शुक्रवार, 20 जनवरी 2017

Mehrauli Archaeological Park : Jamali-Kamali Tomb

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जब आप महरौली के खंडहरों में बलबन के घर और उसकी कब्रों को देख रहे होते हैं और अपने आपको इतिहास का प्रेमी दिखाने की कोशिश में हों तो भूल मत जाइयेगा कि सामने ही एक और इतिहास का नमूना , इतिहास का आइना आपका इंतज़ार कर रहा है ! सामने ही "जमाली -कमाली " की मस्जिद और उन दोनों के मक़बरे हैं ! जगह अच्छी है और भुतहा मानी जाती है , लेकिन इंसान खुद ही भूत हो गया है , ऐसे झूठ मूठ के भूतों से अब कौन डरता होगा ?


जमाली कमाली क्या बला है ? पहले नहीं मालूम था लेकिन जब एकदिन ज़हाज़ महल देखकर आया और उसकी पोस्ट यहां लिखी तो अंग्रेजी की विख्यात ब्लॉगर मृदुला द्विवेदी  जी ने मेरी पोस्ट पर अपने कमेंट में मुझे पूछा कि जमाली कमाली मस्जिद देखकर आये ? मैंने सोचा कि ज़हाज़ महल से थोड़ा आगे एक मस्जिद सी है तो सही , यही जमाली कमाली मस्जिद रही होगी ! और कह दिया , हाँ ! देखी तो लेकिन फोटो नहीं लिए क्योंकि वो जगह मुझे डरावनी सी लगी ! लेकिन वो पता नहीं क्या था ! असली जमाली कमाली तो यहां महरौली के अर्किलिजीओकल पार्क में आराम फरमा रहे हैं और मैं उन्हें जाने कहाँ कहाँ ढूंढता फिर रहा हूँ ! तुम भी न यार ? कहाँ कहाँ जा के लेट जाते हो ? चलो , अब आखिर पकड़ ही लिया है तो लोगों को तुम्हारे बारे में बताना भी अपना कर्तव्य है !



तो भाई लोगो , जमाली -कमाली के नाम से महरौली के अर्किलिजीओकल पार्क में एक खूबसूरत और पुरानी मस्जिद है और इसी मस्जिद के पास में उनके मकबरे हैं ! जमाली -उर्दू नाम है जो जमाल से बनता है ! जमाल का मतलब सुंदरता यानि beauty ! और एक शब्द और भी है -जमालघोटा ! उसका मतलब बताने की जरुरत नहीं है आपको ! आप बड़े स्मार्ट और इंटेलिजेंट लोग हैं , कुछ बातें खुद ही समझ जाते हैं ! जमाली साब का ये नाम उनका तकुल्लुस रहा होगा क्योंकि उनका असली नाम , शेख फजुलउल्लाह था और सही बात तो ये है कि ये नाम भी उनका असली नाम नहीं था ! वो एक सुन्नी मुस्लिम थे तब उनका नाम जलाल खान था और जब वो सूफी संत हो गए तब उनका नाम शेख फजुलउल्लाह या शेख जमाली कंबोह हुआ ! पूरे एशिया की यात्रा करते हुए जमाली सिकंदर लोधी के दरबारी कवि हो गए ! जमाली के विषय में तो खूब जानकारी मिलती है लेकिन उन के साथ कब्र में बराबर में सोये हुए कमाली के बारे में ज्यादा मालूमात नहीं मिलती ! यहां ये बात रोचक है कि ये मकबरे और मस्जिद सन 1528 -29 ईसवी में बनी है जबकि जमाली की मृत्यु सन 1535 ईसवी में हुई ! तो क्या जमाली -कमाली ने अपने जीवन में ही अपने लिए कब्र खुदवा ली थी ? अपने लिए हमेशा सोते रहने के लिए जगह का चुनाव पहले ही कर लिया था ? हालाँकि ऐसा हिन्दू रीति रिवाज़ में होता आया है कि जिन लोगों को अपने पुत्रों पर उनकी तेरहवीं करने का भरोसा नहीं होता , वो अपने जीवित रहते ही अपने मरने के बाद के सब कर्मकांड पूरे कर जाते हैं और ब्राह्मणों को भोजन और दान कर जाते हैं !

ये एक बड़ा सा अहाता है जिसमें एक तरफ मस्जिद है और मस्जिद के सामने खुली जगह है जबकि दूसरी तरफ जमाली -कमाली के मकबरे हैं ! मस्जिद तो सार्वजनिक रूप से खुली है लेकिन मकबरे तक जाने के लिए बीच में एक दरवाज़ा है , लेकिन वहां जो आदमी था उसने हमें मकबरों की तरफ नहीं जाने दिया जबकि मैं जब उस अहाते में घुस रहा था तब एक परिवार को मकबरों की तरफ से आते हुए देखा था ! नालायक !!  तो बस इतना ही कर पाया कि वहां से ही फोटो ले लिए !


चलो जी , जमाली -कमाली की बात तो मैंने आपको सुना दी , अब आगे चलते हैं ! आगे वो दिख रहा है कुछ - दिखा ? अरे यार ! वो पेड़ों के झुरमुट में से जो गोल गोल संरचना सी दिख रही है ? हाँ , बस उसके ही पास एक और पुरानी संरचना है , जिसे चाहो तो क़ुली खान का मकबरा कह लो और चाहो तो मेटकॉफ हाउस कह लो ! लेकिन यार आज नहीं , फिर चलेंगे ! नही नही , चलेंगे तो आज ही , लेकिन लिखेंगे फिर कभी ! लेकिन इतना पक्का है जैसलमेर जाने से पहले लिखेंगे !! तो बच्चो हाजिर हो जाना , अगली क्लास के लिए , इतिहास पढ़ाया जाएगा !

आओ तब तक कुछ फोटू -शोटू भी देखते जाओ  :


जमाली - कमाली मस्जिद , सन 1528 ईसवी में बनी
जमाली - कमाली मस्जिद , सन 1528 ईसवी में बनी

जमाली - कमाली मस्जिद , सन 1528 ईसवी में बनी
जमाली - कमाली मस्जिद , सन 1528 ईसवी में बनी  (अंदर का  द्रश्य)


ये बगल में ही जमाली -कमाली चिर निद्रा में सोये पड़े हैं !!

मस्जिद के दूसरी तरफ




मजेदार किस्सा है इस फोटो के पीछे ! ये लड़का आया -बोला भाई मेरा भी एक फोटो खींच दो , मैंने कहा चल ! और इस फोटो के एवज में हम दोनों ने मस्त चाय पी , और हाँ पैसे उसी ने दिए , जबरदस्ती !! वैसे मास्टर हूँ , मुफ्त की चाय पीना मेरी आदत है

इसके साथ एक और आ गया



मिलेंगे अभी जल्दी ही :
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