बुधवार, 10 अप्रैल 2019

Baijnath Shiva Temple : Himachal Pradesh

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बैजनाथ शिव मंदिर : बैजनाथ ( हिमाचल प्रदेश ) 
Date of Journey : Oct.2018



कांगड़ा दूसरी बार आया था मैं और दोनों ही बार परिवार के साथ आने का सौभाग्य रहा। मैं कोशिश करता हूँ कि जहाँ जाऊं बच्चों को साथ रखूं। इसके दो वजह लेकर चलता हूँ -पहली बात ये कि बच्चे पढ़ने के बजाय  देखने से ज्यादा और जल्दी सीखते हैं , दूसरी बात - बच्चों का अकेले -अकेले घर में मन नहीं लगता और तीसरी बात जो सबसे महत्वपूर्ण हो सकती है वो ये कि जब बीवी -बच्चों को पहले कहीं घुमा लाता हूँ तब कहीं जाकर मुझे अकेले ट्रैकिंग पर जाने की अनुमति मिल पाती है।


आज मौसम एकदम बढ़िया है और कांगड़ा फोर्ट देखकर वापस बस स्टैंड पहुँच रहे हैं। एक ऑटो  hire कर लिया था 300 रूपये में जिससे समय की बचत हो गयी। आज बैजनाथ मंदिर जाने का प्रोग्राम है लेकिन यहाँ कांगड़ा बस स्टैंड पर अभी पालमपुर की बस जाने को तैयार है , बैजनाथ के लिए भी बसें मिलती हैं लेकिन हम इंतज़ार नहीं करना चाहते और पालमपुर की बस में अपना बैग पटक देते हैं। रास्ते अच्छे हैं तो गाड़ियों की रफ़्तार भी अच्छी मिल जाती है। लेकिन किराया भी उसी हिसाब से 'अच्छा ' है , मतलब थोड़ा ज्यादा है और जगहों के मुकाबले। करीब 75 किलोमीटर दूर होगा बैजनाथ , कांगड़ा से। बस पालमपुर पहुँचने को है और मैं उस "पालमपुर " के ख्यालों -ख़्वाबों को फिर से बुनने में लगा हूँ जो मैंने बचपन से पढ़े हैं , देखे हैं। 


मेरी उम्र के जो मित्रगण हैं और जिन्होंने मेरी तरह उत्तर प्रदेश माध्यमिक शिक्षा परिषद् से हाइस्कूल और इंटरमीडिएट की परीक्षाएं पास की हैं , उन्हें याद होगा कि हमें अंग्रेजी में किसी लेखक का एक पाठ पढ़ाया जाता था -नैनीताल का। जिसके बारे में बताया जाता था कि वहां सुन्दर ताल हैं , सीढ़ीदार खेत होते हैं .. कोई- कोई मास्टर जी सीढ़ीदार खेत को पेढ़ीदार खेत कहते थे। मतलब तब हिल स्टेशन के नाम पर बस नैनीताल और मसूरी , दो ही नाम जेहन में भी और किताबों में भी , पढ़ने को मिलते थे। अब थोड़ा हिंदी फिल्मों की तरफ आएं तो 1980 से पहले की फिल्मों में नायक -नायिका कश्मीर की वादियों में पेड़ों के इर्द गिर्द नृत्य करते हुए दिखते थे। . ......छोड़ दो आँचल ......जमाना क्या कहेगा... ..फिर अजय देवगन ने दोनों पैर फैलाकर दो बाइक पर सवार होकर फिल्मों में एंट्री मारी .. उनकी फिल्मों में और उनके बाद की फिल्मों में भी जब जब हीरोइन बीमार पड़ती तो डॉक्टर उन्हें हवा -पानी बदलने के नाम पर पालमपुर भेजने लगे। वो पालमपुर अब आने वाला था। ... लेकिन ये पालमपुर वो नहीं था जिसकी कल्पना मैं करके आया था .. इतना भीड़भाड़ वाला तो नहीं था मेरा वाला पालमपुर। .. इतना बदरंग चेहरा नहीं था मेरे पालमपुर का। . किसने बिगाड़ा इसका चेहरा ? लाइन से चलती छोटी -बड़ी गाड़ियों ने और बेतहाशा बढती आबादी ने। उफ्फ ये वो पालमपुर नहीं है तो फिर मुझे देखना भी नहीं है। मेरी नजरें तो उस चित्रकार वाले पालमपुर को देखने आई थीं जहाँ भरपूर हरियाली हो , जहां कल -कल बहती छोटी सी नदी हो , जहां पक्षियों की कलरव हो.... .. जहां मैं और मेरी हमसफर बाहों में बाहें डालकर बच्चों को साथ लेते हुए प्रेम के तराने गुनगुना सकें . रहे न रहे हम .. महका करेंगे .. बनके कली बनके सबा.... . लेकिन नहीं। वो पालमपुर नहीं है ये और मैं इसका बदरंग चेहरा अपनी आँखों से नहीं देख सकता। लेकिन अब लौटकर लगता है कहीं ऐसा तो नहीं कि मैं असली वाला चेहरा देख ही न पाया होऊं ? ऐसा तो नहीं कि मैं जिस प्रेमिका से मिलने गया था , उसकी चचेरी बहन को देखकर अपना मन खट्टा करके उसके बारे में गलत धारणा बनाकर लौट आया होऊं ? 


पालमपुर से भी पांच मिनट में ही बैजनाथ के लिए बस मिल गई। अक्टूबर का आखरी वीक है और कोल्डड्रिंक की इच्छा जाग्रत हो रही है तो मतलब सीधा सा है , इस पहाड़ी क्षेत्र में गर्मी खूब है। करीब दो -ढाई बजे हम बैजनाथ कस्बे में प्रवेश कर गए। शांत और छोटा सा बैजनाथ जहां का शिव मंदिर विश्व प्रसिद्ध है और उसी के दर्शन के लिए हम यहाँ आये हुए हैं। बैजनाथ जगह का नाम , बैजनाथ शिव मंदिर से ही आया है। बैजनाथ की मुख्य शहरों से दूरी पर निगाह डाल लेते हैं फिर आगे चलते हैं : 


Palampur to Baijnath - 16 KM 
Dharmshala to Baijnath - 50 KM
Kangda to Baijnath(via Palampur ) -78 KM 
Pathankot to Baijnath - 133 KM
Delhi to Baijnath - 504 KM 
Chandigarh to Baijnath -273 KM 
Mumbai to Baijnath -1920 KM 


बैजनाथ जी का जो मंदिर है वो शहर के बस स्टैंड के एकदम सामने ही है और इसके लिए आपको न किसी से पूछने की जरुरत है और न अपना गूगल मैप खोलने की। सामने ही दिख जाएगा लेकिन रुकिए , कुछ खा पीकर जाइये। बराबर में खूब सारी दुकानें हैं जहाँ चाय -समोसा -जलेबी मिल जाती हैं बढ़िया स्वादिष्ट। खाते -पीते चलो यार। 

तो जी ये जो मंदिर है बैजनाथ जी का , ये बैजनाथ शहर में ही है , आप चाहो तो बैजनाथ कस्बा कह लो जी , कोई टैक्स नहीं लगना कहने पर !  और जी ये बैजनाथ शहर पठानकोट -मण्डी हाईवे पर दोनों शहरों के लगभग मध्य में स्थित है। समुद्र तल से करीब एक हजार मीटर की ऊंचाई पर बसा बैजनाथ , पश्चिमी हिमालय की धौलाधार रेंज में बसा है। बैजनाथ की प्रसिद्धि इसी शिव मंदिर से ही है जिसे कभी वैधनाथ के नाम से जाना जाता था। बैद्यनाथ मतलब चिकित्सक , हिंदी में बोलें तो Doctor के रूप में यहाँ भगवान शिव को पूजा जाता था। 13 वीं शताब्दी में बने इस मंदिर को नागर शैली में दो भाइयों मन्युका और आहुका ने बनवाया था। ब्रिटिश आर्किलियजिस्ट अलेक्सेंडर कनिंघम ने यहाँ एक शिलालेख पाया था जो 1786 ईस्वी का था और उसमें राजा संसार चंद्र के द्वारा इस मंदिर के पुनर्निर्माण के बारे में लिखा गया था। हिमाचल के कई प्रमुख स्थलों को भूकंप ने कई बार नुक्सान पहुँचाया है , यहाँ भी 1905 में आये एक भूकंप से इस मंदिर को बहुत नुक्सान पहुंचा था। 


बहुत भीड़भाड़ नहीं थी इसलिए अच्छी तरह दर्शन का लाभ उठाकर बाहर निकल आये। बाहर छोटा और खूबसूरत पार्क है जहां बैठकर आप अपनी थकान भी उतारते रहिये और बाहर से मंदिर के दर्शन भी करते रहिये। बराबर में ही नीचे की तरफ बिनवा नदी कल -कल बह रही है , बिनवा कभी बिंदुका हुआ करती थी जो ब्यास नदी की सहायक नदी मानी जाती है लेकिन समय के साथ बिंदुका , बिनवा हो गयी। पानी एकदम स्वच्छ और साफ़ दिखाई दे रहा था ऊपर से तो , नीचे उतरे नहीं :) 

बैजनाथ के आसपास और दर्शनीय जगहें : बैजनाथ मंदिर से करीब 6 किलोमीटर दूर सांसल में मुकुटनाथ मंदिर,  1. 5 किलोमीटर दूर अवाही नाग मंदिर,  पांच किलोमीटर दूर चोबीन रोड पर महाकाल मंदिर , अंद्रेटा में 11 किलोमीटर दूर शोभा सिंह आर्ट गैलरी !

अब वापसी का समय है और आज यहाँ से चामुंडा देवी के मंदिर जाएंगे और वहीँ रुकेंगे। आज के लिए इतना बहुत है फिर मिलते हैं :






















शनिवार, 23 मार्च 2019

Flag staff : New Delhi

आवारा हूँ .. लेकिन ये आवारगी ऐसी है कि चलते चलते कुछ ऐसा मिल जाता है जो आज के जमाने का भले न हो , तड़क -भड़क भले न हो लेकिन जब घर लौटकर उसके बारे में पढ़ते हैं तो आश्चर्य होता है कि हम जाने -अनजाने एक ऐतिहासिक स्थान देख आये और उसे अपने कैमरे में भी कैद कर लाये। मैंने 2018 के जुलाई -अगस्त महीने में लगातार कई चक्कर लगाए दिल्ली के। कारण -जिस जगह को देखने जाता तो वहीँ आसपास कुछ और भी मिल जाता था मगर उस दिन इतना समय नहीं रहता था कि मैं उस जगह को जीभर देख पाऊं। एक दिन गया तो कमला नेहरू रिज पर स्थित अशोक स्तम्भ और म्युटिनी मेमोरियल ( अजीतगढ़ ) देख के वापस आ गया , फिर पता चला दिल्ली में एक और अशोक स्तम्भ है , फिरोज शाह कोटला में , वहां होकर आया फिर पता चला कि यार कमला नेहरू रिज के पास ही हिंदूराव हॉस्पिटल के पीछे एक बावली है ..फिर गया और वहां से पैदल -पैदल ही लौटने लगा। सिविल लाइन मेट्रो स्टेशन के लिए निकला था करीब दो किलोमीटर पैदल होगा लेकिन ये सोचकर कि पैदल चलूँगा तो पेट कुछ कम होगा , चलना शुरू कर दिया। और जब चला तो रास्ता भूल गया और एक जंगल में पहुँच गया। दिल्ली में भी इतना घना जंगल है ? पहली बार पता चला मुझे। जंगल मुझे डराते हैं और ये जंगल भी मुझे डरा रहा था। लगता था अभी दो -तीन लड़के आएंगे और मुझे चार -पांच जमाके मेरे फ़ोन , कैमरा और रुपया पैसा सब ले जाएंगे। पचास -सौ मीटर चला होऊंगा कि सामने से एक बजुर्ग और उनकी बुजुर्गायन इवनिंग वाक करते हुए दिख गए। कुछ हिम्मत आई तो डर जाने लगा। थोड़ा और आगे बढ़ा तो दिल्ली की ''कल्चर " दिखने लगी। रास्ते के दोनों तरफ एक दूसरे से जुड़े चेहरे ..किसी से पूछा कि पास में कोई मेट्रो स्टेशन है ? हाँ , थोड़ा आगे से लेफ्ट हो जाना सिविल लाइन्स है। 


सामने एक गोल सी संरचना दिख रही है। वाह ! ये तो फ्लैग स्टाफ की बिल्डिंग है जो बिना टिकट ही सामने चली आई। शायद ये भी चाहती होगी कि मेरा भी कहीं जिक्र हो , मेरी भी बात हो। कोई मुझे भी जाने -पहिचाने.... देखने आये ! ये फ्लैग स्टाफ बिल्डिंग है जो 1828 में बनवाई गई थी। बनवाई तो एक सिग्नल टावर के रूप में थी लेकिन बाद में विख्यात या शायद कुख्यात और कारण से हुई। यहां इस इलाके में कभी अंग्रेज़ों के परिवार रहा करते थे जिनके लिए ये बिल्डिंग बनवाई गयी लेकिन 11 मई 1857 में भारत के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के सिपाहियों ने दिल्ली के अन्य स्थानों के साथ इस जगह को भी अपने कब्जे में ले लिया। उस वक्त कुछ मौतें भी हुईं और फिर ये खबर मेरठ पहुंची जहाँ से ब्रिटिश -इंडियन आर्मी की टुकड़ी वहां से करीब एक महीने बाद 7 जून को यहाँ पहुंची। भयंकर मारकाट हुई जिसके परिणामस्वरूप ये जगह बाद में अंग्रेज़ों को छोड़नी पड़ी। 

सम्पूर्ण रूप से गोलाकार रूप में बनी ये संरचना जितना वीभत्स इतिहास अपने आसपास लपेटे हुए है , अगर आप इसे महसूस करेंगे तो रोंगटे खड़े हो जाएंगे लेकिन आज की तारीख में ये बच्चों के खेलने और मस्ती करने की जगह है !! आज बस इतना ही ......











सोमवार, 4 मार्च 2019

Kangra Fort : Himachal Pradesh

कांगड़ा फोर्ट  
अक्टूबर 2018
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शाम हो चली थी बगुलामुखी मंदिर में ही। हमारा अगला ठिकाना कांगड़ा था और हम चाहते थे कि आज ही कांगड़ा पहुँच जाएँ और वहीँ रुकें। दो कारण थे -एक तो कांगड़ा से हम भलीभांति परिचित थे और दूसरा ये कि हमारा अगले दिन का समय बच जाता। रात आठ -साढ़े आठ बजे तक हम कांगड़ा के एक सामान्य से होटल के कमरे खाना -वाना खाकर आज की यात्रा के फोटो देख रहे थे। अक्टूबर का महीना था लेकिन मच्छर अपनी ड्यूटी पर मुस्तैद लगे मुझे , इनका भी सर्जिकल स्ट्राइक जरुरी था। आल ऑउट बहुत सही तरह की मिसाइल का काम करती है मच्छरों के लिए। कांगड़ा जितना बड़ा है उतना ही जीवंत शहर है। लगता ही नहीं पहाड़ी शहर है , देर से सोता है देर से ही जागता है।


आज हमारे दो प्रोग्राम थे। सुबह - सुबह कांगड़ा मंदिर में ब्रजेश्वरी देवी के दर्शन और दूसरा कांगड़ा फोर्ट। मंदिर के दर्शन के लिए हम 2014 में एक बार कांगड़ा आ चुके हैं लेकिन क्योंकि ब्रजेश्वरी देवी हमारी कुलदेवी मानी जाती हैं इसलिए जब भी अवसर मिलता है , दर्शन के लिए पहुँच जाते हैं। ब्रजेश्वरी देवी को हमारे यहाँ नगरकोट वाली देवी भी कहा जाता है। आप कभी वहां जाएँ तो किसी श्रद्धालु से पूछियेगा कि वो कहाँ से आये हैं ? आपको बुलंदशहर , अलीगढ जिले में से ही कोई होंगे वो श्रद्धालु ! कारण ये कि बुलंदशहर और अलीगढ में नगरकोट वाली देवी को बहुत माना जाता है।

सुबह करीब साढ़े आठ बजे हम ब्रजेश्वरी देवी मंदिर के प्रवेश द्वार पर थे और प्रसाद तथा चांदी का छत्र सजाकर अंदर की तरफ जब चले तो एक तरह की आश्चर्य मिश्रित ख़ुशी का एहसास हुआ। कारण ये था कि हमारे आगे दर्शन की लाइन में कोई नहीं था और मजे की बात की पीछे भी कोई नहीं था। बाहर साफ़ सफाई चल रही थी और हम मंदिर में दर्शन कर रहे थे। पिछली बार जब आये थे तब हमें एक लम्बी लाइन में इंतज़ार करना पड़ा था लेकिन आज हमें मौका मिल रहा था बहुत बेहतर और समय लेकर दर्शन करने का। जय माँ ब्रजेश्वरी !!

मंदिर से मुख्य रोड करीब आधा किलोमीटर होगा । लेकिन पहले नाश्ता वगैरह कर लें तब फिर आगे कांगड़ा फोर्ट चलेंगे । कांगड़ा फोर्ट शहर के बाहरी हिस्से में स्थित है और कोई शेयर्ड जीप , ऑटो या बस वहां नहीं जाती और आपको किराए पर ही अपना वाहन लेना होता है। मेरा मानना है कि ऑटो लेना सबसे बेहतर विकल्प है। शायद एक ये कारण हो सकता है कि जितने लोग कांगड़ा देवी मंदिर दर्शन के लिए आते हैं , उतने यहाँ कांगड़ा फोर्ट तक नहीं पहुँचते।

कांगड़ा फोर्ट को हिमालय क्षेत्र में स्थित सबसे बड़ा फोर्ट माना जाता है और ये भी कहा जाता है कि ये किला भारत के सबसे प्राचीन किलों में से एक है। इस किले को कटोच राजवंश के राजपूत राजाओं ने चौथी शताब्दी में बनवाया था। कटोच शासकों का सम्बन्ध महाभारत में वर्णित त्रिगर्त राजवंश से भी माना जाता है। इसकी दीवारें इतनी मजबूत हुआ करती थीं ( आज भी हैं ) कि 1615 ईस्वी में जब मुग़ल शासक अकबर ने इसे जीतने की कोशिश की तब उसे कई दिनों की कोशिश के बाद भी मायूसी झेलनी पड़ी और अंततः वो इसे छोड़कर वापस लौट गया हालाँकि बाद के वर्षों में अकबर के पुत्र जहांगीर ने राजा सूरजमल की मदद से हिमाचल के सबसे शक्तिशाली माने जाने इस किले पर 1620 में कब्जा कर लिया। गद्दार शुरू से ही रहे हैं इस देश में !! 

वक़्त बीतता रहा और उधर एक राजपूत का खून लगातार खौलता रहा। वो राजपूत खून था राजा संसार चंद्र का जो लगातार अपने पूर्वजों के इस किले को वापस लेना चाहता था। संसार चंद्र ही नहीं , उनसे पहले के राजा भी मुग़ल शासकों के अधीन सल्तनतों को मौका पड़ते ही लूटते रहे और कमजोर करते रहे। आखिरकार सन 1789 में राजा संसार चंद्र ने अपने पूर्वजों की इस धरोहर को , राजपूतों की शान को वापस जीत लिया। बीच में कुछ समय के लिए ये फोर्ट गोरखाओं के कब्जे में भी रहा लेकिन फिर अंग्रेज़ों के इसमें आने तक महाराजा रणजीत सिंह ने , राजा संसार चंद की मौत के बाद इसे अपने अधीन रखा। सन 1905 में आये एक भूकंप की वजह से इसे बहुत नुकसान पहुंचा और इसी डर से अंग्रेज़ों ने इसे छोड़ भी दिया।

किले का रहस्य :
ऐतिहासिक दस्तावेजों के अनुसार , कांगड़ा फोर्ट पर हमला करने वाला पहला राजा कश्मीर का राजा श्रेष्ठ था जिसने 470 AD में इस फोर्ट पर आक्रमण किया था। उसके बाद महमूद ग़ज़नवी ने भी 1000 A.D. में अपनी फौजों को इस फोर्ट पर आक्रमण करने का आदेश दिया। और ये सब ऐसे ही नहीं था ! ऐसा माना जाता है कि इस फोर्ट में 4 मीटर गहरे और 2.5 मीटर व्यास के , खजाने से भरे 21 कुँए हैं / थे जिनमें से ग़ज़नवी की फौजों ने आठ कुओं को ढूंढ भी लिया और लूट ले गए। इसके बाद 1890 के आसपास ब्रिटिश फौजों ने भी खजाने से भरे पांच कुओं को लूट लिया। ऐसा माना जाता है कि इस किले में अभी भी 8 कुएं ऐसे हैं जिनमें खजाना भरा पड़ा है और जिन्हें अभी तक खोजा नहीं जा सका है / या कह सकते हैं खोजा नहीं गया है।


फोर्ट में अलग -अलग समय पर बनवाये गए गेट हैं जैसे रणजीत सिंह द्वार , अहानी दरवाज़ा , गंगा -यमुना द्वार। अंदर लक्ष्मी नारायण मंदिर के अलावा एक जैन मंदिर भी है लेकिन इन मंदिरों के अलावा जब हम ऊपर जाते हैं तो इसके खँडहर इसके एक शानदार विरासत होने का नमूना प्रस्तुत करते दिखाई देते हैं। हालाँकि ये फोर्ट बहुत बड़ा नहीं है लेकिन इसको बनाया बहुत ही सोच -समझकर है। दीवारों में तीर -हथियार चलाने के लिए छिद्र बनाये गए हैं और सबसे ऊपर से लगभग उस समय पूरा कांगड़ा शहर दिखाई देता होगा।

लोग कांगड़ा जाते हैं तो सिर्फ उनके मन में टॉय ट्रेन की सवारी और मंदिर दर्शन की इच्छा रहती है। इस बार जाएँ तो अपनी इच्छाओं की लिस्ट को थोड़ा और बड़ा करके जाइये और कांगड़ा फोर्ट को भी एक बार देखकर आइये !! 






























मिलते हैं जल्दी ही :