मंगलवार, 7 फ़रवरी 2017

Bateshwar Temples : Morena

आपने देखा होगा कि मध्य प्रदेश का पर्यटन मंत्रालय बहुत एक्टिव और बहुत ही विशिष्ट विज्ञापन टेलीविज़न पर देता रहता है ! बाकी विज्ञापन मैं  देखूं या न देखूं लेकिन MP Tourism के विज्ञापन स्वतः ही आकर्षित करते हैं ! हमेशा ही एक नया और अलग तरह के विज्ञापन लेकर आते हैं वो लोग ! कोई मेरी बधाई उन तक पहुंचाने की कृपा करें !! लेकिन इन विज्ञापन में आपको मुरैना का नाम सुनने को नहीं मिलता ! वास्तव में , अगर आप भारत के पर्यटन मानचित्र ( Tourism Map ) पर नजर डालें तो आपको मुरैना कहीं भी नजर नहीं आएगा , और अगर कैसे भी मोटा चश्मा लगा के नजर आ भी गया तो बहुत धुंधला सा दिखाई देगा जबकि,  यहीं , इसी मुरैना में ASI ने बहुत ही पुराना खजाना खोज निकाला है ! तो आइये चलते हैं , इसी खजाने के दर्शन करने !



तारीख थी 6 जनवरी 2017 और बच्चों की सर्दियों की छुट्टियां चल रही थीं ! पत्नी और बच्चे अपनी नानी के यहां थे और ऐसे में मौका था कहीं छोटा मोटा सा ट्रिप मार लेने का :) ! उनके नानी के यहां जाने का प्लान लगभग 15 दिन पहले पक्का हुआ और मैंने चुपके से ग्वालियर तक का रिजर्वेशन करा लिया दक्षिण एक्सप्रेस में , ये ट्रेन हज़रत निजामुद्दीन से रात को 11 बजे निकलती है और सुबह साढ़े पांच बजे ग्वालियर पहुंचा देती है ! बढ़िया है , रात का सफर करके ग्वालियर पहुंचो और सुबह अपनी यात्रा शुरू ! मेरे साथ दो मित्र अमित तिवारी जी और नीरज अवस्थी जी भी चल रहे थे लेकिन वो दूसरी ट्रेन में मुझसे आधा घंटे पीछे चल रहे थे ! जब उनसे बात हुई तो उन्होंने बताया कि बटेश्वर मंदिर जाने के लिए ग्वालियर जाने की जरुरत नहीं है , आप मुरैना उतर जाना ! हम भी मुरैना ही उतरेंगे ! ये भी ठीक है , दक्षिण एक्सप्रेस मुरैना पर भी रूकती है ! दिल्ली से निकलते ही बारिश शुरू हो गई थी और आगरा तक बारिश ही होती रही जिस कारण ठण्ड से सिकुड़ के तीन का आंक बन गया ! हालाँकि कम्बल था मेरे पास लेकिन इतनी ठण्ड में कम्बल के बस की बात नही थी कि ठण्ड का मुकाबला कर पाए ! अरे तीन का आंक समझ आया आपको ? तीन मतलब 3 ! असल में सर्दी में 3 का आंक खुद भी बन जाता है , हम भले इसे मुहावरे में प्रयोग कर लेते हों लेकिन इसके पीछे मैकेनिकल इंजिनीरिंग है ! चलो बता ही देता हूँ ! असल में हीट ट्रांसफर रेट , एरिया पर निर्भर करता है ! ज्यादा एरिया मतलब ज्यादा हीट ट्रांसफर और कम एरिया मतलब कम हीट ट्रांसफर ! तो जब आप ठण्ड में सिकुड़ते हैं तो वास्तव में आप अपने शरीर का एरिया कम करते हैं जिससे हमारे शरीर से कम हीट रिजेक्ट होती है और हमारे शरीर में कुछ गर्मी बनी रहती है जबकि गर्मी में इसका उल्टा होता है और हम हाथ फैलाकर सोने की कोशिश करते हैं जिससे एरिया बढ़ जाता है और शरीर कूल कूल महसूस करता है !

खैर सुबह सुबह साढ़े चार -पांच बजे मुरैना स्टेशन पहुँच गया और उतरते ही चाय खेंच ली , बड़े दिन बाद पांच रूपये की चाय मिली , लेकिन कम थी तो एक कप और ले ली ! लौट के फिर स्टेशन आ गया , बाहर ठण्ड बहुत थी ! मोबाइल चार्जिंग पर लगा रहा था कि सामने स्टेट बैंक का ATM दिख गया , स्टेशन परिसर में ही ! पैसे थे जेब में लेकिन नोटबंदी के चक्कर में कहीं कम न रह जाएँ , देख लेता हूँ यहाँ इस ATM से मिल जाएँ तो ठीक रहेगा ! ज्यादातर ATM तो खाली चल रहे हैं ! हुर्रे !!  मिल गए , 500 -500 के चार नोट मार लिए , इससे ज्यादा निकल भी नही सकते !

