सोमवार, 24 फ़रवरी 2014

अमृतसर से लौटकर

अमृतसर यानि अमृत + सर,  मतलब अमृत का सरोवर । इस शहर को रामदासपुर और अम्बरसर भी कहा जाता  रहा है ! अमृतसर वास्तव में तुंग नाम का एक गाँव हुआ करता था , लेकिन सन 1574 ईस्वी में गुरु रामदास जी ने इस गाँव को 700 रुपये में गाँव वालों से खरीद लिया और एक झील बनाई जिसे अमृतसर कहा गया और वो ही नाम अब इस शहर को मिल गया ।

अक्टूबर -नवम्बर 2013 में अलग अलग लोगों के विचारों से संकलित पुस्तक लाहौर -1947 पढ़ रहा था ! उसमें आजादी से पहले और तुरंत बाद का जो द्रश्य वर्णित किया गया है उसमें अमृतसर का भी जिक्र है ! पुस्तक पढ़ते समय कभी कभी दुःख हुआ और आँखों में आंसू तक भी आये ! दिल में अमृतसर की वही तस्वीर बिठा रखी  थी , और उसी तस्वीर की हकीकत और 1984 के समय के ऑपरेशन ब्लू स्टार के अवशेषों को देखने का विचार मन में पाले हुए गोल्डन टेम्पल एक्सप्रेस में परिवार सहित 25 जनवरी का रिजर्वेशन करा लिया ! 25 जनवरी का आरक्षण कराने के दो मकसद थे , पहला ये कि अगले दिन कॉलेज की छुट्टी थी और दूसरा ये कि छब्बीस जनवरी होने के कारण वाघा बॉर्डर पर अच्छी खासी भीड़ होने और पूरा आनंद उठाने की उम्मीद थी । रेल आरक्षण कराने में एक परेशानी हो गयी , हमारा वापिस लौटने का आरक्षण राउरकेला मुरी एक्सप्रेस से तो कन्फर्म था लेकिन अमृतसर जाने का आरक्षण गोल्डन टेम्पल में हमें वेटिंग मिली 4 और 5 ! हमने 59 दिन पहले गोल्डन टेम्पल ट्रैन में आरक्षण कराया था लेकिन हमारी सीट जाने वाले दिन यानि 25 जनवरी को ही कन्फर्म हो पायी । देर आये दुरुस्त आये ।

जैसे ही हमारा टिकेट कन्फर्म हुआ , मैंने तुरंत अपने रिश्तेदार श्री राजदीप सारस्वत जी से दिल्ली संपर्क किया , वो BSF में हैं और उनकी ड्यूटी अभी दिल्ली में ही है ! असल में ये संपर्क वाघा बॉर्डर के लिए BSF से पास लेने के लिए किया गया था जिससे हम आसानी से बच्चों के साथ परेड देख सकें | राजदीप जी ने हमें अमृतसर में रहने वाले श्री आर के .साहू जी का नंबर दिया ! हमने उनसे बात करी तो उन्होंने हमें आश्वस्त कर दिया कि आप जब बॉर्डर पर जाओगे तो आपको पास मिल जाएगा ! प्रसन्नता हुई !

गोल्डन टेम्पल गाजियाबाद स्टेशन पर बिलकुल ठीक समय पर आ पहुंची यानि ठीक 8 बजकर 5 मिनट पर । बच्चे साथ में थे लेकिन गोल्डन टेम्पल में आरक्षण तो कन्फर्म मिल गया लेकिन हम दौनों पति पत्नी की सीट अलग अलग दे दीं । बहुत से लोगों से बात करी लेकिन ज्यादातर तो अपने परिवार  के साथ थे वो जा नहीं सकते थे और कोई एक आध जो सिंगल था वो अपनी सीट बदलने को तैयार नहीं था । एक भाईसाब मिले भी अकेले , लेकिन उन्होंने मना कर दिया , बोले मुझे लुधियाना तक जाना है ,आप वहाँ मेरी सीट पर आ जाइयेगा । लेकिन उनका सीट न बदलने का असल कारण बाद में पता चला । असल में उनके सामने वाली सीट पर एक बेहद खूबसूरत और युवा महिला अपने छोटे से बच्चे के साथ मुम्बई से ही यात्रा कर रही थी , और ऐसे मौके को देखकर भला कोई हमारे लिए सीट कैसे छोड़ देता ? खैर सहारनपुर तक हमें अलग अलग ही बैठना पड़ा । टी टी ई से कई बार बात करी लेकिन वो कुछ कर नहीं पाया । सहारनपुर जाकर हमें पास पास की सीट मिल गयीं और आगे का रास्ता सुगम हो गया ।  अमृतसर पर करीब 6 बजे गोल्डन टेम्पल एक्प्रेस पहुँच गयी । जो लोग दिल्ली या आसपास के हैं और अमृतसर जाना चाहते हैं उनसे यही कहूंगा कि वो प्राथमिकता इसी ट्रेन को दें । औसतन बहुत सही समय पर चलती है ।

