शनिवार, 8 अप्रैल 2023

Chandrakanta Mahal Vijaygarh Fort Sonbhadra

 

 सोनभद्र शहर का नाम आपने शायद नहीं सुना होगा और सुना भी होगा तो देखा बिलकुल नहीं होगा... लेकिन चंद्रकांता का नाम जरूर सुना होगा ! चंद्रकांता नाम से देवकीनंदन खत्री का एक टीवी सीरियल खूब चला था जिसके कुछ किरदार बहुत ही ज्यादा प्रसिद्ध हुए जिनमें यक्कू को कौन भूल सकता है ?       

                    

चंद्रकान्ता हिन्दी के शुरुआती उपन्यासों में है जिसके लेखक देवकीनन्दन खत्री हैं। सबसे पहले इसका प्रकाशन सन 1888 में हुआ था। यह लेखक का पहला उपन्यास था। यह उपन्यास अत्यधिक लोकप्रिय हुआ था और तब इसे पढ़ने के लिये बहुत लोगों ने देवनागरी/हिन्दी भाषा सीखी थी। यह तिलिस्म और ऐयारी पर आधारित है और इसका नाम नायिका के नाम पर रखा गया है।

इसने नीरजा गुलेरी के इसी नाम के मेगा बजट टीवी धारावाहिक को प्रेरित किया जो  भारतीय टेलीविजन के इतिहास में सबसे बड़े ब्लॉकबस्टर में से एक बन गया 

                      

चन्द्रकान्ता को एक प्रेम कथा कहा जा सकता है। इस शुद्ध लौकिक प्रेम कहानी को, दो दुश्मन राजघरानों, नौगढ़ और विजयगढ के बीच, प्रेम और घृणा का विरोधाभास आगे बढ़ाता है। विजयगढ की राजकुमारी चंद्रकांता और नौगढ के राजकुमार वीरेन्द्र विक्रम को आपस में प्रेम है। लेकिन राज परिवारों में दुश्मनी है। दुश्मनी का कारण है कि विजयगढ़ के महाराज नौगढ़ के राजा को अपने भाई की हत्या का जिम्मेदार मानते है। हालांकि इसका जिम्मेदार विजयगढ़ का महामंत्री क्रूर सिंह है, जो चंद्रकांता से शादी करने और विजयगढ़ का महाराज बनने का सपना देख रहा है।

                       

राजकुमारी चंद्रकांता और राजकुमार विरेन्द्र विक्रम की प्रमुख कथा के साथ साथ ऐयार तेजसिंह तथा ऐयारा चपला की प्रेम कहानी भी चलती रहती है। कथा का अंत नौगढ़ के राजा सुरेन्द्र सिंह के पुत्र वीरेन्द्र सिंह तथा विजयगढ़ के राजा जयसिंह की पुत्री चन्द्रकांता के परिणय से होता है।
                      

अब अपने यात्रा वृतांत पर आते हैं। वाराणसी और मिर्ज़ापुर के वॉटरफॉल्स देख के मैं रॉबर्ट्सगंज पहुँच गया था।  उस वक्त शाम के छह बजे थे , रॉबर्ट्सगंज के बस स्टेशन के बाहर बहुत ज्यादा खाने पीने का कुछ  नहीं दिख रहा था। एक दूकान पर चाय पीने बैठ गया तो उन्ही से आसपास रुकने और खाने की बात करने लगा।  पास में ही एक होटल बताया  रुकने को -सिर्फ 150 रूपये में ! कमरा देखा तो बहुत गंदा और बिस्तर तो और भी गंदा। वापस आ गया उसी चाय की दूकान पर ---- एक और चाय खींची , इस बार समोसे के साथ ! वो बोले-एक होटल और है !  मगर थोड़ा महंगा है ! कितने का होगा ? होगा 400 -500 का ! आपको ये बहुत सस्ता लग रहा होगा लेकिन रॉबर्ट्सगंज के हिसाब से ये "थोड़ा महंगा " ही था लेकिन होटल साफ़ सुथरा और नया बना हुआ था ! 100 रूपये एक्सट्रा देकर AC वाला रूम मिल गया ! खाने के लिए उसी चाय की दूकान पर पहुँच गया रात 9 बजे !

