होंगे और जैसे ही हम कालापानी पहुँचने को थे सामने से आर्मी का ट्रक आता हुआ दिख गया जो यहां कालापानी से लौटकर जाएगा , ट्रक देखकर मेरी और हरजिंदर की चलने की स्पीड खुद ब खुद और तेज हो गई , हो भी जानी चाहिए थी ! थोड़ी देर में जोशी जी और कोठारी जी भी पहुँच गए और ट्रक में बैठे हुए तीन बजे से भी पहले हम वापस गुंजी पहुँच चुके थे। कोठारी जी ने अपना यहाँ छोड़ा हुआ बैग उठाया और विनीता के "रेस्टॉरेंट " में चाय -मैग्गी लेकर चल पड़े अगली मंजिल "नबी " गाँव की तरफ।
वसिष्ठकुम्भोद्भवगौतमार्य मुनीन्द्रदेवार्चितशेखराय।
चन्द्रार्कवैश्वानरलोचनाय तस्मै वकाराय नम: शिवायः ॥
वसिष्ठ, अगस्त्य, गौतम आदि श्रेष्ठ मुनीन्द्र वृन्दों से तथा देवताओं से जिनका मस्तक हमेशा पूजित है, और जो चन्द्र–सूर्य व अग्नि रूप तीन नेत्रों वाले हैं; ऐसे उस वकार स्वरूप शिव को मैं नमस्कार करता हूँ।
नबी गाँव , आदि कैलाश के रूट पर गुंजी से करीब तीन किलोमीटर दूर है। कभी -कभी गुंजी से सुबह के समय में कुटी जाने वाले ट्रक मिल जाते हैं लेकिन ये दोपहर बाद का समय था इसलिए इधर से गाडी मिलने की संभावना भी नहीं थी और हम भी पैदल जाने के ही इच्छुक थे। हम ट्रेक करने आये हैं ट्रक में बैठने या उसका इंतज़ार करने नहीं। हाँ सुविधा मिल जा रही है तो उसका कभी -कभी उपयोग कर ले रहे हैं लेकिन सच मानिये अगर आपको हिमालय के सूंदर दृश्य देखने हैं तो वो केवल पैदल चलकर ही मिलेंगे। गुंजी से नबी गाँव का तीन किलोमीटर का रास्ता घने जंगल से होकर गुजरता है और बेहद खूबसूरत लगता है।

नबी गाँव , छोटा गाँव है जहां के निवासी अपने नाम के साथ "नबियाल " लगाते हैं। जैसे ही गाँव में घुसे कुछ बच्चे क्रिकेट खेलते दिखे और सामने ही एक सज्जन मिल गए। ये एस . एस। नबियाल जी हैं जो गुंजी में स्टेट बैंक ऑफ़ इंडिया की शाखा में कार्यरत हैं लेकिन आज रविवार है इसलिए छुट्टी में हैं। इनका पूरा नाम हमें आदि कैलाश यानि ज्योलिंगकांग में पता चला - सुन्दर सिंह नबियाल !! नबी गाँव में रास्ते में ही खड़ी दो जिप्सी आपका ध्यान खींचती हैं , जहां रास्ते न हों वहां इनका क्या काम ? लेकिन कुछ जुनूनी लोग करीब 15 -16 साल पहले इन जिप्सियों को Disassemble करके ले गए थे और वहां जाकर Assemble कर लिया था। हालाँकि आज की तारीख़ में ये बस दिखाने भर के लिए हैं। नबी गाँव में बढ़िया गेस्ट हाउस ले लिया है जहाँ साफ़ सुथरे गद्दे और रजाई पड़े हैं। गर्म पानी भी मिलेगा तो नहा भी लेते हैं , जब तक हम नहा रहे हैं घर वालों के यहाँ कोई पूजा चल रही है। आपको इस क्षेत्र में कहीं पेड़ की टहनियां , कहीं सूखे पेड़ घर के बाहर लगे मिलेंगे जिन पर कपड़ों की झंडियां लगी होती हैं। ये लोग इसे बहुत पवित्र मानते हैं और ऐसा विश्वास करते हैं कि इस सब से बुरी आत्माएं घर के अंदर प्रवेश नहीं कर पातीं। नाबी गाँव के दूसरी तरफ एक बहुत , मतलब सच में ही बहुत खूबसूरत गाँव हैं रेकोंग लेकिन शाम हो चली है अँधेरा भी घिर आया है इसलिए उसकी बढ़िया पिक्चर नहीं आ सकीं , कल यानी अगली पोस्ट में जरूर आएँगी क्योंकि तब तक दिन निकल चुका होगा लेकिन फिर भी इस वक्त दूसरी दिशा में "अपि पर्वत " श्रंखला शानदार नजर आ रही है और शायद नबी गाँव इस पर्वत को देखने का सबसे बढ़िया पॉइंट होगा !! 





















