शनिवार, 9 अक्तूबर 2021

Waterfalls in and around Mirzapur Uttar Pradesh

मिर्ज़ापुर (यूपी )  के वाटरफॉल्स  :

कोरोना की भयानक दूसरी लहर के बाद ये पहला ब्लॉग लिख रहा हूँ।  न जाने कितनों ने अपनी जान गंवाई , कितने अनाथ हो गए और कितने ही माँ-बाप असहाय हो गए !! उन सभी पुण्यात्माओं को अपने शब्दों के माध्यम से नमन और भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित करता हूँ !! 

मिर्ज़ापुर ! नाम तो सुना ही होगा ऐसे या वैसे ! वैसे सुना है तो परिभाषा को बदलना होगा आपको और ऐसे सुना है तो सही सुना है। वैसे मतलब फिल्म के नाम की वजह से और ऐसे मतलब -विंध्यवासिनी मंदिर , अष्टभुजा मंदिर और कालीखोह मंदिर की वजह से तो मिर्ज़ापुर प्रसिद्ध है ही लेकिन रुकिए -------मिर्ज़ापुर सिर्फ इतना नहीं है ! मिर्ज़ापुर की असली खूबसूरती , असली खजाना तो मिर्ज़ापुर शहर के बाहर निकल के है ! अहा - अद्भुत , अनजाना सा , अकल्पनीय और अविश्वसनीय सा लेकिन किसी से मिर्ज़ापुर के विषय में बात कर के तो देखिये , वो एकदम से कहेगा -अच्छा वो ! फिल्म वाला मिर्ज़ापुर !! 

आज मंदिरों की बात नहीं लिख रहा , आज मिर्ज़ापुर की प्राकृतिक धरोहरों को आपके सामने लाने की कोशिश कर रहा हूँ और ये कोशिश सफल तभी होगी जब आप कम से कम एक बार तो मिर्ज़ापुर होकर आएंगे।  और  अभी तक आप मिर्ज़ापुर नहीं गए हैं तो एक बार जाकर देखिये , मिर्ज़ापुर की सुंदरता आपका मन मोह लेगी ! न न... मैं शहर की बात नहीं कर रहा , मैं शहर के बाहर जंगलों में स्थित यहाँ के खूबसूरत प्राकृतिक  झरनों की बात कर रहा हूँ जो एक -दो नहीं , पांच -दस नहीं , 22  हैं ! जी हाँ बाईस वाटरफॉल्स मौजूद हैं मिर्ज़ापुर के आसपास के जंगलों में। लेकिन ये वाटरफॉल्स केवल मानसून के मौसम में ही सक्रिय रहते हैं और सही तरह से जिन्दा भी रहते हैं , जैसे -जैसे मॉनसून ख़त्म होता है ये सांस लेना बंद कर देते हैं और फरवरी -मार्च आते आते लगभग सभी वाटरफॉल्स मृतप्राय हो जाते हैं।  तो अगर आपको इन वाटरफॉल्स को देखना है , पूरे यौवन पर देखना है तो निश्चित रूप से आपको मॉनसून में ही इधर का रुख करना होगा।  

Outside Railway Station : Varanasi Cantt

दो साल से इधर नजर थी लेकिन कोविड की वजह से मुश्किल हो रहा था जाना , अंततः जुलाई 2021 में अवसर मिल गया और तुरंत बनारस के अपने अनन्य मित्र संदीप भाई द्विवेदी जी को सूचना दे दी , वो स्वयं मेरे साथ इन वाटरफॉल्स को देखने की इच्छा जता चुके थे।  

Banaras Hindu University Gate : Varanasi 

बनारस पहुँचते ही एक गड़बड़ हो गई ! मुझे वाराणसी कैंट स्टेशन उतरना था लेकिन सुबह -सुबह 6 बजे अधखुली आँखों से वाराणसी कैंट से पहले के स्टेशन "बनारस " उतर गया।  परेशानी ख़ास नहीं थी क्यूंकि मुश्किल से दोनों स्टेशन के बीच की दूरी 7 -8 किलोमीटर ही होगी किन्तु , वाराणसी कैंट स्टेशन पर मेरा स्टूडेंट आशीर्वाद पाल सुबह से इंतज़ार कर रहा था और मैं गलती से एक स्टेशन पहले उतर गया :) फिर आशीर्वाद को फोन कर के सब कहानी बताई और वो बनारस स्टेशन आ गए कुछ देर में ही।  उधर संदीप भाई को तैयार होकर निकलने को कह दिया और मैं होटल से नहा धोकर जा पहुंचा BHU गेट , अपने एक और पाठक अमृतांशु श्रीवास्तव से मिलने।  BHU के अंदर मैं पहले जा चुका हूँ इसलिए अंदर जाने का कोई मतलब नहीं था , तब तक "आलू बॉन्डा " उदरस्थ कर लेते हैं , वैसे भी सुबह से चाय -चाय करते करते आंतें जल गई होंगी।  

Ganga Ghat : Kashi 

Rudra Convention Centre : Varanasi 

आगे बढ़ने से पहले मैं आपको वो 22  वाटरफॉल्स बताता हूँ जो मिर्ज़ापुर और उसके आसपास मौजूद हैं।  इन वाटरफॉल्स के बारे में जब "होमवर्क " कर रहा था तब केवल मुझे 15 वाटरफॉल्स के बारे में पता था लेकिन कुछ संदीप भाई का ज्ञान और कुछ स्थानीय लोगों का ज्ञान जब अपने कालीन भैया , चंद्रेश कुमार जी  के ज्ञान के साथ मिश्रित कर के जो प्रोडक्ट प्राप्त हुआ वो 22 वाटरफॉल्स का था।  तो अब एक लिस्ट तैयार हुई है इन 22  वाटरफॉल्स की : 

