मंगलवार, 9 मार्च 2021

Places to visit in Vrindavan : Mathura

 मथुरा - वृन्दावन जाना मेरे लिए ऐसा है जैसे मैं अपने घर जा रहा हूँ लेकिन घर के आसपास भी कभी  कभी इतना कुछ छूट जाता है कि उसे देखने के लिए बार -बार जाना होता है।  कुछ नहीं भी छूटे तब भी घर की रोटी का स्वाद लेते रहना चाहिए।  वो ही स्वादिष्ट पेड़े , वही गिलास भर के मीठी चाय जिसमे पानी नाम मात्र के लिए डालते हैं लेकिन गाजियाबाद ने और आज की परिस्थितियों ने आदत बिगाड़ दी है।  पेट मोटा हो गया है इसलिए ज्यादा मीठा नहीं खा पाता और अब काली चाय ज्यादा पसंद आती है।  हमाये ब्रज में जब चाय बनती है तब एक बात जरूर बोली जांत है - पत्ती रोक कें , चीनी ठोक कें !! समझि तो गए ई हुंगे तुम और अगर समझ में न आई होय तो मौय पूछ लियों !! ठीक है सा !! राधे -राधे !! वृन्दावन चलते हैं ग़ाज़ियाबाद से !! 



दिल्ली -गाजियाबाद से वृन्दावन आसानी से पहुंचा जा सकता है।  बहुत सी ट्रेन , बस चलती ही रहती हैं। होटल भी बहुत सारे हैं और खाने के लिए भी सब तरह का खाना उपलब्ध है।  अब सीधा बात करते हैं भगवान श्री कृष्ण की पवित्र और श्रद्धामयी नगरी वृन्दावन की  घूमने वाली जगहों की ! 


गाजियाबाद रेलवे स्टेशन 

मथुरा रेलवे स्टेशन 

1. बांके बिहारी मंदिर :  बांके बिहारी मंदिर वृंदावन धाम में रमण रेती पर स्थित है। यह भारत के प्राचीन और प्रसिद्ध मंदिरों में से एक है। बांके बिहारी कृष्ण का ही एक रूप है जो इसमें प्रदर्शित किया गया है। इसका निर्माण 1864 में स्वामी हरिदास ने करवाया था। हरिदासजी को रसनिधि सखी का अवतार माना गया है। ये बचपन से ही संसार से ऊबे रहते थे। किशोरावस्था में इन्होंने आशुधीर जी से युगल मन्त्र दीक्षा ली तथा यमुना के समीप निकुंज में एकान्त स्थान पर जाकर ध्यान-मग्न रहने लगे। जब ये 25 वर्ष के हुए तब इन्होंने अपने गुरु जी से विरक्तावेष प्राप्त किया एवं संसार से दूर होकर निकुंज बिहारी जी के नित्य लीलाओं का चिन्तन करने में रह गये। निकुंज वन में ही स्वामी हरिदासजी को बिहारीजी की मूर्ति निकालने का स्वप्नादेश हुआ था। तब उनकी आज्ञानुसार मनोहर श्यामवर्ण छवि वाले श्रीविग्रह को धरा को गोद से बाहर निकाला गया। यही सुन्दर मूर्ति जग में श्रीबाँकेबिहारी जी के नाम से विख्यात हुई ! इस मूर्ति को मार्गशीर्ष, शुक्ला के पंचमी तिथि को निकाला गया था। अतः प्राकट्य तिथि को हम विहार पंचमी के रूप में बड़े ही उल्लास के साथ मानते है। 

                                   

2. प्रेम मंदिर प्रेम मंदिर का निर्माण जगद्गुरु कृपालु महाराज द्वारा भगवान कृष्ण और राधा के मन्दिर के रूप में करवाया गया है। प्रेम मन्दिर का लोकार्पण 17 फरवरी 2012 को किया गया था जबकि शिलान्यास 14 जनवरी 2001 को कृपालुजी महाराज द्वारा किया गया था। इतने कम समय में प्रेम मंदिर ने बहुत प्रसिद्धि पा ली है ! दो मंजिल के इस मंदिर में भूतल यानी ग्राउण्ड फ्लोर पर भगवान् श्री कृष्ण और राधा जी विराजमान हैं जबकि पहली मंजिल पर राम दरबार है ! प्रवेश द्वार के पास ही भगवान श्रीकृष्ण द्वारा किये गए कालिया नाग के वध को प्रदर्शित किया गया है।  शाम की अलग अलग रंगों की रौशनी में इस मंदिर को देखने का अनुभव जीवनपर्यन्त याद रखने वाला होता है !