हम जिस दिन शाम को पहुंचे तो ॐ पर्वत पर बादल थे और अगले दो दिन तक बादल बने रहे जिससे हमें दर्शन नहीं हो  पाए लेकिन किसी ने हमें फोटो जरूर उपलब्ध करा दिए !






गुंजी गाँव जैसा और जितना देख पाए




नबी गाँव की ओर.......
नबी गाँव की ओर बढ़ते हुए दो सैलानी






नबी गाँव

ये जिप्सी .....इतनी दूर.... कौतुहल पैदा करती हैं

अपि पर्वत ? सही नाम लिया न मैंने

आज रात का ठिकाना


                                                                                    जल्दी ही मिलेंगे:

मंगलवार, 21 अगस्त 2018

Adi Kailsh Yatra - Fourth Day ( Gunji to OM Parvat )

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यात्रा​ तिथि :  15 June -2018 

कल रात जैसे -तैसे हमने कोठारी जी और जोशी जी को KMVN के गेस्ट हाउस में ढूंढ ही लिया था और वो हमारे पहुँचने से पहले ही हमारे लिए भी गेस्ट हाउस बुक कर चुके थे। रात को करीब साढ़े नौ बजे बढ़िया खाना मिला जिसमें पसंदीदा खीर भी शामिल थी। खाना खाने के समय में ही अपनी टीम के बाकी सदस्यों से भी मुलाकात हो गई । सब यहीं रुके हुए थे इसी गेस्ट हाउस में ही। गुंजी भले गाँव है लेकिन वहां के लिए किसी शहर से कम नहीं। यहां आपको स्टेट बैंक ऑफ़ इंडिया की ब्रांच भी दिखती है , पोस्ट ऑफिस भी और अस्पताल भी। और हाँ , एक बड़ा सा डिपार्टमेंटल स्टोर भी जो विनीता की दुकान के नाम से आसपास के गाँवों में खूब प्रसिद्ध है। शायद जरुरत की हर चीज मिल जाती है यहाँ और दुकान चलाने वाली सभी लड़कियां हैं। विनीता ऐसे लगती है जैसे किसी कंपनी की CEO हो। उनके प्रयास को सलूट करता हूँ जिनकी वजह से शहर से इतना दूर एक "शहर" की कमी पूरी करती हैं ये सब। 


सुबह गुंजी देखने का मन था , बहुत नाम सुना था इस गाँव का यहां जाने से पहले। पढ़ा था कि यहां के घर बहुत पुराने हैं लेकिन खूबसूरत हैं मगर धंस रहे हैं। गुंजी 3825 मीटर ऊंचाई पर बसा एक भरा पूरा गाँव है जिससे पहले एक छोटा सा गाँव "नपलच्या " आता है और कुटी नदी का पुल पार करते ही आप गुंजी में होते हैं। कल रात में कुछ पता नहीं चल पाया था लेकिन अब धीरे -धीरे जानकारी होने लगी थी। गुंजी में ही नेपाल से आने वाली "काली नदी " और ज्योलिंगकांग यानि आदि कैलाश से निकलने वाली "कुटी नदी " का संगम होता है। गुंजी कैलाश मानसरोवर यात्रा का एक मुख्य पड़ाव है जहां यात्रियों का चीन में प्रवेश से पहले मेडिकल चेकअप किया जाता है और जहाँ तक यात्रियों को हेलीकाप्टर की सुविधा मिल पाती है , इससे आगे आपको या तो पैदल ही यात्रा करनी होगी या फिर खच्चर लेना पड़ेगा। ऐसा नहीं है कि गुंजी गाँव अभी इतना विकसित हुआ है या कैलाश यात्रा के पड़ाव की वजह से ही इसका नाम है है बल्कि ये गाँव सदियों पहले तक तिब्बत से होने वाले व्यापार का एक मुख्य बाजार हुआ करता था। यहां और आसपास के लोग तिब्बत में व्यापार करने जाते थे और वहां के लोग यहां आते थे। लेकिन 1962 की लड़ाई के बाद सब कुछ बदल सा गया है , हालाँकि दोनों तरफ से व्यापार अब भी होता है लेकिन बहुत कम स्तर पर होता है।

