बुधवार, 26 सितंबर 2018

Adi Kailsh Yatra - Sixth Day ( Nabi to Kuti Village )

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नाबी गाँव पहुँच चुके हैं जहाँ हमारे पास रुकने के दो विकल्प हैं। एक छान है जिसमें खाना और रुकना केवल 150 रूपये प्रति व्यक्ति में हो जाएगा लेकिन यहां चारों तरफ खुला -खुला है और फिर 8 -10 मजदूर भी हैं तो जगह कम रहेगी। अब एक दूसरा विकल्प है बढ़िया और साफ़ -सुथरे और एकदम नए बने गेस्ट हाउस में रुकने का लेकिन इनके यहाँ 350 रुपया प्रति व्यक्ति खर्च पड़ेगा। कह -सुन के शाम और सुबह की चाय इसी में करा ली और अपने बैग यहीं पटक दिए। जब तक चाय -खाना होगा अपना फेवरिट गेम "नाभी " खेलेंगे।


सुबह "अपि " पर्वत के सुन्दर और शानदार दर्शन हो रहे थे। कल यहाँ गर्म पानी मिल गया था तो शायद सभी ने अपने शरीर का कुछ वजन कम कर लिया था। कल किसी ने बताया था कि यहाँ से साढ़े छह बजे GREF की गाडी जायेगी कुटी की तरफ लेकिन इंतज़ार ही करते रहे और फिर आखिर ये सोचकर कि गाडी आएगी तो आगे कहीं मिल ही जायेगी ! लेकिन न बाबा आये न घण्टा बजा :) और ये हमारे लिए अच्छा ही रहा नहीं तो हम बेहतरीन प्राकृतिक नजारों को देखने से वंचित रह जाते। यहाँ एक बात जरूर और जोर देकर कहना चाहूंगा कि नाबी गाँव के दूसरी तरफ कुटी नदी के उस तरफ एक छोटा सा लेकिन बहुत सुन्दर और प्यारा गाँव है "रेकोंग "।  लेकिन रेकोंग मुख्य रास्ते पर न होने की वजह से शायद ही कोई उधर जाता हो , हम भी नहीं गए लेकिन आप जरूर जाना। हम गए तो नहीं लेकिन मुझे एक बुजुर्ग महिला मिली उस गाँव की और उनसे बात करते हुए ऐसा लगा जैसे वो किसी दूसरे गृह से यहां आई हों !! उन्होंने आजतक शहर नहीं देखा !! रेकोंग की छवि बिल्कुल ऐसी है जैसे हम ड्राइंग रूम में पेंटिंग लगाकर रखते हैं या आपको नाई की दुकान में जैसे पोस्टर लगे दीखते हैं -घर कब आओगे " वाले ! बेहद खूबसूरत गाँव है रेकोंग !!

