गुरुवार, 24 सितंबर 2015

जोशीमठ से गाजियाबाद

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जोशीमठ भले एक छोटा सा क़स्बा हो लेकिन महवपूर्ण जगह मानी जाती है ! विशेषकर उन लोगों के लिए जिन्हें भगवान शंकराचार्य जी और हिन्दू धर्म के प्रति गहरी आस्था और गहन अध्ययन करने की लगन है ! जैसा मैंने पहले भाग में लिखा कि जोशीमठ को ज्योतिर्मठ भी कहते हैं ! भगवान आदि शंकराचार्य जी द्धारा 8 वीं सदी में स्थापित इस मठ को चलाने के लिए नियुक्त किये गए शंकराचार्य स्वामी रामकृष्ण तीर्थ के पश्चात करीब 1941 तक ये मठ 165 साल तक बिना शंकराचार्य के ही रहा।



भगवान शंकराचार्य की गुफा और उनका मंदिर देखने के बाद सामने ही एक प्राचीन मंदिर की तरफ चला गया। हालाँकि मंदिर तो बन्द था लेकिन बाहर से देखने में बहुत सुन्दर लग रहा था। उसके कुछ फोटो खींचने के बाद और आगे बढ़ा तो महाभारत से प्रसिद्द भीष्म पितामह की विशाल मूर्ति लेटी हुई अवस्था में दिखाई देती है ! जीवन में पहली बार भीष्म पितामह की मूर्ति देखि है और वो भी इतनी विशाल ! चलते रहने के लिए सुन्दर और साफ़ सुथरा रास्ता बना हुआ है जिसके दोनों तरफ हरियाली है ! बीच में एक हरा भरा पार्क भी है जो इसकी सुंदरता को और भी बढ़ा देता है ! भीष्म पितामह की मूर्ति के बिल्कुल ​विपरीत दिशा में संकट मोचक हनुमान जी का मंदिर है जो बहुत विशिष्ट नही लगा ! इससे आगे हाथी की एक मूर्ति है फिर सामने मुख्य मंदिर दिखाई देता है जहां लगभग  20 फुट ऊँची भगवान शिव की प्रतिमा लगी हुई है। जब वहां पहुंचा तब मुझे एक भी श्रद्धालु नही दिखा बस तीन चार लड़के दिखे जो मंदिर के ही कर्मचारी थे। इधर -उधर देखते हुए जब बिल्कुल मंदिर के पास पहुँचा तो उस दो मंजिल के मंदिर की ऊपरी मंजिल पर एक संत जैसे सज्जन सफ़ेद कपड़ों में दिखाई दिए  ! मैंने उनसे ऊपर आने की अनुमति मांगी तो उन्होंने इशारे से ऊपर का रास्ता बता दिया ! 10 -15 मिनट उनके पास बैठा और उनसे ज्ञान प्राप्त किया और ज्योतिर्मठ के विषय में और भी जानकारी प्राप्त की ! स्फटिक शिवलिंक के प्रथम बार दर्शन किये और उन्हें दक्षिणा दी ! हालाँकि मैं आसानी से किसी को भी दक्षिणा नही देता क्योंकि मैं स्वयं दक्षिणा लेने वालों में से हूँ , यानि विप्र हूँ लेकिन उन्हें दक्षिणा देने में अच्छा लगा ! 


बाहर आकर कुछ और फोटो खींचे और फिर सीधा ऋषिकेश के लिए प्रस्थान कर दिया ! ऋषिकेश से ही गाजियाबाद ही सीधी बस मिल गयी।  और सुबह पांच बजे के आसपास बस ने  मोहन नगर उतार दिया और पन्द्रह मिनट में घर !

बद्रीनाथ यात्रा का समापन !!



















































मंगलवार, 15 सितंबर 2015

जोशीमठ : बद्रीनाथ यात्रा

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बद्रीनाथ और माणा की यात्रा और वसुधारा फॉल के रोमांच की यादें लेकर अब वापस लौटने का समय आ गया था ! बद्रीनाथ बस स्टैंड से जोशीमठ के लिए बहुत सारी जीप मिल जाती हैं ! ऐसे जोशीमठ होते हुए ही आया था लेकिन उस वक्त जोशीमठ में कुछ भी नही देखा था सिर्फ जीप स्टैंड ही देखे थे ! सुबह ठीक 7 बजकर 10 मिनट पर बद्रीविशाल की जय बोलकर वहां से निकल लिए ! 48 किलोमीटर की दूरी में जोशीमठ पहुँचते पहुँचते दो घंटे लग गए और 9 बजे जोशीमठ पहुंचे ! कुछ खा लिया जाए , बस एक कप चाय पी है अभी तक। चाय और दो समोसे से काम चल गया ! 