  आप चाहें तो मेरा ये वीडियो देख सकते हैं : 

Top 15 Waterfalls in Uttar Pradesh :  https://www.youtube.com/watch?v=N7onkbm5z3A

1 .  लखनिया दरी 
2.   सिद्धनाथ दरी 
3 .   राजदरी 
4 .   देवदरी 
5 .   विंढम फॉल 
6 .   टांडा फल 
7 .   जोगिया दरी 
8 .   सिसली फॉल 
9 .   चूना दरी 
10 . खड़ंजा फॉल 
11 . बकरियां फॉल 
12 . कुशियारा फॉल 
13 . खजूरी डैम वॉटरफॉल 
14 . जोगदहवा वॉटरफॉल 
15 . लतीफशाह डैम 
16 . मुक्खा फॉल 
17 . अलोपी दरी 
18.  नौका दरी 
19 . बद्री (बदरिया ) दरी 
20 . पंचशील की दरी (ठाड़े पत्थर ) 
21. नौगढ़ वाटर फॉल 
22 . नकटी दरी 

अब इतने सारे वाटरफॉल्स को न तो एक -चार दिन की ट्रिप में देखा जा सकता है और न ये संभव है।  आपको कम से कम एक सप्ताह चाहिए होगा इन सब जगहों तक पहुँचने के लिए।  मैं जो वाटरफॉल्स घूम पाया , पहले उनका जिक्र करेंगे फिर बाकी बचे हुए सभी वाटरफॉल्स तक पहुँचने का रास्ता और बाकी detail लिखूंगा।  

सिद्धनाथ दरी (Sidhanath Dari ) : चुनार रोड पर बनारस से करीब 50 किलोमीटर की दूरी पर स्थित सिद्धनाथ दरी बहुत जबरदस्त वॉटरफॉल है जहाँ बनारस और आसपास के लोग परिवार सहित पिकनिक मनाने जाते हैं।  शनिवार -रविवार को खूब भीड़ रहती है और रोड से बमुश्किल 100 मीटर अंदर ये वॉटरफॉल बहुत ही शानदार दिखता है लेकिन साफ़ -सफाई बिलकुल नहीं है।  आसपास यहाँ सैकड़ों छोटी -छोटी दुकानें "उग" आती हैं मानसून के मौसम में !



पंचशील की दरी (ठाड़े पत्थर ) Panchsheel ki Dari (Thade Patthar ) : इसी रोड पर राजगढ़ से कुछ और आगे चलकर है पंचशील की दरी वॉटरफॉल लेकिन ये खूबसूरत होने के बावजूद इतना famous नहीं है ! इसका एक कारण ये हो सकता है कि रोड से करीब तीन किलोमीटर हटकर है जहाँ  आप सिर्फ पैदल जा सकते हैं या अपना two wheeler ले जा सकते हैं।  कार भी हमे करीब दो किलोमीटर पहले ही खड़ी करनी पड़ी थी।  जंगलों के बीच से होकर गुजरता रास्ता एक बिलकुल सुनसान इलाके में लेकर जाता है इसलिए मैं अकेले जाने की सलाह नहीं दूंगा ! दो -तीन लोग हों तो बिलकुल जाइये और इस लगभग छुपे स्थान का आनंद लीजिये ! 



पहले दिन हम ये दो ही वाटरफॉल्स देख पाए और वापस लौट चले बनारस की तरफा।  अभी थोड़ा समय था , मौका भी था तो भगवान शिव के 'काशी -विश्वनाथ " दर्शन को क्यों न जाते ? 

अगले दिन बारिश ने अपना रौद्र रूप दिखा दिया।  सुबह 9 बजे शुरू हुई बारिश ने रुकने का नाम नहीं लिया और डेढ़ घण्टे तक अनवरत जारी रही।  ये डेढ़ घण्टा मैं , BHU गेट के सामने एक तिरपाल के नीचे खड़ा , बारिश रुकने  इंतज़ार में पूड़ी -जलेबी की खुशबु लेता रहा क्यूंकि पेटपूजा तो पहले ही कर चुका था।  

लगभग आधा दिन जा चुका था।  संदीप भाई और उनके मित्र के साथ आज हमारी गाडी नौगढ़ की तरफ दौड़ रही थी।  क्या खूबसूरत रास्ता है अप्रतिम !! हमने कई बार गाडी रोक -रोक के प्राकृतिक नजारों का न सिर्फ  आनंद लिया बल्कि खूब फोटोग्राफी और वीडियोग्राफी भी की।  इसकी सुंदरता का अंदाज़ा आप इस बात से लगा सकते हैं कि यहाँ पहली बार आने वाले लोगों की गाड़ियों की छत खुली हुई थी और  गाड़ियों  स्पीड बमुश्किल 10 किलोमीटर प्रति घण्टा रही होगी।  नव विवाहित जोड़े , खुली गाडी में धीरे -धीरे चलते हुए प्रकृति का आनंद उठा रहे थे।  कुछ देर के लिए सही , कुछ ही महीनों के लिए सही ये क्षेत्र शिमला -कुफरी -चैल जैसा हरा भरा दिखता है !  राजदरी-देवदरी वॉटरफॉल पहुँच गए लेकिन गाड़ियों की लम्बी लाइन लगी है अंदर जाने के लिए।   