रास्ता कुटी नदी के किनारे -किनारे चलता जाता है और खूब चौड़ा रास्ता है। चौड़ा होगा ही क्यूंकि यहाँ आर्मी और GREF की गाड़ियां चलती रहती हैं इसलिए भले RCC की रोड न हो , रास्ता खूब चौड़ा बनाया है। प्राकृतिक नजारों का आनंद लेते हुए हम "कलिम्फू " पहुँच गए जहाँ " खान -पान सुविधा " वाला बोर्ड तो लगा है लेकिन है कुछ भी नहीं , न कोई दूकान न कोई घर बस बहकाने को बोर्ड जरूर लगा है । भले यहाँ खाने पीने को कुछ नहीं है लेकिन जोशी जी के पास फाफड़ा के कई पैकेट बचे हैं तो उन पर टूट पड़े और क्या जबरदस्त स्वाद था !  मजा आ गया । फाफड़ा गुजरती आइटम है जो पापड़ की तरह पतला और हल्का होता है , इसे अगर चटनी और कोई पाउडर सा आता है उसके साथ खाओ तो टेस्ट और दस गुना बढ़ जाता है । रास्ते भर फोटो खींचते- खींचते नम्फा पहुँच गए। गुंजी से कुटी गाँव पूरे 19 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है लेकिन हम नाबी गाँव से चले हैं आज तो तीन किलोमीटर कम चलना होगा। नम्फा में ऐसे KMVN का रेस्ट हाउस दिखा लेकिन रुकने की कोई व्यवस्था नहीं दिखी , बस बनाकर छोड़ दिया है और एक चौकीदार भी रखा हुआ है जो कुटी गाँव के ही रहने वाले कुंदन सिंह हैं। नम्फा में KMVN के गेस्ट हाउस के सामने ही इन्होने अपना चाय -पानी का इंतेज़ाम किया हुआ है और एक -दो लोगों के लिए रुकने का भी ठिकाना मिल जाता है। इन्होने जो मस्त परांठे और भांग की चटनी खिलाई उससे जी खुश हो गया। हालाँकि नींद आने लगी थी लेकिन जब चलने लगे तो नींद फिर से कहाँ भाग गई वो पता ही नहीं लगा। नम्फा में हमारी दूसरी टीम से भी सुखद मुलाकात हो गई जिसमें लखनऊ से सुरेंद्र मणि त्रिपाठी जी , राहुल और वरुण जालंधर पंजाब से और सुनील जी भेल से शामिल थे और ये आदि कैलाश दर्शन करने के पश्चात ॐ पर्वत की तरफ जा रहे थे जबकि हम ॐ पर्वत के दर्शन कर आदि कैलाश की तरफ बढ़ रहे थे।

यक्षस्वरूपाय जटाधराय पिनाकहस्ताय सनातनाय।
          दिव्याय देवाय दिगम्बराय तस्मै यकाराय नम: शिवाय् ॥
जो शिव यक्ष के रूप को धारण करते हैं और लंबी–लंबी खूबसूरत जिनकी जटायें हैं, जिनके हाथ में ‘पिनाक’ धनुष है, जो सत् स्वरूप हैं अर्थात् सनातन हैं, दिव्यगुणसम्पन्न उज्जवलस्वरूप होते हुए भी जो दिगम्बर हैं; ऐसे उस यकार स्वरूप शिव को मैं नमस्कार करता हूँ।

नम्फा से आगे एक लोहे का पुल आता है और इस पुल को पार कर कुटी नदी एक बहुत चौड़ी घाटी से गुजरते हुए दिखाई देती है , और ये नजारा बड़ा विहंगम दृश्य पैदा करता है। यहाँ से थोड़ा आगे तक रास्ता बना हुआ है और आर्मी और GREF के ट्रक आते रहते हैं लेकिन इससे आगे अभी रास्ता बन रहा है और संभव है कि दो -चार साल बाद आप जब उधर जाएँ तो और भी आगे तक आपको रास्ता बना हुआ मिले। यहाँ से धीरे -धीरे नीचे उतरते जाते हैं और लगभग दो किलोमीटर में 100 मीटर की ऊंचाई कम हो जाती है लेकिन अब रास्ता बहुत संकरा और कुटी नदी के एकदम किनारे आ जाता है जहाँ से आप चाहें तो कुटी नदी में हाथ डालकर इसके ठण्डे पानी को छू सकते हैं। पानी साथ में लेकर चलिएगा क्यूंकि नाबी गाँव के बाद आपको नम्फा और फिर कुटी में ही पानी मिल पायेगा , हाँ ! बीच में एक जगह एक वाटर टैप लगा है (जिसे आप फोटो में देख सकते हैं ) लेकिन उसका कोई भरोसा नहीं कभी पानी आ जाता है , कभी नहीं आता। अब तक का रास्ता ऐसा रहा है जहाँ न ज्यादा चढ़ाई और न ज्यादा उतराई है , यानी आपको लगेगा ही नहीं कि आप पहाड़ों में यात्रा कर रहे हैं !