                        

अगला दिन था ! नहाधोकर होटल से निकल गया !  जुलाई की उमस सुबह से ही अपना आभास दे रही थी और पसीना माथे से टपकने लगा था।  सुबह के आठ ही बजे होंगे ,मुझे बताया गया "वहां" से सीधे कुछ मिल जाएगा आपको चातेरी या शायद चतरा जाने के लिए।  ऑटो में बैठा ,बैठा रहा ! मेरे साथ एक स्कूल की मैडम और थीं ,सरकारी प्राइमरी स्कूल की मैडम ! उस ऑटो की सवारी पूरी ही नहीं हुई और अंततः लगभग 40 मिनट बैठे रहने के बाद दोनों पैदल ही आगे बढ़ गए ! अब वो आगे आगे और मैं उनके पीछे :) मेरी डोरी उनसे बंधी हुई थी लेकिन ये डोरी चतरा तक ही बंधी रह पाई ! मुझे वहीँ उतरना था ! 

                              

चतरा उतर तो गया लेकिन चंद्रकांता महल वाला विजयगढ़ फोर्ट तक जाने के लिए  व्यवस्था नहीं थी कोई ! सोचा कि चलो  चलना शुरू  करते हैं , कोई मिल  जाएगा  तो लिफ्ट लेने की कोशिश करूँगा।  100 -200 मीटर चलने के बाद ही एक ट्रैक्टर मिल गया , एक किलोमीटर भी नहीं पहुंचे होंगे कि उसने रास्ता बदल दिया ! उतरना ही पड़ा ! फिर चलने लगा। ... इस बार मास्टर जी मिल गए जो किसी स्कूल में पढ़ाने जा रहे थे।  प्रेमपाल नाम था उनका। . उन्होंने अपने स्कूल के रास्ते को छोड़कर एक दो किलोमीटर का रास्ता तय करा दिया ! मुझे चतरा से 18 किलोमीटर दूर बताया गया था चंद्रकांता महल।  अर्थात मैं लगभग चार-पांच  किलोमीटर का रास्ता तय कर चूका था ! अब फिर चलने लगा -उमस ने जान निकाल रखी थी ! जुलाई में तो वैसे भी गर्मी और उमस अपने शबाब पर होती हैं ! एक जगह जहाँ से रास्ता चुर्क के लिए कटता है वहां से ठण्डा पानी मिल गया।  रास्ते में धंधरौल बाँध मिला जिसकी अथाह जल राशि इसे खूबसूरत बना रही थी।  मास्टर जी ने यहां से आगे एक गांव मऊखुर्द तक छोड़ दिया था।  

                          

        दोपहर होने लगी थी तो यहाँ एक मंदिर के बाहर पेड़ों की छाँव में सुस्ताने लगा।  कुछ लोग पास आये -खाना खाएंगे ? नहीं। ..नहीं ! चाय ? ना ना। .. ठण्डा पानी हाथ में था ! अपनी तरह का अलग शिवलिंग देखा यहाँ तो फोटो खींच लिया।  चलने लगा। . उधर से आते हुए कई गाड़ियां दिखीं लेकिन इधर से या तो दिखी ही नहीं या जो दिखीं उन पर पहले से ही दो -दो तीन -तीन सवारियां जमी हुई थीं ! गाड़ियों से यहाँ मेरा मतलब मोटर साइकल्स से है ! कार यहाँ कभी कभार ही देखने को मिला करती हैं ! सड़क अच्छी है लेकिन अधिकतर वीरान रहती है... . बिजली है............ 4G नेटवर्क भी आ जाता है कभी कभी ! सब कुछ है बस पब्लिक ट्रांसपोर्ट नहीं है इस फोर्ट के लिए।  



एक हल्का सा बैग मेरे कंधे पर था जिसमें बिस्कुट के तीन -चार पैकेट पड़े थे , उनमे से एक निपटाया ! बकरियों के झुण्ड को ले जाते एक बुजुर्ग मिल गए तो एक पैकेट उन्हें पकड़ाया ! दोपहर के एक बज चुके थे। ... रास्ता एकदम वीरान ! इधर से भी और उधर से भी। .. दोनों तरफ घना जंगल ! कोई गाडी इधर या उधर से जब भी गुजरती , भले वो मुझे लिफ्ट नहीं दे रहे थे लेकिन मुझे ये एहसास जरूर दिला जाते थे कि तू सुरक्षित है ! एक मोपेड लिए श्रृंगार का सामान गाँवों में बेचने जा रहा था , रुक गया ! बोला -थोड़ा ! संभलकर चलना भाई ! भेड़िया वगैरह निकल जाते हैं कभी कभी ! 

