गुरुवार, 12 मई 2022

Kakbhushundi Trek Uttarakhand Blog : Day 5 From Shila Samudra to Kagbhushundi to Bramghat

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आज एक बुरे दिन के बाद की सुबह थी , एक आशा भरी सुबह थी उत्साह उतना नहीं रह गया था लेकिन जाना तो था ही और ये उत्साह भी थ्री इडियट के रस्तोगी के मोटर की तरह धीरे धीरे गति पकड़ रहा था।  नाश्ता कर के करीब 8 बजे , सामने दिख रहे green spot की तरफ चढ़ना शुरू कर चुके थे।  कुछ मित्र कल यहाँ तक पहुँच चुके थे और उन्हें यहाँ एक पीले रंग का झण्डा सा दिखाई दिया था वो वास्तव में कोई झण्डा नहीं बल्कि पीले रंग की प्लास्टिक की एक छोटी बोरी (हमारे यहाँ बोरा बोलते हैं ) थी जिसे संकेत के रूप में यहाँ टांग दिया था।  जिसने भी ये किया होगा वो बहुत भला इंसान रहा होगा जिसने दूसरे लोगों का ख्याल रखा हम लेकिन इस झंडे के दूर से ही ऊपर की तरफ चढ़ते गए क्यूंकि सीधा चढ़ना थोड़ा मुश्किल जरूर था लेकिन रास्ता छोटा था और अभी सुबह थी, एनर्जी बनी हुई थी तो झंडे के पास वाला रास्ता न लेकर सीधा चढ़ना तय किया। झण्डे के पास से जाने के लिए हमें अर्ध वृताकार (Semi Circle) रास्ता लेना पड़ता और अभी हम उसके बीच से गुजर रहे थे।  सामने ग्रीन स्पॉट पर पहुंचकर ऊंचाई से उस जगह को आखिरी बार देखा जहाँ हम रात रुके थे तो आँखें थोड़ी सी नम हुईं , कल रात बहुत बुरी गुजरी लेकिन अंततः गुजर गई।  ध्यान रखिये , इस रास्ते पर भी कोई डांवर रोड नहीं बनी है बल्कि पूरा रास्ता बड़े बड़े पत्थरों से भरा हुआ है।  

 
 
 
जैसे ही आप इस ग्रीन स्पॉट के दूसरी तरफ उतरते हैं आपको इधर-उधर उगे हुए सैकड़ों या शायद हजारों ब्रह्मकमल के फूल दिखाई  देने लगेंगे। लगभग दो घण्टे चलने के बाद एक ग्लेशियर दिखा देने लगेगा, आप इसे स्किप नहीं कर सकते। करना भी चाहेंगे तो आपको कम से कम चार-पांच घण्टे एक्स्ट्रा चलना पड़ सकता है और रास्ता भी उधर कोई आसान ही होगा, ऐसा सोचना भी मुश्किल था इसलिए बेहतर था कि थोड़ा रिस्क लेकर ग्लेशियर को ही पार किया जाए।  लेकिन ट्रैकिंग इतनी ही आसान होती तो फिर मजा ही क्या रहता इसमें ! ग्लेशियर की तरफ कदम बढ़ाते हुए चल ही रहे थे कि बारिश शुरू हो गई।  डॉक्टर साब (अजय त्यागी जी ) ने पहला कदम रखा , फिर सुशील भाई और उनके बाद त्रिपाठी जी , मुझे सबसे पीछे ही चलना था।  एक-एक कदम गिन गिनकर चलते हुए अंततः हमने ग्लेशियर क्रॉस कर ही दिया और सामने था - 5000 मीटर ऊंचा कांकुल पास(Kankul Pass) ! ये इस ट्रेक का सबसे ऊँचा पॉइंट था और हमारे लिए एक उपलब्धि। हमारे कुछ मित्र तथा गाइड और पॉर्टर पहले ही वहां पहुँच चुके थे। हमारे पहुँचते ही एक "सेलिब्रेशन" शुरू हुआ यहाँ , इस पॉइंट तक , highest point तक पहुँचने का जश्न मनाया और जश्न कैसे मनाया ? सिगरेट का एक एक लम्बा कश लेकर हमने अपनी इस उपलब्धि को celebrate किया।  लगभग आधा घण्टा यहाँ बिताकर अब धीरे-धीरे नीचे उतरने की बारी थी
 
 
 
 

 
 
कांकुल पास  (Kankul Pass)

 कांकुल पास पर कुछ पत्थरों को एक के ऊपर एक लगा के कभी कोई झण्डी लगाई गई होगी लेकिन अब वहां पत्थर तो हैं झण्डी नहीं बची।  हाँ , एक पत्थर पर 2015 जरूर लिखा है। कांकुल पास पर बर्फ नहीं थी लेकिन उतरते वक्त ढलान अच्छा खासा था।  पहाड़ पर सिर्फ चढ़ना ही कठिन नहीं होता, उतरना भी उतना ही खतरनाक और परेशानी भरा होता है। मुश्किल से 15-20 मिनट ही उतरे होंगे कि आगे-आगे चल रहे पंकज भाई (पंकज मेहता जी) को एक विचित्र पुष्प दिखाई दिया जो पत्थरों के बीच छोटा सा, खरगोश के बच्चे जैसा छुपा हुआ था।  एकदम श्वेत , रुई जैसा जिस पर ब्राउन कलर के तंतु लगे हैं। अहा  ! अलौकिक, अद्भुत और दुर्लभ पुष्प जो सिर्फ हिमालय की ऊंचाइयों में ही पाया जाता है लगभग 4200 मीटर की ऊंचाई के बाद। हम सौभाग्यशाली हैं इस मामले में , हमें आज इस पुष्प के दर्शन का लाभ मिल गया। इसे फेन कमल बोलते हैं .....नहीं-हम तोड़ेंगे नहीं इसे ! उखाड़ेंगे भी नहीं।  ये जहाँ हैं वहीँ रहेगा और आगे आने वाले मित्रों को भी यूँ ही दर्शन देता रहेगा।  प्राकृतिक है , प्राकृतिक अवस्था में ही रहेगा !!  इस वक्त करीब दोपहर के 12 बजे थे। 