राजदरी-देवदरी वॉटरफॉल (Rajdari Devdari Watefall )  : बनारस से करीब 70 किलोमीटर दूर ये दोनों वाटरफॉल्स शायद एकमात्र ऐसे वाटर फाल्स हैं जिनकी एंट्री टिकट लगती है 50 रूपये।  अत्यंत ही खूबसूरत ये दोनों वाटरफॉल्स लगभग एक किलोमीटर की दूरी पर हैं लेकिन दोनों का एंट्री गेट एक ही है और टिकट भी दोनों की एक ही है।  लेकिन मौसम में भयंकर भीड़ होती है , हाँ सार्वजनिक परिवहन की कोई व्यवस्था नहीं है इसलिए चंदौली / वाराणसी से अपना वाहन लेकर जाना बेहतर रहेगा।  रास्ता बहुत ही खूबसूरत है और अगर समय हो तो राजदरी -देवदरी से थोड़ा आगे नौगढ़ की तरफ होकर आइयेगा जहाँ आपको "Watch Tower " देखने को मिलेगा जिस पर चढ़कर आप यहाँ की अद्भुत प्राकृतिक छटा का आनंद उठा सकते हैं।  लौटने में संदीप भाई का बताया हुआ "छान पत्थर " वॉटरफॉल खोजने में हमें दो घंटे लग गए मगर  छानपत्थर कहीं नहीं मिला लेकिन इस दरम्यान मिर्ज़ापुर के गाँवों और "Real India " को देखने का एक अवसर जरूर मिला।  

PC: Chandresh Kumar 

PC: Chandresh Kumar 

PC: Chandresh Kumar 

लौटते हुए संदीप भाई ने , यहाँ की प्रसिद्ध और एकदम खूबसूरत "छातो वैली" (Chhatto Valley) का भी एक चक्कर लगवा दिया।  क्या गजब की जगह है छातो वैली ! जो मॉनसून के मौसम में सुंदरता और हरियाली के मामले में किसी भी हिल स्टेशन से होड़ करती हुई दिखती है।  छोटी -छोटी water streams इसकी सुंदरता में और बढ़ोत्तरी कर देती हैं।  हमारे पास समय की कमी थी और आज का सूरज डूबने की तरफ बढ़ रहा था इसलिए हम नौका दरी तक नहीं जा पाए।  आपके पास समय हो तो आप वहां जरूर जाइयेगा।  

दूसरा दिन खत्म हो चुका था और मैं रॉबर्ट्सगंज की बस पकड़ के निकल चुका था।  संदीप भाई का उपहारस्वरूप दिया हुआ "बनारसी गमछा" और  रसमलाई का डिब्बा अभी भी बैग की शोभा बढ़ा रहे थे जिनमें से मैंने रसमलाई रॉबर्ट्सगंज पहुँचते ही निपटा दी :)  बीच में मेरा एक दिन का  सोनभद्र  के रॉबर्ट्सगंज स्थित चंद्रकांता महल / विजयगढ़ फोर्ट और सलखन फॉसिल्स पार्क का भी प्लान था जिसका ब्लॉग बाद में लिखूंगा।  तो सोनभद्र से निपटकर मैं चल दिया मिर्ज़ापुर ! रात हो चुकी थी और करीब 11 बजे का टाइम था।  भूख के मारे बुरा हाल था मेरा , बंद होते खाने के होटलों  में से एक "पप्पू ढाबे " के आधे गिरे शटर को दोबारा ऊपर कराया -बोला ! एक ही सब्जी बची है ? मैंने कहा -दही है ? हाँ है ! बस फिर सब्जी हो न हो कोई बात नहीं -बस चार रोटी खिला दे ! पेट की गुड़गुड़ शांत हुई तो भारी बारिश से लबालब हुए मिर्ज़ापुर की गंध फेंक रही सडकों पर होटल लेने के लिए ऑटो में चक्कर काटता रहा।  जेल के सामने एक धर्मशाला मिली - दसवीं शताब्दी की बनी हुई प्रतीत होती थी ! लकड़ी की शहतीरों से बने कमरे और हवा का कोई प्रबंध नहीं ! पंखा अपनी अंतिम सांसें गिन रहा था। ..... नहीं भाई ! मैं नहीं रह पाऊंगा यहाँ ! इससे बेहतर तो मैं रेलवे स्टेशन पर जाकर रात गुजार लूंगा !! बोलै -थोड़े ज्यादा पैसे खर्च करोगे ? कितने ? 300 रुपया !! तो ये कमरा कितने का था जो अभी दिखाया !! 100 रूपये का !! मैं मन में बहुत हँसा ! 100 रूपये का। .... कहाँ चला आया मैं !! 300 रूपये का ऊपर की मंजिल पर कमरा मिल गया , हॉल टाइप ! तीन बेड पड़े थे जिन पर गंदे से गद्दे पड़े थे।  आज की रात नींद नहीं आएगी। ... सामने जेल का गेट दिखाई दे रहा था।  चादर मंगवाई। . सड़ी हुई सी थी इसलिए वापस कर दी , अपनी ही बिछा लूंगा।  मच्छरों ने हमला बोल दिया लेकिन शरीर की थकान , मच्छरों के हमले से ज्यादा तारी थी।  सो गया !! 