जोशीमठ को ज्योतिर्मठ भी कहते हैं बल्कि इसे उल्टा कहा जाए , ज्योतिर्मठ को जोशीमठ भी कहते हैं ! क्योंकि इसकी जो पहिचान है वो मठ की वजह से ही है। 6150 फुट की ऊंचाई पर बसा जोशीमठ हिमालय क्षेत्र की बड़ी बड़ी वादियों का प्रवेश द्वार कहा जा सकता है ! ये भगवान आदि शंकराचार्य जी द्वारा स्थापित चार मठों में से एक है जो उत्तर दिशा में स्थित है ! बाकी के तीन मठ - श्रंगेरी , पुरी और द्वारका हैं। और आजकल जोशीमठ , औली के लिए ज्यादा प्रसिद्ध है। वो ही औली जहां जनवरी में अंतर्राष्ट्रीय स्तर के गेम्स होते हैं ! उन्हें क्या कहते हैं , नाम नही मालूम !! आइये थोड़ा सा घूमते चलते हैं यहां भी , नही तो जोशीमठ और जोशीमठ के लोग कहेंगे कि यहां से निकला था और हमें मिलकर भी नही गया ! जोशीमठ के बच्चे बिलकुल अलग हैं , यहां उन्हें जून के महीने में स्कूल जाना होता है जब सब जगह छुट्टियां होती हैं और इन्हें दिसंबर में छुट्टियां मिलती हैं ! 

पहले भविष्य केदार मंदिर चलते हैं ! इस मंदिर में भगवान शिव और देवी पार्वती की प्रतिमाएं हैं और ऐसा माना जाता है कि आज के केदारनाथ मंदिर में निवास कर रहे शिव दंपत्ति भविष्य में इस जगह पर विराजमान हो जाएंगे ! लेकिन कब ? इसके लिए एक पाषाण प्रतिमा के दो अलग अलग हिस्से होने का इंतज़ार करना होगा ! असल में एक आधी अलग पाषाण प्रतिमा है और उसको ऐसा कहा जाता है कि ये एक दिन अलग लग हिस्सों में बट जायेगी तब केदारनाथ से भगवान शिव अपने परिवार सहित यहां "शिफ्ट " हो जाएंगे ! लेकिन मुझे ये कोरी धारणा ही ज्यादा लगती है ! आप का मंतव्य आप समझें ! यही धारणा भविष्य बद्री के लिए बना रखी है कि एक दिन प्राकृतिक आपदा के कारण बद्रीनाथ का रास्ता रुक जाएगा और भगवान बद्रीनाथ अपना घर यहां भविष्य बद्री में बना लेंगे जो जोशीमठ से तपोवन वाले रास्ते पर 17 किलोमीटर दूर है ! 


अगर जोशीमठ के इतिहास की बात करें तो ये बहुत पुराना स्थान है। आज के जोशीमठ का पुराना नाम भगवान शिव के पुत्र कार्तिकेय के नाम पर कार्तिकेयपुरा हुआ करता था फिर ज्योतिर्मठ और फिर जोशीमठ।  यहां आपको 8 वीं सदी में भगवान आदि शंकराचार्य जी द्वारा प्रतिष्ठापित भारत का  पुराना वृक्ष देखने को मिलता है जिसे कल्पवृक्ष कहते हैं।   


आगे की बात बाद में करते हैं  :





​ये पाषाण जब विभक्त हो जाएगा तब भगवान शिव अपने नए "आवास " पर शिफ्ट होंगे जिसे भविष्य केदार कहा जाएगा




































ये वो 2300 वर्ष पुराना कल्पवृक्ष









ये वो 2300 वर्ष पुराना कल्पवृक्ष

 ​ यहां लोगों ने भगवान आदि शंकराचार्य जी को मंदिर के नीचे एक गुफा में बंद किया हुआ है ! यहीं भगवान शंकराचार्य जी ने तपस्या करी थी !!