यहाँ अब आपको थोड़ी दूर तक रास्ता दिखाई देता है। पत्थरों को मिलाकर, सही तरीके से रखकर एक निशान बनाने की कोशिश की है जिससे लोग रास्ता भटकें।  दो घण्टे के आसपास तक यूँ ही पत्थरों के ऊपर चलते रहे। कांकुल पास से उतरने के बाद कोई भी पहाड़ पर नहीं चढ़ना पड़ा था, हाँ पत्थरों के बीच से लगातार चलते रहे। लगभग ढाई बजा होगा जब हमें दूर से पवित्र काकभुशुण्डि ताल के दर्शन हुए। बारिश अपने आने की सूचना प्रेषित कर रही थी मगर इस बूंदाबांदी में एक खुशखबरी आई कि यहाँ बीएसएनएल और जिओ के सिग्नल आ रहे हैं।  बहुत अच्छी तो नहीं लेकिन हाँ , कट कट के बात हो जा रही थी। मैंने भी पॉर्टर के फ़ोन से घर बच्चों से बात कर अपनी कुशलता और यहाँ पहुँचने की सुचना उन्हें दे दी।  बात करते हुए थोड़ा मैं भी भावुक हो गया और बच्चे भी क्यूंकि ये मेरा एक सपना था और इतनी मुश्किलों के बाद जब आपका सपना पूरा होता है तो भावुक हो जाना स्वाभाविक है।  ट्रैकिंग मेरे लिए सिर्फ घुमक्कड़ी नहीं , मेरा जीवन है। 
 
 
कभी त्रिकोण तो कभी पांच कौण ! अलग तरह की शेप है काकभुशुण्डि लेक की।  लेकिन लम्बी है और जल एकदम हरीतिमा लिए हुए। आखिरी बिंदु से फोटो और वीडियो लेते हुए इसके बराबर  से चलते हुए हमें वहां पहुंचना था जहाँ पवित्र झण्डियां लगी हुई थीं।  ऊपर की तरफ एक छोटा सा मंदिर बना है और उसके पास खिले हुए थे सैकड़ों ब्रह्मकमल।  हम ब्रह्मकमल के मोहपांश में फंस गए और फोटो खींचते रहे /वीडियो बनाते रहे और इतने में इन्द्र देवता की नींद टूटी ! झड़ झड़ बारिश होने लगी थी।  हमें बारिश से तो कोई परेशानी नहीं थी लेकिन बस इतना हुआ कि हम इस पवित्र कुण्ड में स्नान करना चाहते थे , नहीं कर पाए।  मैं अब तक जहाँ गया हूँ -चाहे सतोपंथ ताल हो , नन्दीकुंड हो , आदि कैलाश में पार्वती कुण्ड हो , मैं स्नान जरूर करता हूँ लेकिन यहाँ बारिश ने हमें इस स्नान से वंचित कर दिया।    
  
 
        अंजुली भर के अर्घ्य दिया और पूजा संपन्न की। अगरबत्ती थोड़ी दूरी पर जलाई जिससे इस पवित्र और सुन्दर लेक के जल में कोई अशुद्धि न मिलने पाए।  कुलवंत भाई और त्रिपाठी जी ने भी खूब फोटो खिचवाए।  त्रिपाठी जी यहाँ एक रात रुकना चाहते थे लेकिन हम पहले ही एक दिन की देरी से चल रहे थे और आज अभी आगे बढ़ने का समय भी था तो थोड़ी डिस्कशन के बाद आगे कहीं टैण्ट लगना तय हुआ।  क्षमा चाहता हूँ त्रिपाठी जी ! 

हम अपने डेस्टिनेशन पर पहुँच चुके थे।  एक सपना पूरा हो रहा था जिसके लिए राजीव कुमार जी ने जिज्ञासा पैदा की और पंकज मेहता, हरजिंदर सिंह जैसे मित्रों ने उसे पंख लगाए।  हम सब सकुशल, सुरक्षित काकभुशुण्डि ताल पहुँच चुके थे ! मन आल्हादित था , आत्मा तृप्त थी , पैर कीर्तन करने लगे थे ...होठों पर शिव शिव का उच्चारण था और आसमान में बादल हमारे यहाँ पहुँचने की ख़ुशी में ...हमारे साथ खुलकर हमारे साथ गुनगुना रहे थे ..जाप कर रहे थे
ॐ नमः शिवाय
ॐ नमः शिवाय 
 