3. रंगजी या रंगनाथ मंदिर : रंगजी मंदिर वृंदावन के कुछ उन गिने चुने मंदिरों में से एक है जो श्रेष्ठ द्रविड वास्तुशिल्प शैली में बना है। इसे 1851 में बनवाया गया था और इसमें मुख्य देवता के रूप में श्री रंगनाथ या रंगजी विराजमान हैं। ... यह मंदिर वृंदावन के बड़े और भगवान विष्णु को समर्पित मंदिरों में से एक है। रंगजी भगवान विष्णु के साकार रूप हैं। दक्षिण भारत के संत स्वामी रंगाचार्य महाराज ने करीब पांच सौ साल पहले वृंदावन को अपनी साधना स्थली के रूप में अंगीकार किया था। रामानुज संप्रदाय के आचार्यो ने वृंदावन में श्रीरंग मंदिर के नाम से आचार्य पीठ की स्थापना की। करीब डेढ़ सौ वर्ष पहले उनके मथुरा निवासी शिष्यों राधाकृष्ण, सेठ गोविंद दास एवं सेठ लक्ष्मीचन्द्र ने रंगजी मंदिर का निर्माण कराया। ब्रह्मोत्सव में श्री गोदारंगमन्नार भगवान स्वर्ण-रजत निर्मित रथ पर सवार होकर नगर भ्रमण को निकलते हैं। 60 फीट ऊंचा सोने का खंभा-ऊंचे परकोटे वाले मंदिर में सात परिक्रमा हैं तो पश्चिम द्वार पर सात मंजिली ऊंचा शिखर है। मंदिर की चतुर्थ परिक्रमा के विशाल प्रांगण में गरुड़ स्तम्भ (स्वर्ण स्तम्भ) है, जो कि 60 फीट ऊंचा है और पूरा स्वर्ण जड़ित है। इसी कारण इसे सोने के खंभे वाला मंदिर भी कहा जाता है। प्रांगण में दक्षिण भारतीय संस्कृति के प्रतीक गोपुरम एवं मण्डपम निर्मित हैं। सिंह दरवाजे की ओर का गोपुरम 6 कोष्ठ वाला है एवं पूर्व की ओर का गोपुरम 5 कोष्ठ का है। पूर्व दरवाजे से प्रवेश करते ही सामने 16 स्तंभों पर टिकी विशाल बारहद्वारी है।







4. शाह जी मन्दिर :  यह मन्दिर वास्तुकला, चित्रकला तथा शानदार मूर्तिकला का अद्भुत समन्वय है। श्वेत संगमरमर के इस अत्यन्त आकर्षक मन्दिर की विशेषता है कि इसके खम्बे सर्पाकार में एक ही पत्थर की शिला से निर्मित हैं। पत्थर में जड़ाऊ काम के चित्र भी यहाँ अद्भुत हैं। इस मंदिर को स्थानीय लोग टेढ़े खम्भे वाले मंदिर के नाम से भी जानते हैं।  मंदिर के प्रवेश द्वार के दाएं हाथ की तरफ ही एक और सुन्दर जगह है -निधि वन नाम से।  शाह जी मंदिर जाएँ तो बंदरों का विशेष ध्यान रखिये ! वो आपके हाथ में दिखने वाली हर चीज को आपके हाथ से छीन के ले जा सकते हैं -चाहे वो आपका फ़ोन , पर्स , कैप यहाँ तक कि पानी की बोतल भी ! 








5. गोविन्द देव मंदिर : गोविन्द देव जी का मंदिर वृंदावन में स्थित वैष्णव संप्रदाय का मंदिर है। इसका निर्माण 1590 ई. में हुआ था। इस मंदिर के शिला लेख से यह जानकारी पूरी तरह सुनिश्चित हो जाती है कि इस भव्य देवालय को आमेर के राजा भगवान दास के पुत्र राजा मानसिंह ने बनवाया था। रूप गोस्वामी एवं सनातन गोस्वामी नामक दो वैष्णव गुरूऔं की देखरेख में मंदिर के निर्माण होने का उल्लेख भी मिलता है। जेम्स फर्गूसन, प्रसिद्ध इतिहासकार ने लिखा है कि यह मन्दिर भारत के मन्दिरों में बड़ा शानदार है। मंदिर की भव्यता का अनुमान इस उद्धरण से लगाया जा सकता है 'औरंगज़ेब ने शाम को टहलते हुए, दक्षिण-पूर्व में दूर से दिखने वाली रौशनी के बारे जब पूछा तो पता चला कि यह चमक वृन्दावन के वैभवशाली मंदिरों की है। औरंगज़ेब, मंदिर की चमक से परेशान था, समाधान के लिए उसने तुरंत कार्यवाही के रूप में सेना भेजी। मंदिर, जितना तोड़ा जा सकता था उतना तोड़ा गया और शेष पर मस्जिद की दीवार, गुम्बद आदि बनवा दिए। (सात मंज़िल थीं आज केवल चार ही मौजूद हैं)



​6 . मदनमोहन मंदिर मदन मोहन जी का मंदिर वृंदावन में स्थित एक वैष्णव संप्रदाय का मंदिर है। इसका निर्माण संभवतः 1590 से 1627 के बीच में मुल्तान निवासी श्री रामदास खत्री एवं कपूरी द्वारा करवाया गया था। इसी नाम से एक मंदिर कालीदह घाट के समीप शहर के दूसरी ओर ऊँचे टीले पर विद्यमान है। 


​7. कालीदह मंदिर : 


8. इस्कॉन मंदिर ( अंग्रेज़ों का मंदिर ) : इस मंदिर की स्थापना श्रीकृष्णकृपा श्रीमूर्ति श्री अभय चरणारविन्द भक्तिवेदांत स्वामी प्रभुपाद ने की थी. आपको बता दें, ISKCON का पूरा नाम International Society for Krishna Consciousness है. जिसे हिंदी में अंतरराष्ट्रीय कृष्णभावनामृत संघ या इस्कॉन कहा जाता है. इस मंदिर का पावन भजन "हरे रामा हरे रामा कृष्णा" है



​9 पागल बाबा मंदिर : सब मंदिरों में एक मंदिर बहुत ज्यादा खास है और इस मंदिर का नाम है ‘पागल बाबा मंदिर’। आपको बता दें कि इस मंदिर का ‘पागल बाबा’ द्वारा कराया गया था और इस मंदिर को मॉडर्न वास्तुकला का उदाहरण भी माना जाता है।​ इस मंदिर के पीछे की कहानी कुछ यूं है कि पौराणिक कथायों की माने तो बांके बिहारी का एक गरीब ब्राह्मण बहुत बड़ा भक्त था। एक बार उसने एक महाजन से कुछ रुपए उधार लिए थे और हर महीने उसे थोड़ा-थोड़ा करके चुकता रहता था। जब लास्ट किस्त रह गई तब महाजन ने उसे अदालती नोटिस भेज दिया कि अभी तक उसने उधार चुकता नहीं किया है इसलिए पूरी रकम ब्याज वापस करे। 

ऐसे में ब्राह्मण बहुत परेशान हो गया था। उसने महाजन के पास जाकर बहुत सफाई दी लेकिन महाजन अपने दावे से टस से मस नहीं हुआ और मामला कोर्ट तक पहुंच गया। कोर्ट में भी ब्राह्मण ने जज से यही कहा कि उसने सारा पैसा चुका दिया है और महाजन झूठ बोल रहा है। जज ने पूछा कोई गवाह है जिसके सामने तुम महाजन को पैसा देते थे। थोड़ी देर रुक कर और सोच कर ब्राह्मण ने कहा, “मेरे हिस्से की गवाही बांके बिहारी देंगे।“ 

ऐसे में अदालत ने गवाह का पता पूछा तो ब्राह्मण ने बताया, “बांके बिहारी वल्द वासुदेव, बांके बिहारी मंदिर वृंदावन।“ ऐसे में इस पते पर सम्मन जारी कर दिया गया। ब्राह्मण ने सम्मन को मूर्ति के सामने रखकर कहा, ‘‘बांके बिहारी आपको गवाही देने कचहरी आना है।'' इसके बाद यह हुआ कि गवाही के दिन सचमुच एक बूढ़ा आदमी जज के सामने खड़ा होकर बता गया कि पैसे देते समय मैं साथ होता था और साथ ही यह भी बता गया कि कब-कब रकम वापस की गई थी। 