गुंजी देखने की चाहत धरी की धरी रह गई जब गेस्ट हाउस के कमरे से बाहर निकलकर बारिश देखी तो अरमान पिघलते गए। लेकिन अभी एक मौका था लौटकर वापसी में देखने का । सुबह करीब साढ़े सात बजे के आसपास एक जगह मजदूरों की भीड़ दिखाई देने लगी , इसका मतलब जल्दी ही कोई न कोई गाडी कहीं न कहीं जा रही होगी। कोठारी जी ने मुझे रवाना कर दिया लेकिन मेरे सामने से दो गाड़ियां मजदूरों को लेकर निकल गईं लेकिन मुझे जगह नहीं मिली। बेइज्जती बचाने की कोशिश कर रहा हूँ -असल में मुझे बिठाया ही नहीं किसी भी गाडी में। थोड़ी देर बाद कोठारी जी और लोगों के साथ वहां आ पहुंचे। एक ट्रक लगी थी "कालापानी " जाने के लिए। कोठारी जी ने पता नहीं ड्राइवर के पास जाकर उसके कान में क्या मंत्र फूंका कि उन्हें आगे की सीट मिल गई और अंततः हमें भी जगह मिल गई। कोठारी जी इस मामले में मास्टर आदमी हैं :) आज हम चारों कालापानी होते हुए "ओम पर्वत " के दर्शन के लिए निकल पड़े हैं और हमारी दूसरी टीम सुबह छह बजे ही आदि कैलाश दर्शन के लिए दूसरी दिशा में पैदल -पैदल ही प्रस्थान कर चुकी है।

गुंजी से कालापानी की दूरी नौ (9 KM ) है और इतना ही दूर कालापानी से नाभीढांग है। यानी आज कुल 18 किलोमीटर की यात्रा रहेगी जिसमें सात किलोमीटर तक तो ट्रक मिल गई है। ट्रक में खड़े होने की जगह तो मिल गई लेकिन जिस ट्रक में सामान भरा था ,  झारखण्ड के बीसियों मजदूर भरे थे उसी में हम भर गए। आप खुद अंदाज़ा लगाइये कैसा रहा होगा ये सफर ? लेकिन कमाल का अनुभव था ,परेशानी तो थोड़ी बहुत होती ही है और ऐसी छोटी -मोटी परेशानियों से डरता कौन है ? जो डरता है वो जाकर अपनी भैंस चराये :) घंटे भर के रास्ते में इन मजदूरों की हिम्मत और हौसलों की तारीफ करता रहा मन में , अपने घर -परिवार से इतना दूर !! देश के विकास में और विशेषकर पहाड़ी इलाकों में आपके ही हाथों का कमाल है जो हम इन रास्तों पर बेख़ौफ़ चले जा रहे हैं !! साधुवाद मित्रो !!

ट्रक ने हिचकोले खाते हुए और जिसको जहाँ उतारना था उसे उस जगह पर उतारकर , जो पैदल जा रहा था उसे ट्रक में बिठाते हुए आखिरकार करीब नौ बजे हम सबको एक सुन्दर जल धारा से पहले उतार दिया। अब इससे आगे ट्रक नहीं जाएगा हालाँकि रास्ता बना हुआ है और कभी कभी आर्मी के ट्रक और उनकी जिप्सी आगे नाभीढांग तक भी जाती हैं। नाभीढांग वो जगह है जहाँ से आपको "ओम पर्वत " के दर्शन होते हैं। आदि कैलाश यात्री तो यहां से ओम पर्बत के दर्शन कर के वापस आ जाते हाँ जबकि कैलाश मानसरोवर यात्री नाभीढांग से नौ किलोमीटर आगे लिपुलेख दर्रा पार कर तिब्बत में स्थित कैलाश मानसरोवर के लिए पहुँचते हैं। हमें ट्रक ने कालापानी से करीब दो किलोमीटर पहले ही उतार दिया है जो सच में हमारे लिए बहुत अच्छा रहा। हमारे साथ ही दो पहाड़ी बुजुर्ग सी महिलाएं भी ट्रक में आई थीं और उतरते ही उन्होंने अपना खाना खोल लिया। हरजिंदर की उनसे अच्छी "मित्रता " हो चुकी थी इसलिए हरजिंदर भी उनके साथ बैठ गए खाने के लिए और फिर हम सभी। फाफर की रोटी थी और शायद मट्ठा था। फाफर कुमायूं में बहुत उपयोग में लाया जाता है और इसकी खेती भी होती है। अभी इसका बीज आपको नहीं दिखा पाऊंगा लेकिन जब कुटी गाँव की तरफ चलेंगे तो पक्का दिखाऊंगा। हालाँकि मुझे ज्यादा स्वादिष्ट नहीं लगा फाफर। कुछ हरे रंग की रोटी बनी थी और मोटी भी थी। लेकिन एक नया स्वाद चखने को मिला जो जिंदगी भर याद रहेगा। उन्हीं दोनों महिलाओं ने कालापानी से करीब एक किलोमीटर पहले काली नदी के किनारे स्थित गर्म पानी के स्रोत के बारे में बताया तो मेरे जैसे ऐसी जगहों पर पानी को हाथ तक लगाने वाले लोग भी इसमें नहाने से नहीं चूके और करीब आधा घंटा तक इसके पानी में पड़े रहे।