अमित भाई और नीरज जी भी पहुँच गए , उनके साथ एक कप और सही ! अब इस टूर के असली मालिक वो ही हैं ! अमित भाई के हाथ में है सब आगे का प्लान ! अमित भाई के साथ ये दूसरी यात्रा है , इससे पहले उनके साथ सतोपंथ की अविस्मरणीय यात्रा कर चूका हूँ और उन्हें हमारे ग्रुप में "गूगल बाबा " कहा जाता है ! आप समझ गए होंगे कि कितनी जानकारी होगी उन्हें ! स्टेशन से ऑटो पकड़ा और बस स्टैंड पहुँच गए , वहां से नूराबाद की बस लगी थी ! सुबह के मुश्किल से 6 बज रहे होंगे और घुप अँधेरा फैला हुआ था चारों तरफ ! आधा घंटे -चालीस मिनट में नूराबाद पहुँच गए ! अब हमें "बटेश्वर मंदिर समूह " देखने जाना है !

नूराबाद में सुबह सुबह कुछ मिलेगा नहीं इन मंदिरों तक जाने के लिए ! असल में ये मंदिर पड़ावली गाँव में हैं तो वहां कोई इन्हें बटेश्वर मंदिर नही बल्कि पड़ावली के मंदिर कहते हैं और इन मंदिरों तक आसानी से पहुँच भी नही सकते ! या तो आप अपनी गाडी से जाओ , गाडी किराए पर लेकर जाओ या फिर हमारी तरह ट्रेक्टर में लटक लटक के जाओ ! नूराबाद जिस तिराहे पर खड़े थे वहीँ एक चाय -बीड़ी की दूकान वाले ने बता दिया था कि आपको ट्रेक्टर में या मेटाडोर में ही जाना पड़ेगा ! कब मिलेगा , नही पता ! लेकिन अच्छी बात ये रही कि 10 मिनट के अंदर ही एक पिकअप गाडी आ गयी और हम तीनों पीछे लटक लिए ! उसने हमें एक गांव के बाहर तक जाकर छोड़ दिया ! रास्ते में बड़े बड़े पत्थरों से भरे बहुत सारे ट्रेक्टर मिलते रहे , ये पत्थर वहीँ पडावली मंदिरों से खुदाई कर करके निकाले जा रहे हैं !

जहां उतरे वहीँ तीन चार बुजुर्ग इंगहाने ( अलाव ) पर आग ताप रहे थे , हम भी उधर ही बढ़ चले ! उन्होंने अपनी कुर्सियां हमारे लिए छोड़ दीं , ये होता है गांव का सम्मान ! खूब बातें हुईं , उनमे से बस एक ही आदमी ने दिल्ली देखी थी , बाकी ने बस नाम ही सुना था ! शुद्ध दूध की चाय पी , हालाँकि अमित भाई थोड़ा शर्मा रहे थे लेकिन मैं चाय के मामले में थोड़ा बेशर्म हो जाता हूँ ! वहीँ के लोगों ने हमारे लिए ट्रेक्टर रोक लिया और हम उनसे विदा लेकर फिर आगे की तरफ चल दिए ! उस ट्रेक्टर वाले ने भी हमें मंदिरों से करीब एक डेढ़ किलोमीटर दूर उतार दिया ! अब पैदल चलते हैं ! अमित भाई ने अपना GPS चालू कर लिया है ! ये वो ही जगह है जहाँ 80 के दशक में दस्यु मलखान सिंह , निर्भय सिंह का आतंक व्याप्त था लेकिन अब सबकुछ सामान्य !


हालाँकि मंदिरों तक जाने का रास्ता सड़क से ही है लेकिन हम शॉर्टकट लेने के चक्कर में पहाड़ियों के ऊपर होकर गए , जिसका एक नुक्सान हुआ कि हमें ज्यादा चलना पड़ा लेकिन एक फायदा भी हुआ कि हमने इस मंदिर समूह में पीछे की तरफ से प्रवेश किया और पीछे की पहाड़ियां भी देख पाए !

 क्या है "बटेश्वर मंदिर समूह " ? कहाँ है ? क्यों प्रसिद्द है ? आइये थोड़ा जानकारी लेते हैं :