आदि कैलाश के रास्ते में "रेकॉन्ग गाँव "  Rekong Village on the route to Adi Kailash
Kuti River कुटी नदी

Rekong Village in the lap of Mountains
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​बस बोर्ड ही लगा है , बाकी खाने -पीने का कुछ नहीं मिलता





ये नम्फा है जहां आपको खाने -पीने की सुविधा मिल जाती है और पीने का पानी भी     ↓ ↑


ये नम्फा से दोनों तरफ की दूरियां





रास्ते तैयार हो रहे हैं और संभव है कुछ सालों में रास्ता कुटी गाँव तक पहुँच जाय





इसकी यहाँ क्या जरुरत थी ?
यहाँ भी One Way........





Water Tap is available about 2 Km before Kuti




रास्ता चलते -चलते जब कुटी नदी आपके बायीं तरफ , आपसे दूर होने लगे तो समझ लीजिये आप कुटी गाँव के पास पहुँचने वाले हैं लेकिन वहां पहुंचना एकदम से इतना आसान भी नहीं है। अभी आपको धीरे -धीरे ही सही एक चढ़ाई और चढ़नी है और जब आप इस चढ़ाई को पूरा कर के ऊपर पहुँचते हैं तो आपको एक हरा -भरा मैदान दिखाई देता है जहां आप चाहें तो क्रिकेट खेल सकते हैं। हम क्रिकेट बैट -बॉल नहीं ले गए थे इसलिए नहीं खेल पाए लेकिन आप जब जाएँ तो पूरी क्रिकेट किट ले जाना और खूब क्रिकेट खेलना क्यूंकि वहां के बच्चे तो खेलते नहीं। बच्चे होंगे तब खेलेंगे , पेट की खातिर उनके माँ -बाप उन्हें वहां से धुंआ उगलते शहरों में खींच ले आये हैं दुनियां की होड़ में शामिल करने के लिए , सुबह से शाम तक की जिंदगी की दौड़ में बेमतलब दौड़ाने के लिए उन्हें उन्हीं की जड़ों से उखाड़ लाये हैं। अब वहां बच्चों की किलकारियां नहीं गूंजती , खंडहरों और खालीपन का एहसास अपनी चादर ओढ़े सोता रहता है और अपने अंतिम दिनों को गिन -गिन के पूरा करता है। ख़्वाबों की माला के मोती पिरोता रहता है कि कोई आएगा जो इस सन्नाटे को , डरावने खालीपन को तोड़ेगा। लेकिन कौन आएगा ? कब आएगा ? दुनिया की दौड़ में भागना स्वीकार है उसे , अपनी जड़ों को शायद वो अब कभी न लौटे और अगर वो नहीं लौटा तो उसके बच्चों को कौन लौटा के ला सकेगा ?

ये जो मैदान है , खूब हरा भरा है और हमने करीब दो घण्टे यहाँ गुजार दिए होंगे लेकिन हम मुसाफिर हैं। कहाँ रुक पाते हैं ! चलना ही होगा !! एक और छोटा सा पुल पार किया तो कुटी का स्वागत द्वार दिखा। इसमें से प्रवेश करते ही एक अलग और खूबसूरत दुनियां में प्रवेश कर जाते हैं। रास्ते के दोनों तरफ रंगीन ईंटों से बनी रेखाएं ध्यान आकर्षित करती हैं और इसके साथ ही प्रवेश द्वार के बिल्कुल पास लगे कुछ पत्थर हैं जिन पर कुछ नाम और अंक लिखे हुए हैं। अगर मैं गलत नहीं हूँ तो ये इस गाँव के निवासी उन वीर पुत्रों के नाम हैं जो किसी न किसी युद्ध में देश की खातिर शहीद होकर अपने आपको इतिहास के स्वर्ण अक्षरों में दर्ज करा चुके हैं।