आज का दिन इधर अपना आखरी दिन था।  सुबह -सुबह विन्ध्वासिनी देवी मंदिर के दर्शन निकल पड़ा।  वहां से टांडा फॉल जाने का सोचा लेकिन ऑटो वाला 500 रूपये मांग रहा था इसलिए विंढम की तरफ बढ़ चला।  

विंढम वॉटरफॉल (Wyndham Waterfall) : उत्तर प्रदेश का शायद सबसे Famous Waterfall होगा विण्ढ़म वॉटरफॉल।  मिर्ज़ापुर से लगभग  13 किलोमीटर दूर बछराकलां के पास विण्ढ़म फॉल का नाम यहाँ कभी 13 वर्षों तक जिलाधिकारी रहे अंग्रेज़ अधिकारी पी विण्ढ़म  के नाम पर है जिनका जिक्र जिम कॉर्बेट ने भी अपनी किताब में किया है।  बहुत ही सुन्दर और शानदार वॉटरफॉल है ये और आसपास के लोगों के लिए "प्रिय पिकनिक स्पॉट" भी है।  फॉल के बाहर खाने -पीने की दुकानें हैं और रोड से वॉटरफॉल तक का करीब एक किलोमीटर का रास्ता देखने लायक है।   




खड़ंजा वॉटरफॉल (Khadanja Waterfall) : विंढम फॉल से बाहर रोड पर आकर आप जब मिर्ज़ापुर की तरफ करीब तीन किलोमीटर लौटेंगे तब आपको खड़ंजा वॉटरफॉल का बोर्ड दिखाई देगा।  Main Road से भी तीन किलोमीटर और अंदर होगा ये वॉटरफॉल लेकिन कोई Public Transport उपलब्ध नहीं है।  या तो अपना कोई वाहन हायर करके ले जाइये या फिर मेरी तरह किसी से लिफ्ट लीजिये। वॉटरफॉल ज्यादा सुन्दर नहीं है इसलिए अगर समय की कमी हो तो आप skip कर सकते हैं यहाँ जाना लेकिन हाँ ! रास्ता बहुत खूबसूरत है।  

लखनिया दरी (Lakhaniya Dari) : लखनिया दरी , मैं 2014 में एक बार जा चुका हूँ इसलिए न तो इस बार इतना वक्त निकाल पाया और न ही इस जगह को प्राथमिकता में रखा।  बनारस से रॉबर्ट्सगंज वाले रास्ते पर , अहरौरा से थोड़ा सा  आगे है ये वाटर फॉल।  रोड से थोड़ा यानी करीब एक किलोमीटर हटकर होगा जहाँ खूब भीड़भाड़ रहती है।  थोड़ा फिसलने से बचने का प्रयास करें और बच्चों का विशेष ध्यान रखें।  बनारस से करीब 55 किलोमीटर और चुनार से 35 किलोमीटर दूर पड़ता है ये वॉटरफॉल। कोशिश करियेगा कि भारी बारिश के बीच यहाँ न जाएँ क्योंकि कई बार यहाँ हादसे होते रहे हैं।  चूना दरी और बद्री दरी वॉटरफॉल भी इसके आसपास ही हैं जबकि करीब 15 किलोमीटर दूर लतीफशाह डैम है।  समय इजाजत दे तो आप एक और वॉटरफॉल जा सकते हैं जिसका मैंने लिस्ट में नाम नहीं दिया है और वो है -डूंगिया वॉटरफॉल ( Dungia Waterfall ) 

टाण्डा वॉटरफॉल (Tanda Waterfall) : बनारस से तो ये वॉटरफॉल दूर है करीब 80 किलोमीटर लेकिन मिर्ज़ापुर से बस 14 किलोमीटर ही है और बहुत ही शानदार दृश्य बनता है बारिश के मौसम में।  आसपास के लोग पिकनिक मनाने के लिए पहुँचते हैं लेकिन Public Transport नहीं मिलता आसानी से।  यहाँ जाएँ तो बोकरिया फॉल मत छोड़ना।  

अलोपी दरी (Alopi Dari) : अलोपी दरी बहुत ही खूबसूरत वॉटरफॉल है जहाँ नाममात्र की जनता पहुँचती है।  मिर्ज़ापुर के मड़िहान क्षेत्र के जंगलों में स्थित ये वॉटरफॉल अभी तक भीड़भाड़ से बचा हुआ है।  रोड से करीब 3 किलोमीटर अंदर है ये वॉटरफॉल और यहीं अलोपी माता का एक मंदिर भी है।  जब जाएँ तो अगरबत्ती का पैकेट भी ले जाएँ यहाँ जलाने के लिए।  Public transport नहीं है इसलिए अपने वाहन से जाएँ तो बेहतर ! यहीं पास में ही जोगिया दरी वॉटरफॉल भी है और थोड़ा और आगे जाकर  Jamithwa Dari भी है।  

मुक्खा वॉटरफॉल (Mukkha Fall) : रॉबर्ट्सगंज और घोरावल रोड पर एक जगह आती है सुकृत , यहाँ से करीब 3 किलोमीटर हटकर एक बहुत शानदार वॉटरफॉल है -मुक्खा वॉटरफॉल।  पब्लिक ट्रांसपोर्ट न के बराबर है इसलिए या तो आप गाडी हायर करके जाएँ या फिर घोरावल से ऑटो किराए पर ले जा सकते हैं।  

बाकी जो वाटरफॉल्स हैं वो कम प्रसिद्ध हैं और बहुत सुन्दर भी नहीं हैं इसलिए लिखने का कोई प्रयोजन नहीं बनता।  आप चाहें तो गूगल मैप में जाकर उनकी लोकेशन पता कर सकते हैं और विस्तृत जानकारी ले सकते हैं।  

बहुत धन्यवाद !! अगले मानसून में संभवतः मैं भी आपको इन जगहों पर भटकता हुआ मिल जाऊं फिर से ........