जब जज ने सेठ का बहीखाता देखा तो गवाही सच निकली। रकम दर्ज थी और नाम फर्जी डाला गया था। जज ने ब्राह्मण को निर्दोष करार दे दिया। महाजन के मन में उथल-पुथल मच गई और उसने ब्राह्मण से पूछा कि वो बूढ़ा आदमी कौंन था। ब्राह्मण ने बताया कि वह तो सर्वत्र रहता है, गरीबों की मदद के लिए अपने आप आता है। इसके बाद जज साहब ब्राह्मण से बोले की यह आदमी कौन थे जो गवाही देकर चले गए? ब्राह्मण बोला “अरे जज साहब यही तो मेरा ठाकुर था। जो भक्त की दुविधा देख ना सका और भरोसे की लाज बचाने आ गया।“ 

इतना सुनने के बाद जज ब्राह्मण के चरणों में लेट गए और बांके बिहारी का पता पूछा। इस सवाल के जवाब में ब्राह्मण ने यही कहा, “मेरा ठाकुर तो सर्वत्र है वो तो हर जगह है।“ इसके बाद जज अपना घरबार और सारा काम-धंधा सब छोड़ ठाकुर को ढूंढने के लिए निकल गया और फकीर बन गया। जब वो बहुत साल बाद वृंदावन लौट कर आया तो लोग उसे पागल बाबा के नाम से जानने लगे। पागल बाबा मंदिर’ दस मंजिल का बना हुआ है और इस मंजिल के उपरी भाग से वृन्दावन को बखूबी निहारा जा सकता है। 

इस मंदिर के निचले भाग में पूरे साल कठपुतली डांस आयोजित किया जाता है। 


10. वैष्णो देवी मंदिर : जम्मू के वैष्णो देवी की तर्ज पर वृंदावन में बने इस मंदिर की अपनी एक अलग मान्यता है। लोगों के अनुसार आज भी इस मंदिर की रक्षा हनुमान जी करते हैं। इस मंदिर में स्थापित मां की मूर्ति की ऊंचाई को लेकर इसका नाम लिम्का बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड में दर्ज है।

11. निधिवन : धार्मिक नगरी वृन्दावन में निधिवन एक अत्यन्त पवित्र, रहस्यमयी धार्मिक स्थान है। मान्यता है कि निधिवन में भगवान श्रीकृष्ण एवं श्रीराधा आज भी अर्द्धरात्रि के बाद रास रचाते हैं। रास के बाद निधिवन परिसर में स्थापित रंग महल में शयन करते हैं।


                                                



मंगलवार, 27 अक्तूबर 2020

Maheshwar : The Land of Maharani Ahilyabai

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          Date of Journey : 07 Dec.2019 
          
महेश्वर : मध्य प्रदेश

उज्जैन पहुँचते -पहुँचते तीन बज गए थे दोपहर के और मेरे जो मित्र लोग थे हमारे GDS ग्रुप के , वो मंदिर में दर्शन की लाइन में लगे थे। संपर्क मुश्किल हो रहा था क्यूंकि फ़ोन सभी के बाहर ही रखवा लिए जाते हैं। GDS -जानते तो होंगे आप ? घुमक्कड़ी दिल से , हमारा एक फेसबुक ग्रुप है जिसके 50 हजार से ज्यादा सदस्य हैं। और बात चली है तो ये भी बताता जाऊं कि GDS परिवार का ये वार्षिक मिलन समारोह था जिसमें हम सभी मित्रों को भारत के कोने -कोने से महेश्वर पहुंचना था। सही पहचाना आपने - पवित्र नर्मदा के किनारे बसा महारानी अहिल्याबाई का शहर महेश्वर जिसके नाम में ही पवित्र होने का संकेत मिलता है !! GDS परिवार का ये मिलन , चौथा मिलन था। जबकि इससे पहले , ओरछा में 2016 में पहला समारोह हुआ , 2017 में रांसी (उत्तराखंड ) में दूसरा और 2018 में जैसलमेर में तीसरा मिलन हो चूका था। ये चौथा मिलन समारोह था 2019 का ! आप कल्पना करिये - आप ऐसे लोगों से मिलते हैं जो भारत के अलग -अलग दिशाओं , अलग -अलग प्रांतों और शहरों से आते हैं और एक परिवार के नाम से , एक छत के नीचे ऐसे मिलते हैं जैसे पिछले जन्म के कोई सगे सम्बन्धी रहे हों। अद्भुत ग्रुप है GDS और मैं इस ग्रुप के साथ जुड़कर स्वयं को सम्मानित और गौरवान्वित महसूस करता हूँ। 

 आज का दिन अच्छा था। उज्जैन के महाकाल मंदिर में दर्शन के लिए हमेशा लम्बी लाइन लगती है लेकिन मैं मुश्किल से 20 मिनट में दर्शन करके बाहर आ चुका था। जय महाकाल !! 