सामने ही कुटी गाँव दिखने लगा है और बाएं तरफ एक पहाड़ी पर कोई बहुत पुरानी संरचना दिख रही है। ये जो पहाड़ी पर संरचना , खँडहर के रूप में दिख रही है ये पांडव किला है जिसे स्वयं पांडवों ने बनवाया था। कुटी गाँव का नाम भी तो पांडवों की माता "कुंती " से ही आया है जो कुंती से अपभ्रंश होते -होते कुटी हो गया। कुटी गाँव के निवासी अपने नाम के साथ "कुटियाल " लगाते हैं !! जोशी जी और कोठारी जी ने तो ऊपर चढ़ पाने में असमर्थता दिखा दी लेकिन मैंने जब से Anshul Rautela का ब्लॉग पढ़ा है तब से यहाँ जाने का मन था तो अब कैसे छोड़ सकता हूँ ये मौका। तो मैं और हरजिंदर चल दिए उस पहाड़ी पर चढ़ने और वहां खूब फोटोग्राफी की ।

पिछली पोस्ट में एक जगह आपको "ज़िप्पू " नाम के जानवर से परिचित कराया था मैंने , आज उसके फिर से दर्शन हुए और इस बार खेत जोतते हुए मिले ये महाराज। फाफड़ की खेती का समय था तो छोटे -छोटे खेतों में बुवाई का काम चल रहा था। फाफड़ ! वही जिसकी हमने कालापानी में रोटी खाई थी। हमारे मैदानी इलाकों में जैसे गेहूं की खेती होती है वहां फाफड़ होता है। दुनियां के सबसे सुन्दर गाँव में शामिल किये जा सकने वाले कुटी गाँव की दहलीज पर पैर रखना जैसे मेरे लिए एक सपने के सच होने जैसा था। कुटी , यूँ समुद्र तल से 3850 मीटर की ऊंचाई पर है और नबी गाँव 3200 मीटर की ऊंचाई पर।  गुंजी से कुटी लगभग 19 किलोमीटर है और गुंजी से नबी गाँव करीब 3 किलोमीटर।  आज क्यूंकि हम नबी गाँव से चले हैं तो कुटी तक की करीब 16 किलोमीटर की पैदल यात्रा रही जिसमें गुंजी से 12 किलोमीटर दूर "नम्फा " में ही कुछ खाने -पीने की व्यवस्था मिली।  नम्फा से कुटी सात किलोमीटर और आगे है। लेकिन 16 किलोमीटर की यात्रा में सच कहूं तो ज्यादा परेशानी नहीं आई।


अब बाकी की कहानी अगली पोस्ट में :

Plain and a Big Field before Kuti Village














Pandav Fort on the Hill
Kuti : A Beautiful Village named after Kunti , mother of Pandavas
Ruins of Pandav Fort on the Hill   ↑ ↓














Fafad : is like wheat which is used to make Roti

Have Reached "Kuti" Village



सोमवार, 10 सितंबर 2018

Adi Kailsh Yatra - Fifth Day ( Om Parvat to Nabi Village )

इस यात्रा वृतांत को शुरू से पढ़ने के लिए यहां क्लिक करिये  !!

नाभीढांग , कैलाश मानसरोवर जाने वाले यात्रियों के ठहरने का भारत में अंतिम "स्टॉप" है जहाँ से आगे यात्री लगभग नौ किलोमीटर दूर लिपुलेख दर्रा पार कर तिब्बत में प्रवेश कर जाते हैं। नाभीढांग पर कोई स्थाई निवासी नहीं है और न आईटीबीपी का स्थाई कैंप है। यहां यात्रा के समय में ITBP अपना कैंप बना लेती है और उनके साथ ही गुंजी के कुछ लोग भी आ जाते हैं और अपना "होटल " खोल लेते हैं। नाभीढांग में KMVN का गेस्ट हाउस भी है और फ़ोन की लैंडलाइन सुविधा भी उपलब्ध है हालाँकि कॉल रेट 6 रूपये प्रति मिनट है लेकिन सुविधा मिल रही है अपने घर बात करने की , ये ज्यादा मायने रखता है !