अमृतसर स्टेशन से बाहर निकलते ही , बल्कि ये कहूं कि स्टेशन पर ही आपको बहुत से लोग मिल जायेंगे जो आपसे गाड़ियों के लिए भाव ताव करने लगेंगे । उस वक्त यानि 25 जनवरी को अमृतसर में अच्छी खासी ठण्ड होनी चाहिए थी , जैसा कि फेसबुक के मित्र श्री विक्रमजीत सिंह जी ने बताया था कि जनवरी में बहुत सर्दी रहती है , लेकिन सच कहूं तो  ग़ाज़ियाबाद जैसी ही ठण्ड थी या उससे भी कम रही होगी । बाहर साइन बोर्ड लगा है वहाँ वो उस दिन 11.6 टेम्परेचर बता रहा था और ग़ाज़ियाबाद में एक दिन पहले का टेम्परेचर 10 डिग्री था । खैर ये ठीक ही था कि मौसम कुछ गर्म रहने की उम्मीद थी । स्टेशन से बाहर निकलकर इण्डिका गाडी किराए पर ले ली | 1500 बोला था उसने लेकिन बात 1200 रुपये में तय हो गयी और सीधे हम चल दिए दुर्गियाना मंदिर की धर्मशाला । वहाँ जाने का कार्यक्रम बस इतना था कि वहाँ जाकर नहायेंगे कपडे बदलेंगे और सामान छोड़कर चलेंगे । कौन लादेगा इतना सामन । केवल 60 रुपये की ही तो पर्ची कटवानी थी , सौदा सस्ता लगा तो पहुँच गए । वहाँ से करीब 8 :30 बजे हम दुर्ग्याणा मंदिर , जो बिलकुल पास है , के दर्शन के लिए निकल गए । बहुत ही सुन्दर मंदिर है । उसे भी गोल्डन टेम्पल की तरह सोने का बना रहे हैं वो लोग , और कुछ पर सोने की परत लग भी गयी है । वहाँ पहली बार मैंने किसी मंदिर में 100 रुपये का दान किया । हाहाहा ।

दुर्ग्याणा मंदिर के दर्शन करने के पश्चात हमारा ध्येय गोल्डन टेम्पल जाने का था और कार वाले ने तुरंत ही गाडी मोड़ दी गोल्डन टेम्पल की तरफ ! अत्यंत सुन्दर । जितना सुना , समझा था उसे भी कई गुना सुन्दर । तालाब (सर ) एकदम साफ़ स्वच्छ । वहाँ लाइन में थोडा समय जरुर लगता है लेकिन वो समय अखरता नहीं है । आस पास का माहौल बहुत अच्छा लगता है । अंदर जाने के भी कई रास्ते हैं । व्यवस्था अच्छी है । मुख्य स्थान अति सुन्दर है , पूरा स्वर्ण जड़ित । मुख्य द्वार , जहां से मंदिर का रास्ता शुरू होता है वहाँ दौनों ओर जो बिजली के लट्टू लगे हैं वो भी स्वर्ण जड़ित हैं । अंदर घुसते ही लगता है कि एक सर्वाधिक सुन्दर जगह के दर्शन हो रहे हैं , वहाँ गुरबानी का पाठ लगातार चलता रहता है । प्रकाश ही प्रकाश । ऊपर के लिए सीढ़ियां हैं लेकिन वो इतनी छोटी और रपटीली हैं कि गिरने का अंदेशा बना ही रहता है । हालाँकि वहाँ लोग लगातार साफ़ सफाई करते रहते हैं लेकिन फिर भी लगता है कि कोई न कोई जरुर ही फिसलता होगा ।

​दुर्ग्याणा मन्दिर में पानी के बीच से बना मंदिर तक का रास्ता
गोल्डन टेम्पल के दर्शन करने के पश्चात पास में ही स्थित वीरों के निशाँ की धरती जलियाँवाला बाग़ देखने की उत्सुकता थी । कौन भारतीय होगा जिसको अपने स्वतंत्रता के वीर सिपाहियों से लगाव और उनके प्रति सम्मान न होगा ? एक इतिहास आँखों में उतर आता है उस जगह पर , मैं अपने बच्चों को भी उस जगह से परिचित करना चाहता था , आखिर मेरे बाद देश का भविष्य वही  तो हैं । वहाँ दीवारों पर लगे गोलियों के निशान आज तक उस वक्त की याद दिलाते हैं ! और वहाँ स्थित शहीदी कुआँ मेरे बच्चों को बहुत आकर्षित कर रहा था । सही बना रखा है । उसी परिसर में वहाँ के शासन प्रशासन ने एक म्यूजियम भी बना रखा है जो स्वतंत्रता आंदोलन के समय के देश विदेश के अखबार और महान वीरों के चित्रों से सुसज्जित है । देखने लायक है ।


yogi saraswat
​दुर्ग्याणा मन्दिर 
    



​दुर्ग्याणा मन्दिर में लगी महावीर हनुमान की सुन्दर प्रतिमा



दुर्ग्याणा मन्दिर



​दुर्ग्याणा मन्दिर में पानी के बीच से बना मंदिर तक का रास्ता

Golden Temple at Night
​स्वर्ण मंदिर , रात के समय में ! ये फ़ोटो इंटरनेट से ली गयी है !
 


​                                  स्वर्ण मंदिर



क्रमशः 

सोमवार, 30 दिसंबर 2013

द्रोण सिटी ............. दनकौर

महाभारत काल की कथा सबको पता है कि जब गुरु द्रोणाचार्य ने एकलव्य को धनुर विद्या सिखाने के लिए मना कर दिया तब एकलव्य ने गुरु द्रोण की मिट्टी की प्रतिमा बनाकर उसके समक्ष ही , उस प्रतिमा को साक्षात् गुरु मानकर तीर चलाने की शिक्षा ली ! पिछले दिनों मुझे उसी गुरु द्रोण की नगरी दनकौर जाने का अवसर प्राप्त हुआ ! शनिवार और रविवार दो दिन की कॉलेज की छुट्टी थी तो सोचा मौसम भी अच्छा है , देख कर आया जाए !