मध्य प्रदेश के मुरैना में स्थित "बटेश्वर मंदिर समूह "मुरैना से करीब 25 किलोमीटर दूर archaeological site है जहाँ करीब 200 मंदिरों के अवशेष ASI को मिले हैं ! इन मंदिरों में ज्यादातर मंदिर भगवान शिव को और कुछ मंदिर भगवान विष्णु जी को समर्पित हैं ! ये मंदिर सैंडस्टोन के बने हैं और ऐसा माना जाता है कि इन्हें 8 वीं -9 वीं सदी में परिहार वंश के शासकों ने बनवाया ! रोचक बात ये है कि ये मंदिर खजुराहो के मंदिरों से पहले के बने हुए हैं ! चम्बल की घाटी में लगभग 10 एकड़ जगह में बने इन मंदिरों के बारे में जब ASI को पता चला तब एक मुस्लिम अधिकारी डॉ के के मुहम्मद ने इनका जीर्णोद्धार करने का बीड़ा उठाया ! लेकिन मुश्किल ये थी कि यहां आसपास चम्बल के डकैतों का डर व्याप्त था इसलिए न तो कोई अधिकारी आगे बढ़ रहा था और न काम करने वाले मजदूर ! ऐसे में डॉ मुहम्मद ने वहां के दस्यु सरगना निर्भय सिंह गुर्जर से संपर्क किया और निर्भय सिंह को मनाने में सफल हो गए ! उन्ही के प्रयासों का परिणाम है कि हम आज इस विरासत को फिर से जीवंत देख पा रहे हैं ! Thank You !! डॉ साब !! आज कुल 200 मंदिरों में से करीब 80 मंदिर पुनः अपने रूप में हैं , लेकिन दुर्भाग्य ये है कि जबसे (2015 ) डॉ मुहम्मद अपनी सरकारी नौकरी से रिटायर हुए हैं और दस्यु निर्भय सिंह मारा गया है तब से , मंदिरों जीर्णोद्धार का काम लगभग रुक सा गया है ! वहां जो केयर टेकर था , वो बता रहा कि डॉ मुहम्मद कभी कभी आज भी आते हैं इन मंदिरों को देखने , पूजा पाठ करने ! सही है , उन्होंने जिस जीवट और लगन से इन मंदिरों को दोबारा से खड़ा किया है वो प्रयास सच में सराहनीय है !



आगे अभी बहुत कुछ ऐसा है जिसे आप पहली बार देखेंगे , ऐसा मुझे भरोसा है :


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                                ये निजामुद्दीन स्टेशन पर youtube का कियोस्क लगा है , जहाँ लोग अपनी पसंद का विडियो डाउनलोड करने में लगे थे , और jio के ज़माने में भी खूब भीड़ लगी थी

ये तुर्रेदार मूंछ और नीरज जी की कातिलाना मुस्कान!
मुझे इनकी मूंछ से ज्यादा कडा पसंद आया
अमित भाई का केंचुआ ब्रांड हमेशा उनके साथ होता है



ट्रेक्टर ट्राली में ही चलते हैं



ये 21 वीं शताब्दी है और इंसान चाँद पर पहुँच चूका है लेकिन यहाँ अभी तक बिजली नही पहुँच पाई
मेरे देश की मिटटी सोना उगले -उगले हीरे मोती

मुसाफिर चलता जा
तुम भी चलते जाओ मुसाफिरों
कुछ दिखा क्या नीरज भाई ?
अभी तो यही दिख रहा है बस
मिल गया ! मिल गया ! खजाना मिल गया
मिल गया ! मिल गया ! खजाना मिल गया!
पहली झलक
पहली झलक


जल्दी ही मिलेंगे फिर से :

गुरुवार, 2 फ़रवरी 2017

Quli Khan's Tomb : Mehrauli, Delhi

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तो हाजिर हो सब ? इतिहास की क्लास शुरू करी जाए ? बच्चो , इस बार क्लास लगाने में थोड़ा विलम्ब हुआ क्योंकि इस बीच आपके गुरु जी , मतलब मैं जयपुर और जैसलमेर की यात्रा पर निकल गया था ! आगे की क्लास का मैटर भी तो तैयार करना होता है ! है कि नहीं ? तो वापस चलते हैं , महरौली के ऐतिहासिक अर्किलिजीओकल पार्क में ! अब तक हम बलबन के मक़बरे और जमाली -कमाली की मस्जिद के बारे में पढ़ चुके हैं ! मस्जिद से बाहर आकर ऊँट की तरह मुंह उठाकर खड़े हो जाओ और चारों तरफ घूम जाओ , देखो कहीं कुछ रह तो नहीं गया ? आपको एक गोल गोल सी संरचना और उसके पास एक छोटा महल सा दिखाई देगा ! ये जो छोटा सा महल है ये क़ुली खान का मक़बरा है या ये कह लें कि मेटकॉफ का "आराम घर " है ! अब ये क़ुली खान कौन था ? यहां क्यों आया ? और ये मेटकॉफ कौन था , यहां भारत में क्या बेचने आया था :-) आइये थोड़ा इतिहास में चलते हैं :

अकबर से आप सब भलीभांति परिचित हैं , अकबर की परवरिश की थी महम अंगा ने , तो महम अंगा उसकी सौतेली माँ जैसी हो गयी , और इसी महम अंगा के दो बेटे थे ! एक अधम खान और दूसरा कुली खान ! आदम खान का तो बहुत कुछ मिलता है लेकिन कुली खान का ज्यादा इतिहास नहीं मिल पाता पढ़ने को ! वैसे भी "छोटे लोगों " की कहानियां कौन लिखता है ? आदम खान का मकबरा भी पास में ही है , आप चाहें तो देख सकते हैं !

