गुरुवार, 14 जुलाई 2022

Kakbhushundi Trek Uttarakhand Blog : Day 6 From Brahma ghat to Farswan Top

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 कल का दिन एक खराब दिन के बाद अच्छा गुजरा था और हम कागभुशुण्डि लेक तक पहुँचने के बाद ब्रह्मघाट रुक गए थे।  ब्रह्मघाट में पानी की एक चौड़ी सी स्ट्रीम बह रही थी जो कल हमारे लिए water source थी लेकिन आज उसे पार कर के आगे बढ़ना था।  रास्ता हमारे बाएं तरफ की चोटियों से होकर था तो लाजिमी था कि हमें ऊपर और ऊपर चढ़ते जाना था।  आज का ट्रैक शुरू करते ही लगभग 15 मिनट में ही चढ़ाई शुरू कर देनी पड़ी और बड़ी -बड़ी घास और झाड़ियां न हमें कोई रास्ता देखने दे रही थीं न बनाने दे रही थीं।   

                         

                       

हालाँकि करीब एक-डेढ़ घण्टा निकल जाने के बाद छोटी सी पगडण्डी नजर आने लगी थी।  ये वो पगडंडी रही होगी जो पैंका गाँव के लोग कभी कभार आते जाते रहे होंगी अपने तीज त्योहारों पर , उससे बनी होगी लेकिन आज हमारे लिए जीवन रेखा जैसा काम कर रही थी।  पंकज मेहता जी को जल्दी ही निकलना था और आगे उन्हें आसाम भी जाना था इसलिए उन्होंने आज जल्दी ही ट्रेक शुरू कर दिया था और फिर उसके बाद वो हमें कहीं नजर नहीं आए ! नजर आए तो सिर्फ उनके मैसेज -योगी भाई हम लोग एक ही दिन में बाकी का ट्रैक पूरा कर के नीचे गोपेश्वर की बस पकड़ लिए थे।  गजब जीवट है उनका , पहाड़ी हैं , वायु सेना में हैं तो फिटनेस लेवल हमसे ज्यादा होना ही होना है।  हम ठहरे मास्टर आदमी जिसकी तौंद निकल रही हो :) लेकिन तारीफ कर दीजिये मेरी भी कि तौंद निकलने और अस्थमा का मरीज होते हुए भी मैं ट्रैकिंग कर पाता हूँ।   

                         

                         

पंकज भाई के साथ उनके तीनों मित्रों ने भी उनके साथ निकलना बेहतर समझा और अब हम रह गए कुल सात ट्रेक्कर और छह पोर्टर। सुबह करीब 8 बजे हम ब्रह्मघाट से निकले थे और ब्रह्मताल पहुँचते -पहुँचते 11 बज गए।  ब्रह्मताल ऊपर से छोटा सा दिखाई दे रहा था क्यूंकि ऊपर आसमान में बादल लटके पड़े थे और जैसे ही बादल छंटे हमें ब्रह्मताल का वृहद रूप दिखाई देने लगा।  ये हमारा सौभाग्य रहा कि जहाँ बाकी लोग इस ट्रैक में सिर्फ कागभुशुण्डि ताल ही देख पाते हैं हमें तीन-तीन ताल देखने को मिल गए ! 1. मच्छी ताल 2 .कागभुशुण्डि ताल और 3. ब्रह्मताल ! हालांकि हम चौथा ताल "हाथी ताल " भी देखना चाहते थे लेकिन हमारा एक दिन बेकार चला गया था और उस तरफ बादल भी बहुत लगे हुए थे इसलिए ज्यादा रिस्क लेना ठीक नहीं लगा और जो मिला , जितना मिला उतने में संतोष कर लिया।  हिमालय में भटकना -खो जाना और फिर कभी न मिलना .. इससे बेहतर है कि एक ताल को skip ही कर दिया जाए !  

                               

                                

                               

                               

                                              

ब्रह्मताल के ऊपर से बड़े बड़े पत्थरों के बीच से निकल रहे थे हम।  पत्थरों में रास्ता नाम की कोई चीज नहीं हुआ करती , हाँ कुछ निशान जरूर कुछ भले लोग बना देते हैं लेकिन यहाँ हमारे गाइड देवेंद्र पंवार जी आगे-आगे बढ़ते चले जा रहे थे और हम उन्हें बस फॉलो कर रहे थे।  हरजिंदर भाई , हनुमान जी न जाने कब उड़कर आगे पहुँच चुके थे।  लेकिन हम चार-पांच फिसड्डी लोग आज भी हर रोज़ की तरह पीछे ही घिसट रहे थे जिनमे मैं भी शामिल था। कुलवंत भाई आगे -आगे चलते जा रहे थे मगर अब बादल आने लगे थे जो जल्दी ही बारिश  में बदल गए।  

                       

                       
  
                       

                        

                       

सामने पत्थरों वाले पहाड़ की एक लम्बी-ऊँची दीवार सी दिखाई देने लगी थी।  उसी दीवार में एक खिड़की जैसा पहाड़ कटा हुआ था जहाँ तक एक अच्छी खासी चढ़ाई तय कर के पहुंचना था।  ये अच्छी बात थी कि उस "खिड़की " तक पहुँचने की जो ऊंचाई थी उसमे slope था मगर बारिश की वजह से ये स्लोप बहुत कठिन और फिसलन भरा हो गया था।  मैं आगे-आगे कभी त्रिपाठी जी का हाथ पकड़ के ऊपर की तरफ चढ़ने में सहारा देता तो कभी अपना रेन कोट (पोंचो ) संभाल रहा होता।  अंततः हम दोनों बारिश में ही उस "खिड़की" तक पहुँच गए जहाँ हमारे गाइड पंवार जी खड़े थे सभी को इस खिड़की से पार पहुंचाने के लिए।   

 
                             

ये जो "खिड़की" थी बड़ी जानलेवा थी ! ये खिड़की ही बरमाई पास (Barmai Pass ) है जो कागभुशुण्डि वाली घाटी को फर्स्वाण वाली घाटी से जोड़ता है और इसीलिए ये पास कहा जाता है ! अभी हम लगभग 4700 मीटर की ऊंचाई पर थे लेकिन यहाँ ऊंचाई से ज्यादा उतराई खतरनाक थी।  बरमाई पास से जब नीचे की तरफ झाँक के देखा तो नीचे मौत की खाई नजर आ रही थी।  लगभग 30 -35 डिग्री का स्लोप था उतरने में और ऊपर से लगातार बारिश।  रास्ता नाम की चीज नहीं थी।  लेकिन कभी ऊपर से पानी आता रहा होगा जिससे ऊपर से नीचे की तरफ एक नाला जैसा बन गया था , हालाँकि उसमे छोटे-बड़े पत्थरों की भरमार थी मगर हमारे पास न कोई दूसरा चारा था न कोई दूसरा रास्ता ! 

                         

                          

मुझे बरमाई पास से नीचे कदम रखने में भयंकर डर लग रहा था।  महसूस हो रहा था कि अगर कैसे भी फिसल गया और पाँव न टिका पाया तो नीचे 300 मीटर तक गिरता चला जाऊँगा और तब तक मेरे शरीर की 206 की 206 हड्डियों का पाउडर बन चुका होगा।  लेकिन भगवान शिव का आशीर्वाद काम आया और हम सुरक्षित नीचे उतरने लगे।  बस एक जगह सिर्फ एक ही पाँव रखने की जगह थी करीब 5 -7 मीटर तक , उसे भी हम जैसे तैसे पार करते हुए नीचे पहुँच गए जहाँ एक बड़ा सा मैदान हमारा स्वागत करने को तैयार था और बारिश के बीच ही तैयार थे हमारे पॉर्टर जिन्होंने बारिश में भी छतरियां तानकर सबको एक-एक कप गर्मागर्म चाय पिला दी।  