दनकौर बहुत छोटा सा क़स्बा है ! दिल्ली से करीब 40 किलोमीटर और ग्रेटर नॉएडा से करीब 20 किलोमीटर की दूरी पर बसा ये क़स्बा आम भारतीय कस्बों जैसा ही शांत दीखता है ! ग्रेटर नॉएडा और नॉएडा उत्तर प्रदेश के गौतम बुद्ध नगर जनपद में आते हैं और दनकौर भी इसी जनपद में है ! जाने के लिए आप ग्रेटर नॉएडा के परी चौक से कासना होते हुए जा सकते हैं या फिर अगर अपना व्हीकल है तो आगरा जाने वाले यमुना एक्सप्रेसवे से  जाना ज्यादा बेहतर है । एक्सप्रेसवे से गलगोटिया यूनिवर्सिटी के सामने से कट लीजिये और बस कुछ ही दूर दनकौर पहुँच जाइये । दनकौर ऐसा स्थान है जहां आप 2 घंटे में ही पूरा क़स्बा आराम से देख लेंगे ।

असल में ये द्रोण सिटी नहीं है , यहाँ एकलव्य ने मूर्ती की स्थापना करके गुरु द्रोण को साक्षात् मानकर धनुर विद्या सीखी थी इसलिए मुझे लगता है इसका नाम एकलव्य सिटी होना चाहिए था लेकिन द्रोण सिटी ही कहते हैं ! इस कसबे को पर्यटन स्थल बनाने के लिए लगातार संघर्ष कर रहे श्री  पंकज कौशिक कहते हैं कि असल में जब एकलव्य यहाँ शिक्षारत था तब एक बार गुरु द्रोण अपने शिष्यों के साथ इधर से निकल रहे थे , उनके रास्ते में एक कुत्ता उन पर भौंक रहा था ।  एकलव्य वहीँ कहीं जंगल में था ,  वो गुरु द्रोण को पहिचानता था , उसे ये देखकर बहुत गुस्सा आया कि एक कुत्ता उसके गुरु पर भौंक रहा है तो उसने अपने बाणों से उस कुत्ते का मुंह भर दिया जिससे उस कुत्ते का मुंह खुला का खुला रह गया । इसी मान्यता को सिद्ध करता हुआ एक गाँव भी है पास में जिसका नाम है मुँहफाड़ । उसी घटना के बाद गुरु द्रोण को एकलव्य और उसकी धनुर विद्द्या के विषय में पता चला ।

दनकौर में गुरु द्रोण को समर्पित एक खूबसूरत मंदिर है जहां गुरु द्रोणाचार्य की वो मूर्ति भी है जो एकलव्य ने बनाई थी लेकिन ये मूर्ति मिट्टी की नहीं पत्थर की है ! मंदिर परिसर में ही एकलव्य पार्क भी है जो रखरखाव की उपेक्षा झेल रहा है । हालाँकि उसके दरवाजे बंद रहते  हैं लेकिन फिर भी एक कोशिश करी कि कुछ फ़ोटो ले लिए जाएँ ! मेरे साथ मेरा साथी राजेश रमन भी था और मेरा स्टूडेंट कुशाग्र कौशिक भी था । कुशाग्र दनकौर का ही है इसलिए उसे पहले ही सूचित कर दिया था जिससे वो हमारी कुछ मदद कर सके और उसने सच में पूरी मदद करी । धन्यवाद कुशाग्र
दनकौर में एक पीर बाबा की मज़ार है , जैसा कि कुशाग्र ने बताया कि उर्स के समय यहाँ बाहर के देशों तक से भी जायरीन आते हैं और जो मन्नत इस पीर पर मांगी जाती है पूरी होती है । मेरी कोई मन्नत ही नहीं है तो क्या मांगता ? खैर ! अगर आप दिल्ली या आस पास से हैं तो कुछ घंटे का सफ़र तय करके यहाँ तक आसानी से पहुंचा जा सकता है ! और अगर आपके पास समय है तो थोड़ी ही दूर यानि करीब 10 -12 किलोमीटर की दूरी पर रावण के पिता द्वारा स्थापित शिवलिंग भी है जहां एक मंदिर भी है ! इस गाँव का नाम बिसरख है !



आइये फोटो देखते हैं :



एकलव्य द्वारा बनाई गयी गुरु द्रोण की मूर्ति

गुरु द्रोण की मूर्ति 

गुरु द्रोण की आरती

गुरु द्रोण का मंदिर

मंदिर परिसर में लगी एकलव्य की प्रतिमा




ग्रेटर नॉएडा का पारी चौक

ग्रेटर नॉएडा का पारी चौक

ग्रेटर नॉएडा के परी चौक पर सुन्दर परी

ग्रेटर नॉएडा के परी चौक पर सुन्दर परी


बिसरख गाँव में रावण के पिता द्वारा स्थापित शिव मंदिर

बिसरख गाँव में रावण के पिता द्वारा स्थापित शिव लिंग





दनकौर में स्थित एक सुन्दर मजार

       







            