हम कल शाम को पांच बजे के आसपास नाभीढांग पहुँच गए थे और सीधे अशोक सिंह गुंज्याल के "दिव्यांश " छान में पहुँच गए। चार -पांच छान और भी हैं यानि रुकने -खाने की कोई दिक्कत नहीं। कोठारी जी , KMVN के रेस्ट हाउस में रुके थे क्यूंकि उन्हें "इंग्लिश टॉयलेट " की जरुरत पड़ती है। हरजिंदर तेज चलने वालों में और सबसे पहले पहुँचने वालों में हैं इसलिए जब तक मैं और जोशी जी पहुंचे , हरजिंदर भाई ठिकाना तलाश चुके थे और ठिकाना मात्र 150 Rs प्रति व्यक्ति प्रति दिन के हिसाब से था। इतना सस्ता और कहीं संभव है ? लेकिन चाय अलग होगी , मैगी अलग होगी। कोई नहीं , वो भी यहाँ कुछ कमाने के लिए ही बैठे हैं। गर्मागर्म चाय पीने के बाद भी अभी लग रहा था कि अभी आसपास की जगहों को देखने का पर्याप्त है तो निकल चले अपना कैमरा उठाये। यहां एक सीमा से आगे नहीं जा सकते और वो सीमा मंदिर के आसपास ही खत्म हो जाती है। मंदिर न ज्यादा बड़ा है न ज्यादा खूबसूरत लेकिन इसके बनने की कहानी रोचक है। एक बार कोई मंत्री जी हेलीकाप्टर से परिवार सहित मर्यादा भंग करते हुए ओम पर्वत के ऊपर से निकल रहे थे , हालाँकि पायलट ने उन्हें बताया था कि ओम पर्वत के बिल्कुल ऊपर से जाना सुरक्षित नहीं है क्यूंकि ऐसा करना धार्मिक मान्यता के भी विरुद्ध होगा और ओम पर्वत से निकलने वाली किरणें भी हेलीकाप्टर को नुक्सान पहुंचा सकती हैं लेकिन मंत्री जी को धुन सवार थी कि ओम पर्वत के बिल्कुल ऊपर से ही जाना है और जैसे ही वो ओम पर्वत के बिल्कुल ऊपर पहुंचे , हेलीकॉप्टर लड़खड़ाने लगा और नीचे गिर गया। सौभाग्य से मंत्री जी और उनका परिवार तो बच गया लेकिन हेलीकॉप्टर तहस -नहस हो गया। खुद के और परिवार के जिन्दा बच जाने का एहसान उन्होंने भगवान का मंदिर उसी जगह बनाकर उतारा जिस जगह उनका हेलीकाप्टर गिरा था। उस हेलीकाप्टर को भी आप उसी स्थिति में पड़ा हुआ यहां देख सकते हैं और हमारी तरह इस पर चढ़कर खूब फोटो खींच सकते हैं।