                         
 मुश्किल सफर लगभग खत्म हो चुका था। बरमाई पास वाला हिस्सा इसलिए भी और कठिन हो गया था हमारे लिए क्यूंकि हमसे पहले किसी भी भाई ने इस जगह का कुछ भी विवरण सोशल मीडिया में नहीं लिखा जिससे कुछ अंदाज़ा लगाया जा सकता।  खैर कभी-कभी एकदम अनजान और अनदेखी चीजें और भी ज्यादा रोमांच देती हैं और बरमाई पास ने हमारे साथ यही किया।   

                       
रास्ता आगे भी आसान नहीं था।  हम अब भी लगभग 4600 मीटर  की ऊंचाई पर चल रहे थे लेकिन हाल फिलहाल जिंदगी का रिस्क उठाने जैसा रास्ता नहीं था।  उस मैदान में एक चबूतरा बना है सीमेंट का और उस पर सीमेंट और ईंटों से ही शिवलिंग बनाया हुआ है।  इसका मतलब  पैंका गाँव के लोग यहाँ तक आते रहते होंगे।   

                         

थोड़ी सी चढ़ाई करीब 10 -12 मीटर की सामने दिख रही थी जिसे चढ़ते ही एक और मैदान मिल गया।  ऐसा लग रहा था जैसे कोई मिटटी का पहाड़ एकदम समतल कर दिया गया हो और जब वहां से उतरे तो ब्रह्मकमल का बेहतरीन जंगल नजर आने लगा जो शायद हमारे इस ट्रेक का आखिरी ऐसा पॉइंट था जहाँ हमें ब्रह्मकमल देखने का अवसर मिला।  आखिरी बार इस ट्रेक पर ब्रह्मकमल देख रहे थे तो जीभर के देख लेने में क्या बुराई थी :) 

                       

                       

                       

                       

                     
 
                     
करीब तीन चार घण्टे शांत रहने के बाद इन्द्र देवता को फिर खुजली होने लगी और बारिश आ गई।  अभी हम लगभग समतल जमीन पर ही चल रहे थे तो दिक्क्त नहीं थी। बारिश और बादलों ने ऐसा मायाजाल फैलाया कि मैं एक जगह कई सारे पत्थरों को मंदिर की तरह लगे हुए देखकर खुश हो गया कि मैं आज की अपनी मंजिल फर्स्वाण टॉप पहुँच गया :) जब गाइड साब आए और बोले अभी फर्स्वाण टॉप तीन किलोमीटर और आगे है तो हवा निकल गई :)     

                           

                           

हम इस खूबसूरत और कठिन ट्रैक  के आखिरी पड़ाव में थे , लगातार बारिश हो रही थी मगर हम रुक नहीं सकते थे क्यूंकि पहले ही एक दिन देरी से आगे बढ़ रहे थे।  दूसरी बात कि हम सभी के पास बेहतरीन रेनकोट थे तो बारिश से शरीर को या हमें बहुत परेशानी नहीं थी लेकिन रास्तों की हालत बहुत खराब हो चुकी थी।  एक जगह हमें पहाड़ी के नीचे से होते हुए जाना था करीब 40 मीटर का फासला तय कर के लेकिन वहां बहुत गहरा गड्ढा बन चूका था जिसे किसी भी हालत में पार कर पाना संभव नहीं दिख रहा था।  अब क्या कर सकते हैं ? थोड़ी दूरी पर वापस लौटे और गाइड ने तीन पोर्टरों को आगे भेजा।  हम सभी के बैग हमारे कंधों से उतरवाए गए और पोर्टरों ने एक एक कर के उन्हें दूसरी तरफ पहुँचाया।  अब असली खतरा था -हम सभी को उसी पहाड़ी पर बाहर की तरफ निकले हुए पत्थरों पर एक-एक पाँव रखकर आगे बढ़ना था।  पहाड़ी के पत्थर गीले हुए पड़े थे और हम सिर्फ एक पैर ही रख सकते थे , हाथ छूटा तो जिंदगी छूटी ! हालाँकि बाकी पॉर्टर नीचे खड़े थे उस गड्ढे को छोड़कर ! भगवान भोलेनाथ की कृपा रही कि वो अंतिम कठिन समय भी सभी ने बेहतरीन तरीके से निकाल दिया।  ट्रैकिंग में हर कदम एक नई जंग है !!  