मंगलवार, 3 दिसंबर 2013

पौढ़ी पौढ़ी चढ़ता जा , जय माता दी कहता जा

हमेशा से मन में एक बात लेकर बैठा था कि अपने ट्रेवलिंग ब्लॉग कि शुरुआत किसी धार्मिक स्थान के यात्रा विवरण से करूँगा ! ये बात हकीकत में साकार हुई नवम्बर महीने की 10 तारीख को ! माता वैष्णो देवी के दर्शन के रूप में ! 9 नवम्बर की रात को 11 बजे गाजियाबाद स्टेशन पहुँच गया था अपने पूरे परिवार और मितगणों के साथ ! 12 बजकर २० मिनट पर जम्मू स्पेशल ट्रैन में आरक्षण था ! ट्रैन लगभग सही समय पर गाजियाबाद आ पहुंची ! लेट होने का सवाल इसलिए नहीं था क्यूंकि ये ट्रैन आनंद विहार से ही खुलती है जो ज्यादा दूर नहीं है गाजियाबाद से ! अगले दिन की सुबह हो चली थी और सभी लोग पेट भरके खाना खाकर आये थे लेकिन न जाने क्यों सबको ट्रैन में बैठते ही भूख लग गयी और परांठे खोल लिए , मैंने भी ! किसी ने पूड़ी भी निकल रखी थी ! बढ़िया तरह से पेट भर गया कहा जाए कि ओवर लोड हो गया ! सब अपनी अपनी सीट पर फ़ैल गए ! और फिर लुधियाना में जाकर ही आँख खुली ! लुधियाना में चाय -नाश्ता लेकर मेरा ठिकाना तो टॉयलेट के पास वाला दरवाजा बन गया और मैं पंजाब देखते हुए जम्मू कश्मीर में प्रवेश कर गया ! रावी नदी लगभग सूखी पड़ी हुई थी ,जहां तक मुझे याद है रावी से ही जम्मू कश्मीर शुरू होता है ! बहुत खूबसूरत लगता है पंजाब और कश्मीर ! लहलहाते खेत हों या खेतों कि जुताई करते ट्रेक्टर ! मेरे देश की जान हैं ये ! बहुत खूबसूरत ! फिल्लौर ,पंजाब से निकलकर ये ट्रेन मुझे लगता है एकदम बैलगाड़ी बन जाती है ! इसीलिए जहां हमें दोपहर को 12 बजे तक जम्मू पहुँच जाना चाहिए था इसे वहाँ पहुँचने में लगभग 3 बज गए , यानि तीन घंटे लेट !

 

विचार ये था कि पहले जम्मू के दर्शनीय स्थलों को देखा जाए लेकिन प्रभात ने कहा कि भैया लौटकर देखेंगे और मेरी पत्नी लाता ने भी उसकी हाँ में हाँ मिला दी तो जाहिर है मैं अकेला क्या कर सकता था ! हालाँकि हैम बाद में भी उन जगहों को नहीं देख पाये ! जम्मू रेलवे स्टेशन से निकलकर थोडा नीचे ही कटरा जाने वाली बस और टैक्सी उपलब्ध रहती हैं ! वहाँ से 75 रुपये प्रति सवारी के हिसाब से बस में बैठे और करीब सवा दो घंटे में कटरा पहुँच गए ! बस जम्मू से कटरा के रास्ते में एक जगह चाय नाश्ते के लिए जरुर रूकती है ! जम्मू रेलवे स्टेशन से निकलकर जब हैम प्लान बना रहे थे तब एक बढ़िया सी घटना पेश आई ! हमारे साथ ग्रुप लीडर के रूप में चल रहे शर्मा जी हालाँकि पुलिस में नहीं हैं लेकिन पुलिस मैन जैसे कद काठी और रुतबा रखते हैं ! जब उनकी बेटी और मेरी पत्नी ने कहा कि उन्हें शौच जाना है तो वो जगह कि तलाश होने लगी सार्वजनिक शौचालय देखा गया , वो 7-7 रुपये मांग रहा था ! शर्मा जी उसके पास गए और उससे बोले कि अगर तू खाली शौच करके दिखा दे (अगर पेशाब न करे ) तो मैं तुझे पचास रुपये दूंगा ! वो बेचारा घबरा गया और मुफ्त में सब कुछ करने दिया ! हहहआआआ ! अपना अपना रुतबा ,अपनी अपनी सोच !

 

