अमरनाथ यात्रा 2022
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खन्ना जी रात में ही चंदनवाड़ी जाने के लिए गाडी बुक कर चुके थे। सुबह -सुबह छह बजे ही निकलना था या शायद उससे भी थोड़ा पहले इसलिए 4 बजे ही जगने का सिलसिला शुरू हो गया और पहलगाम की ठण्ड में नहाना भी था, मगर अच्छी बात रही कि हमें होटल वालों ने गर्म पानी उपलब्ध करा दिया।
अँधेरा था जब हम ममलेश्वर अर्थात मामल मंदिर के पास स्थित अपने गेस्ट हाउस से निकले थे, गाडी एकदम बाहर तक ही आ गई थी। ड्राइवर ने गाडी पेट्रोल पंप पर लगा दी और वहां सिर्फ एक नहीं गाड़ियों की लम्बी लाइन लगी थी। ऐसा नहीं था कि गाडी में तेल नहीं था बल्कि वो पहले ही राउंड में गाडी की टंकी फुल करा लेना चाहता था जिससे ज्यादा से ज्यादा राउंड लगा पाए और ज्यादा लोगों को पहलगाम से चंदनवाड़ी तक छोड़ सके और कुछ और..... ज्यादा कमाई कर सके.! हमें पहलगाम से चंदनवाड़ी तक की 16 किलोमीटर की यात्रा कार से तय करनी थी।
लगभग सात बजे अच्छी -खासी सुरक्षा जांच के बाद हम उस पॉइंट पर थे जहाँ से वास्तव में हमें पैदल यात्रा शुरू करनी थी। पहले पेट पूजा कर लेना जरूरी था और यहाँ इतने तरह के खाने -पीने के आइटम्स थे कि गिनती कर पाना, लिख पाना बहुत मुश्किल होगा ! मैंने बस एक कप चाय और दो टोस्ट खाकर अपनी यात्रा को भगवान् भोलेनाथ का नाम लेकर शुरू कर दिया।
कुछ देर तक तो मुझे खन्ना साब और यूथिका चौधरी दीखते रहे मगर लगभग एक घण्टे के अंदर मैं उनसे पीछे छूट गया। अभी रास्ता ठीक ही था मगर 2 या ढाई किलोमीटर ही चले होंगे कि लगातार ऊँची चढ़ाई सामने दिख रख रही थी। चढ़ाई से उतनी परेशानी नहीं होती मुझे मगर लोग इधर-उधर से उस ऊंचाई को तय करने के चक्कर में जैसे दौड़े जा रहे थे जैसे उस पार कुछ तमाशा हो रहा है और उस पर घोड़े -खच्चर वाले ! घोड़े -खच्चर वाले अच्छा काम कर रहे हैं उधर मगर उनमें अनुशासन की बहुत कमी दिखी मुझे।
मैं अपनी चाल से चलता चला और एक ऐसी जगह पहुंचा जहाँ बहुत सारे लोग आराम फरमा रहे थे। मैं भी उधर बैठ गया , एक ऊंची सी जगह जिसे हम टीला कह सकते हैं जैसे दिल्ली में है -मजनू का टीला मगर ये मजनू का या लैला का टीला नहीं था ये पिस्सू टॉप था जो 11500 फुट की ऊंचाई पर है जबकि चंदनवाड़ी 9500 फुट की ऊंचाई पर है। इसका मतलब हम चंदनवाड़ी से चलकर अब तक 2000 फुट की ऊंचाई तय कर चुके थे।
पिस्सू टॉप आप आसानी से पहचान लेंगे, यहाँ टीले पर भारत की शान तिरंगा लहराता हुआ दिखेगा आपको। मगर एक और बात बताऊँ आपको -यहां से नीचे की तरफ बहुत शानदार व्यू देखने को मिलता है आपको। तो जब भी आप अमरनाथ यात्रा पर जाएँ यहाँ कुछ देर बैठ के इन नजारों का दीदार जरूर करियेगा। अमरनाथ जैसी यात्राओं के लिए समय लेकर चलिए क्यूंकि रास्ते बहुत ही सुन्दर हैं और उनको देखना , उनका आनंद लेना आपकी ऊर्जा को बढ़ाता रहेगा !