काकभुशुण्डि ताल से ऊपर की तरफ चढ़ना भयंकर कठिन था।  सीधे चढ़ाई , नीचे नाला और पत्थर और पहाड़ी की चढ़ाई में फिसलन ! बहुत डर लगा मुझे यहाँ क्यूंकि अगर हाथ छूट जाता तो जिंदगी का ही साथ छूट जाता।  
ज्यादातर लोग यहाँ आकर फिर जिस रास्ते से हम यहाँ पहुंचे उसी रास्ते से वापस लौट आते हैं।  मनीष भाई (मनीष नेगी ) का वीडियो भी यहीं तक का था।  हमारी असली परीक्षा अब शुरू होनी थी।  परीक्षा इसलिए क्यूंकि हमें इसी रास्ते पर वापस नहीं लौटना था बल्कि पूरा सर्किट कम्पलीट करते हुए पैंका गाँव (विष्णुप्रयाग) की तरफ से उतरना था।  इस रास्ते का न कोई वीडियो उपलब्ध था न कोई ब्लॉग किसी भाषा में।  असली रोमांच, असली डर , असली परीक्षा अब शुरू हो रही थी।  कोई अंदाजा नहीं था हमें कि रास्ता कैसा है , कितना कठिन है लेकिन जब भगवान आशुतोष ने हमें यहाँ तक पहुंचा दिया तो भरोसा था कि आगे भी सकुशल पहुँच जाएंगे।  

 
दूसरी दिशा में ऊपर जाने पर पत्थरों को जोड़कर और पहाड़ काटकर पगडण्डी बनी हुई दिखने लगी।  इसका मतलब लोग इस रास्ते से भी आते जाते तो हैं पैंका गाँव वाले लेकिन उन्होंने कोई वीडियो अपलोड नहीं किया है।  काकभुशुण्डि ताल से लौटते हुए मुश्किल से आधा किलोमीटर ही चले होंगे कि भरापूरा ब्रह्मकमल का जंगल मिल गया।  अब तक का सबसे घना ब्रह्मकमल का जंगल जैसे किसी ने बड़े करीने से सजाए हों , एक एक ब्रह्मकमल अपने नैसर्गिक रूप में हमें हमारे यहाँ तक पहुँचने की न केवल बधाई दे रहा है, हमारा अभिनन्दन करना चाहता है।  हम भी खुश हैं , हमसे ज्यादा ये ब्रह्मकमल खुश हैं ! ये हर्षित हैं और आज का दिन इनके लिए भी बहुत बड़ा दिन है कि कोई है जो इन्हें देखने , इनकी शोभा की प्रशंसा करने वाला कोई तो आया है।  स्त्री अगर श्रृंगार करे और श्रृंगार की तारीफ करने वाला कोई न हो तो उसका श्रृंगार करना व्यर्थ चला जाता है बिलकुल उसी तरह आज ब्रह्मकाल की सुंदरता की तारीफ हमारे मन से स्वतः स्फुटित हो रही है।  

 
अब हम बरमाई पास की तरफ चल रहे हैं।  सितम्बर का महीना है और वनस्पति अपने यौवन के रंग बिखेर रही है।  अद्भुत और अविश्वसनीय खूबसूरती देख पा रहा हूँ मैं प्रकृति की।  इतना सुन्दर लैंडस्केप है , मैं बैठा रहता हूँ और सब आँखों से ओझल हो जाते हैं।  हर तरह के रंग हैं इस प्रकृति की अनमोल चादर में।  मैं फूलों को नहीं पहचानता , उनका नाम नहीं जानता लेकिन प्रकृति से बात करने के लिए उसे किसी सम्बोधन की जरुरत थोड़े ही होती है ? बस आँखों से आँखों की भाषा पढ़नी आनी चाहिए हमें। अब तक इतना सुन्दर प्राकृतिक सौंदर्य कभी नहीं देखा , श्रीखण्ड में भी नहीं।  

 
 
अधिकांश रास्ता उतराई वाला है। बीच में एक बहुत ऊंचाई से आती वाटर स्ट्रीम को पार करना थोड़ा कठिन रहा बाकी रास्ता आसान ही था।  कई प्रकार के फूलों से परिचय प्राप्त करने की कोशिश की लेकिन वो काँटा मार के भाग गए! पांच बजने को थे या शायद उससे भी ज्यादा। ऊपर से खुले-बड़े मैदान में बैठे हुए मित्रगण और अपने टैण्ट दिखाई देने लगे थे।  आज का ठिकाना यही था हम बंजारों का -ब्रह्मघाट ! यही था उस जगह का नाम जहाँ हमने अपने टैण्ट लगाए उस दिन।  

 
 सात नहीं बजे होंगे अभी शाम के लेकिन ठण्ड भयंकर थी।  हम में से कुछ टैंट में घुसे थे , कुछ चाय पी रहे थे किचन टैंट के पास और डॉक्टर साब इधर-उधर टहल रहे थे।  आए तो हाथ धोए और हाथ धोने के बाद जब पानी छिटकाया तो उनकी ऊँगली में पड़ी सोने की रिंग भी छिटक गई लेकिन ये बात उन्हें 15 -20 मिनट बाद पता चली।  अब अँधेरे में टोर्च लगा लगा के -रिंग खोजो अभियान शुरू हुआ।  रिंग मिलना जरुरी था क्यूंकि एक तो वो बहुत महँगी और दूसरी नीलम जी ( डॉक्टर साब की मिसेस ) की दी हुई रिंग थी वो ! इतनी ठण्ड में आदमी कितना पसीना-पसीना हो सकता है ये देखने का था उस वक्त।  हम तो सोचते थे हम ही बीबी से डरते हैं यहाँ तो डॉक्टर लोग भी खौफ खाए हुए थे !! थोड़ी सर्चिंग , थोड़ी मेहनत से आखिरकार रिंग मिल गई नहीं ।  भगवान का बहुत-बहुत धन्यवाद ! 
 