मेटकॉफ , अंतिम मुग़ल शासक बहादुर शाह ज़फर के समय में ब्रिटिश का गवर्नर जनरल रहा था , जिसे दिल्ली के सिविल लाइन में रहने को बंगला दिया गया था लेकिन उसे अपनी छुट्टियां बिताने के लिए खूबसूरत जगह की तलाश थी और उसकी ये तलाश रुकी कुली खान के इस octagonal मकबरे पर, जिसे उसने 1830 ईसवी में "दिलखुशा " नाम दिया ! दिलखुशा मतलब "दिल की ख़ुशी " ( “delight of the heart,”) ! इस जगह को चुनने की सबसे बड़ी वजह ये थी कि यहां से सामने ही क़ुतुब मीनार का शानदार द्रश्य दिखाई देता था ! आज भी दिखाई देता है लेकिन शायद पोल्लुशन ने कुछ तो असर डाला ही है , अन्यथा आप वहां खड़े होकर कल्पना कर सकते हैं कि कितना शानदार नजारा होता होगा ! वैसे एक बात है , जितनी मौज राजा महाराजों , सुल्तानों की रही है हर युग में वो बड़े नसीब से मिलती है ! इन अंग्रेजों को सर्दी के लिए अलग घर चाहिए होता था गर्मी के लिए अलग ! जब मेटकॉफ दिलखुशा में नही होता था तब वो इस घर को हनीमून कपल्स को किराए पर दे देता था !

इस दिलकुशा के पास ही एक गोल सा कुछ बना है , लेकिन मुझे उसके विषय में कोई जानकारी नहीं है ! वो भी किसी ने ऐवें ही बनवा दिया होगा और अब हम जैसे फ़ालतू के लोग ये पता लगाते फिर रहे हैं कि ये किसने बनवाया , कब बनवाया , क्यों बनवाया ? लगे रहो ! मैं तो चलता हूँ वापस अपने घर ! शाम होने को है और अभी गाज़ियाबाद पहुँचने में डेढ़ -दो घंटे लग ही जाएंगे ! महरौली की कथा ख़त्म होती है !

चलो मिलते हैं जल्दी ही एक और इंटरेस्टिंग कहानी लेकर ! तब तक कुछ फोटो भी देखते जाइये :










ये क्या है ? आप को ही जवाब देना पड़ेगा ( What is this ? somebody can tell ) 




ये फोटो नेट से उठाया है ! केवल एक तुलनात्मक सन्दर्भ देने के लिए

ये क्या है ? आप को ही जवाब देना पड़ेगा ( What is this ? somebody can tell ) 
*****************#######**********************राम राम ************************

शुक्रवार, 20 जनवरी 2017

Mehrauli Archaeological Park : Jamali-Kamali Tomb

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जब आप महरौली के खंडहरों में बलबन के घर और उसकी कब्रों को देख रहे होते हैं और अपने आपको इतिहास का प्रेमी दिखाने की कोशिश में हों तो भूल मत जाइयेगा कि सामने ही एक और इतिहास का नमूना , इतिहास का आइना आपका इंतज़ार कर रहा है ! सामने ही "जमाली -कमाली " की मस्जिद और उन दोनों के मक़बरे हैं ! जगह अच्छी है और भुतहा मानी जाती है , लेकिन इंसान खुद ही भूत हो गया है , ऐसे झूठ मूठ के भूतों से अब कौन डरता होगा ?


जमाली कमाली क्या बला है ? पहले नहीं मालूम था लेकिन जब एकदिन ज़हाज़ महल देखकर आया और उसकी पोस्ट यहां लिखी तो अंग्रेजी की विख्यात ब्लॉगर मृदुला द्विवेदी  जी ने मेरी पोस्ट पर अपने कमेंट में मुझे पूछा कि जमाली कमाली मस्जिद देखकर आये ? मैंने सोचा कि ज़हाज़ महल से थोड़ा आगे एक मस्जिद सी है तो सही , यही जमाली कमाली मस्जिद रही होगी ! और कह दिया , हाँ ! देखी तो लेकिन फोटो नहीं लिए क्योंकि वो जगह मुझे डरावनी सी लगी ! लेकिन वो पता नहीं क्या था ! असली जमाली कमाली तो यहां महरौली के अर्किलिजीओकल पार्क में आराम फरमा रहे हैं और मैं उन्हें जाने कहाँ कहाँ ढूंढता फिर रहा हूँ ! तुम भी न यार ? कहाँ कहाँ जा के लेट जाते हो ? चलो , अब आखिर पकड़ ही लिया है तो लोगों को तुम्हारे बारे में बताना भी अपना कर्तव्य है !