कटरा में तीन परिवारों को तीन अलग अलग कमरे लेने थे ! होटल वाले से बात हुई , 600 रुपये का एक कमरा ! गर्म पानी की सुविधा ! सामान रखने की सुविधा ! बढ़िया था लेकिन शर्मा जी ने पता नहीं क्या तरकीब बिठाई कि वो 600 रूपये वाला कमरा हमें 400 रुपये में ही मिल गया और एक एक कप चाय उसके साथ मुफ्त ! शर्मा जी जुगाड़ू तो हैं ! लेकिन ये याद रखिये कटरा में मोल भाव बहुत काम आता है ! होटल में अपना सामान रखकर खाना खाकर बस फ़ैल गए अपने अपने बिस्तर में ! ठण्ड बहुत ज्यादा तो नहीं थी लेकिन थी ! कम्बल के लायक ही ! अगली सुबह माता अर्धकुंवारी के दर्शन की योजना बनी और सुबह ही सुबह चढ़ाई चढ़ने की योजना बनी ! काउंटर पर पहुंचे ! पहले सुना था कि एक ग्रुप में 50 लोगों को भेजते हैं और कोई एक ही व्यक्ति वहाँ जाकर पर्ची बनवा लेता था लेकिन इस बार तीन वर्ष से ऊपर के हर व्यक्ति का अलग से टिकट बन रहा था और उसे व्यक्तिगत रूप से वहाँ होना होता था क्यूंकि उसकी फ़ोटो ली जाती थी ! ये जानकारी शायद आपके काम आये ! हाँ अर्धकुंवारी पर अभी वाही चल रहा है कि एक ग्रुप में वो 50 लोगों को भेजते हैं ! शर्मा जी अर्धकंवरी पर जल्दी पहुँच गए थे इसलिए उन्होंने करीब १०:३० बजे अपना नंबर लगा दिया था ! बाकी लोग देर से पहुंचे और सबसे बाद में मैं पहुंचा क्योंकि मेरे साथ दो छोटे छोटे ( ५साल और ३ साल ) बच्चे थे ! अर्धकुंवारी पर भीड़ भाड़ बहुत थी लेकिन ठण्ड का नामोनिशान नहीं था ! वही नवम्बर वाली सर्दी ! वहाँ सरकारी खान पान सेवा केंद्र है , चाय 5 रुपये की खूब सारी मिल जाती है ! बाहर 8 या 10 रुपये की मिलती है और वो भी बहुत कम ! लेकिन खाने में थोड़ी समस्या है ! सरकारी यानि श्री माता वैष्णो श्राइन बोर्ड के खान पान केंद्र में कढ़ी चावल , राजमा चावल या बड़ी बड़ी पूड़ी ही मिल पाती हैं ! दूध मिल जाता है जिससे बच्चों का काम चल जाता है ! बाहर पकोड़ी , समोसे , चाउमिन वगैरह मिल जाती है ! जेब में दाम चाहिए सब मिल जाता है लेकिन थोडा सा महंगा ! जैसे 10 रुपये की फ्रूटी 20 रुपये में मिलती है ! कोई नहीं, इतना तो बनता है ! हमें यानि हमारे ग्रुप को 126 वाँ नंबर मिला अर्धकुंवारी के दर्शन के लिए, लेकिन 4 बजे जैसे ही 120 वें ग्रुप का नम्बार आया ,दर्शन रोक दिए गए ! 4 बजे से साढ़े सात बजे तक दर्शन रोक दिए गए , बताया गया आरती का समय है ! आखिर हमें 8 बजे प्रवेश मिला और करीब 10 बजे के आसपास दर्शन हुए ! दर्शन , मतलब एक छोटी सी गुफा में से पार निकलना होता है ! बताया गया कि ये गुफा ही पवित्र स्थान है ! कहानी नहीं लिखूंगा ! दर्शन पश्चात खाना खाकर सीधे भवन की ओर प्रस्थान करने की योजना बनी और रात में करीब 11 बजे भवन (माता वैष्णो देवी के स्थल को भवन कहते हैं ) की ओर प्रस्थान कर दिया ! बच्चों ने पूरा साथ दिया ! पैदल पैदल चलते रहे ! हालाँकि घोड़े -खच्चर और पिट्ठू उपलब्ध थे किन्तु मान्यता के अनुरूर पैदल ही यात्रा करना आवश्यक था ! अब बैटरी वाली गाड़ियां भी उपलब्ध हैं अर्धकुंवारी से भवन तक ! लेकिन कटरा से अर्धकामवारी की चढ़ाई जितना कठिन है उसकी तुलना में अर्धकुंवारी से भवन तक की चढ़ाई कम , आसान और सरल है ! दो घंटे भी नहीं लगे होंगे हमें भवन तक जाने में ! 1 बज रहा होगा , कम्बल मिलना मुश्किल था ! लेकिन शर्मा जी ने सब जुगाड़ कर दिया ! पहले ही कह चूका हूँ बहुत केयरिंग और जुगाड़ू हैं वो ! 

 

अर्धकुंवारी और भवन पर जितना चाहो आप कम्बल ले सकते हैं बस आपको वहाँ 100 रूपये प्रति कम्बल के हिसाब से पैसा जमा करना होता है जो सुबह कम्बल वापिस करने के साथ ही वापिस मिल जाता है ! अच्छी सुविधा है ! भवन पर ही सोने की बढ़िया जगह मिल गयी ! निश्चित हुआ कि सुबह नहा धोकर दर्शन करेंगे ! हाँ ! वैष्णो देवी के भवन पर भी श्राइन बोर्ड वालों ने खाने पीने की बढ़िया सुविधा करी हुई है ! 24 घंटे की सुविधा !


अगली सुबह बहुत ठन्डे पानी से नहाना पड़ा ! हालाँकि मैं नवम्बर आते ही ठण्डे पानी से नहाने से तालुक तोड़ देता हूँ और गर्म पानी शुरू कर लेता हूँ लेकिन पूजा पाठ के मामले में ये जिद छोड़ देनी पड़ती है ! बहुत ठंडा पानी था ,राम राम ! रोम रोम खड़ा हो गया ! सबसे बाद में नहाया मैं ! नहाने के लिए बढ़िया व्यवस्था है , महिलाओं की अलग और पुरुषों की अलग ! नहा धोकर जूते चप्पल लॉकर में रखे और दर्शन करने वाली लाइन में लग गए ! जल्दी ही नंबर आ गया ! ये दर्शन अर्धकुंवारी माता के दर्शनों से आसान रहे और सुन्दर भी ! सुना था भीड़ भाड़ वाले दिनों में आदमी पिंडियों को देख भी नहीं पाता और चलता कर देते हैं लेकिन माता की कृपा रही कि बहुत सुन्दर और स्पष्ट दर्शन कर पाये हम ! 

 


जय माता की !