खाना खाने अशोक सिंह गुंज्याल के किचन में ही बैठ गए और बातें चलने लगीं। दोनों पति -पत्नी हंसमुख और मेहनती हैं जिनका बेटा दिव्यांश भी इन्हीं के साथ यहीं इस ऊंचाई पर रहता है। ये वो ऊंचाई है जहां अच्छे अच्छे तुर्रमखां आने से डरते हैं और बहुत से ऑक्सीजन की कमी की वजह से घरों से ही नहीं निकलते , यहां 4550 मीटर की ऊंचाई पर दिव्यांश अकेला ही बालक है और हर यात्री के साथ -साथ वहां पोस्टेड हर ITBP जवान का लाडला है। उसे देखकर ऐसा लगा जैसे हर जवान उसमें अपने बच्चों की शक्ल तलाश रहा हो , मुझे भी उस बच्चे को और उसकी शैतानियों को देखकर अपने दोनों बच्चों की याद आ गई थी। लेकिन इसकी शैतानियां मेरे बच्चों की शैतानियों से ज्यादा , बहुत ज्यादा थीं और शायद हिम्मत भी। हम जहाँ एक -एक पैर गिन गिन के उठाते वहीँ ये बच्चा दिव्यांश , बार -बार अपना रिक्शा नीचे से ऊपर ले जाता और वहां से खूब तेज स्पीड में नीचे लेकर आता। न थकान न जोश में कमी। बचपन की पूरी मस्ती। अशोक जी की पत्नी बहुत हसमुख और अच्छी महिला हैं , खाना बहुत टेस्टी बनाती हैं। मूल रूप से नेपाल की रहने वाली क्रांति खूब अच्छी हिंदी बोलती हैं और समझती हैं और उन्होंने दुकान में जरूरत का लगभग हर सामान लगाया हुआ है। फ़ोन और कैमरा चार्जिंग की सुविधा अभी तक हर जगह मिली है और यहां भी उपलब्ध है।

आज 16 जून है और साल 2018 चल रहा है। हम यहाँ नाभीढांग में हैं ओम पर्वत के दर्शन करने आये हैं और इस वक़्त हम तीन लोग , मैं , हरजिंदर सिंह और भरत जोशी जी , अशोक सिंह गुंज्याल के छान में इस इंतज़ार में रजाइयों में सिकुड़े पड़े हैं कि ओम पर्वत के ऊपर से बादल हटें तो हमें दर्शन का सौभाग्य मिल सके लेकिन आज शायद सूर्य देवता हमसे नाराज हैं। और हमसे ही क्या , नाभीढांग आये हुए आदि कैलाश के अन्य यात्रियों और कैलाश मानसरोवर यात्रियों से भी नाराज हैं इसीलिए आज पूरा दिन नजर नहीं आये। पूरा दिन बस रजाई में पड़े -पड़े ही गुजारना पड़ा। यहां आये हैं और ओम पर्वत के दर्शन के बिना वापस चले जाएँ ये संभव नहीं , हालाँकि मौसम विभाग ने 14 जून से 18 जून तक भारी बारिश की भविष्यवाणी की थी पूरे उत्तराखंड में लेकिन बारिश तो नहीं हुई हाँ आज बादल जरूर रहे। थोड़े से बादल हटते तो दूर नाग पर्वत के थोड़े से दर्शन हो जाते तो कभी पास में ही स्थित त्रिशूल पर्वत के दर्शन हो जाते। ये त्रिशूल पर्वत अलग है जिस पर त्रिशूल की शेप जैसी उभर आती है। इस दरम्यान कोठारी जी भी हमारे ही "आश्रम " में आ गए और उनके आने का बड़ा फायदा ये हुआ कि ताश के नए गेम "नाभि " का आविष्कार हो गया। ये गेम कुछ और था लेकिन इसके दूसरे रूप को हमने विकसित किया और यहां नाभीढांग में विकसित हुआ इसलिए कोठारी जी ने इसका नामकरण " नाभि " कर दिया और जैसा कि होता आया है , मैं ही इस गेम को हारा। बार -बार -लगातार ! लेकिन खेलने में जो मजा आया वो हार -जीत से ज्यादा था।

आज का दिन बस ताश खेलकर ही गुजरा। कभी -कभी समय ऐसे भी गुजरना चाहिए - न कोई मंजिल हो न कोई लक्ष्य हो -न कोई जिम्मेदारी हो -न कोई काम हो। बस खाओ पियो और पड़े रहो :) अजगर की तरह। शाम हुई तो कुछ और लोग हमारी वाली "खोली " में घुस आये। ये घोड़े -खच्चर वाले लोग थे जिन्होंने आते ही "चकती " निकाल ली और चकती खत्म करते -करते पहले उनमें कुछ तू -तू मैं -मैं हुई और फिर जो उन्होंने गढ़वाली या कुमायूंनी या नेपाली कोई गाना गाया। भाषा समझ नहीं आई लेकिन उनका जोश , उनके सुर ने दिल खुश कर दिया। रूमसेला ... रूमसेला .......ओ रूमसेला ऐसे कुछ बोल थे उनके। जिसमें रूमसेला का मतलब उन्होंने भगवान विष्णु बताया और ये गाना भगवान विष्णु को ही समर्पित था। जहां तक मेरा ब्लॉग पहुंचे तो प्लीज कोई बताइयेगा इस गाने के बारे में।