तो भाई लोगो , जमाली -कमाली के नाम से महरौली के अर्किलिजीओकल पार्क में एक खूबसूरत और पुरानी मस्जिद है और इसी मस्जिद के पास में उनके मकबरे हैं ! जमाली -उर्दू नाम है जो जमाल से बनता है ! जमाल का मतलब सुंदरता यानि beauty ! और एक शब्द और भी है -जमालघोटा ! उसका मतलब बताने की जरुरत नहीं है आपको ! आप बड़े स्मार्ट और इंटेलिजेंट लोग हैं , कुछ बातें खुद ही समझ जाते हैं ! जमाली साब का ये नाम उनका तकुल्लुस रहा होगा क्योंकि उनका असली नाम , शेख फजुलउल्लाह था और सही बात तो ये है कि ये नाम भी उनका असली नाम नहीं था ! वो एक सुन्नी मुस्लिम थे तब उनका नाम जलाल खान था और जब वो सूफी संत हो गए तब उनका नाम शेख फजुलउल्लाह या शेख जमाली कंबोह हुआ ! पूरे एशिया की यात्रा करते हुए जमाली सिकंदर लोधी के दरबारी कवि हो गए ! जमाली के विषय में तो खूब जानकारी मिलती है लेकिन उन के साथ कब्र में बराबर में सोये हुए कमाली के बारे में ज्यादा मालूमात नहीं मिलती ! यहां ये बात रोचक है कि ये मकबरे और मस्जिद सन 1528 -29 ईसवी में बनी है जबकि जमाली की मृत्यु सन 1535 ईसवी में हुई ! तो क्या जमाली -कमाली ने अपने जीवन में ही अपने लिए कब्र खुदवा ली थी ? अपने लिए हमेशा सोते रहने के लिए जगह का चुनाव पहले ही कर लिया था ? हालाँकि ऐसा हिन्दू रीति रिवाज़ में होता आया है कि जिन लोगों को अपने पुत्रों पर उनकी तेरहवीं करने का भरोसा नहीं होता , वो अपने जीवित रहते ही अपने मरने के बाद के सब कर्मकांड पूरे कर जाते हैं और ब्राह्मणों को भोजन और दान कर जाते हैं !

ये एक बड़ा सा अहाता है जिसमें एक तरफ मस्जिद है और मस्जिद के सामने खुली जगह है जबकि दूसरी तरफ जमाली -कमाली के मकबरे हैं ! मस्जिद तो सार्वजनिक रूप से खुली है लेकिन मकबरे तक जाने के लिए बीच में एक दरवाज़ा है , लेकिन वहां जो आदमी था उसने हमें मकबरों की तरफ नहीं जाने दिया जबकि मैं जब उस अहाते में घुस रहा था तब एक परिवार को मकबरों की तरफ से आते हुए देखा था ! नालायक !!  तो बस इतना ही कर पाया कि वहां से ही फोटो ले लिए !

चलो जी , जमाली -कमाली की बात तो मैंने आपको सुना दी , अब आगे चलते हैं ! आगे वो दिख रहा है कुछ - दिखा ? अरे यार ! वो पेड़ों के झुरमुट में से जो गोल गोल संरचना सी दिख रही है ? हाँ , बस उसके ही पास एक और पुरानी संरचना है , जिसे चाहो तो क़ुली खान का मकबरा कह लो और चाहो तो मेटकॉफ हाउस कह लो ! लेकिन यार आज नहीं , फिर चलेंगे ! नही नही , चलेंगे तो आज ही , लेकिन लिखेंगे फिर कभी ! लेकिन इतना पक्का है जैसलमेर जाने से पहले लिखेंगे !! तो बच्चो हाजिर हो जाना , अगली क्लास के लिए , इतिहास पढ़ाया जाएगा !

आओ तब तक कुछ फोटू -शोटू भी देखते जाओ  :

जमाली - कमाली मस्जिद , सन 1528 ईसवी में बनी
जमाली - कमाली मस्जिद , सन 1528 ईसवी में बनी

जमाली - कमाली मस्जिद , सन 1528 ईसवी में बनी
जमाली - कमाली मस्जिद , सन 1528 ईसवी में बनी  (अंदर का  द्रश्य)

ये बगल में ही जमाली -कमाली चिर निद्रा में सोये पड़े हैं !!
मस्जिद के दूसरी तरफ



मजेदार किस्सा है इस फोटो के पीछे ! ये लड़का आया -बोला भाई मेरा भी एक फोटो खींच दो , मैंने कहा चल ! और इस फोटो के एवज में हम दोनों ने मस्त चाय पी , और हाँ पैसे उसी ने दिए , जबरदस्ती !! वैसे मास्टर हूँ , मुफ्त की चाय पीना मेरी आदत है
इसके साथ एक और आ गया

मिलेंगे अभी जल्दी ही :

सोमवार, 16 जनवरी 2017

Mehrauli Archaeological Park : Balban's Ruins

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राजों की बावली और सामने वाले कब्रिस्तान की दुर्गन्ध सूंघने के बाद आगे महरौली अर्किलिजीओकल पार्क की तरफ कदम बढ़ा दिए , जंगल में से होकर रास्ता बना है ! आगे पीछे दो दो चार लड़के लड़कियों का ग्रुप चल रहा था और मैं अकेला ! इतिहास के टूटे फूटे पन्नों में इन नौजवानों की रूचि को चलते चलते ही तौल रहा था ! इन्हें सच में इतिहास में रूचि है ? या अवसर , एक मौके की तलाश कर रहे हैं ये लोग , अपनी भावनाओं को खुलकर बह जाने देने के लिए ! खैर , जो भी है !