मंगलवार, 9 मार्च 2021

Places to visit in Vrindavan : Mathura

 मथुरा - वृन्दावन जाना मेरे लिए ऐसा है जैसे मैं अपने घर जा रहा हूँ लेकिन घर के आसपास भी कभी  कभी इतना कुछ छूट जाता है कि उसे देखने के लिए बार -बार जाना होता है।  कुछ नहीं भी छूटे तब भी घर की रोटी का स्वाद लेते रहना चाहिए।  वो ही स्वादिष्ट पेड़े , वही गिलास भर के मीठी चाय जिसमे पानी नाम मात्र के लिए डालते हैं लेकिन गाजियाबाद ने और आज की परिस्थितियों ने आदत बिगाड़ दी है।  पेट मोटा हो गया है इसलिए ज्यादा मीठा नहीं खा पाता और अब काली चाय ज्यादा पसंद आती है।  हमाये ब्रज में जब चाय बनती है तब एक बात जरूर बोली जांत है - पत्ती रोक कें , चीनी ठोक कें !! समझि तो गए ई हुंगे तुम और अगर समझ में न आई होय तो मौय पूछ लियों !! ठीक है सा !! राधे -राधे !! वृन्दावन चलते हैं ग़ाज़ियाबाद से !! 



दिल्ली -गाजियाबाद से वृन्दावन आसानी से पहुंचा जा सकता है।  बहुत सी ट्रेन , बस चलती ही रहती हैं। होटल भी बहुत सारे हैं और खाने के लिए भी सब तरह का खाना उपलब्ध है।  अब सीधा बात करते हैं भगवान श्री कृष्ण की पवित्र और श्रद्धामयी नगरी वृन्दावन की  घूमने वाली जगहों की ! 


गाजियाबाद रेलवे स्टेशन 

मथुरा रेलवे स्टेशन 

1. बांके बिहारी मंदिर :  बांके बिहारी मंदिर वृंदावन धाम में रमण रेती पर स्थित है। यह भारत के प्राचीन और प्रसिद्ध मंदिरों में से एक है। बांके बिहारी कृष्ण का ही एक रूप है जो इसमें प्रदर्शित किया गया है। इसका निर्माण 1864 में स्वामी हरिदास ने करवाया था। हरिदासजी को रसनिधि सखी का अवतार माना गया है। ये बचपन से ही संसार से ऊबे रहते थे। किशोरावस्था में इन्होंने आशुधीर जी से युगल मन्त्र दीक्षा ली तथा यमुना के समीप निकुंज में एकान्त स्थान पर जाकर ध्यान-मग्न रहने लगे। जब ये 25 वर्ष के हुए तब इन्होंने अपने गुरु जी से विरक्तावेष प्राप्त किया एवं संसार से दूर होकर निकुंज बिहारी जी के नित्य लीलाओं का चिन्तन करने में रह गये। निकुंज वन में ही स्वामी हरिदासजी को बिहारीजी की मूर्ति निकालने का स्वप्नादेश हुआ था। तब उनकी आज्ञानुसार मनोहर श्यामवर्ण छवि वाले श्रीविग्रह को धरा को गोद से बाहर निकाला गया। यही सुन्दर मूर्ति जग में श्रीबाँकेबिहारी जी के नाम से विख्यात हुई ! इस मूर्ति को मार्गशीर्ष, शुक्ला के पंचमी तिथि को निकाला गया था। अतः प्राकट्य तिथि को हम विहार पंचमी के रूप में बड़े ही उल्लास के साथ मानते है। 

                                   

2. प्रेम मंदिर प्रेम मंदिर का निर्माण जगद्गुरु कृपालु महाराज द्वारा भगवान कृष्ण और राधा के मन्दिर के रूप में करवाया गया है। प्रेम मन्दिर का लोकार्पण 17 फरवरी 2012 को किया गया था जबकि शिलान्यास 14 जनवरी 2001 को कृपालुजी महाराज द्वारा किया गया था। इतने कम समय में प्रेम मंदिर ने बहुत प्रसिद्धि पा ली है ! दो मंजिल के इस मंदिर में भूतल यानी ग्राउण्ड फ्लोर पर भगवान् श्री कृष्ण और राधा जी विराजमान हैं जबकि पहली मंजिल पर राम दरबार है ! प्रवेश द्वार के पास ही भगवान श्रीकृष्ण द्वारा किये गए कालिया नाग के वध को प्रदर्शित किया गया है।  शाम की अलग अलग रंगों की रौशनी में इस मंदिर को देखने का अनुभव जीवनपर्यन्त याद रखने वाला होता है !