कालापानी से आप पुल पार करके सीधे ही नाभीढांग जा सकते हैं लेकिन वहां एक खूबसूरत मंदिर है और इतनी दूर स्थित इस मंदिर के दर्शन करे बिना जाना असंभव था। मंदिर के सामने की पहाड़ी में एक बड़ा सा छेद सा दिखाई देता है जिसे व्यास गुफा कहते हैं और मान्यता ये है कि व्यास जी ने यहाँ बैठकर अपने कुछ ग्रंथों की रचना की थी। मंदिर की पूरी व्यवस्था ITBP के हाथों में है जिसे उन्होंने बहुत बेहतरीन रूप से संभाला हुआ है। आईटीबीपी के जवानों ने मस्त पुदीना चाय पिलाई और ये इतनी स्वादिष्ट थी कि वहां से लौटने के बाद मैं घर में कई बार पुदीना की चाय बना कर पी चुका हूँ। कालापानी में आपका इनर लाइन परमिट चेक होता है और फिर रजिस्टर में एंट्री कराने के बाद आप ओम पर्वत के दर्शन के लिए नाभीढांग की तरफ बढ़ने लगते हैं !

रास्ता आसान है और मनमोहक भी है जिससे आपको बोरियत नहीं होती। बताते हैं कि कालापानी वाली जगह नेपाल में आती है जिसे अब भारत ने ले लिया है और इसके बदले नेपाल को वहीँ कहीं आसपास उतनी ही जगह दी गई है। यहां से आगे निकलकर एक पुल आता है और जैसे ही इस पुल को पार करेंगे आप वापस भारत में आ जाते हैं और ये सब सैद्धांतिक रूप से होता है , असलियत में तो आपको पता भी नहीं लगता कि आप कब भारत से नेपाल में चले गए और कब नेपाल से भारत में लौट आये। यही एक चौड़ा सा क्रिकेट का मैदान बना है जो कभी -कभी हेलीकाप्टर उतारने के लिए भी काम आता होगा। क्रिकेट खेलता हुआ कोई नहीं दिखा लेकिन पिच बनी हुई थी जो खेलने के लिए आमंत्रित कर रही थी। एक बार मध्यमहेश्वर में क्रिकेट खेला था लेकिन उन्होंने बस फील्डिंग करा ली और बैटिंग नहीं दी :)

शिवाय गौरीवदनाब्जवृन्द सूर्याय दक्षाध्वरनाशकाय।
श्रीनीलकण्ठाय वृषध्वजाय तस्मै शिकाराय नम: शिवाय ॥


भावार्थ :
जो शिव स्वयं कल्याण स्वरूप हैं, और जो पार्वती के मुख कमलों को विकसित करने के लिए सूर्य हैं, जो दक्ष–प्रजापति के यज्ञ को नष्ट करने वाले हैं, नील वर्ण का जिनका कण्ठ है, और जो वृषभ अर्थात् धर्म की पताका वाले हैं; ऐसे उस शिकार स्वरूप शिव को मैं नमस्कार करता हूँ।
कालापानी से नाभीढांग यानि ओम पर्वत 9 किलोमीटर रह जाता है लेकिन रास्ता ठीक ठाक बना हुआ है। यूँ खच्चर भी चलते हैं लेकिन कम ही चलते दिखे हमें। कभी कभी आर्मी की गाड़ियां और ट्रक भी चलते हुए मिलते हैं। लेकिन पैदल चलने का मजा ही कुछ और होता है , हर चीज देख पाते हैं आप और हर नज़ारे का लुत्फ़ उठा पाते हैं। हम कालापानी करीब साढ़े ग्यारह बजे पहुँच गए होंगे और यहाँ से निकलते निकलते एक बजने को था। कोठारी जी सीधे एंट्री पॉइंट पर ही बैठे मिल गए और फिर चार यार एक साथ। कालापानी 3626 मीटर की ऊंचाई पर है जबकि गुंजी 3269 मीटर की ऊंचाई पर , इसका मतलब अब तक हम 9 किलोमीटर में 400 मीटर की ऊंचाई चढ़ चुके हैं हालाँकि ज्यादातर चढ़ाई ट्रक ने चढ़ी थी हम तो उसमें बैठे बैठे ही इतनी ऊंचाई चढ़ गए। कालापानी , गुंजी और नाभीढांग के बिल्कुल मध्य में स्थित है। गुंजी से कालापानी 9 किलोमीटर दूर और कालापानी से नाभीढांग यानी ओम पर्वत भी 9 किलोमीटर दूर। लेकिन कालापानी से नाभीढांग की 9 किलोमीटर की दूरी में आपको 3600 मीटर से 4550 मीटर तक की ऊंचाई पानी होती है यानी करीब 800 मीटर , जो आसान नहीं है। नाभीढांग 4550 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है जबकि ओम पर्वत की ऊंचाई 6300 मीटर है। आपको 4550 मीटर की ऊंचाई पर से ही ओम पर्वत के दर्शन करने होते हैं लेकिन पहले बड़ी परीक्षा ये है कि आप नाभीढांग की ऊंचाई तक पहुंचें। हमने इन नौ किलोमीटर में करीब पांच -छह घण्टे लगाए क्यूंकि हमें मालुम था ट्रैकिंग का ये वाला हिस्सा कुछ कठिन रहेगा और खूबसूरत भी रहेगा। यहां हमारे ऊपर ही कहीं नाग पर्वत भी था लेकिन हमें दिख नहीं रहा था।  नाग पर्वत के दर्शन भी नाभीढांग से ही ढंग से हो पाते हैं वो भी तब जब मौसम साफ़ हो ।  नाभीढांग से ही कुछ पहले जीवन में पहली बार याक जैसे दिखने वाले जानवर "ज़िप्पू " को देखने का मौका मिला जिसे वहां के लोग "झब्बू " भी कहते हैं। ये गाय और याक की नस्ल का जानवर होता है जो सामान ढोने और खेतों में हल चलाने के लिए काम लिया जाता है । अगर आप वहां जा रहे हैं तो रास्तों पर ध्यान देते रहिएगा क्यूंकि अगर आप गाड़ियों और ट्रकों के लिए ही बनाये गए रास्तों पर ही चलते रहेंगे तो संभव है आपको कुछ और ज्यादा दूरी और कुछ और ज्यादा चढ़ाई भी चढ़नी पड़ जाए जबकि आप किसी और छोटे रास्ते से अपना समय और ऊर्जा बचा भी सकते हैं !!

तो इस वक्त करीब शाम के पांचबजे हैं और आज 15 जून -2018 है और हम नाभीढांग , ओम पर्वत के दर्शन के लिए पहुँच चुके हैं। अब आगे की बात आगे की पोस्ट में होगी -भक्तो आते रहिएगा , प्रवचन चालू है !! 

गुंजी के KMVN गेस्ट हाउस में
विकास के आधार स्तम्भ : मजदूर (मैं भी इन्हीं में शामिल हूँ )
इससे और सफ़ेद क्या होगा ? शायद रिन इतनी सफेदी दे दे

अभी गुंजी से बस यहीं तक ट्रक आते हैं , आने वाले दिनों में और भी आगे जाने लगेंगे

आ जा हरजिंदर रोटी खा ले :) फाफर की रोटी है
मेहनत की कमाई


गर्म पानी का स्रोत मिल गया है तो शरीर का वजन कुछ कम कर लें :)
ये वो ही वाला गर्म पानी का स्रोत है
सामने कालापानी दिख रहा है











कालापानी में शहीद स्मारक है और अपने देश के वीर सैनिक को श्रद्धांजलि अर्पित करना मेरा परम कर्तव्य है

वो .......सामने की पहाड़ी में जो होल दिख रहा है न , उसे व्यास गुफा बोलते हैं



   ये भाईसाब भी हमारे साथ ट्रेक करने को उतावले थे लेकिन रास्ते में इनकी गर्ल फ्रेंड मिल गई ......... तो ट्रैक -व्रैक सब भूल गए और उसके साथ निकल लिए

स्वर्ग सा सुन्दर हिंदुस्तान है मेरा

कोशिश जारी है .........चश्मे में आने की
आ  जाओ ....क्रिकेट खेलते है




इसका वीडियो जरूर देखिएगा अच्छा लगेगा

ताल से ताल मिला
कौन सा फूल है ? बताइयेगा जरूर  


ये जिप्पू है ​.....याक जैसा दिखने वाला जानवर
लो जी नाभीढांग .....यानि ओम पर्वत पहुँच गए