और जंगल ! फोर्ट से बस थोड़ा ही पहले खत्म हुआ होगा बल्कि खत्म ही नहीं हुआ फोर्ट तक भी ! फोर्ट पर आवाजाही की वजह से रास्ता थोड़ा चौड़ा कर दिया गया है इसलिए एक आभास सा होता है की जंगल खत्म हो गया है ! वास्तव में ऐसा नहीं है।  अंततः लगभग पौने तीन बजे मैं 14 किलोमीटर की पैदल यात्रा के बाद विजयगढ़ फोर्ट के सामने था।  बाहर एक दो दूकान हैं खाने -पीने की।  एक ठो कोल्ड ड्रिंक और वहां के स्थानीय घास फूस के पकोड़े खाकर फोर्ट के प्रवेशद्वार की तरफ चल पड़ा।  प्रवेशद्वार भी लगभग 200 -220 सीढ़ियों के बाद आता है , अच्छी खासी चढ़ाई है वहां तक भी।  



झाड़ -झंखाड़ से भरे इस फोर्ट की चाहरदीवारी टूट फूट गई है कई जगहों से। मैंने प्रवेशद्वार से अंदर जाते हुए लेफ्ट से चलना शुरू किया -ये खण्डहर जरूर हैं ! लेकिन इतिहास के आईने हैं ! आईने हैं राजकुमारी चंद्रकांता और राजकुमार वीरेंद्र के प्रेम के।  आईने हैं एक प्रेम कहानी के जिसे शब्दों में गूंथकर देवकीनंदन खत्री जी ने जन जन तक पहुंचाया और जिसे चलचित्र के माध्यम से गुलेरी जी ने घर घर में प्रसिद्ध कर दिया।  यहाँ के खंडहरों से भुतहा आवाजें नहीं आतीं , सुगंध आती है ! सुगंध इस पावन धरती की , सुगंध सच्ची मुहब्बत की , सुगंध प्रकृति की और सुगंध ! प्रकृति से जुड़े यहाँ के लोगों के सात्विक विचारों की।  पवित्र सीता कुण्ड से आगे बढ़ा तो किसी महल के किसी हिस्से के कुछ स्तम्भ दिखे जो दूर से देखने पर बहुत आकर्षित कर रहे थे।  आगे एक और पवित्र कुण्ड है जिसे रामकुण्ड कहते हैं।  यहीं एक मंदिर बना है ! कहते हैं कि आसपास के गाँवों के लोग इसी कुण्ड से अपनी कांवड़ यात्रा शुरू करते हैं और इस कुण्ड में कभी भी जल सूखता नहीं है।  


मंदिर में एक बाबा मिल गए।  थोड़े नाटे कद के हैं , झारखण्ड के किसी गाँव के रहने वाले हैं।  नाम -षणमुखानंद बताया मुझे ! अब मैं उनके घड़े से एक गिलास पानी पीकर उनके साथ आगे बढ़ता हूँ , वो चंद्रकांता महल देखने जिसकी ख्वाहिश तबसे थी जबसे इस जगह का नाम सुना है।  बाबा मुझे सब जगह घुमाते हैं।  और अब लगभग शाम के पांच बजने को हैं , मैं बाबा के साथ उनकी कुटिया में प्रवेश करता हूँ।  बाबा एक कप चाय और कुछ मीठा मुझे खाने को देते हैं और वहां पहुंचे कुछ लोगों और अपने यजमानों की एक डायरी दिखाते हुए मुझे आज यहीं रुक जाने का अनुरोध करते हैं। मैं बाबा को कुछ दक्षिणा देता हूँ। ...  मुझे लेकिन लौटना होगा ! 

                      

अभी आधा घण्टा और लग जाता है मुझे फोर्ट में और फिर मैं पूरा एक चक्कर करते हुए वापस उस जगह पर हूँ जहाँ से इस फोर्ट के अंदर गया था।  सीढ़ियां उतर के जल्दी जल्दी उस रास्ते पर लौटने लगता हूँ जिस रास्ते से भरी दोपहर में मैं फोर्ट गया था।    



पीछे से एक बाइक की आवाज आने लगती है , मैं इस उम्मीद में कि शायद लिफ्ट मिल जाए , रुक जाता हूँ।  इस बार भगवान् ने सुन ली :) कोई महोदय हैं जो खुद रॉबर्ट्सगंज से यहाँ आये थे। मतलब पूरे रास्ते के लिए जुगाड़ बन गया।  रास्ते में कहीं बारिश आई तो मढ़ैया में चाय पीने रुक गए , पैसे भी उन्होंने ही दिए। वो चुर्क होते हुए मुझे मेरे होटल से लगभग दो किलोमीटर दूर एक रास्ते पर छोड़ देते हैं।  अंधेरा घिरने को है लेकिन आज मैं बहुत खुश हूँ , एक ऐसी जगह होकर आया हूँ जो वर्षों से मेरी wishlist में थी !