                       

अब बढ़िया और एकदम स्पष्ट पगडण्डी दिखने लगी थी।  रास्ते में ही एक जगह , एक पत्थर पर लिखा दिखा : फर्स्वाण टॉप 2 किलोमीटर @ 4166 मीटर height ! मन को सुकून देने वाले शब्द थे ये और मन को ये एहसास भी कि एक कठिन और बेहद खूबसूरत ट्रेक को पूरा करने का आनंद ही अलग होता है।  

                       

 हम करीब पांच बजे फर्स्वाण पास पहुँच चुके थे जहाँ से जोशीमठ शहर और औली बुग्याल दिखने लगे थे।  जोशीमठ और औली उस ऊंचाई से बड़े सुन्दर गाँव से दिख रहे थे और गाड़ियां खीलों के जैसी नजर आ रही थीं।  कुछ ही देर में अँधेरा उतर आया और बारिश भी बंद हो गई और फिर जब जोशीमठ और औली शहर की रोशनियां जगमगाने लगीं तो एक सुन्दर नजारा आँखों के सामने आने लगा।  ऊपर एकदम साफ़ -नीला आसमान और नीचे जोशीमठ और औली जैसे सुन्दर शहर ! आँखों की रौशनी को और बढ़ा दे रहे थे ! मौसम में ठण्डक बहुत भयानक थी।  आज लगभग पूरे दिन बारिश होती रही जिससे हमारे स्लीपिंग बैग भी ठण्डे हो गए थे।   




आखिरी रात थी इस ट्रैक पर।  आज हमें इस ट्रैक पर छठवां दिन था ! जिंदगी के बेहतरीन लम्हों में शुमार रहने वाले थे ये दिन।  मैग्गी खा के कुछ ऊर्जा आई तो अपने -अपने टैंट से बाहर निकल के आसपास और जोशीमठ की लाइटों को निहारते रहे।  पूरे छह दिन बाद हमें मानव सभ्यता फिर से देखने मिली थी लेकिन अभी हम गिने चुने मानवों के आलावा और कोई बाहरी मानव देखने को नहीं मिला।  शायद कल जरूर देख पाएंगे कुछ और "मानवों " को !  


रात के लगभग 10 बजे होंगे ! मैं , डॉक्टर अजय त्यागी जी और सुशील भाई एक ही टैण्ट में थे , बादल गरजने लगे और बिजलियाँ ऐसी चमक रही थीं जैसे हमारे ही टैण्ट पर आके गिरेगी ! हवा इतनी तेज कि लग रहा था हमें टैंट सहित उड़ा ले जाएगी।  सभी की घिग्घी बंधी हुई थी , अंदर से सब डरे हुए थे।  मैंने मजाक में कहा -काश ! हवा हमें अल्लादीन की चटाई की तरह उड़ाते हुए ले जाए और नीचे पहुंचा दे :) 




डर मैं भी रहा था  वो एक -डेढ़ घण्टा भगवान् भोलेनाथ की कृपा  से बस निकल गया ! बारिश पूरी रात होती रही.... मगर हवा बंद हो गई थी , बिजली के कड़कने की आवाज भी नहीं आ रही थी और हम थके मगर मन से जीते हुए लोग नींद के आगोश में पहुँच ही गए।  अगली सुबह नहाई  हुई सी , मद्धम मद्धम खुशबु लिए हुए थी .. मगर अगले दिन की बात अगली पोस्ट में होगी ! 



तब तक  के लिए राम राम सभी मित्रों को  !!