दर्शनों के पश्चात भैरों बाबा के दर्शन के लिए और ऊपर जाना था ! साथ चल रहे प्रभात और प्रशांत ने बताया कि भैया सीढ़ियों से चढ़ना कठिन तो है लेकिन जल्दी पहुँच जायेंगे ! सीढ़ियां ही पकड़ लीं ! एकदम खडी चढ़ाई दिखती है ! बच्चे साथ हों तो और भी मुश्किल ! लेकिन माता रानी की कृपा , देखिये सब जय माता की ! कहते कहते भैरों बाबा के मंदिर तक पहुच ही गए ! वहाँ भीड़ बहुत कम थी और ऐसा लग रहा था जैसे भवन पर जाने वालों में से सिर्फ कुछ ही लोग यहाँ तक आये हों ! दर्शन सुलभ और आसान रहे ! ये 12 नवम्बर हो चला था ! शर्मा जी का आदेश आया कि आज ही वापिस अर्धकुंवारी रुकेंगे ! दोपहर के 12 बजे होंगे अभी ! मैंने पूछा -क्या हम आज ही कटरा चल सकते हैं ? फिर सुबह सुबह जम्मू और शाम को ट्रेन पकड़कर गाजियाबाद ! मेरे दिमाग में जम्मू घूमने का प्लान चल रहा था लेकिन मेरा विचार किसी को पसंद नहीं आया ! सब थके हुए थे और अर्धकुंवारी से आगे नहीं बढ़ना चाह रहे थे ! भैरों बाबा की तरफ से अर्धकुंवारी तक उतराई है ! रास्ते में एक दो बढ़िया दूकान हैं जिन्हें आप रेस्टॉरेंट कह सकते हैं ! भैरों बाबा से शुरू करके हम बस वहीँ रुके और कुछ खाया पिया ! वहाँ से चले तो थोड़ी नीचे ही सांझी छत है जहां तक कटरा से हेलीकाप्टर सेवा उपलब्ध है ! हर 10 मिनट में एक हेलीकाप्टर उड़ान भरता हुआ दीखता है ! सांझी छत विश्राम करने के लिए भी बहुत बेहतर जगह है हालाकिं ये हेलीपेड से कुछ दूर है लेकिन बहुत सुन्दर जगह है ! हमने करीब एक घंटे तक वहाँ डेरा जमाये रखा ! बढ़िया , आरामदायक धुप लग रही थी वहाँ और आसपास के दृश्य भी अति सुन्दर हैं ! फ़ोटो लेने लायक ! सांझी छत पर ही माता वैष्णो श्राइन बोर्ड का एक रेस्टोरेंट है जहां आपको वही सब कड़ी चावल , राजमा चावल , चाय आदि मिल जायेगी !

 


सांझी छत से उतरते समय बहुत सी सीढ़ियां पड़ती हैं ! उनकी संख्या अधिकतर स्थानों पर लिखी हुई है जैसे 68 सीढ़ियां , 526 सीढ़ियां आदि आदि ! ये सीढ़ियां चढ़ते समय तो बहुत कष्टदायक लगती हैं किन्तु उतरते समय बहुत आसान और शॉर्टकट लगती हैं ! बहुत जल्दी जल्दी ही नीचे पहुंचा देती हैं ! लेकिन बुजुर्ग लोगों को ख़ास ध्यान रखना चाहिए ! सीढ़िया चढ़ते समय भी और उतरते समय भी ! जय माता दी , जय माता दी करते कहते आखिर हम 4 या साढ़े चार बजे के आसपास वापिस अर्धकुंवारी पहुँच गए थे ! अर्धकुंवारी पर एक जगह है शारदा भवन , 100 -100 रुपये में डोरमेटरी मिल जाती है यानि हर आदमी को 100 रुपये में एक एक बैड मिल जाता है सोने के लिए । इसी की जरुरत थी हमें उस वक्त ! इतनी थकान थी कि पड़ते ही सो लिया मैं तो ! पत्नी ने जगाया कि कुछ खा तो लो ! 8 बजे थोड़ी दूर स्थित श्राइन बोर्ड के खान पान केंद्र में गया और रोज की तरह वो ही कढ़ी चावल खैंच आया दो प्लेट ! लौटकर आया तो बीवी नाराज ! मेरे लिए क्यूँ नहीं लाये ? मैंने कहा अपने आप खा आओ ! वो गुस्सा हो गयी ! लेकिन थोड़ी देर ही गुस्सा , रही मान गयी ! मानना ही था ! मैं झुक गया था और वापिस उसके लिए कढ़ी चावल लेने चला गया ! साथ में दौनों बच्चों को भी कर दिया ! बच्चों ने मैगी खानी थी , वो मिली नहीं तो चाउमिन का विचार आया ! 40 रूपये कि एक प्लेट ! मुझे मालुम था एक प्लेट में दौनों का ! उसे बोला ,बिना सॉस और मिर्च कि चाउमिन बना दे ! उसने कह दिया नीचे बेसमेंट में चले जाओ , वहाँ कह देना ,वो बना देगा ! नीचे पहुंचे तो लगा बिलकुल ही धरातल में आ गए हैं शायद ! उसने बच्चों के हिसाब से बिना मिर्च मसला डाले चाउमिन बना दी ! जब बच्चे खा चुके और चलने को तैयार हुए तो वो मुझे पूछने लग गया , दौनों बच्चे जुड़वां हैं क्या ? मैंने कहा नहीं , डेढ़ -दो साल का अंतर है ! हाँ ,बड़ा बीटा शरीर से कुछ हल्का है इसलिए लग रहा होगा ! मैंने चलते चलते बच्चों को बोला बीटा , अंकल को थैंक्यू बोलो ! बड़ा तो बोल आया , जब छोटे ने देखा तो वो भी भाग कर आया और थैंक्यू बोलकर भाग आया ! वो आदमी हमारी टेबल के पास आया और उसने दौनों बच्चों को टेबल पर खड़ा कर एक फ़ोटो निकल ली अपने मोबाइल में और फिर कुछ देर बाद एक पर्ची मेरे हाथ में थमाते हुए बोला इसे आप ऊपर काउंटर पर दे देना ! उसमें लिखा था स्टाफ ! ऊपर जाकर वो पर्ची काउंटर पर दी तो मुझे मेरे दिए हुए 40 रुपये वापस मिल गए ! बच्चों का प्यार ! जय हो