आज 7 दिसंबर 2019 है !! मैंने थोड़ा आगे जाकर उज्जैन के बाहर अपनी टीम की बस को आखिर पकड़ ही लिया और पकड़ा भी कहाँ ? खाना खाते हुए एक होटल पर। खैर अब इंदौर के लिए प्रस्थान कर चुके थे और बस सरसराती हुई इंदौर की तरफ उडी जा रही थी जहाँ ग्रुप के ही दो तीन परिवार इंतज़ार में थे। डॉ सुमित शर्मा और GDS के संस्थापक माननीय भालसे परिवार ने जो स्वागत किया उसने हम सभी को अभिभूत कर दिया।  

रात के एक बजे के आसपास महेश्वर की सीमा में प्रवेश कर गए थे। सभी लगभग निद्रा वाली अवस्था में थे और अपने गंतव्य तक पहुँचते पहुँचते रजाई उठाकर लंबलेट हो चुके थे। मैं अपने लिए रजाई और गद्दा ढूंढ ही रहा था कि मुंबई से पधारे विनोद गुप्ता जी , मेरी आँखों के सामने से रजाई गद्दे को उठा ले गए। उनकी भी मजबूरी थी। पत्नी और दो बच्चे थे उनके साथ और अगर पत्नी की सेवा न करते इस वक्त तो भारी पड़ सकता था। मैंने भी आखिर कहीं से अपना इंतेज़ाम कर ही लिया। ठण्ड वाली रात थी , सिकुड़ना नहीं था। 

अगली सुबह एक नई जगह की खुशबू से सराबोर थी। ऐसे जल्दी नहीं जाग पाता हूँ लेकिन उस दिन पता नहीं क्यों और कैसे आँखें जल्दी खुल गईं ! बाहर निकल के देखा कि कहीं चाय -वाय का इंतेज़ाम है क्या ? लेकिन सब सिकुड़े हुए से गहरी नींद में थे -चाय की तो क्या बात करें ! ये आदत मेरी वाइफ की बिगाड़ी हुई है , मेरी कोई गलती नहीं ! वो खुद जल्दी जग जाती है और चाय बना लेती है फिर मुझे जगाती है , यहाँ भी उसी आदत के कारण चाय की प्यास लगी थी लेकिन यहाँ कौन इतना जल्दी चाय पिलाता मुझे ? यहाँ कौन है तेरा....... मुसाफिर 


कोई न कोई तो इस दुनियां में है जो आपका भी ध्यान रखेगा। निकल चले नर्मदा घाट की ओर। दुकानें सजी हैं मंदिर के सामने ही। ज्यादातर प्रसाद की हैं लेकिन चाय ? मिल गई मिल गई ! अहा ....ऐसे लगा जैसे प्राणों को यमराज से फिर मांग लाया होऊं ....कुछ देर के लिए ! 

बहुत ही छोटा कप मिला चाय का .....  दो घूँट मारे और चाय खत्म , फिर एक और ली .. फिर एक और ली ! तीन कप चाय पीने के बाद कुछ लगा पेट को और बोला -हाँ ! मालिक , अब ज़रा कुछ संतुष्टि मिली !! मेरा पेट भी मेरे साथ ही रहता है ज्यादातर.. . यात्रा में भी ... भावनाओं में भी। ये मेरी बात मान लेता है और मैं इसकी .. लेकिन आजकल ये अपने साइज से कुछ बड़ा हो गया है ज्यादा खा खा के।



सुबह -सुबह का अदभुत नजारा देख रही थीं मेरी आँखें और स्वयं को सौभाग्यशाली मानते हुए आपस मैं बातें कर रही थीं दोनों जुड़वाँ बहनें और मैं .......चुपके से कनखियों से उनका वार्तालाप सुने जा रहा था।  भारत के सबसे पवित्र नदियों में से एक नर्मदा का किनारा हो , कल कल करती जलधारा हो , हाथ में चाय का कप हो और सामने दूर .....क्षितिज में प्रकृति अपने अनन्य रूप में आभा बिखेरने को उतावली हुई जा रही हो तो ऐसे में कौन ना बैरागी हो जाएगा ? कैमरे का शटर खोल के जीवन के इन क्षणों को कैद कर लेना भी तो जरुरी है जिससे जब मैं बुजुर्ग हो जाऊँगा तब कम से कम इन्हें देखकर अपने अकेलेपन का साथी तो बना सकूंगा अपनी इन यादों को !! .....बाकी बातें कल करेंगे 











धन्यवाद् !!