गुरुवार, 12 मई 2022

Kakbhushundi Trek Uttarakhand Blog : Day 5 From Shila Samudra to Kagbhushundi to Bramghat

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आज एक बुरे दिन के बाद की सुबह थी , एक आशा भरी सुबह थी उत्साह उतना नहीं रह गया था लेकिन जाना तो था ही और ये उत्साह भी थ्री इडियट के रस्तोगी के मोटर की तरह धीरे धीरे गति पकड़ रहा था।  नाश्ता कर के करीब 8 बजे , सामने दिख रहे green spot की तरफ चढ़ना शुरू कर चुके थे।  कुछ मित्र कल यहाँ तक पहुँच चुके थे और उन्हें यहाँ एक पीले रंग का झण्डा सा दिखाई दिया था वो वास्तव में कोई झण्डा नहीं बल्कि पीले रंग की प्लास्टिक की एक छोटी बोरी (हमारे यहाँ बोरा बोलते हैं ) थी जिसे संकेत के रूप में यहाँ टांग दिया था।  जिसने भी ये किया होगा वो बहुत भला इंसान रहा होगा जिसने दूसरे लोगों का ख्याल रखा हम लेकिन इस झंडे के दूर से ही ऊपर की तरफ चढ़ते गए क्यूंकि सीधा चढ़ना थोड़ा मुश्किल जरूर था लेकिन रास्ता छोटा था और अभी सुबह थी, एनर्जी बनी हुई थी तो झंडे के पास वाला रास्ता न लेकर सीधा चढ़ना तय किया। झण्डे के पास से जाने के लिए हमें अर्ध वृताकार (Semi Circle) रास्ता लेना पड़ता और अभी हम उसके बीच से गुजर रहे थे।  सामने ग्रीन स्पॉट पर पहुंचकर ऊंचाई से उस जगह को आखिरी बार देखा जहाँ हम रात रुके थे तो आँखें थोड़ी सी नम हुईं , कल रात बहुत बुरी गुजरी लेकिन अंततः गुजर गई।  ध्यान रखिये , इस रास्ते पर भी कोई डांवर रोड नहीं बनी है बल्कि पूरा रास्ता बड़े बड़े पत्थरों से भरा हुआ है।  

 
 
 
जैसे ही आप इस ग्रीन स्पॉट के दूसरी तरफ उतरते हैं आपको इधर-उधर उगे हुए सैकड़ों या शायद हजारों ब्रह्मकमल के फूल दिखाई  देने लगेंगे। लगभग दो घण्टे चलने के बाद एक ग्लेशियर दिखा देने लगेगा, आप इसे स्किप नहीं कर सकते। करना भी चाहेंगे तो आपको कम से कम चार-पांच घण्टे एक्स्ट्रा चलना पड़ सकता है और रास्ता भी उधर कोई आसान ही होगा, ऐसा सोचना भी मुश्किल था इसलिए बेहतर था कि थोड़ा रिस्क लेकर ग्लेशियर को ही पार किया जाए।  लेकिन ट्रैकिंग इतनी ही आसान होती तो फिर मजा ही क्या रहता इसमें ! ग्लेशियर की तरफ कदम बढ़ाते हुए चल ही रहे थे कि बारिश शुरू हो गई।  डॉक्टर साब (अजय त्यागी जी ) ने पहला कदम रखा , फिर सुशील भाई और उनके बाद त्रिपाठी जी , मुझे सबसे पीछे ही चलना था।  एक-एक कदम गिन गिनकर चलते हुए अंततः हमने ग्लेशियर क्रॉस कर ही दिया और सामने था - 5000 मीटर ऊंचा कांकुल पास(Kankul Pass) ! ये इस ट्रेक का सबसे ऊँचा पॉइंट था और हमारे लिए एक उपलब्धि। हमारे कुछ मित्र तथा गाइड और पॉर्टर पहले ही वहां पहुँच चुके थे। हमारे पहुँचते ही एक "सेलिब्रेशन" शुरू हुआ यहाँ , इस पॉइंट तक , highest point तक पहुँचने का जश्न मनाया और जश्न कैसे मनाया ? सिगरेट का एक एक लम्बा कश लेकर हमने अपनी इस उपलब्धि को celebrate किया।  लगभग आधा घण्टा यहाँ बिताकर अब धीरे-धीरे नीचे उतरने की बारी थी
 
 
 
 

 
 
कांकुल पास  (Kankul Pass)

