बुधवार, 5 नवंबर 2014

हिमाचल यात्रा -तीसरा दिन : चिंतपूर्णी मंदिर

 इस यात्रा वृतांत को शुरू से पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें!!

ज्वालाजी के दर्शन करने के पश्चात करीब 2 बजे हम बाहर आ गए ! पेट में चूहे उछाल मारने लगे थे तो सबसे पहले खाने का स्थान देखा गया ! बस स्टैंड के ही पीछे बहुत सारे रहने और खाने के लिए होटल हैं , उनमें से ही एक में घुस गए ! ये अच्छा था कि उस होटल में ज्यादा भीड़ भाड़ नहीं थी , खाना खाया और चाय पी ! बच्चों के लिए बिस्कुट के दो -तीन पैकेट लिए और फिर तैयार ! बस स्टैंड पर पता किया तो चामुण्डा जी दूर पड़ रही थी , असल में वो कांगड़ा से ज्यादा नजदीक हैं लेकिन वो रास्ता हम छोड़ आये थे पीछे इसलिए उधर वापस जाने का कोई मतलब नही था और हमारा कोई ऐसा प्रीप्लान भी नहीं था कि हमें ये ये जगह घूमनी हैं , जहां मन करे उधर ही मुंह उठाके चल दो ! और यही हुआ , देखा कि चिंतपूर्णी की बस खड़ी है और ये ज्यादा दूर भी नहीं है तो बैठ गए चिंतपूर्णी के लिए ! 35 किलोमीटर दूर है ज्वालाजी से चिंतपूर्णी ! किराया लिया 50 रूपये प्रति सवारी ! जैसा मैंने पहले भी कहा कि हिमाचल में आपको पल पल पर बस मिलेगी और भीड़ नाम को भी नही ! लेकिन इस रास्ते में भीड़ कुछ ज्यादा हो गयी , बच्चों को गोद में लेकर बैठना मुश्किल सा हो गया तो मैंने बस कंडक्टर से दोनों बच्चों के लिए एक टिकट और ले लिया यानी 50 रुपये और देने पड़ गए , लेकिन इसका फायदा ये हुआ कि बच्चों और उनकी माँ को डबल सीट वाली एक पूरी सीट मिल गयी और आराम से सुविधाजनक रूप से यात्रा संपन्न हो गयी ! ज्वालाजी से ऐसे तो कंडक्टर ने बताया था कि ज्यादा से ज्यादा एक घंटा लगेगा चिंतपूर्णी तक लेकिन सवारियों के चक्कर में उसने डेढ़ घंटा लगा दिया ! देहरा , ढलियारा होते हुए आखिर चिंतपूर्णी पहुंचे ! तीन दिनों के बाद आज पहली बार कांगड़ा जिले से बाहर आये हैं ! बहुत बड़ा है कांगड़ा और मुझे लगता है कि भारत के सबसे बड़े जिलों में कोई न कोई नंबर जरूर होगा कांगड़ा का ! देहरा क़स्बा जैसा ही है लेकिन वहां धर्म शाला , चंडीगढ़ , जालंधर की बसें खड़ी देखकर लग रहा था कि यहां बसों का ठहराव है ! हाँ , उस दिन दशहरा था और देहरा बस स्टैंड के पास ही दशहरा की झांकियां भी निकल रही थीं , न सुन्दर थीं और न ज्यादा बड़ी ! लेकिन परंपरा है , और परम्पराओं को निभाया जाना अच्छा लगता है !


ऐसा माना जाता है कि चिंतपूर्णी मंदिर को माई दास नाम के सारस्वत ब्राह्मण ने छपरोह गाँव में छब्बीस पीढ़ियों पहले स्थापित किया था ! बाद में यही छपरोह गाँव चिंतपूर्णी हो गया ! उनके वंशज आज भी चिंतपूर्णी में ही रहते हैं और चिंतपूर्णी मंदिर में पूजा अर्चना करते हैं ! किवदंतियों के अनुसार भक्त माई दास के पिता पटियाला राज्य के अथूर गाँव में रहते थे और वो माँ दुर्गा के बहुत बड़े भक्त थे ! उनके तीन पुत्र थे -देवी दस , दुर्गा दस और माई दास ! माई दास भी पिता की तरह माँ दुर्गा के भक्त थे और सदैव पूजा पाठ और भजन कीर्तन में ही लगे रहते ! उनके भाइयों को ये सब पसंद नहीं आता था ! कालांतर में पूरा परिवार ऊना जिले के अम्ब के पास रापोह गाँव में आ गया ! एक बार माई दास ससुराल जा रहे थे , थके हारे बेचारे एक पेड़ के नीचे बैठ गए , जल्दी ही खर्राटे लेने लगे तो उन्हें सपने में एक बहुत सुन्दर कन्या दिखाई दी ! माई दास अचानक से उठे लेकिन जब कुछ न दिखा तो फिर ससुराल की तरफ चल दिए ! वापसी में फिर उसी बरगद के पेड़ के नीचे बैठकर सो गए ! फिर से वोही कन्या सपने में आई ! अब बड़े परेशान, तो आँखें बंदकर के बोले -माँ अगर तुम मानती हो कि मैं तुम्हारा सच्छा भक्त हूँ तो कृपया मेरे सामने आओ ! माँ चारभुजा के वेश में शेर पर सवार होकर उपस्थित हुईं और माई दास से कहा कि तुम यहीं मेरा मंदिर बनाकर मेरी पूजा करो ! मैं यहीं इस बरगद के नीचे पिंडी के रूप में स्थापित रहूंगी ! लेकिन माई दास को घने जंगल में शेर-चीतों का डर था और फिर उसे वहां पानी का कोई स्रोत भी नजर नही आ रहा था ! भक्त की इस बात को महसूस कर माँ ने माई दस से इशारा करके कहा - जाओ उस पत्थर वहां से हटाओ , जैसे ही माई दास ने पत्थर हटाया वहां से प्राकृतिक जल धारा फूट निकली ! माई दास ने वहां मंदिर बनवाया और धीरे धीरे उस मंदिर की महिमा दूर दूर तक होने लगी !



चिंतपूर्णी मंदिर के विषय में कुछ कहानियाँ प्रचलित हैं , पहले वो बता दूँ फिर आगे चलता हूँ ! चिंतपूर्णी , जिसे छिन्नमस्तिका शक्ति पीठ भी कहते हैं , भारत के सात मुख्य और 51 शक्तिपीठ में से एक है और ये हिमाचल प्रदेश के ऊना जिले में पड़ता है ! छिन्नमस्तिका का अर्थ होता है विभाजित या कटा हुआ सर या माथा ! ऐसा कहा जाता है कि जब भगवन विष्णु ने शिव के तांडव को शांत करने के लिए सती के शरीर को 51 भागों में काट दिया तो वो हिस्से इधर उधर बिखर गए और सती का माथा , यानि ललाट इस स्थान पर गिरा ! और इसीलिए इसे बहुत महत्वपूर्ण और पवित्र शक्तिपीठ माना जाता है !


मार्कण्डेय पुराण के अनुसार माँ चंडी ने राक्षसों के साथ हुए भयंकर युद्ध में उन्हें पराजित कर दिया लेकिन उनकी योगिनी , जया और विजया अब भी खून के लिए लालायित थीं तो माँ चंडी ने स्वयं ही अपना सिर काट के उनकी प्यास को शांत किया ! इसिलए माँ के एक रूप में उन्हें अपना ही सर हाथ में लिए हुए दिखाया जाता है जिसमें उनके अगल बगल में जया और विजया को खून की धार पीते हुए भी देखते हैं ! छिन्नमस्तिका का अगर सरल शब्दों में अर्थ देखें तो समझ आता है छिन्न भिन्न मस्तिष्क ! यानी इससे ये सन्देश मिलता है कि मस्तिष्क का शरीर से अलग होना अर्थात भौतिक वस्तुओं ( शरीर ) को दिमाग से , मन से दूर रखना !


इसी के साथ एक बात और प्रचलत है कि छिन्नमस्तिका देवी की रक्षा के लिए चारों दिशाओं में भगवान शिव अपने रूप में विराजमान रहेंगे ! पूर्व में कालेश्वर महादेव , पश्चिम में नारायण महादेव , उत्तर में मुचुकुन्द महादेव और दक्षिण में शिव बारी ! यहां ये बात धयान देने योग्य है कि चारों दिशाओं में उपस्थित भगवान शिव , चिंतपूर्णी मंदिर से सामान दूरी पर स्थित हैं !


चिंतपूर्णी में कांगड़ा के मुकाबले ज्यादा , बेहतर और सस्ते होटल उपलब्ध हैं ! हमने जहां बस ने उतारा उसके पास में तीन सौ रुपये में एक होटल में कमरा ले लिया और जाते ही बस बिस्तर पर पसर गए ! रात को आठ बजे के आसपास निकले होंगे दर्शन के लिए ! बीच में एक जगह पराठे भी खा लिए ! पराठे कुछ महंगे हैं , आलू का एक पराठा 25 रूपये का ! गाज़ियाबाद में पहलवान ढाबे पर रायते के साथ बहुत बड़ा पराठा 25 रूपये में मिल जाता है ! खैर आलू इतना महंगा है तो पराठा भी महंगा मिलेगा ! रात को 10 साढ़े दस बजे वापस आये होंगे ! भीड़ उस दिन भी थी , होनी भी थी ! सब के पास छुट्टियां थीं और पवित्र दिन भी था विजयादशमी का !



आज बस इतना ही ! अगले दिन की बात अगली पोस्ट में :



मंदिर जाते समय हनुमान जी की एक बड़ी सी मूर्ति मिलती है रोड के किनारे! ​ये डबल हनुमान हैं ​​




छिन्नमस्तिका मुख्य मंदिर
मंदिर बहुत छोटा है ! इसके बाहर एक टीवी स्क्रीन लगा रखा है जिसमें ज्यादा बढ़िया पिंडी दर्शन हो सकता है





यह चित्र इंटरनेट से लिया गया है !

यह चित्र इंटरनेट से लिया गया है !

एक फोटो मेरे बड़े बेटा हर्षित की भी 






यात्रा जारी है :



एक टिप्पणी भेजें