 

अगली सुबह अर्धकुंवारी से कटरा ही पहुंचना था , शरीर थक हुआ भी था आराम से आँख खुली ! आठ बजे ! शायद 9 बजे हैम निकले होंगे कटरा के लिए ! 11 बजे कटरा बड़े आराम से पहुँच गए ! लोगों को खरीद दारी भी करनी थी , प्रसाद वगैरह ! महिलाओं को अपने स्टॉल , शॉल , कड़े , चूड़ी ,सिंदूर जाने क्या का लेना था ! भगवान् जाने ! ये सब चीजें हर जगह मिलती हैं लेकिन न जाने क्यूँ कटरा से ही खरीदना जरुरी था ? हाँ एक बात भूल गया ! कटरा में बहने वाली बाण गंगा नदी के ठन्डे ठन्डे पानी में सिर्फ मैं ही नहाया ! बड़ी बात ! दिसंबर जनवरी कि ठण्ड में 8 -8 दिन मुँह चुपड़कर कॉलेज आने वाला बाँदा इतने ठन्डे पानी में नहाया ! और फिर गुलशन कुमार के भंडारे में भी भोजन किया ! पहली बार मैकेनिकल रोटी मेकर भी देखा ! खैर ! सब सामान और प्रसाद खरीदकर कटरा से तीन बजे बस पकड़ी और पांच बजे हम जम्मू रेलवे स्टेशन पर थे ! छह बजे का समय था ट्रैन का ! जम्मू स्पेशल ! एकदम गन्दी और बकवास ट्रैन ! न साफ़ सुथरी और न टाइम पर चलने वाली ! इसे सुबह 6 बजे ग़ज़िआबाद पहुँचना था लेकिन पहुंची 10 बजे ! अगर कोई मजबूरी न हो तो इस ट्रैन से यात्रा न करें !

 

जय माता की !

 

                                    मेरा बड़ा बेटा हर्षित





                                                                छोटा बेटा पारितोष


                   कटरा की तरफ से चढ़ाई करते समय शुरू में ही पड़ता है ये मंदिर ! सुन्दर है ! दौनो भाई साथ साथ


                                                   अर्धकुंवारी पर दर्शन का इंतज़ार 

              गर्मी थी ! इस बन्दर का मन हुआ होगा की कुछ तूफानी हो जाए तो छीन ली किसी की कोल्ड ड्रिंक 



                                  अच्छा तो अब चलते हैं वापस


जल्दी  ही आप अमृतसर की यात्रा का विवरण पढ़ेंगे ! तब तक राम राम ....................

सोमवार, 1 जुलाई 2013

चलते – चलते

तेरी आरजू , तेरी जुस्तजू , तेरा इंतज़ार
ओह ! हमें कितना काम है आजकल ।



एक जेल में और एक ‘ बेल’ में
नेताओं का कितना नाम है आजकल ॥



छत पर एक झंडा लगा लिया जाए
पार्टियों के झंडे का क्या दाम है आजकल ?



काम से फुर्सत पाकर तुझे ही ढूँढता हूँ
तेरी जुल्फों के तले ही मेरी सुबहे-शाम है आजकल ॥



चलो इन उसूलों को कूड़े में डाल दें
इस मुल्क में सोच गुलाम है आजकल ॥



हुकूमत से कोई उम्मीद लगाना छोड़ दो
चोरों के हाथ में मुल्क का निजाम है आजकल ॥



अदीब-ओ-अमन के पैरोकार कहाँ गए
निठल्लों के हाथ में कलाम है आजकल ॥



अब छोड़ दी जाएँ ‘ योगी ‘ ज़मीर -ओ- ईमान की बातें
हिन्द में बस ताकत को सलाम है आजकल ॥



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बुधवार, 19 सितंबर 2012

कंक्रीट के वृक्ष

यहाँ वृक्ष हुआ करते थे
जो कभी
लहलहाते थे
चरमराते थे
उनके पत्तों का
आपस का घर्षण
मन को छू लेता था
उनकी डालों की कर्कश
कभी आंधी में
डराती थी मन को |
बारिश के मौसम की
खुशबू और ताज़गी
कुछ और बढ़ा देती थी
जीवन को ||

 

उन वृक्षों की पांत
अब नहीं मिलती
देखने तक को भी
लेकिन , हाँ !
वृक्ष अब भी हैं
वही डिजाईन
वही उंचाई
शायद उंचाई तो कुछ
और भी ज्यादा हो
मगर इनसे हवा
नहीं मिलती
नहीं मिलती
इनसे खुशबू
न कोई आनंद
लेकिन
निश्चित ही
ये वृक्ष
पैसे उगलते हैं
जिसके लिए
हर कोई
पागल बना फिरता है
मगर इतने पर भी
इन वृक्षों से मोह
नहीं हो पाता


कैसे हो ! आखिर
हमने इन्हें सीमेंट से
जो सींचा है |
भावनाएं कैसे समझेंगे
ये कंक्रीट के वृक्ष
हमारी भावनाओं का
घड़ा भी तो
इनके लिए रीता है ||