3. रंगजी या रंगनाथ मंदिर : रंगजी मंदिर वृंदावन के कुछ उन गिने चुने मंदिरों में से एक है जो श्रेष्ठ द्रविड वास्तुशिल्प शैली में बना है। इसे 1851 में बनवाया गया था और इसमें मुख्य देवता के रूप में श्री रंगनाथ या रंगजी विराजमान हैं। ... यह मंदिर वृंदावन के बड़े और भगवान विष्णु को समर्पित मंदिरों में से एक है। रंगजी भगवान विष्णु के साकार रूप हैं। दक्षिण भारत के संत स्वामी रंगाचार्य महाराज ने करीब पांच सौ साल पहले वृंदावन को अपनी साधना स्थली के रूप में अंगीकार किया था। रामानुज संप्रदाय के आचार्यो ने वृंदावन में श्रीरंग मंदिर के नाम से आचार्य पीठ की स्थापना की। करीब डेढ़ सौ वर्ष पहले उनके मथुरा निवासी शिष्यों राधाकृष्ण, सेठ गोविंद दास एवं सेठ लक्ष्मीचन्द्र ने रंगजी मंदिर का निर्माण कराया। ब्रह्मोत्सव में श्री गोदारंगमन्नार भगवान स्वर्ण-रजत निर्मित रथ पर सवार होकर नगर भ्रमण को निकलते हैं। 60 फीट ऊंचा सोने का खंभा-ऊंचे परकोटे वाले मंदिर में सात परिक्रमा हैं तो पश्चिम द्वार पर सात मंजिली ऊंचा शिखर है। मंदिर की चतुर्थ परिक्रमा के विशाल प्रांगण में गरुड़ स्तम्भ (स्वर्ण स्तम्भ) है, जो कि 60 फीट ऊंचा है और पूरा स्वर्ण जड़ित है। इसी कारण इसे सोने के खंभे वाला मंदिर भी कहा जाता है। प्रांगण में दक्षिण भारतीय संस्कृति के प्रतीक गोपुरम एवं मण्डपम निर्मित हैं। सिंह दरवाजे की ओर का गोपुरम 6 कोष्ठ वाला है एवं पूर्व की ओर का गोपुरम 5 कोष्ठ का है। पूर्व दरवाजे से प्रवेश करते ही सामने 16 स्तंभों पर टिकी विशाल बारहद्वारी है।







4. शाह जी मन्दिर :  यह मन्दिर वास्तुकला, चित्रकला तथा शानदार मूर्तिकला का अद्भुत समन्वय है। श्वेत संगमरमर के इस अत्यन्त आकर्षक मन्दिर की विशेषता है कि इसके खम्बे सर्पाकार में एक ही पत्थर की शिला से निर्मित हैं। पत्थर में जड़ाऊ काम के चित्र भी यहाँ अद्भुत हैं। इस मंदिर को स्थानीय लोग टेढ़े खम्भे वाले मंदिर के नाम से भी जानते हैं।  मंदिर के प्रवेश द्वार के दाएं हाथ की तरफ ही एक और सुन्दर जगह है -निधि वन नाम से।  शाह जी मंदिर जाएँ तो बंदरों का विशेष ध्यान रखिये ! वो आपके हाथ में दिखने वाली हर चीज को आपके हाथ से छीन के ले जा सकते हैं -चाहे वो आपका फ़ोन , पर्स , कैप यहाँ तक कि पानी की बोतल भी ! 








5. गोविन्द देव मंदिर : गोविन्द देव जी का मंदिर वृंदावन में स्थित वैष्णव संप्रदाय का मंदिर है। इसका निर्माण 1590 ई. में हुआ था। इस मंदिर के शिला लेख से यह जानकारी पूरी तरह सुनिश्चित हो जाती है कि इस भव्य देवालय को आमेर के राजा भगवान दास के पुत्र राजा मानसिंह ने बनवाया था। रूप गोस्वामी एवं सनातन गोस्वामी नामक दो वैष्णव गुरूऔं की देखरेख में मंदिर के निर्माण होने का उल्लेख भी मिलता है। जेम्स फर्गूसन, प्रसिद्ध इतिहासकार ने लिखा है कि यह मन्दिर भारत के मन्दिरों में बड़ा शानदार है। मंदिर की भव्यता का अनुमान इस उद्धरण से लगाया जा सकता है 'औरंगज़ेब ने शाम को टहलते हुए, दक्षिण-पूर्व में दूर से दिखने वाली रौशनी के बारे जब पूछा तो पता चला कि यह चमक वृन्दावन के वैभवशाली मंदिरों की है। औरंगज़ेब, मंदिर की चमक से परेशान था, समाधान के लिए उसने तुरंत कार्यवाही के रूप में सेना भेजी। मंदिर, जितना तोड़ा जा सकता था उतना तोड़ा गया और शेष पर मस्जिद की दीवार, गुम्बद आदि बनवा दिए। (सात मंज़िल थीं आज केवल चार ही मौजूद हैं)



​6 . मदनमोहन मंदिर मदन मोहन जी का मंदिर वृंदावन में स्थित एक वैष्णव संप्रदाय का मंदिर है। इसका निर्माण संभवतः 1590 से 1627 के बीच में मुल्तान निवासी श्री रामदास खत्री एवं कपूरी द्वारा करवाया गया था। इसी नाम से एक मंदिर कालीदह घाट के समीप शहर के दूसरी ओर ऊँचे टीले पर विद्यमान है। 


​7. कालीदह मंदिर : 


8. इस्कॉन मंदिर ( अंग्रेज़ों का मंदिर ) : इस मंदिर की स्थापना श्रीकृष्णकृपा श्रीमूर्ति श्री अभय चरणारविन्द भक्तिवेदांत स्वामी प्रभुपाद ने की थी. आपको बता दें, ISKCON का पूरा नाम International Society for Krishna Consciousness है. जिसे हिंदी में अंतरराष्ट्रीय कृष्णभावनामृत संघ या इस्कॉन कहा जाता है. इस मंदिर का पावन भजन "हरे रामा हरे रामा कृष्णा" है



​9 पागल बाबा मंदिर : सब मंदिरों में एक मंदिर बहुत ज्यादा खास है और इस मंदिर का नाम है ‘पागल बाबा मंदिर’। आपको बता दें कि इस मंदिर का ‘पागल बाबा’ द्वारा कराया गया था और इस मंदिर को मॉडर्न वास्तुकला का उदाहरण भी माना जाता है।​ इस मंदिर के पीछे की कहानी कुछ यूं है कि पौराणिक कथायों की माने तो बांके बिहारी का एक गरीब ब्राह्मण बहुत बड़ा भक्त था। एक बार उसने एक महाजन से कुछ रुपए उधार लिए थे और हर महीने उसे थोड़ा-थोड़ा करके चुकता रहता था। जब लास्ट किस्त रह गई तब महाजन ने उसे अदालती नोटिस भेज दिया कि अभी तक उसने उधार चुकता नहीं किया है इसलिए पूरी रकम ब्याज वापस करे। 