मैं फिर से बैग उठके चल पड़ा। रास्ता एकदम सपाट एकदम बढ़िया था और इसका फायदा उठाया मैंने तेज -तेज चल के। थोड़ा आगे ही कई भण्डारे लगे थे तो कुछ खाया पिया ! लगभग आधा घण्टे का आराम भी मिल गया और खाना भी हो गया तो निकल पड़े अगली मंजिल , अगले पड़ाव की ओर ! अगला पड़ाव ज़ोजिबल था जो मुश्किल से दो या तीन किलोमीटर ही होगा।
रास्ते में आपको इधर और उधर दोनों तरफ से घोड़े खच्चर आते जाते मिलेंगे और मिलेंगी खूबसूरत जलधाराएं जो सामने के पहाड़ों पर चांदी जैसी चमक रही होती हैं। इन जलधाराओं को देखते हुए चलते जाइये -चलते जाइये। कुछ देर में ही आपके रास्ते के बराबर में ही आपको बहुत सुन्दर और बड़ा वॉटरफॉल देखने को मिलेगा। आपकी आत्मा को तृप्त कर देगा ये दृश्य। पता नहीं क्या समस्या हुई चलते चलते कि मुझे लगा मेरा पेट गड़बड़ कर रहा है। मैं रास्ते में एक क्लिनिक में जा पहुंचा जहाँ डॉक्टर ने कोई मेडिसिन दी और बोले -पांच मिनट आप लेट के आराम कर लो ! आराम हो जायेगा ! अब ठीक फील करने लगा था तो रास्ता तय करना शुरू कर दिया।
लगभग 11 बजे होंगे जब मैं जोजीबल पहुंचा था। अब मैं अकेला था हालाँकि यात्रा के शुरू में हम चार लोग थे। जोजिबल के पास में कोई छोटी नदी बहती है जहाँ बहुत सारे लोग स्नान कर रहे थे , मैं नहाय तो नहीं मगर कुछ देर के लिए घास पर बैठ गया। बैठा क्या -नींद भी ले ली ! पहाड़ों की धुप बड़ी अच्छी लगती है और जब आपका शरीर थका हुआ होता है तो नींद भी जल्दी आ जाती है। खैर घण्टे भर की नींद खेंचने के बाद यहाँ से उठ चले अगली मंजिल जो नागकोटि बोली जाती है। ज़ोजिबल में भी खूब सारे भंडारे लगे हुए थे।
यहाँ थोड़ा बहुत कुछ खाया और आगे बढ़ चला। एक जगह तेज आवाज में भोलेबाबा के भजन बज रहे थे और जब नजदीक पहुंचा तो सिर्फ गाने ही नहीं बज रहे थे वहां शिव और पारवती का रूप धारण करे हुए नर्तक अपनी कला का प्रदर्शन कर रहे थे , उनके साथ ही कई लड़कियां -लड़के भी नृत्य में साथ निभा रहे थे और ये लड़के -लड़कियां मेरी तरह ही यात्री थे। अद्भुत दृश्य देखा मैंने यहाँ ! एक लगभग 50 -52 वर्षीय यात्री आया जिसके हाथ में भगवा ध्वज भी लहरा रहा था , वो आया और शिव -पारवती का रूप धारण किये हुए कलाकारों के चरण स्पर्श करने लगा। कितना सरल हृदय होगा ये व्यक्ति , उसने इन कलाकारों में भी भगवान आशुतोष को देख लिया। यही हमारी आस्था है , यही हमारी परम्परा है ! हमारे लिए हर जीवित अंश में भगवान का निवास है !