भगवान शंकराचार्य जी



                                                                                                                  ​आगे जारी रहेगी : 


मंगलवार, 8 सितंबर 2015

कोरोनेशन पार्क -2 : दिल्ली

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अपनी इस भारत यात्रा के दौरान इंग्लैंड की महारानी ने वायसराय निवास के लिए उद्घाटन भी किया लेकिन ये जमीन बाद में उचित नही लगने पर वायसराय निवास के लिए रायसीना पहाड़ियों पर जगह ढूंढी गयी और वहां ये उद्घाटन का पत्थर लगा दिया गया ! यही वायसराय निवास आज भारत के राष्ट्रपति का निवास स्थान स्थान है जिसे हम राष्ट्रपति भवन कहते हैं ! वर्तमान रूप में जो राष्ट्रपति भवन है उसका निर्माण प्रथम विश्व युद्ध के बाद शुरू हुआ था और 1931 में जाकर पूरा हुआ !


भारत की आज़ादी के बाद इधर उधर लगी हुई अँगरेज़ राजाओं और उनके चमचों मतलब वायसरायों की मूर्तियों को मुख्य शहर से हटाकर एक जगह लाकर लगा दिया गया ! कुछ मूर्तियां राजपथ और इंडिया गेट से भी हटाई गयी। ये वो ही जगह थी जहाँ कभी दिल्ली दरबार लगा करते थे लेकिन आज़ादी के बाद इन्हें बिलकुल तन्हाई और निर्जन से स्थान में लगा दिया गया ! कालांतर में इसका सुधार होता गया और और आज की तारीख में देखने लायक बन पड़ा है !! इस पार्क में करीब 49 फ़ीट ऊँची और सबसे लम्बी किंग जॉर्ज पंचम की मूर्ति को ओबिलिस्क ( चतुष्कोणीय स्तम्भ ) के बिलकुल सामने स्थान दिया गया है !! इस मूर्ति को नई दिल्ली को डिज़ाइन करने वाले एडविन लुट्यन्स ने ही डिज़ाइन किया था !! इसे असल में इंडिया गेट के सामने से निकाल कर यहां लाया गया था और अगर आपने गौर किया हो तो इंडिया गेट के बिलकुल सामने एक खाली छतरी दिखती है , 1965 तक ही वहां थी उसके बाद वो कैनोपी खाली है !! यहां जितनी भी मूर्तियां लगी हैं उन में से बस एक दो ही पहिचान में आती है !! सबसे बड़ी मूर्ति किंग जॉर्ज की है , एक मूर्ति वायसराय लार्ड विलिंग्डन की है , बाकी किसकी हैं कोई नही जानता और न कहीं उनके नाम लिखे हैं !! 


आइये फोटो देखते हैं और जितना संभव है नाम जानते हैं :













Obelisk !! इसके बिल्कुल सामने ही किंग जॉर्ज की मूर्ति लगी है !!










पार्क की ये हालत हो जाती है बारिश के मौसम में !!






बच्चों के मनोरंजन का साधन भी है !!
















लॉर्ड विलिंग्डन की मूर्ति


लॉर्ड विलिंग्डन की मूर्ति

वायसराय लॉर्ड हार्डिंग

वायसराय लॉर्ड हार्डिंग

वायसराय लॉर्ड हार्डिंग
ये किंग जॉर्ज पंचम ( King George V )

ये किंग जॉर्ज पंचम ! कौवे इसके ऊपर बैठे हैं , मूर्ति में नही बनाये गए हैं !!

कौवे इसके ऊपर बैठे हैं , मूर्ति में नही बनाये गए हैं !!




कितना लबादा पहन रखा है भाई ने !!

ये शायद ब्रिटिश हुकूमत का निशान है !!
ये भी ?

49 फ़ीट ऊँची है ये मूर्ति , जो 1965 में इंडिया गेट से यहां लाई गयी थी !!

Obelisk

ये पता नही कौन है ?



इसने भी खूब लबादा  पहना हुआ है !!



इसने भी खूब लबादा  पहना हुआ है !! ये इसके लबादे की ही फोटो
ये किंग जॉर्ज पंचम !
ये किंग जॉर्ज पंचम !















यहाँ गज़ब की बात है कि इस जगह जो भी लिखा है वो सिर्फ अंग्रेजी और उर्दू  में लिखा है !! हिंदी कहाँ है ?
ये शायद ब्रिटिश हुकूमत का निशान है !! और भी ज्यादा स्पष्ट


इंडिया गेट के सामने से यहीं से किंग जॉर्ज की मूर्ति को हटा कर कोरोनेशन पार्क में लगाया गया था !!

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