अच्छा बनाया हुआ और अच्छी तरह मैंटेन किया हुआ है पार्क को ! बहुत सारे लोग मिल जाएंगे घूमते घामते , कुछ मॉडलिंग के शौक़ीन लोग भी बड़े बड़े कैमरों के सामने अपनी हर अदा से दूसरों की आँखों की चमक बढ़ा देते हैं ! आगे शुरुआत होती है एक गहरे कुँए से , जो शायद जहांगीर का कुआँ कहा जाता है ! इसके बाद मेटकॉफ का प्रयोग है जिसके निशान अभी बाकी हैं और लगभग हर जाने वाला उसके साथ खड़े होकर एक फोटो खिंचवाता ही है ! मेटकॉफ के विषय में और ज्यादा जानकारी अगली पोस्ट में आएगी ! यहां से निकलते हैं और अब सीधे बलबन के मक़बरों के खंडहरों की तरफ बढ़ते हैं ! बलबन मतलब गयासुद्दीन बलबन , 1266 ईसवी से 1287 ईसवी तक गुलाम वंश का दिल्ली का शासक रहा ! बलबन , गुलाम वंश का एक प्रितिष्ठित सुलतान रहा है ! और इसी प्रतिष्ठित शासक के ये जो खँडहर हैं ये 19 वीं शताब्दी के मध्य में ढूंढें गए जो आज हमारे लिए देखने लायक जगह हो चुकी हैं !


इन खंडहरों में आपको बलबन का मक़बरा , उसके पुत्र खान शहीद ( जिसका वास्तविक नाम मुहम्मद था ) का मकबरा और उस समय के घरों के कुछ खँडहर देखने को मिलते हैं ! खान शहीद 1285 ईसवी में मंगोलों के साथ युद्ध करते हुए मुल्तान में शहीद हो गया था जिसका मकबरा यहां बनवाया गया ! वैसे बलबन का इतिहास पढ़ें तो आप इसे बहुत रुचिकर समझेंगे , कैसे इसी बलबन को मंगोलों ने बंदी बना लिया था और इसे गज़नी ले जाकर बसरा के ख्वाज़ा जमालुद्दीन के हाथों बेच दिया था ! ख्वाज़ा जमालुद्दीन उसे लेकर दिल्ली आ गए और फिर इल्तुतमिश ने उसे ग्वालियर की विजय के बाद खरीद लिया ! और उसकी योग्यताओं से खुश होकर उसे "खासदार " बना दिया ! स्वामिभक्ति और सेवाभाव के फलस्वरूप वह निरंतर उन्नति करता गया, यहाँ तक कि सुलतान ने उसे चेहलगन के दल में सम्मिलित कर लिया। रज़िया के राज्यकाल में उसकी नियुक्ति अमीरे शिकार के पद पर हुई। बहराम ने उसको रेवाड़ी तथा हांसी के क्षेत्र प्रदान किए।

सन 1245 ईसवी में मंगोलों से लोहा लेकर अपने सामरिक गुण का प्रमाण दिया। आगामी वर्ष जब नासिरुद्दीन महमूद सिंहासनारूढ़ हुआ तो उसने बलबन को मुख्य मंत्री के पद पर आसीन किया। 20 वर्ष तक उसने इस उत्तरदायित्व को बेहतरीन तरीके से निबाहा । इस अवधि में उसके समक्ष जटिल समस्याएँ प्रस्तुत हुईं तथा एक अवसर पर उसे अपमानित भी होना पड़ा, परंतु उसने न तो साहस ही छोड़ा और न दृढ़ संकल्प। वह निरंतर उन्नति की दिशा में ही अग्रसर रहा । सन 1246 ईसवी में दुआबे के हिंदू जमींदारों की उद्दंडता का दमन किया। तत्पश्चात् कालिंजर व कड़ा के प्रदेशों पर अधिकार जमाया। प्रसन्न होकर सन 1249 ईसवी में सुल्तान ने अपनी पुत्री का विवाह उसके साथ किया और उसको नायब सुल्तान की उपाधि प्रदान की। सन 1252 ई. में उसने ग्वालियर, चंदेरी और मालवा पर अभियान किए। प्रतिद्वंद्वियों की ईर्ष्या और द्वेष के कारण एक वर्ष तक वह पदच्युत रहा परंतु शासन व्यवस्था को बिगड़ती देखकर सुल्तान ने विवश होकर उसे बहाल कर दिया। दुबारा कार्यभार सँभालने के पश्चात् उसने उद्दंड अमीरों को नियंत्रित करने का प्रयास किया। सन 1255 ईसवी में सुल्तान के सौतेले पिता कत्लुग खाँ के विद्रोह को दबाया।  सन 1257 ईसवी में मंगोलों के आक्रमण को रोका।  सन 1259 ईसवी में क्षेत्र के बागियों का नाश किया।