 कांकुल पास पर कुछ पत्थरों को एक के ऊपर एक लगा के कभी कोई झण्डी लगाई गई होगी लेकिन अब वहां पत्थर तो हैं झण्डी नहीं बची।  हाँ , एक पत्थर पर 2015 जरूर लिखा है। कांकुल पास पर बर्फ नहीं थी लेकिन उतरते वक्त ढलान अच्छा खासा था।  पहाड़ पर सिर्फ चढ़ना ही कठिन नहीं होता, उतरना भी उतना ही खतरनाक और परेशानी भरा होता है। मुश्किल से 15-20 मिनट ही उतरे होंगे कि आगे-आगे चल रहे पंकज भाई (पंकज मेहता जी) को एक विचित्र पुष्प दिखाई दिया जो पत्थरों के बीच छोटा सा, खरगोश के बच्चे जैसा छुपा हुआ था।  एकदम श्वेत , रुई जैसा जिस पर ब्राउन कलर के तंतु लगे हैं। अहा  ! अलौकिक, अद्भुत और दुर्लभ पुष्प जो सिर्फ हिमालय की ऊंचाइयों में ही पाया जाता है लगभग 4200 मीटर की ऊंचाई के बाद। हम सौभाग्यशाली हैं इस मामले में , हमें आज इस पुष्प के दर्शन का लाभ मिल गया। इसे फेन कमल बोलते हैं .....नहीं-हम तोड़ेंगे नहीं इसे ! उखाड़ेंगे भी नहीं।  ये जहाँ हैं वहीँ रहेगा और आगे आने वाले मित्रों को भी यूँ ही दर्शन देता रहेगा।  प्राकृतिक है , प्राकृतिक अवस्था में ही रहेगा !!  इस वक्त करीब दोपहर के 12 बजे थे। 

यहाँ अब आपको थोड़ी दूर तक रास्ता दिखाई देता है। पत्थरों को मिलाकर, सही तरीके से रखकर एक निशान बनाने की कोशिश की है जिससे लोग रास्ता भटकें।  दो घण्टे के आसपास तक यूँ ही पत्थरों के ऊपर चलते रहे। कांकुल पास से उतरने के बाद कोई भी पहाड़ पर नहीं चढ़ना पड़ा था, हाँ पत्थरों के बीच से लगातार चलते रहे। लगभग ढाई बजा होगा जब हमें दूर से पवित्र काकभुशुण्डि ताल के दर्शन हुए। बारिश अपने आने की सूचना प्रेषित कर रही थी मगर इस बूंदाबांदी में एक खुशखबरी आई कि यहाँ बीएसएनएल और जिओ के सिग्नल आ रहे हैं।  बहुत अच्छी तो नहीं लेकिन हाँ , कट कट के बात हो जा रही थी। मैंने भी पॉर्टर के फ़ोन से घर बच्चों से बात कर अपनी कुशलता और यहाँ पहुँचने की सुचना उन्हें दे दी।  बात करते हुए थोड़ा मैं भी भावुक हो गया और बच्चे भी क्यूंकि ये मेरा एक सपना था और इतनी मुश्किलों के बाद जब आपका सपना पूरा होता है तो भावुक हो जाना स्वाभाविक है।  ट्रैकिंग मेरे लिए सिर्फ घुमक्कड़ी नहीं , मेरा जीवन है। 
 
 
कभी त्रिकोण तो कभी पांच कौण ! अलग तरह की शेप है काकभुशुण्डि लेक की।  लेकिन लम्बी है और जल एकदम हरीतिमा लिए हुए। आखिरी बिंदु से फोटो और वीडियो लेते हुए इसके बराबर  से चलते हुए हमें वहां पहुंचना था जहाँ पवित्र झण्डियां लगी हुई थीं।  ऊपर की तरफ एक छोटा सा मंदिर बना है और उसके पास खिले हुए थे सैकड़ों ब्रह्मकमल।  हम ब्रह्मकमल के मोहपांश में फंस गए और फोटो खींचते रहे /वीडियो बनाते रहे और इतने में इन्द्र देवता की नींद टूटी ! झड़ झड़ बारिश होने लगी थी।  हमें बारिश से तो कोई परेशानी नहीं थी लेकिन बस इतना हुआ कि हम इस पवित्र कुण्ड में स्नान करना चाहते थे , नहीं कर पाए।  मैं अब तक जहाँ गया हूँ -चाहे सतोपंथ ताल हो , नन्दीकुंड हो , आदि कैलाश में पार्वती कुण्ड हो , मैं स्नान जरूर करता हूँ लेकिन यहाँ बारिश ने हमें इस स्नान से वंचित कर दिया।    
  