 
और धन्यवाद आप सभी  मित्रों का !

फिर मिलेंगे अगले दिन का वृतांत लेकर 





 

गुरुवार, 3 मार्च 2022

Kakbhushundi Trek Uttarakhand Blog : Day 4 From Machhali Tal to Shila Samudra

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आज हमारा काकभुशुण्डि ट्रैक पर चौथा दिन था और सुबह एकदम शानदार थी।  मौसम भी अच्छा दिख रहा था हालाँकि हाथी पर्वत अब भी बादलों में मुंह दबाये हुए था मगर मछली ताल की हमारी Campsite और आसपास एकदम खिली लेकिन ठण्ड से भरी हुई धूप महसूस हो रही थी।  आज 8 सितम्बर 2021 है।  


सुबह नाश्ते में रोटी -चाय लेकर करीब आठ बजे हमने काकभुशुण्डि ताल के लिए प्रस्थान कर दिया।  मछली ताल जैसी खूबसूरत जगह को छोड़ना आसान नहीं था लेकिन हम ट्रैक में थे , आगे बढ़ना ही होता है।  अपनी कैंप साइट से ऊपर की तरफ चल निकले और दो घण्टे चलते रहे।  आज का अपना लक्ष्य " काकभुशुण्डि ताल"  ज्यादा दूर नहीं था , सिर्फ 5 किलोमीटर की दूरी बताई गई थी।  



हम आज पहली बार बर्फ पर चल रहे थे।  सितम्बर में इतनी बर्फ है तो जून में क्या हाल होता होगा ? लेकिन करने वाले करते हैं और एक महिला ने ( जो अब करीब 70 वर्ष की हैं ) मुझे , मेरा वीडियो देखकर मैसेज किया था कि उन्होंने ये ट्रेक 1983 में किया था और वो भी जून में ! उनकी हिम्मत , हौसला और जज्बा मुझसे 100 गुणा ज्यादा रहा होगा क्यूंकि तब न फेसबुक था , न कोई और सोशल मीडिया माध्यम लेकिन उन्होंने किया भी और सफलता भी हासिल की।  प्रणाम करता हूँ उन्हें और उनके जोश को !! 


थोड़ी ही देर चले थे कि फेन कमल दिख गया।  मुझे तो पहचान नहीं थी  लेकिन आगे-आगे चल रहे पंकज भाई को पत्थरों के बीच में से झांकता फेन कमल दिखाई दे गया , और उन्हें दिख गया तो मतलब हमें भी दिख गया।  
फेन कमल जिसे अंग्रेजी में Saussurea Simpsoniana बोलते हैं , हिमालयी क्षेत्र में 4000 से 5600 मीटर तक की ऊंचाई पर जुलाई से सितंबर के मध्य खिलता है। इसका पौधा छह से 15 सेमी तक ऊंचा होता है और फूल प्राकृतिक ऊन की भांति तंतुओं से ढका रहता है। फेन कमल बैंगनी रंग का होता है।भगवान शिव का अनेक अनेक धन्यवाद जिन्होंने हमारे ऊपर यहाँ तक पहुँचने की कृपा बनाये रखी !!


पहाड़ों में बारिश का कोई समय नहीं होता ! अभी मुश्किल से 11 ही बजे होंगे कि झमाझम बारिश आने लगी।  हमें बर्फ पर पहला कदम रखना था , और जैसा कि अक्सर होता था इस ट्रैक में - मैं , त्रिपाठी जी और डॉक्टर अजय त्यागी सबसे पीछे रह जाने वालों में होते थे , अब भी वही थे लेकिन इस बार तीन नहीं चार थे।  चौथे सुशील भाई थे जो आज बहुत तकलीफ महसूस कर रहे थे।  बर्फ से जमे ग्लेशियर पर चलना बहुत मुश्किल नहीं होता लेकिन उस पर पहला कदम रखते हुए पैर काँप जाते हैं।  ऊपर से बारिश !  डॉक्टर साब ने हिम्मत दिखाई -वैसे भी वो हम सब में सबसे यंग हैं :) बारिश ने बर्फ को और भी रपटीला बना दिया था।  बाकी सब लोग आगे निकल चुके थे ग्लेशियर को पार कर के लेकिन हम पहला कदम बढ़ाते हुए कांप रहे थे और आसपास देखता तो और भी कंपकंपी छूट जा रही थी , सब जगह बर्फ ही बर्फ ! 


कुछ लोगों ने हमे देखा दूसरी तरफ से तो हमारी हालत पर तरस  आया उन्हें और उनमे से तीन चार लोग हमारी तरफ आ गए।  दो लोग डॉक्टर साब को सपोर्ट देकर ग्लेशियर के दूसरी तरफ ले गए , एक त्रिपाठी जी को और दो लोगों ने सुशील भाई को एस्कॉर्ट किया।  मैं रह गया !! असल में मुझे ट्रैकिंग में चलते हुए किसी का सपोर्ट लेकर चलने में मुश्किल होती है तो मैंने बस अपना बैग पीठ से उतारकर उन्हें दे दिया और मैं मस्त बारिश में ग्लेशियर के ऊपर अपनी ट्रैकिंग स्टिक लेकर मजे से चलता रहा।  


आगे एक गली पार करके एक... और ग्लेशियर पार कर के हमें सीधे काकभुशुण्डि ताल पहुँच जाना था।  हमारे गाइड की प्लानिंग ये थी कि गली में से निकलकर हम ग्लेशियर पर फिसलते हुए काकभुशुण्डि ताल के पास पहुँच जाएंगे , इससे समय भी बचेगा और हमें ज्यादा चलना भी नहीं पड़ेगा।  लेकिन !! उधर वाला ग्लेशियर टूटा हुआ था .. अगर हम उस पर से होकर जाने की कोशिश करते तो किसी के भी साथ कोई भी दुर्घटना हो सकती थी।  हमें लौटना पड़ा और इसने हमारे दिलों में खौफ भर दिया।  हम इतनी मुश्किल से इस ऊंचाई पर पहुँच पाए थे मगर यहाँ पहुंचकर पता लगा कि आगे रास्ता ही नहीं है।  हिमालय में खो जाने में देर नहीं लगती !! हिमालय जितना सुन्दर है , सुन्दर दीखता है उसी में खो जाने या रास्ता भटक जाने पर ये उतना ही खतरनाक भी हो जाता है।  हम अंदर से पसीने से सराबोर थे , ऊपर से बारिश ने भिगोया हुआ था और धड़कनों में खौफ तारी था।  खौफ खुद के खो जाने का , रास्ता भटक जाने का लेकिन पूरी टीम साथ थी , खाना था , राशन था इसलिए थोड़ी तसल्ली भी थी कि चलो ! अगर रास्ता न भी मिला तो वापस मछली ताल चले जाएंगे।  हमारे गाइड साब को आज हमने पहली बार कुछ परेशान सा देखा।  वो दो -तीन पॉर्टर को साथ लेकर एक -डेढ़ घण्टे तक छोटी -छोटी पहाड़ियों पर चढ़कर आसपास नजरें मारकर रास्ता ढूंढते रहे और अंततः हम फिर से एक  बजे के आसपास आगे  चल पड़े।  चल तो रहे थे लेकिन मन में उत्साह नहीं था और रास्ते भी चलने वाले नहीं लग रहे थे।  खतरनाक से भी खतरनाक , बड़े -बड़े पत्थर और उनमे से निकलते हुए जाना ऐसा लग रहा था जैसे हम पृथ्वी पर नहीं बल्कि किसी और ग्रह पर चल रहे हैं।  


कुछ लोग आगे थे मगर बारिश की वजह से एक गुफा में छुपे हुए थे।  हम पहुंचे तो हम भी उनके पास बैठ गए।  गुफा क्या थी ! बस सिर के ऊपर एक लंबा सा पत्थर निकला हुआ था जो हमें जैसे -तैसे भीगने से बचाये हुए था।  तीन -साढ़े  तीन बज रहे होंगे जब बारिश रुकी।  कुछ लोग आगे जाना चाहते थे और कुछ आज यहीं आसपास रुकना चाहते थे।  पास में ही एक कैंपिंग साइट दिखाई दे रही थी जहाँ टैण्ट लगाए जा सकते थे।  पंकज भाई और उनके मित्रों की सलाह थी कि आज हम बहुत कम चल पाए हैं , ऐसे ही चलते रहेंगे तो 5 -6  दिन का ये ट्रेक 10 दिन में पूरा हो पाएगा।  ये बात सही थी कि हम आज बहुत कम चल पाए थे , मुश्किल से 4 किलोमीटर की दूरी ही तय कर पाए होंगे लेकिन हम भीग बहुत गए थे और मानसिक रूप से भी टूट गए थे इसलिए अंततः वहीँ पास में टैण्ट लगा दिए।  जहाँ हमने टैण्ट लगाए उस जगह को - शिला समुद्र कह रहे थे गाइड और पॉर्टर लेकिन पंकज क्यूंकि खुद गढ़वाली हैं , उन्होंने कहा कि जहाँ आसपास बड़े -बड़े पत्थर दिखाई देते हैं और बीच में कोई Campsite होती है तो उस जगह को "शिला समुद्र " कह दिया जाता है।  


खैर ! हम शिला समुद्र पर अपना टैण्ट लगा चुके थे और धीरे -धीरे हमारा चौथा दिन समाप्ति की ओर बढ़ रहा था।  बारिश ने बस इतनी ही मोहलत प्रदान की थी कि हम अपने टैण्ट लगा पाएं और जैसे ही हम टैण्ट लगाकर उसमें घुसे , बारिश ने फिर अपना प्रदर्शन शुरू कर दिया।  पांच बजे खिलखिलाती रौशनी फिर से हमें ऊर्जा देने आई थी मगर रात में 9 -9 :30 बजे जो बारिश शुरू हुई उसने सुबह चार बजे तक हमारी घण्टी बजाए रखी ! 