बुधवार, 9 सितंबर 2020

Train Journey from Bhopal to Ujjain


भोपाल से उज्जैन पैसेंजर ट्रेन यात्रा 
 06 December 2019 

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मुश्किल सफर था।  साढ़े आठ बजे की ट्रेन रात 12 के भी बाद आई।  विदिशा उतरने का प्लान था और फिर वहां से साँची स्तूप के साथ -साथ दूसरी जगहों तक जाने का भी सोचा था।  ट्रेन चार घंटे लेट थी , तो ये सोचकर कि विदिशा भी चार घंटे लेट पहुंचेगी यानि साढ़े नौ बजे के आसपास, हम लम्बी चादर तानकर सो गए ! हमारे यहाँ एक कहावत है -जो सोवेगौ वो खोवैगौ !! खो ही गया मैं ! सुबह आँख खुली तो टाइम तो साढ़े सात का ही हुआ था लेकिन ट्रेन भोपाल के आउटर पर खड़ी थी।  पता नहीं ट्रेन के ड्राइवर ने कौन सी भांग पी ली थी रात जो इतना तेज खींच लाया ट्रेन को।  विदिशा धरा रह गया मेरा और धरी रह गयीं आज की सारी प्लानिंग।  टिकट भी विदिशा तक का ही था मेरे पास। गया बेटा -अब पकड़ा जाएगा तू !! भोपाल बड़ा स्टेशन है और बहुत से काले कोट इधर -उधर घूमते रहते हैं, तेरा बचना इम्पॉसिबल है ! बोले तो -असंभव  !!  यूपी वाला ठुमका लगाया , न न यूपी वाला दिमाग लगाया और आउटर पर उतर लिए। कुछ देर तक धीरे -धीरे रेलवे लाइन के सहारे चलते रहे और फिर किसी बस्ती में पहुँच गए।  कोई टेम्पो आया और मैं भी बैठ गया उसमें।  बराबर में एक मोहतरमा बैठी थीं , उनके परफ्यूम ने होश बिगाड़ दिए लेकिन तुरंत ही अपने आपको कण्ट्रोल में लाया।  मैडम स्कूल टीचर लग रही थीं। वो इतनी महक रही थीं और मुझमें से सड़े टमाटर सी गंध आ रही होगी उन्हें इसलिए मुझसे थोड़ी और दूरी बना ली :)  


भोपाल रेलवे स्टेशन के बाहर पहुंचने पर कुछ राहत की सांस ली।  पेनल्टी से बच गए।  अब चाय पिएंगे , नहाएंगे और फिर उज्जैन की तरफ मुंह करके खड़े हो जाएंगे।  जो ट्रेन आएगी सीटी बजाती हुई , उसी में चढ़ जाना है।  Ujjain , The city of Mahakal is calling me ! GDS is calling me !! अरे यार ! ये भोपाल वाले बस इतनी सी चाय पीते हैं क्या ? बहुत ही छोटा कप मिला चाय का प्लेटफार्म पर ! दो घूँट मारे और चाय खत्म , फिर एक और ली .. फिर एक और ली ! तीन कप चाय पीने के बाद कुछ लगा पेट को और बोला -हाँ ! मालिक , अब ज़रा कुछ संतुष्टि मिली !! मेरा पेट भी मेरे साथ ही रहता है ज्यादातर.. . यात्रा में भी ... भावनाओं में भी।  ये मेरी बात मान लेता है और मैं इसकी .. लेकिन आजकल ये अपने साइज से कुछ बड़ा हो गया है ज्यादा खा खा के।  

भयंकर !! मोबाइल नेट ऑन करते ही न्यूज़ फ़्लैश हुई -हैदराबाद में बलात्कार के चारों आरोपियों का एनकाउंटर ! दुःख नहीं प्रसन्नता हुई मुझे तो।  आपकी सोच आप जानें लेकिन अभी ट्रेन आ गई है कोई , निकलता हूँ !  