आज 17 जून है और हमें यहाँ नाभीढांग में दूसरा दिन है। सुबह अच्छी है लेकिन अभी भी सूरज पूरी तरह से बाहर नहीं आया। हम तो नल्ले हैं पड़े रहेंगे लेकिन आदि कैलाश के जो यात्री KMVN से आये हैं उन्हें आज वापस लौटना होगा और कैलाश मानसरोवर यात्री भी शायद सुबह चीन की तरफ प्रस्थान कर गए थे। भारी मन से हम उन्हें बिना ॐ पर्वत के दर्शन करते हुए जाकर देखते रहे लेकिन वो क्या कर सकते थे ? जाना ही था उन्हें वापस नीचे लेकिन हमारे पास अभी कुछ समय और बाकी था। हालाँकि हमें भी ओम पर्वत के बहुत अच्छे और स्पष्ट दर्शन नहीं हो पाए लेकिन ॐ का नीचे का हिस्सा कुछ दिखने लगा था और फिर बादल आ गए , इस बार और गहरे बादल थे जो उम्मीदों को तोड़ रहे थे। अब और ज्यादा यहाँ रुक पाना संभव नहीं था हमारे लिए तो चल पड़े राही अगली मंजिल की तरफ। और आज की मंजिल वापस गुंजी भी हो सकती है , नबी गाँव भी। कोई लक्ष्य तय नहीं किया था बस इतना था कि आज जहाँ तक पहुँच पाएं , पहुँच जाएंगे।

नाभीढांग से वापसी में उतराई थी और ज्यादा फोटो भी नहीं खींचने थे इसलिए कालापानी से नाभीढांग तक जाते हुए जहाँ हमें करीब छह घण्टे लगे थे उतरने में मुश्किल से तीन घण्टे लगे होंगे और जैसे ही हम कालापानी पहुँचने को थे सामने से आर्मी का ट्रक आता हुआ दिख गया जो यहां कालापानी से लौटकर जाएगा , ट्रक देखकर मेरी और हरजिंदर की चलने की स्पीड खुद ब खुद और तेज हो गई , हो भी जानी चाहिए थी ! थोड़ी देर में जोशी जी और कोठारी जी भी पहुँच गए और ट्रक में बैठे हुए तीन बजे से भी पहले हम वापस गुंजी पहुँच चुके थे। कोठारी जी ने अपना यहाँ छोड़ा हुआ बैग उठाया और विनीता के "रेस्टॉरेंट " में चाय -मैग्गी लेकर चल पड़े अगली मंजिल "नबी " गाँव की तरफ।
वसिष्ठकुम्भोद्भवगौतमार्य मुनीन्द्रदेवार्चितशेखराय।
चन्द्रार्कवैश्वानरलोचनाय तस्मै वकाराय नम: शिवायः ॥
वसिष्ठ, अगस्त्य, गौतम आदि श्रेष्ठ मुनीन्द्र वृन्दों से तथा देवताओं से जिनका मस्तक हमेशा पूजित है, और जो चन्द्र–सूर्य व अग्नि रूप तीन नेत्रों वाले हैं; ऐसे उस वकार स्वरूप शिव को मैं नमस्कार करता हूँ।
नबी गाँव , आदि कैलाश के रूट पर गुंजी से करीब तीन किलोमीटर दूर है। कभी -कभी गुंजी से सुबह के समय में कुटी जाने वाले ट्रक मिल जाते हैं लेकिन ये दोपहर बाद का समय था इसलिए इधर से गाडी मिलने की संभावना भी नहीं थी और हम भी पैदल जाने के ही इच्छुक थे। हम ट्रेक करने आये हैं ट्रक में बैठने या उसका इंतज़ार करने नहीं। हाँ सुविधा मिल जा रही है तो उसका कभी -कभी उपयोग कर ले रहे हैं लेकिन सच मानिये अगर आपको हिमालय के सूंदर दृश्य देखने हैं तो वो केवल पैदल चलकर ही मिलेंगे। गुंजी से नबी गाँव का तीन किलोमीटर का रास्ता घने जंगल से होकर गुजरता है और बेहद खूबसूरत लगता है।