एक गड़बड़ हो गई ! गड़बड़ ये हुई कि मैंने अपनी कैप टैंट के बाहर ही अपनी trekking Stick पर सूखने के लिए लटका दी थी लेकिन रातभर की बारिश ने उसे पूरी तरह से भिगो डाला ! मुझे पता था कि मेरी कैप भीग रही है लेकिन शरीर में इतनी जान नहीं बची थी कि टैण्ट से बाहर जाकर अपनी कैप को बचा पाता ! मेरी कैप बीमार पड़ गई तो मुझे सुशील भाई की कैप का सहारा लेना पड़ा।  

कल अपने लक्ष्य यानी काकभुशुण्डि ताल की तरह चलेंगे ! तब तक साथ बने रहिये .....

बुधवार, 12 जनवरी 2022

Kakbhushundi Trek Uttarakhand Blog : Day 3 From Raj Kharak to Machhli Tal

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कल शाम हम राजखरक से करीब दो किलोमीटर पहले ही रुक गए थे , अब आगे निकलते हैं ! आज 7 सितम्बर है और 2021 वां वर्ष चल रहा है।  


आज सुबह का स्वागत बारिश ने किया हमारा और हम टैण्ट में पड़े -पड़े इसके खत्म होने के इंतज़ार करते रहे।  दस बजे के आसपास बारिश बंद हुई तो नाश्ता -पानी लेकर करीब पौने बारह बजे अपने बैग कंधे पर उठाये और अगली मंजिल की तरफ पांवों को बढ़ने दिया।  रास्ता एकदम स्पष्ट है और यहाँ अब आपको Treeline नहीं मिलेगी।  छोटी -छोटी झाड़ियाँ नजर आएँगी।  करीब आधा घण्टा चलने के बाद एक खड़ा -पीला पत्थर दिखाई देगा।  ये एकदम हेमकुण्ड का Back है लेकिन यहाँ से हेमकुण्ड जाने का कोई रास्ता नहीं है , इसलिए कोशिश भी मत करियेगा उधर निकलने की।  हिमालय में खो सकते हैं इसलिए यहाँ खो -खो मत खेलिए और बने हुए रास्तों पर चलते जाइये। अगर रास्ता नहीं मिल रहा तो अपने मित्रों का इंतज़ार करिये , गाइड का इंतज़ार करिये अन्यथा जहाँ आप भूगोल नापने आये हैं , आप इतिहास बन जाएंगे।  





राजखरक एक मैदान सा है जिसके निचले भाग में काकभुशुण्डि नदी अपने हल्के हल्के वेग में शांत रूप में बहती हुई मिलती है और ऊपर एक मंदिर में लगी हुई झण्डी भी लहराती हुई दिखेगी।  वन विभाग ने पत्थरों को जोड़कर बेहतरीन रास्ता बनाया है यहाँ।  हाँ , बीच में छोटी -छोटी जलधाराएं मिलती रहेंगी लेकिन आसान है इन्हें  क्रॉस करना।।। इसलिए अभी तक तो एकदम मजा  आ रहा है चलते -चलते।  बाएं हाथ पर हेमकुंड साहिब  के बैक वाले पहाड़ हैं तो दूसरी तरफ एकदम हरियाली से लबालब पर्वत श्रृंखला जिनके नीचे काकभुशुण्डि नदी बह रही है।  




राजखडक़ पार करते -करते डेढ़ बज गया।  जैसे ही इसे पार किया सामने एक ऐसी जगह आई जो एकदम सफ़ेद है , बर्फ से नहीं , पहाड़ी कंक्रीट और बजरी से।  इसपर कई तरफ से जलधाराएं बहकर आई हुई दिखती हैं जिससे ऐसा लगता है जैसे गाड़ियां ऊपर की तरफ गई हों और उनके पहियों के निशान यहाँ बन गए हों , लेकिन नहीं ! ये डांग खड़क है शायद !  हमें इस रास्ते पर ऊपर की तरफ नहीं जाना बल्कि राजखड़क खत्म होने के बाद जो जलधारा दिख रही है उसे पार कर के इस जलधारा के बहाव के साथ ही चलना होगा थोड़ी दूर तक।  मैं फिर से लिख रहा हूँ इस बात को -राजखडक तक हम काकभुशुण्डि नदी के प्रवाह के विपरीत चलते हैं और फिर इस नदी को क्रॉस कर के कुछ दूर तक इसके प्रवाह के साथ -साथ चलते हैं तब तक , जब तक कि ये नदी राजखरक के पास से Turn नहीं लेती और जहाँ से नदी राजखडक और सिमरटोली की तरफ मुड़ती है , वहां से हमें ऊपर की तरफ चढ़ते जाना है।  