नासिरुद्दीन महमूद की मृत्यु के पश्चात् बिना किसी विरोध के बलबन ने मुकुट धारण कर लिया। उसने 20 वर्ष तक राज्य किया। सुल्तान के रूप में उसने जिस बुद्धिमत्ता, कार्यकुशलता तथा नैतिकता का परिचय दिया, इतिहासकारों ने उसकी भूरि भूरि प्रशंसा की है। शासनपद्धति को उसने नवीन साँचे में ढाला और उसको मूलत: लौकिक बनाने का प्रयास किया। वह मुसलमान विद्वानों का आदर तो करता था लेकिन राजकीय कार्यों में उनको हस्तक्षेप नहीं करने देता था। उसका न्याय पक्षपात रहित और उसका दंड अत्यंत कठोर था, इसी कारण उसकी शासन व्यवस्था को लोह रक्त की व्यवस्था कहकर संबोधित किया जाता है। वास्तव में इस समय ऐसी ही व्यवस्था की आवश्यकता थी।

बलबन ने मंगोलों के आक्रमणों की रोकथाम करने के उद्देश्य से सीमांत क्षेत्र में सुदृढ़ दुर्गों का निर्माण किया और इन दुर्गों में साहसी योद्धाओं को नियुक्त किया। उसने मेवात, दोआब और कटेहर के विद्रोहियों को आतंकित किया। जब तुगरिल ने बंगाल में स्वतंत्रता की घोषणा कर दी तब सुल्तान ने स्वय वहाँ पहुँचकर निर्दयता से इस विद्रोह का दमन किया। साम्राज्य विस्तार करने की उसकी नीति न थी, इसके विपरीत उसका अडिग विश्वास साम्राज्य के संगठन में था। इस उद्देश्य की पूर्ति के हेतु के उसने उमराव वर्ग को अपने नियंत्रण में रखा एवं सुलतान के पद और प्रतिष्ठा को बनाया। उसका कहना था कि "सुल्तान का हृदय दैवी अनुकंपा की एक विशेष निधि है, इस कारण उसका अस्तित्व अद्वितीय है।" उसने सिजदा एवं पायबोस की पद्धति को चलाया। उसका व्यक्तित्व इतना प्रभावशाली था कि उसको देखते ही लाग संज्ञाहीन हो जाते थे। उसका भय व्यापक था। उसने सेना का भी सुधार किया, दुर्बल और वृद्ध सेनानायकों को हटाकर उनकी जगह वीर एवं साहसी जवानों को नियुक्त किया। वह तुर्क जाति के एकाधिकार का प्रतिपालक था, अत: उच्च पदों से अतुर्क लोगों को उसने हटा दिया। कीर्ति और यश प्राप्त कर वह सन 1287 ई. के मध्य परलोक सिधारा। बलबन के दरबारी फ़ारसी कवि आमिर खुसरो और आमिर हसन थे ! नाशिरुद्दीन महमूद ने बलबन को उलुग खान की उपाधि दी ! बलबन ने फ़ारसी त्यौहार नवरोज प्रारम्भ करबाया ! सिजदा और पेबोस एक प्रकार की सम्मान करने की पद्धति थी जिसमें सुल्तान को लेट कर सम्मान देते थे और सुल्तान का ताज और पैर पर चुमते थे ! बलबन ,दिल्ली को मंगोलों के आक्रमण से रक्षा करने में सफल रहा और अंत में तुरकन ए चहल्गामी का नाश किया जिसे इल्तुत्मिस ने बनाया था ! 
इतिहास में जिसकी रूचि नहीं होती उसके लिए ऐसी पोस्ट झेलना मुश्किल हो जाता है , मैं जानता हूँ ! लेकिन देखते हैं ? कितने लोग हिम्मत दिखाते हैं : 

मेटकॉफ का प्रयोग  (Metcalfe Foli )
मेटकॉफ का प्रयोग स्थल से दिखाई देता कुतुबमीनार( Qutub Minar seen from Metcalfe Folly )


बलबन के ज़माने के घरों के अवशेष( Ruins of Houses of Balban's era)

बलबन की कब्र ( Grave of Balban)


Balban's Tomb
Balban's Tomb
Some more Ruins of Houses
Some more Ruins of Houses

गुरुवार, 12 जनवरी 2017

ताक धिना धिन ताके से.......Part- 4 ( Final)

अगर आप इस कहानी को शुरू से पढ़ना चाहते हैं तो यहां क्लिक करिये और अगर तारतम्य बनाने के लिए पिछले अंक पर लौटना चाहते हैं तो कृपया यहां अपना कर्सर ( Cursor ) लाकर हिट करिये !! अब तक आपने पढ़ा कि बकरी को पहाड़ से नीचे लाने के लिए लड़का , खरगोश और गिलहरी अपनी अपनी कोशिश कर चुके हैं अब आइये आगे बढ़ते हैं :