नबी गाँव , छोटा गाँव है जहां के निवासी अपने नाम के साथ "नबियाल " लगाते हैं। जैसे ही गाँव में घुसे कुछ बच्चे क्रिकेट खेलते दिखे और सामने ही एक सज्जन मिल गए। ये एस . एस। नबियाल जी हैं जो गुंजी में स्टेट बैंक ऑफ़ इंडिया की शाखा में कार्यरत हैं लेकिन आज रविवार है इसलिए छुट्टी में हैं। इनका पूरा नाम हमें आदि कैलाश यानि ज्योलिंगकांग में पता चला - सुन्दर सिंह नबियाल !! नबी गाँव में रास्ते में ही खड़ी दो जिप्सी आपका ध्यान खींचती हैं , जहां रास्ते न हों वहां इनका क्या काम ? लेकिन कुछ जुनूनी लोग करीब 15 -16 साल पहले इन जिप्सियों को Disassemble करके ले गए थे और वहां जाकर Assemble कर लिया था। हालाँकि आज की तारीख़ में ये बस दिखाने भर के लिए हैं। नबी गाँव में बढ़िया गेस्ट हाउस ले लिया है जहाँ साफ़ सुथरे गद्दे और रजाई पड़े हैं। गर्म पानी भी मिलेगा तो नहा भी लेते हैं , जब तक हम नहा रहे हैं घर वालों के यहाँ कोई पूजा चल रही है। आपको इस क्षेत्र में कहीं पेड़ की टहनियां , कहीं सूखे पेड़ घर के बाहर लगे मिलेंगे जिन पर कपड़ों की झंडियां लगी होती हैं। ये लोग इसे बहुत पवित्र मानते हैं और ऐसा विश्वास करते हैं कि इस सब से बुरी आत्माएं घर के अंदर प्रवेश नहीं कर पातीं। नाबी गाँव के दूसरी तरफ एक बहुत , मतलब सच में ही बहुत खूबसूरत गाँव हैं रेकोंग लेकिन शाम हो चली है अँधेरा भी घिर आया है इसलिए उसकी बढ़िया पिक्चर नहीं आ सकीं , कल यानी अगली पोस्ट में जरूर आएँगी क्योंकि तब तक दिन निकल चुका होगा लेकिन फिर भी इस वक्त दूसरी दिशा में "अपि पर्वत " श्रंखला शानदार नजर आ रही है और शायद नबी गाँव इस पर्वत को देखने का सबसे बढ़िया पॉइंट होगा !! 





















हम जिस दिन शाम को पहुंचे तो ॐ पर्वत पर बादल थे और अगले दो दिन तक बादल बने रहे जिससे हमें दर्शन नहीं हो  पाए लेकिन किसी ने हमें फोटो जरूर उपलब्ध करा दिए !






गुंजी गाँव जैसा और जितना देख पाए




नबी गाँव की ओर.......
नबी गाँव की ओर बढ़ते हुए दो सैलानी






नबी गाँव

ये जिप्सी .....इतनी दूर.... कौतुहल पैदा करती हैं

अपि पर्वत ? सही नाम लिया न मैंने

आज रात का ठिकाना


                                                                                    जल्दी ही मिलेंगे: