सोमवार, 16 अक्तूबर 2017

Nandikund-Ghiyavinayak Trek : Manpai Bugyal to Banshi Narayan Temple( Day 7)

इस ट्रैक को शुरू से पढ़ने और पूरा शेड्यूल ( Itinerary ) जानने के लिए इच्छुक हैं तो आप यहां क्लिक कर सकते हैं !!


आज 24 जून है , 2017 का वर्ष चल रहा है ! मेरे अपने गाँव में और गाज़ियाबाद -दिल्ली में भयंकर गर्मी है लेकिन यहां नन्दीकुंड ट्रैक पर हम गर्म कपडे पहने हुए हैं । यही बात तो मेरे वतन को अलग और विशेष बनाती है , यहां आपको हर मौसम , हर भौगोलिक क्षेत्र देखने मिलेगा। फिर काये कू स्विट्ज़रलैंड और यूरोप जाने का ??

आज का दिन सुहावना है , धूप खिली हुई है सुबह से ही,  तो हम सबने अपना सब कब कुछ सुखाने डाल दिया। बैग से लेकर शॉक्स तक ! कल जब नन्दीकुंड से उतर के आये थे तब टैण्ट यहां मानपाई बुग्याल में नीचे की तरफ लगाया था , मैं क्योंकि सबसे बाद में पहुंचा था और मानपाई की खूबसूरती देखकर मन प्रफुल्लित हो रहा था , नए नए रंग और शेप के फूल दिख रहे थे , तो मैं उनके फोटो लेने में पिछड़ गया। एक से एक बेहतरीन फोटो ! मैना गाड़ धारा के उधर भी और इधर भी । जबकि मानपाई पर तो जैसे एक और " वैली ऑफ़ फ्लॉवर " बनकर आ गई हो ! यहां किसी बकरी वाले ने छोटे -छोटे पत्थरों को लगाकर अपने रहने की जगह बनाई होगी , लेकिन आज वो यहाँ नहीं है तो हम रुकते हैं । थोड़ी कल्पना करिये ... चारों तरफ पहाड़ हों .... गुनगुनी धूप हो... और... नीचे बुग्याल में किसी एक जगह सूखी घास हो ....घास पर आप हों !! .......क्या मजा आएगा :)

आज इस ट्रैक का हमें सातवां दिन है और आज हमारी मंजिल मानपाई बुग्याल से निकल कर बंशी नारायण मंदिर तक पहुँचने की होगी। आज करीब 10 किलोमीटर की दूरी तय करनी होगी और फाइनली केवल 100 मीटर ही नीचे उतरेंगे । फाइनली क्यों लिखा है ? मानपाई बुग्याल 3700 मीटर की ऊंचाई पर है तो बंशी नारायण मंदिर 3600 मीटर पर , लेकिन बीच बीच में बहुत ऊंचाइयां -उतराइयाँ आएँगी , इस वजह से लिखा है कि फाइनली 100 मीटर उतरेंगे ~!

मानपाई बुग्याल से सुबह सवा आठ बजे शुरू हुए। शुरू में करीब 1.5 -2 Km मैना गाड़ धारा ( नदी ) तक केवल उतरना है और इस दूरी में हम लगभग 300 मीटर नीचे उतर आये । मैना गाड़ पर लकड़ी का छोटा सा पुल बना है जो इस नदी को पार करते हावड़ा ब्रिज से भी ज्यादा important लगा वरना कल की तरह फिर फिसलना पड़ता !!

मैना गाड़ पार करते ही बुरांश का घना जंगल शुरू हो जाता है और इसके साथ ही लगातार चढ़ाई । मुझे जंगल में रुकने के लिए मना किया गया था कि इस जंगल में भालू भी आ जाता है !! हालांकि मुझे मालूम था कि इस तरफ ऐसा कुछ नहीं है । ये असल में साथियों ने मुझे देखकर डराने की कोशिश की गई थी , मैं हर 10 कदम पर बैठ रहा था और बहुत -बहुत देर के लिए बैठ रहा था तो उन्होंने सोचा होगा - ये ट्रिक काम कर जायेगी ! मैंने भी उनके डर के माहौल को समझा और फिर जंगल पार करके ही आराम लिया। आदेश था कि सबको साथ चलना है , चला तो जरूर लेकिन मेरा तेल निकल गया :) हमने मैना गाड़ से 9 :15 बजे चढ़ाई चढ़नी शुरू की थी और करीब 10 :45 बजे जंगल पार हुआ और इस डेढ़ घण्टे में दो - तीन मिनट का ही ब्रेक लिया होगा। भालू तो नहीं मिला लेकिन मेरा बुरा हाल जरूर हो गया !

जंगल पार करने के बाद एक -दो -तीन पहाड़ पार किये और धीरे धीरे ऊंचाई पर चढ़ते गए। बुग्याल पार करते गए । आप जब रास्ते पर चल रहे होते हैं तो मैना गाड़ से करीब 4 -5 किलोमीटर आगे एक पहाड़ पर लाल झंडी लहराती दिखेगी , ये खण्ड द्वारी है जो 3900 मीटर की ऊंचाई पर है। यहां दो मंदिर हैं। जब आप खंड द्वारी पहुँचते हैं तो फिर वहां से आगे आपको उतरते ही जाना है और फिर बंशी नारायण तक पहुंचना है। बंशी नारायण मंदिर 3600 मीटर की ऊंचाई पर है ! बंशी नारायण मंदिर की कहानी जरूर जान लेनी चाहिए आपको :

ऐसा माना जाता है कि बंशी नारायण मंदिर साल में केवल एक दिन , रक्षा बंधन वाले दिन ही खुलता है लेकिन हमें तो ये खुला हुआ ही मिला। रक्षा बंधन के दिन महिलाएं और लडकियां पहले बंशी नारायण मंदिर में जाकर उन्हें राखी बांधती हैं और फिर उसके बाद अपने भाइयों को राखी बांधती हैं। प्रसिद्द पहाड़ी स्थापत्य शैली "कत्यूरी " में बने इस मंदिर में भगवान चतुर्भुज की प्रतिमा के साथ दो और भी प्रतिमाएं हैं ! दस फुट ऊँचे इस मंदिर को आठवीं शताब्दी में बनवाया गया था लेकिन कभी किसी भूकंप में इसका शीर्ष टूटकर गिर गया , जो वहीँ पास में ही पड़ा है। मंदिर हालाँकि सुरक्षित है लेकिन मरम्मत मांग रहा है। इस गाँव के सामने नीचे की तरफ "कलगोट " गाँव है और ऐसा माना जाता है कि वहीँ के राजपूत इस मंदिर के पुजारी होते हैं।

तो अब तक मानपाई बुग्याल से पहले के stretch में 300 मीटर उतरना है फिर मैना गाड़ नदी से खंड द्वारी तक की पांच किलोमीटर की दूरी में 500 मीटर चढ़ना है और फिर आगे 300 मीटर उतरना है। हालत पतली हो जाती है ! खण्डद्वारि से बंशी नारायण के रास्ते में मुख्य रास्ते से थोड़ा नीचे की तरफ " छोटा नन्दीकुंड " और " सुजल सरोवर " भी मिलते हैं लेकिन इनके लिए आपको डेढ़ - दो किलोमीटर नीचे जाना होता है और फिर वापस चढ़ाई चढ़कर आना होता है। मैं तो नहीं गया , हाँ अमित भाई और श्रीकांत जी गए थे।

दो बजे के आसपसस बंशी नारायण पहुँच गए। रास्ते में कुछ बकरी चराने वाले मिल गए जो बाद में हमारे साथ मंदिर पर भी आ गए। उन्हीं के माध्यम से जीवन में पहली बार " कीड़ा जड़ी " देखी। ज्यादा नहीं लिखूंगा इस विषय में लेकिन इतना जरूर कि कीड़ा जड़ी की कीमत बाजार में 8 -9 लाख रूपये प्रति किलो तक होती है। थोड़ी ऊंचाई पर मंदिर के सामने एक पहाड़ी है जहां आज सात दिन बाद वोडाफोन के 3G सिग्नल आ रहे हैं ! 4 G न सही , 3G ही मिल गया , ये क्या कम है :) पहाड़ी पर बैठकर ट्रैक के सफलतापूर्वक संपन्न होने और अपने सुरक्षित होने की सूचना घर और मित्रों को दी। लेकिन जैसे ही थोड़ी चैट करने लगा , बारिश आ गई और वहां से भाग लिया ! फिर एक घण्टा बाद जब मौसम साफ़ हुआ तो मैं और अमित भाई पहुँच गए पहाड़ी पर , लेकिन इस बार मकसद दूसरा था। यहां से हाथी -घोड़ी पर्वत दिख रहे थे हालाँकि नंदा देवी , त्रिशूल और द्रोणगिरि भी देखना चाहते थे लेकिन मौसम ने इतना एहसान नहीं किया। वैसे आज भी भगवान इंद्र को धन्यवाद कि उन्होंने आज पूरा दिन अपना ऑफिस वर्क ( बारिश करने का ) रोके रखा और बस चार -साढ़े चार बजे दो -चार फाइलों में sign किये , मतलब हल्की -फुल्की ही बारिश हुई !

इस वक्त रात के नौ बजे हैं और हमारा टैण्ट बंशी नारायण मंदिर के बिल्कुल पीछे लगा है और उसी में बैठा हुआ मैं ये डायरी लिख रहा हों । इससे करीब 10 फ़ीट दूर एक और गुफा है जहां आज का खाना बना है ।आज का दिन सच में बहुत अच्छा गुजरा ! खण्डद्वारि पर लगभग सभी के मोबाइल में सिग्नल आने लगे थे चाहे BSNL हो , या Vodafone या Airtel ! सबकी अपने अपने घर बात हो गई ! मैंने भी माँ से , पत्नी से और बच्चों से बात कर ली ! आठ दिन बाद आप अपने परिवार और बच्चों से बात कर रहे होंगे तो कितनी ख़ुशी होगी , ये केवल महसूस ही किया जा सकता है , लिखा नहीं जा सकता !!

ये जो वृतांत आपने ऊपर पढ़ा है इसे बस डायरी में से कंप्यूटर में लिखा गया है , तो अब फोटो भी तो हो जाएँ कुछ !!

                   
 
















छोटा नन्दीकुंड  PC :Amit Tiwary Ji



इतने सारे फूल हैं लेकिन मैं किसी का भी नाम नहीं जानता !!




ये तो शायद " कोबरा लिली " है ?



इस​ ट्रैक में आखरी बार इन पहाड़ों को देखता चलूँ


इस जगह को खण्डद्वारि बोलते हैं


ये​ कीड़ा जड़ी है !! आप कन्फर्म करिये

बंशी नारायण मंदिर !! कहते हैं साल में केवल एक बार खुलता है , लेकिन हमें तो खुला मिला था




आज यहीं बंशी नारायण मंदिर के पीछे टैण्ट लगाया है , कल आगे चलेंगे:


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