नागकोटि मैं ज्यादा देर नहीं रुका और शेषनाग के रास्ते पर आगे चल पड़ा। शेषनाग अभी थोड़ी दूर था मगर उससे पहले एक बहुत सुन्दर वॉटरफॉल हमारे ही रास्ते में दिख रहा था। आनंद आ गया इसे देखकर। साइड में वॉटरफॉल है जो एक पुल के नीचे से गुजरता हुआ अंततः नदी में जाकर मिल जाता है मगर नदी में मिलने से पहले अपना रौद्र रूप दिखा चुका होता है। यहाँ से शेषनाग झील के हल्के से दर्शन होने लगे थे। झील का हरे रंग का पानी निकलता हुआ दिखने लगा था।
शेषनाग लेक से जुड़े रोचक तथ्य :
शेषनाग झील करीब 250 फ़ीट से भी ज्यादा गहरी है. इस झील के विषय में मान्यता है कि शेषनाग जी स्वयं यहाँ निवास करते हैं
स्थानीय लोग ऐसा मानते हैं की 24 घंटे में एकबार शेषनाग जी झील की सतह पर आते हैं और उनकी आकृति दिखाई पड़ती है
पौराणिक कथाओं की मानें तो इस झील के साथ एक पौराणिक गाथा जुडी हुई है। इस झील का इतिहास भगवान शिव और माता पार्वती से जुड़ा है। दरअसल भगवान शिव पारवती जी को अमरकथा सुनाने के लिए अमरनाथ जा रहे थे और उन्हें ऐसी जगह चाहिए थी जहाँ उनकी कथा को और कोई न सुन पाए। क्योंकि जो उस अमरकथा को सुन लेता , वो अमर हो जाता। इसी के चलते भगवान शिव ने अपने गानों में से अनंत नागों को अनंतनाग में , नंदी जी को पहलगाम में और चन्द्रमा को चंदनवाड़ी में छोड़ दिया और सिर्फ शेषनाग जी को लेकर यहाँ पहुंचे। शेषनाग जी को यहीं छोड़कर भगवान शिव ने उन्हें निर्देश दिया कि यहाँ से आगे कोई भी नहीं जाना चाहिए।
शेषनाग पहुँचते-पहुँचते करीब तीन बज गए थे. बैग उतार के उसी के सहारे बैठा हुआ था तभी दो लड़के मेरे सामने से निकले। जाहिर है वो भी अमरनाथ यात्रा पर आए यात्री थे। मैंने उनसे अपनी दो -तीन तसवीरें निकलवाईं तो फिर बाद में बातचीत भी शुरू हुई। और ऐसी शुरू हुई कि हम अगले कुछ दिनों तक न सिर्फ अमरनाथ यात्रा में साथ रहे बल्कि श्रीनगर और आसपास भी साथ घूमते रहे।
मैं जहाँ जाता हूँ उस पवित्र कुण्ड में स्नान भी करता हूँ और वहां का जल भी अपने साथ लेकर आता हूँ चाहे वो सतोपंथ झील हो , नंदीकुंड हो या आदि कैलाश यात्रा में पार्वती सरोवर या कागभुशुण्डि ताल हो ! सब जगह से जल लेकर आया हूँ तो ष्षनाग झील का पवित्र जल भी लेकर आना ही था मगर लेक बहुत गहरी भी है और खतरनाक भी है और वहां सुरक्षा व्यवस्था भी बहुत है इसलिए मैं खुद नहीं उतरा जल लेने । आसपास एक 30 -35 वर्षीय कश्मीरी व्यक्ति दिखाई दिया , उसे 100 रूपये दिए और वो नीची जाकर मेरे लिए शेषनाग झील का पवित्र जल भर लाया।
अब यहाँ से आगे मैं अकेला नहीं था , मेरे साथ दो सहयात्री और जुड़ गए थे जो शेषनाग लेक के किनारे मिल गए थे। ये दोनों वकालत के छात्र थे और देहरादून से थे -ये थे राहुल और सुशील ! जिनके साथ मेरी आगे की यात्रा तय हो रही थी।
शाम का धुंधलका बस उतरने को ही था जब मैं शेषनाग के सुरक्षा गेट पर पहुंचा। अपना RFID कार्ड यहाँ स्कैन किया और आग बढ़ गए। बहुत ठण्ड लगने लगी थी जबकि शेषनाग का ये रेस्टिंग एरिया 11750 फ़ीट पर ही है मगर ठण्ड बहुत ही ज्यादा थी। हमें 400 रूपये प्रति व्यक्ति रुकने का प्रबंध मिल गया और रात करीब 9 बजे भण्डारे में प्रसाद ग्रहण कर के आज का दिन समाप्त हो गया।
कल फिर मिलेंगे आपको , इसी रास्ते पर इसी यात्रा पर.......
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