गीदड़ बोला :
तुम मत रो ओ
मैं बकरी को पहाड़ से उतारूँगा 
गीदड़ पहाड़ पर चढ़ने लगा
और बकरी के पास पहुंचा
गीदड़ ने बकरी को बुलाया
बकरी नहीं आई
वो और ऊपर चढ़ गई
अब गीदड़ भी रोने लगा
उसने दिल में सोचा
पहाड़ ऊँचा है
उसके नीचे दरिया बहता है
कहीं बकरी पहाड़ से न गिर जाए ?
कहीं बकरी दरिया में डूब न जाए ?
सोचकर गीदड़ जोर जोर से रोने लगा
गीदड़ लड़के , खरगोश और गिलहरी के पास आया
उन के पास बैठ गया
उन के साथ मिल कर बोला -

ताक धिना धिन ताके से
मामा कुंवर मर गई फ़ाक़े से


वहां कहीं पास ही एक हिरन रहता था
वो लड़के के पास आया
उसे घूरकर देखा
वो खरगोश के पास आया
उसे घूरकर देखा
वो गिलहरी के पास आया
उसे घूरकर देखा
वो गीदड़ के पास आया
उसे घूरकर देखा
फिर हिरन ने चारों से पूछा :
जंगल में खैर तो है ?
तुम क्यों रो रहे हो ?
सब मिल कर बोले -
मामा कुंवर की बकरी पहाड़ पर चढ़ गई है
पहाड़ ऊंचा है
उसके नीचे दरिया बहता है
कहीं बकरी पहाड़ पर से गिर न जाए ?
कहीं बकरी दरिया में डूब न जाए ?
इसलिए हम रोते हैं
अब चारों मिल कर बोले :

ताक धिनाधिन ताके से
मामा कुंवर मर गई फ़ाक़े से


हिरन ने कहा :
तुम मत रोओ
मैं बकरी को पहाड़ से उतारूँगा
अब हिरन पहाड़ पर चढ़ने लगा
वो बकरी के पास पहुंचा
बकरी को बुलाया
बकरी नहीं आई
वो और ऊपर चढ़ने लगी !
हिरन ने सोचा
पहाड़ ऊंचा है
उसके नीचे दरिया बहता है
कहीं बकरी पहाड़ से गिर न जाए
कहीं बकरी दरिया में डूब न जाए
ये सोचकर हिरन जोर जोर से रोने लगा
हिरन , लड़के , खरगोश , गिलहरी , गीदड़ के पास आया
वो उनके पास आकर बैठ गया
और उनके साथ मिल कर बोला -

ताक धिनाधिन ताके से
मामा कुंवर मर गई फ़ाक़े से


वहां पास ही ततैया या भिड़ों ( Wasps ) के झुण्ड का छत्ता था
भिड़ों के छत्ते में भिड़ों की रानी रहती थी
वो लड़के के पास आई
उसे घूरकर देखा 
वो खरगोश के पास आई
उसे घूरकर देखा
वो गिलहरी के पास आई
उसे घूरकर देखा
वो गीदड़ के पास आई
उसे घूरकर देखा
वो हिरन के पास आई , उसे घूरकर देखा
उसने लड़के , खरगोश , गिलहरी , गीदड़ और हिरन से पूछा :
तुम क्यों रो रहे हो ?
जंगल में खैर तो है ?
सब मिल कर बोले :
मामा कुंवर की बकरी पहाड़ पर चढ़ गई है
पहाड़ ऊंचा है !
उसके नीचे दरिया है
बकरी कहीं पहाड़ पर से गिर न जाए
बकरी कहीं दरिया में डूब न जाए
इसलिए हम रोते हैं
अब सब मिल कर बोले :

ताक धिनाधिन ताके से
मामा कुंवर मर गई फ़ाक़े से


भिड़ों की रानी बोली :
तुम रोओ मत !
मैं बकरी को पहाड़ से उतारूंगी
अब भिड़ों की रानी उड़ी
उड़ते उड़ते बकरी के पास पहुंची
उसने बकरी के कान में " भिन भिन " कहा
तुम नीचे उतरो !
पहाड़ पर मत चढ़ो
पहाड़ ऊंचा है
नीचे दरिया है
तुम्हारा कहीं पाँव न फिसल जाए
फिर तुम कहीं पहाड़ पर से गिर न जाओ
फिर तुम कहीं दरिया में डूब न जाओ
भिड़ों की रानी की बात बकरी की समझ में आ गई
वो पहाड़ से नीचे उतरी
वो लड़के के पास आई 

लड़के से बोली -
चलो घर चलें !
मामा कुंवर के पास चलें 
लड़का उठा
खरगोश उठा
गिलहरी उठी
गीदड़ उठा
हिरन उठा
सब एक कतार में खड़े हो गए
भिड़ों की रानी उड़ती रही
सब मिल कर बोले -
ताक धिनाधिन ताके से
मामा कुंवर मर गई फ़ाक़े से
सब जानवर अपने घरों को चल दिए
लड़का बकरी लेकर मामा कुंवर के घर गया
मामा कुंवर ने लड़के को खूब दूध पिलाया
मामा कुंवर फिर जोर से ताली बजाकर बोली : 

ताक धिनाधिन ताके से
मामा कुंवर मर गई फ़ाक़े से !!





************************** जय हिन्द !! जय हिन्द की सेना !!**************************