 
        अंजुली भर के अर्घ्य दिया और पूजा संपन्न की। अगरबत्ती थोड़ी दूरी पर जलाई जिससे इस पवित्र और सुन्दर लेक के जल में कोई अशुद्धि न मिलने पाए।  कुलवंत भाई और त्रिपाठी जी ने भी खूब फोटो खिचवाए।  त्रिपाठी जी यहाँ एक रात रुकना चाहते थे लेकिन हम पहले ही एक दिन की देरी से चल रहे थे और आज अभी आगे बढ़ने का समय भी था तो थोड़ी डिस्कशन के बाद आगे कहीं टैण्ट लगना तय हुआ।  क्षमा चाहता हूँ त्रिपाठी जी ! 

हम अपने डेस्टिनेशन पर पहुँच चुके थे।  एक सपना पूरा हो रहा था जिसके लिए राजीव कुमार जी ने जिज्ञासा पैदा की और पंकज मेहता, हरजिंदर सिंह जैसे मित्रों ने उसे पंख लगाए।  हम सब सकुशल, सुरक्षित काकभुशुण्डि ताल पहुँच चुके थे ! मन आल्हादित था , आत्मा तृप्त थी , पैर कीर्तन करने लगे थे ...होठों पर शिव शिव का उच्चारण था और आसमान में बादल हमारे यहाँ पहुँचने की ख़ुशी में ...हमारे साथ खुलकर हमारे साथ गुनगुना रहे थे ..जाप कर रहे थे
ॐ नमः शिवाय
ॐ नमः शिवाय 
 
काकभुशुण्डि ताल से ऊपर की तरफ चढ़ना भयंकर कठिन था।  सीधे चढ़ाई , नीचे नाला और पत्थर और पहाड़ी की चढ़ाई में फिसलन ! बहुत डर लगा मुझे यहाँ क्यूंकि अगर हाथ छूट जाता तो जिंदगी का ही साथ छूट जाता।  
ज्यादातर लोग यहाँ आकर फिर जिस रास्ते से हम यहाँ पहुंचे उसी रास्ते से वापस लौट आते हैं।  मनीष भाई (मनीष नेगी ) का वीडियो भी यहीं तक का था।  हमारी असली परीक्षा अब शुरू होनी थी।  परीक्षा इसलिए क्यूंकि हमें इसी रास्ते पर वापस नहीं लौटना था बल्कि पूरा सर्किट कम्पलीट करते हुए पैंका गाँव (विष्णुप्रयाग) की तरफ से उतरना था।  इस रास्ते का न कोई वीडियो उपलब्ध था न कोई ब्लॉग किसी भाषा में।  असली रोमांच, असली डर , असली परीक्षा अब शुरू हो रही थी।  कोई अंदाजा नहीं था हमें कि रास्ता कैसा है , कितना कठिन है लेकिन जब भगवान आशुतोष ने हमें यहाँ तक पहुंचा दिया तो भरोसा था कि आगे भी सकुशल पहुँच जाएंगे।  