भोपाल से निकले तो संत हिरदाराम नगर नाम का कोई स्टेशन आया।  छोटा सा है और शायद नया बना है।  जल्दी ही सीहोर आ गया।  भोपाल से करीब 40 किलोमीटर दूर होगा सीहोर और पता है इस जगह का नाम कब से सुन रहा हूँ मैं ? करीब 30 साल से ! नहीं नहीं मेरा पहला जन्म नहीं हुआ था सीहोर में (और हुआ भी हो तो क्या पता :)) ... मेरी बड़ी बहन के ससुर जी यहाँ मास्टर जी हुआ करते थे किसी जूनियर हाई स्कूल में , तब से इस जगह का नाम मेरे दिमाग में अपना कब्जा जमाये हुए है।  अवैध कब्जा है लेकिन।  सीहोर मालवा क्षेत्र की विंध्याचल रेंज में बसा एक छोटा सा , सोतडू सा शहर लगा मुझे तो लेकिन लोग लिखते हैं कि यहाँ शैव्य , वैष्णव , नाथ और जैन सम्प्रदाय के साधकों ने अनन्य और अदभुत ज्ञान पाया है ।  अब कैसा भी हो सीहोर लेकिन इतिहास का एक अहम् हिस्सा रहा है ये शहर और विशेषकर तब जब यहाँ राजा चन्द्रगुप्त का  शासन था।  आगे चलते हैं , बाय बाय सीहोर ! फिर मिलेंगे 


अगला स्टेशन कालापीपल था।  ट्रेन कुछ देर रुकी भी रही यहाँ , शायद ड्राइवर चाहता होगा कि मैं कालापीपल देख आऊं लेकिन मुझे कहीं नहीं दिखा कालापीपल !! आपको दिखे तो मुझे जरूर बताना !! 


शुजालपुर पहुँच गए।  शुजालपुर खुद कोई जिला नहीं है बल्कि शाजापुर जिले का एक टाउन है।  शुजालपुर के राणोगंज में ग्वालियर राजघराने के  संस्थापक राणोजी राव शिंदे (सिंधिया ) की छतरी है जहाँ उनकी 1745 ईस्वी में मृत्यु हुई थी।  वहां जाना नहीं हो पाया क्योंकि आज उज्जैन पहुंचना ही है मुझे। ... 


अकोदिया , कालीसिंध और बेरछा स्टेशन निकल गए।  बेरछा निकलते ही लैंडस्केप एकदम से बदला हुआ सा लगा। हरे भरे खेत तो थे ही , दूर तक wind Mills दिखाई दे रही थीं।  एक दो या दस बीस नहीं , सैकड़ों की तादाद में मौजूद wind Mills भारत के नए कदमों की तरफ इशारा कर रही थीं।  मुझे wind मिल देखकर बहुत आनंद मिलता है।  ये Non Conventional Energy Resources के बहुत बड़े माध्यम हैं।  wind Mills का ये शो बेरछा से शुरू होकर मुझे देवास तक दीखता रहा और मुझे अंदर तक प्रफुल्लित करता रहा।  





 मक्सी जंक्शन आ गया भाई लोगो , जिसे उतरना है उतर जाओ।  ट्रेन बदलनी है तो बदल लो मगर हम तो इसी से जाएंगे।  मक्सी देखने में तो किसी जंक्शन सा नहीं लगा।  एक ट्रेन खड़ी थी वहां बस।  छोटा ही है स्टेशन।



                       जिसने भी ये सीढ़ियां बनाई होंगी , उसे भारत रत्न के लिए नामित किया जाना चाहिए😄😄
            
 रणायल जसम्या स्टेशन है अगला।  लो जी आ पहुंचे देवास। देवास , सामान्य ज्ञान की पुस्तकों में खूब पढ़ा था कभी बचपन में।  क्यों पढ़ा था ? इसलिए पढ़ा था कि यहाँ भारत सकरकार की नोट छपने की फैक्ट्री है।  खुश हुए न आप ? मैं भी बहुत खुश होता था लेकिन फिर बाद में समझ आया कि हमें पैसे छापने नहीं  कमाने पड़ते हैं।   अब बस प्लेटफार्म बदल के उस तरफ से उज्जैन की ट्रेन पकड़नी है।  जो भी आएगी चढ़ जाना है ...








जय महाकाल !!