शुक्रवार, 6 फ़रवरी 2015

फतह सागर लेक


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 मोती मगरी में अपना तो टिकट लगता ही है , जिस वाहन से जाते हैं उसको अंदर ले जाने का भी टिकट लेना पड़ जाता है ! लेकिन अन्दर पहुंचकर आप इस के विषय में भूल जाते हैं और वहां से मंत्रमुग्ध कर देने वाले दृश्यों में इतना डूब जाते हैं कि याद ही नहीं रहता कि हमने इसके लिए अलग से पैसे दिए हैं ! वैसे ऐसा कोई प्रतिबन्ध नहीं है कि आप वाहन से ही अंदर जाएँ , मुख्य गेट के पास ही से मोती मगरी हिल तक के लिए सीढ़ियां बानी हुई हैं जिनके माध्यम से आप ऊपर जा सकते हैं और अपनी फिटनेस भी जांच सकते हैं ! मोती मगरी के ही  बिल्कुल पास फ़तेह सागर झील है ! 1680 ईस्वी में मेवाड़ के राजा महाराणा फ़तेह सिंह के नाम पर बनी इस झील के लगभग मध्य में नेहरू पार्क नाम से एक पार्क है जहां तक आप सिर्फ नौका से ही पहुँच सकते हैं और पक्की बात है कि इसके लिए भी आपको टिकट लेना पड़ेगा ! हर 15 मिनट के अंतराल पर एक नौका इस किनारे से निकलती है , ये समय और भी ज्यादा हो सकता है अगर पर्याप्त सवारियां नहीं मिलती हैं तो ! नेहरू पार्क में ऐसा कुछ भी नहीं है , जिसकी प्रशंसा करी जाए लेकिन आदमी वहां तक गया है तो सोचता है , देखते ही चलते हैं ! इतना खर्च कर रहे हैं तो थोड़ा और सही ! और इसी चक्कर में वो अंदर तक भी हो ही आता है ! लेकिन इसके ही साथ इसमें दो आइसलैंड और भी हैं ! एक है वाटर जेट फाउंटेन और दूसरा उदयपुर सोलर ऑब्जर्वेटरी ! ये दोनों देखने लायक हैं ! फ़तेह सागर झील उदयपुर की चार झीलों - पिछोला झील , उदय सागर झील , और धेबार झील में से एक है ! साफ़ सुथरी है ! 

वास्तव में फ़तेह सागर लेक का निर्माण महाराणा जय सिंह ने 1687 में शुरू कराया था लेकिन उनका निर्माण बाढ़ में बह गया और फिर सन 1889 के आसपास महाराणा फ़तेह सिंह जी ने इंग्लैंड की महारानी विक्टोरिया के पुत्र ड्यूक ऑफ़ कनॉट की यात्रा को यादगार बनाने के लिए देवली झील के किनारे कनॉट डैम बनवाया जिसे बाद में बड़ा करके झील में परिवर्तित कर दिया गया और फिर इस झील को फतह सागर झील नाम दिया गया ! ये वही कनॉट थे जिनके नाम पर दिल्ली का प्रसिद्द कनॉट प्लेस है।  

कभी कभी दो जाने पहिचाने चेहरे कहाँ और कैसे मिल जाते हैं , अंदाजा लगाना ज़रा मुश्किल है ! इधर इस किनारे से बोट चलने में थोड़ा समय बाकी था तो अपनी फैमिली के साथ मैं बस ऐसे ही रोड साइड घूम रहा था ! किसी ने आवाज़ लगाईं -सारस्वत ! यहाँ मुझे इस नाम से कौन बुला सकता है ? मैं पीछे मुड़कर देखता उससे पहले ही वो मेरे कंधे पर हाथ मार चुका था ! राजू चौधरी ! मेरा मित्र ! झाँसी में डिप्लोमा करते समय हम हॉस्टल में साथ रहे हैं ! राजकीय पॉलिटेक्निक झाँसी के दिन , वो तीन साल , याद आ गए पल भर में ! हालाँकि राजू मेरे बेस्ट फ्रैंड में कभी शामिल नहीं रहा और उसकी ब्रांच भी इलेक्ट्रॉनिक्स थी और मेरी मैकेनिकल (हथोड़ा छाप ), लेकिन साथ पढ़े लोग हमेशा मित्र होते हैं और जब पंद्रह साल बाद मिलते हैं तो बेस्ट से भी ज्यादा बेस्ट लगते हैं ! हालाँकि डिप्लोमा के बाद डिग्री भी हो गयी और एम.टेक. भी ! लेकिन जो आनंद डिप्लोमा के उन तीन साल में आया वो दोबारा फिर कभी नहीं आ सका । हॉस्टल की यादें फिर कभी साझा करूँगा ! आज बस इतना ही ! 

फतह सागर झील के ही बिलकुल पास में एक संग्रहालय है जिसे वीर भवन कहा जाता है ! इस संग्रहालय में महाराणा प्रताप और उनके वंशजों और मेवाड़ के अनेक वीरों और योद्धों में शहीद हुए भील नायकों की आदमकद तस्वीरें लगी हैं ! यहां आप मेवाड़ के उस समय के लोगों की देशभक्ति के साक्षात दर्शन कर सकते हैं ! हमेशा पूजा पाठ और कर्मकांडों में व्यस्त रहने वाले ब्राह्मणों तक ने देश की रक्षा के लिए तलवार उठाने में गुरेज नहीं किया था ! दो मंजिल के इस संग्रहालय में आपको उस समय के कुम्भलगढ़ और चित्तौड़गढ़ के दुर्ग के मॉडल देखने को मिलते हैं जिससे अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि उस वक्त मेवाड़ कितना विस्तृत , कितना धनी और कितना वीर हुआ करता था !

आइये कुछ फोटो देखते हैं :







मोती मगरी हिल पर बनी प्याऊ और जमना लाल बजाज की प्रतिमा 








वीर भवन , फतह सागर लेक के बिल्कुल पास ही है


​कुम्भलगढ़ फोर्ट का मॉडल 
और ये दाँत दिखाता पुराना  मित्र राजू चौधरी 
फतह सागर का  शानदार नजारा ! बीच में नेहरू पार्क दिख रहा है
नेहरू पार्क
नेहरू पार्क


नेहरू पार्क में लगी एक कलाकृति
ये कौन सा वृक्ष है ?
नेहरू पार्क से दिखाई देता लक्ष्मी विलास









यात्रा जारी है , पढ़ते रहिये :

शुक्रवार, 30 जनवरी 2015

लेक सिटी उदयपुर : मोती मगरी

लेक सिटी उदयपुर : मोती मगरी

दिनांक : 22 जनवरी 2015

उत्तराखंड और हिमाचल को जैसे हम देव भूमि कहते हैं उसी तरह राजस्थान को वीरों की भूमि कहा जाता है ! उत्तर प्रदेश को क्या कहा जाता है ? मुझे नहीं मालुम !! इसी राजस्थान का मेवाड़ इलाका विश्व भर में अपने वीरों और उनकी वीरताओं की कहानियों से भरा हुआ है ! मेवाड़ का मूल नाम मेधपाट हुआ करता था जो कालांतर में मेवाड़ हो गया और इस राज्य के देवता भगवन शिव हुआ करते थे जिन्हें एकलिंगनाथ बोला जाता था , इसीलिए कभी कभी भगवन शिव को मेवाड़ में मेधपाटेश्वर भी कहा जाता है ! वर्तमान में मेवाड़ का क्षेत्रफल यूँ राजस्थान से लेकर गुजरात और इधर हरियाणा तक फैला है लेकिन मुख्य रूप से राजस्थान के चित्तौड़गढ़ , भीलवाड़ा , राजसमन्द और उदयपुर मिलाकर मेवाड़ बनाते हैं ! इसी मेवाड़ की धरती को नमन करने का मन वर्षों से दिल में था जो अब जाकर पूरा हुआ ! नए साल के अवसर पर जिस कॉलेज में मैं काम करता हूँ उसने अपने उन कर्मचारियों के लिए जिन्हें पांच साल या ज्यादा हो गए हैं , एक उपहार दिया जिसमें पांच दिन की छुट्टी और परिवार के साथ कहीं घूमने फिरने का खर्च शामिल था ! मुझे भी यहां सात साल हो गए हैं, मैं भी इसका हकदार था और मैंने बिलकुल भी देर नहीं लगाईं अपना प्रोग्राम बनाने में ! 21 जनवरी के लिए हजरत निजामुद्दीन स्टेशन , दिल्ली से उदयपुर तक मेवाड़ एक्सप्रेस ( 12963 ) में आरक्षण कराया और 26 जनवरी को उसी ट्रैन से वापसी का भी !

राजस्थान की तरफ जाने वाली ट्रेनों की एक विशेषता है कि आपको यात्रा वाले दिन से 3-4 दिन पहले तक भी कन्फर्म टिकेट मिल जाएगा जबकि बिहार , बंगाल की तरफ जाने वाली ट्रेन देखें तो 3-4 महीने पहले भी शायद कन्फर्म टिकेट न मिले ! तो 21 जनवरी को तय समय शाम को 7 :00 बजे गाडी रवाना हो गयी ! 2-3 बार पहले भी इस ट्रेन से चंदेरिया तक जाने का अवसर प्राप्त हुआ है लेकिन इस बार अंतिम स्टेशन उदयपुर तक जाना था ! मथुरा , भरतपुर निकलते निकलते नींद आ गयी और आँख खुली अपने पुराने जाने पहिचाने स्टेशन चंदेरिया पर ! चित्तौड़गढ़ से बिलकुल पहले का स्टेशन है चंदेरिया ! यहां बिरला के दो बड़े सीमेंट कारखाने BCW ( बिरला सीमेंट वर्क्स ) और CCW ( चेतक सीमेंट वर्क्स) हैं जिनमें से एक में मेरे बहनोई कार्यरत हैं ! उस वक्त सुबह के लगभग चार बजे होंगे , बारिश हो रही थी और जनवरी के महीने में अगर बारिश हो जाए तो सर्दी का क्या हाल होता है , आप जानते हैं ! जल्दी से फिर वापस आकर कम्बल में घुस गया और उदयपुर के साफ़ सुथरे स्टेशन पर ही जाकर अपने डिब्बे में से बाहर निकला ! राजस्थान में भी गजब की ठण्ड होती है यार ! स्टेशन से ऑटो कर सीधे होटल और फिर उसी ऑटो वाले को कह दिया कि भाई एक घंटे बाद फिर से आ जाना , उदयपुर के दर्शनीय स्थल दिखाने के लिए ! कुल 12 जगह दिखाने की बात थी और किराया तय हुआ 600 रूपया ! सुबह 9 बजे से शाम लगभग 7 बजे तक , ज्यादा नहीं था ! सबसे पहले उसने मोती मगरी ले जाने का तय किया ! क्यूंकि सुबह से बस एक कप चाय ही पी थी , रास्ते में उससे कहीं नाश्ता कराने के लिए कहा तो उसने नगर निगम के सामने अपना औरो रोक दिया , बोला सर - यहां बढ़िया नाश्ता मिल जाएगा आपको ! चार कचौड़ी और दो मिर्ची बड़ा ! मिर्ची बड़ा , एक फुट लम्बी हरी मिर्च के ऊपर बेसन लपेट कर बनाते हैं ! लेकिन मिर्ची बस नाम की , बिलकुल भी तीखापन नही ! इसीलिए शायद उसने उस पैकेट में आठ दस ऐसी ही मिर्च और भी रख दी होंगी ! कचर कचर गाजर की तरह खाते जाओ ! इसका नाम मिर्च न होकर हरी गाजर होना चाहिए था ! आइये मोती मगरी की सैर करते हैं और इसी रास्ते पर पड़ने वाले उदयपुर नगर निगम के अरावली पार्क को भी देखते चलते हैं :









दोनों बेटे : हर्षित और पारितोष


महाराणा प्रताप की कांस्य प्रतिमा


महाराणा प्रताप की कांस्य प्रतिमा

महाराणा प्रताप के घोड़े चेतक की अंतिम सांस का मार्मिक दृश्य




महाराणा प्रताप की कांस्य प्रतिमा




महाराणा प्रताप की कांस्य प्रतिमा

मोती मगरी से उदयपुर का विहंगम दृश्य


हल्दीघाटी के युद्ध में राणा प्रताप के सेनापति रहे हकीम खां सूर की प्रतिमा









मोती मगरी के सामने भामाशाह की प्रतिमा

मोती मगरी के सामने भामाशाह की प्रतिमा

मोती मगरी से फतेहसागर झील का एक दृश्य



                                                   

                                                                                           यात्रा जारी है , पढ़ते रहिये :
 


 



आगे की पोस्ट : 

 फतह सागर लेक

                                    सहेलियों की बाड़ी और सुखाड़िया सर्कल 

        उदयपुर : सिटी पैलेस 

              जगदीश मंदिर : उदयपुर 

                                              उदयपुर रोप वे और दीनदयाल उपाध्याय पार्क 

          उदयपुर से एकलिंगजी 

                                     एकलिंगजी से श्रीनाथ जी मंदिर नाथद्वारा 

हल्दीघाटी

                हल्दीघाटी : चेतक समाधी 

बाय बाय उदयपुर 

                  साँवरिया जी मंदिर :चित्तौड़गढ़ 

चित्तौड़गढ़ किला

पदमिनी​ महल : चित्तौड़गढ़ 

                                            जयमल फत्ता महल और विजय स्तम्भ : चित्तौड़गढ़ 

         गौमुख मंदिर : चित्तौड़गढ़

   मीरा मंदिर : चित्तौड़गढ़

   कीर्ति स्तम्भ : चित्तौड़गढ़ 

                                 नगीना बाजार और रतन सिंह पैलेस : चित्तौड़गढ़

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

गुरुवार, 15 जनवरी 2015

आदमी

आदमी ही आदमी से लड़ रहा

ये कैसा रोग इस दुनियाँ को जकड रहा

आदमी ही आदमी के मार्ग में बाधा बन जाता है !

आदमी के ही हाथ से आदमी का निवाला छिन जाता है !!

यहाँ दाता बना आदमी आदमी ही बना गुलाम

आदमी ही आदमी को ठोकर मारे

आदमी ही आदमी को करे सलाम !!

सोमवार, 5 जनवरी 2015

मनन धाम : गाज़ियाबाद


दिल्ली मेरठ रोड पर स्थित , दिल्ली से करीब 30 किलोमीटर की दूरी पर भगवन शिव को समर्पित मनन धाम गाज़ियाबाद का एक प्रसिद्द तीर्थ स्थल है ! हालाँकि गाज़ियाबाद में तीर्थ के नाम पर या कहा जाए कि घूमने के नाम पर ऐसा कुछ भी नहीं है जिसकी प्रशंसा करी जा सके ! हाँ , मॉल जरूर हैं एक से बेहतर एक ! अगर कहीं जाना हो तो आप मोहन नगर मंदिर , दूधेश्वर मंदिर या फिर मनन धाम ही जा सकते हैं ! वैसे अगर कोई जाना चाहता है और उसके पास समय है तो सीधा दिल्ली की तरफ रुख करता है ! मनन धाम के विषय में मुझे मेरी हिमाचल यात्रा के दौरान पता चला ! असल में रोड के किनारे चाय पीते समय किसी से ऐसे ही बात होने लगी और जब उसे पता चला कि हम गाज़ियाबाद से आये हैं तो वो बोला गाज़ियाबाद तो हम हर साल जाते हैं !! काहे के लिए ? सत्संग में , मनन धाम में सत्संग होता है ! तब से मनन धाम के दर्शन करने का मन था लेकिन बहुत दिनों के बाद अवसर मिला तो आपके लिए भी चित्र ले आया !

आइये देखते हैं:














मन्दिर के शिखर पर लगा शंख आकर्षित करता है



हवन कुण्ड ! मस्तों का झुण्ड



​रोड पर से ऐसा दीखता है मनन धाम

​रोड पर से ऐसा दीखता है मनन धाम



मनन धाम के पास ही जैन धर्मावलम्बियों के ऋषभांचल भी है ! उसके भी कुछ फोटो
मनन धाम के पास ही जैन धर्मावलम्बियों के ऋषभांचल भी है ! उसके भी कुछ फोटो
मनन धाम के पास ही जैन धर्मावलम्बियों के ऋषभांचल भी है ! उसके भी कुछ फोटो


ऋषभांचल से ऐसा दीखता है मनन धाम
मनन धाम के पास ही जैन धर्मावलम्बियों के ऋषभांचल भी है ! उसके भी कुछ फोटो


ऋषभांचल से ऐसा दीखता है मनन धाम