 
दूसरी दिशा में ऊपर जाने पर पत्थरों को जोड़कर और पहाड़ काटकर पगडण्डी बनी हुई दिखने लगी।  इसका मतलब लोग इस रास्ते से भी आते जाते तो हैं पैंका गाँव वाले लेकिन उन्होंने कोई वीडियो अपलोड नहीं किया है।  काकभुशुण्डि ताल से लौटते हुए मुश्किल से आधा किलोमीटर ही चले होंगे कि भरापूरा ब्रह्मकमल का जंगल मिल गया।  अब तक का सबसे घना ब्रह्मकमल का जंगल जैसे किसी ने बड़े करीने से सजाए हों , एक एक ब्रह्मकमल अपने नैसर्गिक रूप में हमें हमारे यहाँ तक पहुँचने की न केवल बधाई दे रहा है, हमारा अभिनन्दन करना चाहता है।  हम भी खुश हैं , हमसे ज्यादा ये ब्रह्मकमल खुश हैं ! ये हर्षित हैं और आज का दिन इनके लिए भी बहुत बड़ा दिन है कि कोई है जो इन्हें देखने , इनकी शोभा की प्रशंसा करने वाला कोई तो आया है।  स्त्री अगर श्रृंगार करे और श्रृंगार की तारीफ करने वाला कोई न हो तो उसका श्रृंगार करना व्यर्थ चला जाता है बिलकुल उसी तरह आज ब्रह्मकाल की सुंदरता की तारीफ हमारे मन से स्वतः स्फुटित हो रही है।  

 
अब हम बरमाई पास की तरफ चल रहे हैं।  सितम्बर का महीना है और वनस्पति अपने यौवन के रंग बिखेर रही है।  अद्भुत और अविश्वसनीय खूबसूरती देख पा रहा हूँ मैं प्रकृति की।  इतना सुन्दर लैंडस्केप है , मैं बैठा रहता हूँ और सब आँखों से ओझल हो जाते हैं।  हर तरह के रंग हैं इस प्रकृति की अनमोल चादर में।  मैं फूलों को नहीं पहचानता , उनका नाम नहीं जानता लेकिन प्रकृति से बात करने के लिए उसे किसी सम्बोधन की जरुरत थोड़े ही होती है ? बस आँखों से आँखों की भाषा पढ़नी आनी चाहिए हमें। अब तक इतना सुन्दर प्राकृतिक सौंदर्य कभी नहीं देखा , श्रीखण्ड में भी नहीं।  

 
 
अधिकांश रास्ता उतराई वाला है। बीच में एक बहुत ऊंचाई से आती वाटर स्ट्रीम को पार करना थोड़ा कठिन रहा बाकी रास्ता आसान ही था।  कई प्रकार के फूलों से परिचय प्राप्त करने की कोशिश की लेकिन वो काँटा मार के भाग गए! पांच बजने को थे या शायद उससे भी ज्यादा। ऊपर से खुले-बड़े मैदान में बैठे हुए मित्रगण और अपने टैण्ट दिखाई देने लगे थे।  आज का ठिकाना यही था हम बंजारों का -ब्रह्मघाट ! यही था उस जगह का नाम जहाँ हमने अपने टैण्ट लगाए उस दिन।  

 
 सात नहीं बजे होंगे अभी शाम के लेकिन ठण्ड भयंकर थी।  हम में से कुछ टैंट में घुसे थे , कुछ चाय पी रहे थे किचन टैंट के पास और डॉक्टर साब इधर-उधर टहल रहे थे।  आए तो हाथ धोए और हाथ धोने के बाद जब पानी छिटकाया तो उनकी ऊँगली में पड़ी सोने की रिंग भी छिटक गई लेकिन ये बात उन्हें 15 -20 मिनट बाद पता चली।  अब अँधेरे में टोर्च लगा लगा के -रिंग खोजो अभियान शुरू हुआ।  रिंग मिलना जरुरी था क्यूंकि एक तो वो बहुत महँगी और दूसरी नीलम जी ( डॉक्टर साब की मिसेस ) की दी हुई रिंग थी वो ! इतनी ठण्ड में आदमी कितना पसीना-पसीना हो सकता है ये देखने का था उस वक्त।  हम तो सोचते थे हम ही बीबी से डरते हैं यहाँ तो डॉक्टर लोग भी खौफ खाए हुए थे !! थोड़ी सर्चिंग , थोड़ी मेहनत से आखिरकार रिंग मिल गई नहीं ।  भगवान का बहुत-बहुत धन्यवाद ! 
 
 
और धन्यवाद आप सभी  मित्रों का !

फिर मिलेंगे अगले दिन का वृतांत लेकर