यहाँ से ऊपर की तरफ जब आप चलते जाते हैं तो नदी में गिरती हुई एक भयंकर जलधारा मिलेगी।  ये जलधारा ही वास्तव में काकभुशुण्डि नदी है जो नीचे की तरफ बह रही है और नीचे जाकर राजखडक के पास , डांग खड़क से निकली जलधारा इसमें आकर मिल जाती है।  वही जलधारा जिसे हम अभी क्रॉस करके आये हैं।  यहाँ काकभुशुण्डि  का वेग और इसके गिरने की आवाज भयंकर हैं और दिलों में खौफ ला देती हैं।  हम पांच लोग इसके किनारे पर खड़े हैं ये सोचने के लिए कि ये जलधारा हमें पार तो नहीं करनी ? ऊपर कुछ दूर हमारे और मित्र बैठे हैं लेकिन उनकी नजर अभी तक हमारे ऊपर नहीं पड़ी है।  पीछे से गाइड और कुछ पॉर्टर आ गए हैं और उनके निर्देशानुसार हमें इस जलधारा को पार नहीं करना है।  इसी किनारे ऊपर की ओर चढते जाना है।  कठिन चढ़ाई है लेकिन रिस्क नहीं है इसलिए फोटोग्राफी करते -करते आराम से चलते जा रहे हैं।  इसके चक्कर में गाइड और हमसे पहले ऊपर की पहाड़ी पर पहुंचे मित्र अब हमारी आँखों से ओझल हो गए हैं , लेकिन चिंता वाली कोई बात नहीं।  रास्ता नहीं है लेकिन दाएं हाथ पर वही जलधारा है और बाएं हाथ पर पहाड़ी है इसलिए रास्ता यही है।  




कुछ बड़े प्यारे और रंग -बिरंगे फूल दिख रहे हैं बीच बीच में और भेड़ -बकरियों का मल भी दिख जाता है कहीं -कहीं।  इसका मतलब गडरिये अपनी भेड़ -बकरियों को यहाँ तक ले आते हैं चराने के लिए और इस बात से ये भी प्रमाणित होता है कि हम सही रास्ते पर आगे बढ़ रहे हैं।  अब ये नदी रुपी जलधारा को पार करना होगा लेकिन अब इसे पार करना थोड़ा आसान होगा क्यूंकि चौड़ाई कम हो गई है हालाँकि वेग भयंकर है।  गाइड और दो पॉर्टर सामने खड़े हैं -जैसे ही कुछ ऊंच नीच होती है तो तुरंत हाथ पकड़ के खींचा जा सके।  मैं सुरक्षित क्रॉस कर गया लेकिन जूतों में पानी पहुँच गया है और आप जानते हैं , ऐसी जलधाराओं का पानी बर्फ  से भी ज्यादा ठण्डा लगता है।   अब तक मौसम भी अच्छा है और सब सुरक्षित एवं स्वस्थ हैं।  सब इस जलधारा को क्रॉस कर के आराम फरमा  रहे हैं।  



अभी तीन के आसपास का समय हुआ है।  काकभुशुण्डि नदी जलधारा को क्रॉस कर के नीचे उतर गए हैं।  हम आगे बढ़ने लगे तो कोहरा चढ़ आया इसलिए शॉर्टकट लेने का विचार छोड़ दिया।  ये शॉर्टकट वास्तव में ही शॉर्टकट नहीं बल्कि धार के नीचे से एक रास्ता था लेकिन कोहरा जैसे ही आया , हमारे गाइड ने शॉर्टकट लेने से मना कर के धार पर चलने का निर्णय लिया।  धार एकदम पतली थी और जितना आगे बढ़ते , आगे उतना ही और नजर आने लगती और ऊँची।  जैसे -जैसे आगे बढ़ते  ये धार और खतरनाक , और ऊँची नजर आने लगती।  एक जगह हमें केवल एक ही पैर  आगे रखने की जगह मिल पाई जिसने हमें अंदर तक हिला दिया।  अच्छा था कि हवा नहीं थी , बारिश नहीं थी लेकिन कोहरे की वजह से पांच -छह मीटर से ज्यादा का रास्ता नहीं दिख पा रहा था।  हमारे मित्र जो आगे निकल के आगे खड़े थे , वो दूर से बस ऐसे दिख रहे थे जैसे कोई हिलती -डुलती आकृति पहाड़ पर नजर आ रहे थे।  



थोड़ी देर के लिए  कोहरा छटा तो धार के ऊपर से "मछली ताल " की एक झलक दिखाई दे गई।  हम उस वक्त करीब 4270 मीटर की ऊंचाई पर चल रहे थे और हम से लगभग 90 -100 मीटर नीचे हरे रंग के पानी वाला मछली ताल कुछ पल के लिए नजर आया लेकिन फिर से कोहरा आ गया और ताल छुप गया।  हम आगे चलते गए ..


अभी हमें आगे बढ़ते जाना था।  इसी धार पर जब और आगे बढ़े तो नीचे उतर के एक ग्लेशियर के किनारे -किनारे चलकर सामने वाली पहाड़ी पर पहुंचना था।  अब कोहरा छंट गया था लेकिन मछली ताल नजर नहीं आ पाया।  लोकेशन बदल रही थी और नज़ारे भी बदल रहे थे।  इस पहाड़ी पर गोल -गोल चलते हुए इसकी परिधि नाप कर एक वॉटर स्ट्रीम को पार कर के जैसे ही ऊपर पहुंचे , एक बेहद सुन्दर जगह हमारा इंतज़ार कर रही थी जहाँ से मछली ताल एकदम साफ़ दिखाई दे रहा था।  