ऐसे में ब्राह्मण बहुत परेशान हो गया था। उसने महाजन के पास जाकर बहुत सफाई दी लेकिन महाजन अपने दावे से टस से मस नहीं हुआ और मामला कोर्ट तक पहुंच गया। कोर्ट में भी ब्राह्मण ने जज से यही कहा कि उसने सारा पैसा चुका दिया है और महाजन झूठ बोल रहा है। जज ने पूछा कोई गवाह है जिसके सामने तुम महाजन को पैसा देते थे। थोड़ी देर रुक कर और सोच कर ब्राह्मण ने कहा, “मेरे हिस्से की गवाही बांके बिहारी देंगे।“ 

ऐसे में अदालत ने गवाह का पता पूछा तो ब्राह्मण ने बताया, “बांके बिहारी वल्द वासुदेव, बांके बिहारी मंदिर वृंदावन।“ ऐसे में इस पते पर सम्मन जारी कर दिया गया। ब्राह्मण ने सम्मन को मूर्ति के सामने रखकर कहा, ‘‘बांके बिहारी आपको गवाही देने कचहरी आना है।'' इसके बाद यह हुआ कि गवाही के दिन सचमुच एक बूढ़ा आदमी जज के सामने खड़ा होकर बता गया कि पैसे देते समय मैं साथ होता था और साथ ही यह भी बता गया कि कब-कब रकम वापस की गई थी। 

जब जज ने सेठ का बहीखाता देखा तो गवाही सच निकली। रकम दर्ज थी और नाम फर्जी डाला गया था। जज ने ब्राह्मण को निर्दोष करार दे दिया। महाजन के मन में उथल-पुथल मच गई और उसने ब्राह्मण से पूछा कि वो बूढ़ा आदमी कौंन था। ब्राह्मण ने बताया कि वह तो सर्वत्र रहता है, गरीबों की मदद के लिए अपने आप आता है। इसके बाद जज साहब ब्राह्मण से बोले की यह आदमी कौन थे जो गवाही देकर चले गए? ब्राह्मण बोला “अरे जज साहब यही तो मेरा ठाकुर था। जो भक्त की दुविधा देख ना सका और भरोसे की लाज बचाने आ गया।“ 

इतना सुनने के बाद जज ब्राह्मण के चरणों में लेट गए और बांके बिहारी का पता पूछा। इस सवाल के जवाब में ब्राह्मण ने यही कहा, “मेरा ठाकुर तो सर्वत्र है वो तो हर जगह है।“ इसके बाद जज अपना घरबार और सारा काम-धंधा सब छोड़ ठाकुर को ढूंढने के लिए निकल गया और फकीर बन गया। जब वो बहुत साल बाद वृंदावन लौट कर आया तो लोग उसे पागल बाबा के नाम से जानने लगे। पागल बाबा मंदिर’ दस मंजिल का बना हुआ है और इस मंजिल के उपरी भाग से वृन्दावन को बखूबी निहारा जा सकता है। 

इस मंदिर के निचले भाग में पूरे साल कठपुतली डांस आयोजित किया जाता है। 


10. वैष्णो देवी मंदिर : जम्मू के वैष्णो देवी की तर्ज पर वृंदावन में बने इस मंदिर की अपनी एक अलग मान्यता है। लोगों के अनुसार आज भी इस मंदिर की रक्षा हनुमान जी करते हैं। इस मंदिर में स्थापित मां की मूर्ति की ऊंचाई को लेकर इसका नाम लिम्का बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड में दर्ज है।

11. निधिवन : धार्मिक नगरी वृन्दावन में निधिवन एक अत्यन्त पवित्र, रहस्यमयी धार्मिक स्थान है। मान्यता है कि निधिवन में भगवान श्रीकृष्ण एवं श्रीराधा आज भी अर्द्धरात्रि के बाद रास रचाते हैं। रास के बाद निधिवन परिसर में स्थापित रंग महल में शयन करते हैं।


                                                



मंगलवार, 27 अक्तूबर 2020

Maheshwar : The Land of Maharani Ahilyabai

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          Date of Journey : 07 Dec.2019 
          
महेश्वर : मध्य प्रदेश

उज्जैन पहुँचते -पहुँचते तीन बज गए थे दोपहर के और मेरे जो मित्र लोग थे हमारे GDS ग्रुप के , वो मंदिर में दर्शन की लाइन में लगे थे। संपर्क मुश्किल हो रहा था क्यूंकि फ़ोन सभी के बाहर ही रखवा लिए जाते हैं। GDS -जानते तो होंगे आप ? घुमक्कड़ी दिल से , हमारा एक फेसबुक ग्रुप है जिसके 50 हजार से ज्यादा सदस्य हैं। और बात चली है तो ये भी बताता जाऊं कि GDS परिवार का ये वार्षिक मिलन समारोह था जिसमें हम सभी मित्रों को भारत के कोने -कोने से महेश्वर पहुंचना था। सही पहचाना आपने - पवित्र नर्मदा के किनारे बसा महारानी अहिल्याबाई का शहर महेश्वर जिसके नाम में ही पवित्र होने का संकेत मिलता है !! GDS परिवार का ये मिलन , चौथा मिलन था। जबकि इससे पहले , ओरछा में 2016 में पहला समारोह हुआ , 2017 में रांसी (उत्तराखंड ) में दूसरा और 2018 में जैसलमेर में तीसरा मिलन हो चूका था। ये चौथा मिलन समारोह था 2019 का ! आप कल्पना करिये - आप ऐसे लोगों से मिलते हैं जो भारत के अलग -अलग दिशाओं , अलग -अलग प्रांतों और शहरों से आते हैं और एक परिवार के नाम से , एक छत के नीचे ऐसे मिलते हैं जैसे पिछले जन्म के कोई सगे सम्बन्धी रहे हों। अद्भुत ग्रुप है GDS और मैं इस ग्रुप के साथ जुड़कर स्वयं को सम्मानित और गौरवान्वित महसूस करता हूँ। 