बुधवार, 20 जून 2012

धरती जो सबसे पावन ……

धरती जो सबसे पावन वो धरती हिंदुस्तान की |
लेते वीर जन्म जहाँ वो माटी हिंदुस्तान की ||


कितने हमले हुए यहाँ , खोने ना पाई इसकी शान
मात्रभूमि की रक्षा को यहाँ करता बच्चा बच्चा जां कुर्बान ||


मात्रभूमि की रक्षा को ही यहाँ नारी ने तलवार उठाई थी
करोड़ों लोग आ गए पीछे जब गाँधी ने आवाज़ लगाईं थी ||


मत भूल अशफाक की कुर्बानी को मत भूल भगत के जोश को
फिरंगियों को वापस भगाया , तू भूल गया क्या उस बोस को ? ||


आजाद सरीखे वीरों के दम पर ही अंग्रेजों ने जंग हारी थी
भूल गया क्या उस ऊधम को जिसने डायर को गोली मारी थी ||


इन सब वीरों को भारत की आज़ादी का अरमान था
लड़ा जो हिंद के लिए वो हर वीर महान था ||


उनका ही वंशज है तू , और है भारत वासी
लगता है जन्मभूमि है फिर से कुछ बलिदानों की प्यासी ||


भारत माँ की रक्षा को अपना शीश कटा ले तू
मात्रभूमि पर निछावर होकर कुछ पुण्य कमा ले तू ||

शुक्रवार, 11 मई 2012

अगर भ्रष्टाचार खत्म हो गया तो ?

मान के चलिए कि अन्ना हजारे जी के आन्दोलन ने अपना रंग दिखाना शुरू कर दिया और लोगों के दिमाग बदलने लग गए | लोगों ने रिश्वत लेना और देना बंद कर दिया और कमीशन से तौबा कर ली ……….| नेताओं और अधिकारियों के मन ने उनको धिक्कारना शुरू कर दिया | घर में रिश्वत के पैसे लाने पर बीवी और बच्चों ने धिक्कारना शुरू कर दिया | मतलब ये कि भ्रष्टाचार में लिप्त लोगों की आत्मा ने उन्हें कचोटना शुरू कर दिया , उनका जमीर जाग गया तो ……………? सोचिये कितना बड़ा नुक्सान हो जायेगा अगर ऐसा हो गया तो ? फिल्म वालों के लिए वैसे ही कहानी का अकाल पड़ा रहता है हर तीसरी फिल्म तो भ्रष्टाचार पर होती है , भ्रष्टाचार नहीं रहेगा तो फिर कहानी कैसे मिलेगी ? सोचिये उस बेचारे मुसद्दी का जिसने ऑफिस ऑफिस खेलते खेलते अपने बच्चों को पाला और उस को हीरो भी बना दिया | सुनते हैं अब वही मुसद्दी एक फिल्म ” मौसम” भी बना रहा है | आप ही बताइए अगर भ्रष्टाचार नाम का धंधा न रहा होता तो ये बेचारे कैसे जीवन यापन करते ? और अपना वो राम गोपाल वर्मा , जानते तो हैं न ? वो तो कहीं भुट्टा ही बेच रहा होता | फिर भी आप कहते हैं कि इस भ्रष्टाचार को ख़तम करें | काहे भाई ? काहे औरों के पेटों पर लात मार देना चाहते हैं | तनिक उनका भी तो सोचिये जो “कुछ” पाने के चक्कर में नेता जी के इधर उधर लगे रहते हैं ? भले ही दुनिया उन्हें चमचा कहे , मगर उन्हें भी तो अपना घर चलाना है कि नाही ? अगर नेता जी को कहीं से कमीशन या नजराना नहीं मिलेगा तो वो अपने चमचों को क्या देंगे ? अगर चमचों को चासनी नहीं मिलेगी तो वो फिर उधर क्यों मुहं मारने जायेंगे ? और जो वो मुहं मारने वहां नहीं जायेंगे तो नेता जी को पूछेगा कौन ? फिर कैसी राजनीति और काहे के लिए राजनीति ? बिना किसी फायदे के लिए कोई कुछ करता है क्या ? अब वो भगवान श्री कृष्ण तो हैं नहीं कि सोच लें ” कर्म किये जा फल कि इच्छा मत कर |”


इस भ्रष्टाचार के खेल से जाने कितनो के घर चलते हैं | टी.वी. की टी.आर.पी. से रिपोर्टर की तनख्वाह बढती है , अखबार के समाचारों से पत्रकारों का घर चलता है | कुछ नहीं तो कम से कम हम जैसे तुच्छ साहित्यकारों के बारे में ही सोचिये जिन्हें भ्रष्टाचार पर लिखने से कुछ संतुष्टि मिल जाती है |


तो भैया जैसा चल रहा है चलने देने में ही क्या बुराई है ? जब हमारे इतने गुनी और योग्य प्रधानमंत्री को इसमें कोई बुराई नज़र नहीं आती तो आप काहे खामखाँ परेशान होते हैं |

ओम प्रकाश आदित्य जी की एक कविता , इस लेख को कुछ  और बड़ा करने और रोचक बनाने के लिए साथ में दे रहा हूँ !

इधर भी गधे हैं , उधर भी गधे हैं
जिधर देखता हूँ , गधे ही गधे हैं  ||
 

गधे हँस रहे हैं , आदमी रो रहा है
हिंदुस्तान में ये क्या हो रहा है  ?

ये दिल्ली ये पालम गधों के लिए है
ये संसार सालम गधों के लिए है  ||

मुझे माफ़ करना मैं भटका हुआ था
वो
ठर्रा था जो भीतर अटका हुआ था !!