मछली ताल बहुत ही खूबसूरत जगह है।  हालांकि रुकने के लिए ज्यादा जगह नहीं है लेकिन फिर भी जितना मुझे अंदाजा लगा ,  उसके हिसाब से दस टैण्ट लगाए जा सकते हैं।  हमारे भी सात टैण्ट आराम से लग गए थे और दो -तीन टैण्ट की जगह और दिखाई दे रही थी।  भयंकर ठण्ड थी यहाँ और ठण्ड होनी भी चाहिए थी क्योंकि ये जगह लगभग 4500 मीटर की ऊंचाई पर है।  थोड़ी देर के लिए सूरज निकला तो पहाड़ों की चोटियां चांदी के जैसी चमक उठीं लेकिन बस कुछ पल के लिए ही।  शायद ये हाथी पर्वत ही रहा होगा लेकिन पूरा नहीं दिखा इसलिए सिर्फ अंदाजा ही है।  लेकिन आसपास का जो नजारा था वो बहुत ही सुन्दर , बहुत ही आकर्षक था।  शायद अब तक के तीन दिनों में मिला सबसे सुन्दर स्थान।  कुछ लोग पहले यहाँ कभी रुके होंगे क्यूंकि यहाँ अधजली कुछ लकड़ियां पड़ी थीं।  


अभी किचन टैण्ट तैयार हो रहा था , पंकज भाई इधर -उधर Explore कर रहे थे और मैं जूते निकाल रहा था।  चप्पल पहने ही थे कि पंकज भाई थोड़ा ऊपर से आवाज लगाने लगे -योगी भाई ! आओ , आपको ब्रह्मकमल दिखाता हूँ! मैंने अभी तक किसी ट्रेक में ब्रह्मकमल नहीं देखे , या आप कह सकते हैं मुझे देखने को नहीं मिले ! मैं एक तरह से दौड़ लिया ब्रह्मकमल देखने को ! पहली बार देखने को और फिर तो उसे छूकर देखा , इधर से देखा , उधर से देखा , नीचे से देखा , ऊपर से देखा ! एंगल बदल -बदल के देखा ! 

   

ब्रह्मकमल का अर्थ ही है 'ब्रह्मा का कमल' कहते हैं और उनके नाम ही इसका नाम रखा गया है। ऐसा माना जाता है कि केवल भग्यशाली लोग ही इस फूल को खिलते हुए देख पाते हैं और जो ऐसा देख लेता है, उसे सुख और संपत्ति की प्राप्ति होती है। फूल को खिलने में 2 घंटे का समय लगता है। फूल मानसून के मध्य के महीनों के दौरान खिलता है। मैंने  और पंकज भाई ने मन बनाया था कि हम मध्यरात्रि में इसे खिलता हुआ देखेंगे लेकिन रात की ठण्ड और दिन भर की थकान ने कभी इतनी रात को टैण्ट से बाहर निकलने ही नहीं दिया।

   

उत्तराखण्ड का राज्य पुष्प माना जाता है ब्रह्मकमल जिसका अंग्रेजी नाम Saussurea obvallata है और ये करीब 3500 से 4800 मीटर की हिमालय की ऊंचाइयों में देखने को मिलेगा।  इसके अंदर काले -काले से बीज होते हैं और खुशबु बहुत अच्छी तो नहीं कहूंगा लेकिन विचित्र सी , कुछ अलग सी होती है लेकिन हाँ ! देखने में बहुत ही आकर्षक और सुन्दर लगता है।  एक फुट की ऊंचाई के इसके पौधे में नीचे हल्के हरे / नीले रंग का गोल तना होता है और ऊपर ब्रह्मकल पुष्प खिलता है। ब्रह्मकमल पुष्प का ऊपरी भाग थोड़ा Purple रंग का और बाकी हिस्सा Yellowish -Green होता है।   ध्यान देने वाली बात ये भी है कि ये जुलाई से सितम्बर मध्य तक ही देखने को मिलता है और हिमालय के / उत्तराखंड के हर ट्रेक में नहीं मिलता।  



आज हमारे पास थोड़ा समय था और मौसम  भी एकदम साफ़ था हालाँकि ठण्ड भी भयानक थी और दूर पहाड़ियों पर कोहरा दिख रहा  था लेकिन यहाँ मछली ताल के ऊपर सब एकदम मंगलमय था।  खूब फोटोग्राफी की , खूब मस्ती की और एक -एक गिलास वेजिटेबल सूप ने शरीर को एक तरह से नई ऊर्जा दे दी तो फिर से आसपास की जगहों को एक्स्प्लोर करने लगे! 






आज हरजिंदर भाई ने मुझसे पहली बार Diamox की टेबलेट मांगी है और उनका स्वास्थ्य भी बहुत बेहतर नहीं दिख रहा।  वो मेरे साथ आदि कैलाश के ट्रेक में भी थे इसलिए उन्हें बहुत बेहतर जानता भी हूँ और पहचानता भी हूँ।  वो एक बेहतरीन ट्रेक्कर हैं , बहुत शानदार चलने वाले और अगर उनको परेशानी हुई है तो आप काकभुशुण्डि ट्रैक की कठिनाई को और बेहतर समझ पाएंगे।  आज कुलवंत भाई ने जबरदस्त फोटोग्राफी की है और इस जगह की खूबसूरती को दिखाने में अपनी पूरी मेहनत लगा दी है। आठ बज गए हैं , हमने खाना खा लिया है जबकि हनुमान जी और त्रिपाठी जी दूध और कुछ ड्राई फ्रूट्स खाकर सो गए हैं। मैं , सुशील भाई और डॉक्टर अजय त्यागी जी गप्प लगाते -लगाते अंततः दस बजे के आसपास अपने -अपने स्लीपिंग बैग में मुंह घुसाए सो गए हैं। 





 कल मिलते हैं फिर से ..