 आज का दिन अच्छा था। उज्जैन के महाकाल मंदिर में दर्शन के लिए हमेशा लम्बी लाइन लगती है लेकिन मैं मुश्किल से 20 मिनट में दर्शन करके बाहर आ चुका था। जय महाकाल !! 

आज 7 दिसंबर 2019 है !! मैंने थोड़ा आगे जाकर उज्जैन के बाहर अपनी टीम की बस को आखिर पकड़ ही लिया और पकड़ा भी कहाँ ? खाना खाते हुए एक होटल पर। खैर अब इंदौर के लिए प्रस्थान कर चुके थे और बस सरसराती हुई इंदौर की तरफ उडी जा रही थी जहाँ ग्रुप के ही दो तीन परिवार इंतज़ार में थे। डॉ सुमित शर्मा और GDS के संस्थापक माननीय भालसे परिवार ने जो स्वागत किया उसने हम सभी को अभिभूत कर दिया।  

रात के एक बजे के आसपास महेश्वर की सीमा में प्रवेश कर गए थे। सभी लगभग निद्रा वाली अवस्था में थे और अपने गंतव्य तक पहुँचते पहुँचते रजाई उठाकर लंबलेट हो चुके थे। मैं अपने लिए रजाई और गद्दा ढूंढ ही रहा था कि मुंबई से पधारे विनोद गुप्ता जी , मेरी आँखों के सामने से रजाई गद्दे को उठा ले गए। उनकी भी मजबूरी थी। पत्नी और दो बच्चे थे उनके साथ और अगर पत्नी की सेवा न करते इस वक्त तो भारी पड़ सकता था। मैंने भी आखिर कहीं से अपना इंतेज़ाम कर ही लिया। ठण्ड वाली रात थी , सिकुड़ना नहीं था। 

अगली सुबह एक नई जगह की खुशबू से सराबोर थी। ऐसे जल्दी नहीं जाग पाता हूँ लेकिन उस दिन पता नहीं क्यों और कैसे आँखें जल्दी खुल गईं ! बाहर निकल के देखा कि कहीं चाय -वाय का इंतेज़ाम है क्या ? लेकिन सब सिकुड़े हुए से गहरी नींद में थे -चाय की तो क्या बात करें ! ये आदत मेरी वाइफ की बिगाड़ी हुई है , मेरी कोई गलती नहीं ! वो खुद जल्दी जग जाती है और चाय बना लेती है फिर मुझे जगाती है , यहाँ भी उसी आदत के कारण चाय की प्यास लगी थी लेकिन यहाँ कौन इतना जल्दी चाय पिलाता मुझे ? यहाँ कौन है तेरा....... मुसाफिर 


कोई न कोई तो इस दुनियां में है जो आपका भी ध्यान रखेगा। निकल चले नर्मदा घाट की ओर। दुकानें सजी हैं मंदिर के सामने ही। ज्यादातर प्रसाद की हैं लेकिन चाय ? मिल गई मिल गई ! अहा ....ऐसे लगा जैसे प्राणों को यमराज से फिर मांग लाया होऊं ....कुछ देर के लिए ! 

बहुत ही छोटा कप मिला चाय का .....  दो घूँट मारे और चाय खत्म , फिर एक और ली .. फिर एक और ली ! तीन कप चाय पीने के बाद कुछ लगा पेट को और बोला -हाँ ! मालिक , अब ज़रा कुछ संतुष्टि मिली !! मेरा पेट भी मेरे साथ ही रहता है ज्यादातर.. . यात्रा में भी ... भावनाओं में भी। ये मेरी बात मान लेता है और मैं इसकी .. लेकिन आजकल ये अपने साइज से कुछ बड़ा हो गया है ज्यादा खा खा के।



सुबह -सुबह का अदभुत नजारा देख रही थीं मेरी आँखें और स्वयं को सौभाग्यशाली मानते हुए आपस मैं बातें कर रही थीं दोनों जुड़वाँ बहनें और मैं .......चुपके से कनखियों से उनका वार्तालाप सुने जा रहा था।  भारत के सबसे पवित्र नदियों में से एक नर्मदा का किनारा हो , कल कल करती जलधारा हो , हाथ में चाय का कप हो और सामने दूर .....क्षितिज में प्रकृति अपने अनन्य रूप में आभा बिखेरने को उतावली हुई जा रही हो तो ऐसे में कौन ना बैरागी हो जाएगा ? कैमरे का शटर खोल के जीवन के इन क्षणों को कैद कर लेना भी तो जरुरी है जिससे जब मैं बुजुर्ग हो जाऊँगा तब कम से कम इन्हें देखकर अपने अकेलेपन का साथी तो बना सकूंगा अपनी इन यादों को !! .....बाकी बातें कल करेंगे 











धन्यवाद् !!