शनिवार, 1 अगस्त 2020

Dashavatara Temple, Deogarh (Lalitpur)-UP

दशावतार मंदिर , देवगढ़ (ललितपुर ) 
यात्रा दिनांक : 05 दिसंबर 2019



सुबह का समय था और घड़ी की सुइयां धीरे धीरे 10 बजने की तरफ बढ़ रही थीं जब ललितपुर जैसे छोटे से रेलवे स्टेशन से बाहर निकल रहा था। बड़े बड़े विक्रम टेम्पो तितर -बितर होकर आड़े -तिरछे जहाँ -तहाँ खड़े हुए थे। और तो और जो बाहर आने -जाने का रास्ता था उसके सामने भी टैंपो खड़े थे। मैं तो जैसे -तैसे निकल गया लेकिन महिलाओं को , विशेषकर मोटी सी महिलाओं को बहुत परेशान होते हुए देख रहा था। न पुलिस और न ट्रैफिक का कोई नियम -कानून ! भूख लगने लगी थी तो रेलवे स्टेशन से बाहर निकलकर दोनों तरफ कई होटल बने हुए दिख गए और हम एक में जा बैठे। बैग भारी था। आखिर आठ दिन के लिए कपड़े थे और ठण्ड के मौसम की वजह से कुछ गर्म कपड़े भी ....तो बैग फुल हो गया था और भारी भी। इसे और आगे "ढोना " नहीं चाहता था। नाश्ता करने के बाद उसी होटल वाले से पूछा -भैया बैग यहाँ छोड़ दें क्या ? भैया से पूछ लेना ! भैया ? जी। .. होटल मालिक ! आने वाले होंगे ! जब तक भइया आएं -तुम एक कप चाय और दो कचौड़ी और खिला दो ! उसके साथ सब्जी और दही ने स्वाद को और बढ़ा दिया !


भैया आये तो उनसे भी यही सवाल -बैग यहाँ छोड़ के जा सकता हूँ ? मुझे देवगढ़ जाना है ! आप कहाँ से आये हैं ? जी -गाजियाबाद से !

आप सुबह आये होते तो छह बजे यहाँ से एक बस जाती है , उससे चले जाते। आप जैन हैं ? नहीं , मैं जैन नहीं हूँ ! गाजियाबाद में कहाँ से है ? जी ---शास्त्री नगर से ! कौन से ब्लॉक से ? H ब्लॉक से !! H ब्लॉक से ... आप फलां जैन को जानते हैं ? हाँ जी जानता हूँ !! उनकी स्पोर्ट्स के सामान की दुकान है ! फिर और बातें हुईं। .. बैग वहीँ रखा ! नाश्ते के कितने पैसे हुए ? कुछ नहीं !! आपको पैसे नहीं देने हैं और हाँ , जब लौट के आएंगे देवगढ़ से तो आपको खाना भी यहीं खाना है !!  इस रिश्ते को क्या नाम दूँ ?

ललितपुर से देवगढ़ करीब 30 किलोमीटर तो होगा ही और ऑटो वाले का 500 रुपया माँगना गलत भी नहीं था लेकिन 500 रुपया मेरे लिए ठीक नहीं था। इतना महंगा ट्रिप नहीं बनाता मैं अपना। करीब आधा घंटे बाद यानी साढ़े ग्यारह के आसपास बस आई जो केवल जाखलौन तक जायेगी। कुछ तो आगे बढ़ेंगे ही। जाखलौन से बस 10 किलोमीटर के आसपास ही रह जायेगा देवगढ़। वैसे एक और बात है -अगर थोड़ा होमवर्क करता पहले तो जिस ट्रेन से ललितपुर आया था उसका एक हिस्सा टीकमगढ़ जाता है और दूसरा होस्सा बीना की तरफ जाता है। बीना वाले ही रूट पर ललितपुर से अगला स्टेशन जाखलौन ही है लेकिन ये सुविधा आपको तभी मिलेगी जब आप मेरी तरह पैसेंजर ट्रेन से यात्रा कर रहे होंगे अन्यथा तो आपको ललितपुर ही उतरना पड़ेगा। और हाँ , ललितपुर स्टेशन भी बहुत बड़ा स्टेशन नहीं है और न बहुत ज्यादा ट्रेन यहाँ रूकती हैं।


जाखलौन पहुँच चुका हूँ। नमक लगा खीरा अच्छा लगता है , दो खीरे खाने में बुराई नहीं है और इतनी देर में एक ऑटो भी तय कर लिया 200 रूपये में। हालाँकि मैं चाहता था कोई बाइक वाला मिल जाए जो मुझे देवगढ़ के दर्शन करा लाये। होई है वही .........जो राम रची राखा !! 


गजमोक्ष का दर्शन

 दशावतार मंदिर भगवान विष्णु को समर्पित मंदिर है जिसे 6th Century में बनाया गया था। ऐसे कहा जाता है कि इसे गुप्तकाल में बनाया गया था। बेतवा नदी की रमणीक घाटी में स्थित ये मंदिर आज के मंदिरों जैसा भव्य भले न हो लेकिन बहुत ही प्राचीन जरूर है। इतने पुराने मंदिरों में से बचे कुछ गिने -चुने मंदिरों में से एक दशावतार मंदिर की एक विशेषता इसका इतना प्राचीन होना भी है। मंदिर हालाँकि विष्णु जी को समर्पित है किन्तु आप यहाँ शिव , पार्वती , कार्तिकेय के साथ -साथ इसके मुख्य प्रवेश द्वार पर गंगा -यमुना की मूर्तियां भी देख सकते हैं। अच्छी बात ये है कि अब इस मंदिर को ASI ने अपने संरक्षण में ले रखा है जिससे कुछ और सुधार होने की गुंजाइश तो बढ़ती ही है। दशावतार का शाब्दिक अर्थ है -विष्णु जी के दस अवतार जो यहाँ परिलक्षित किये गए थे लेकिन इनमें से कुछ अवतार की मूर्तियां अब "मिसिंग " हैं।


दशावतार मन्दिर का शिखर अधिक ऊँचा नहीं है, वरन् इसमें क्रमिक घुमाव बनाए गए हैं। इस समय शिखर के निचले भाग की गोलाई ही शेष है, किन्तु इससे पूर्ण शिखर का आभास मिल जाता है। शिखर के आधार के चारों ओर प्रदक्षिणा पथ की सपाट छत थी, जिसके किनारे पर बड़ी व छोटी चैत्य खिड़कियाँ थीं, जैसा कि महाबलीपुरम के रथों के किनारों पर हैं।



मुख्य मंदिर एक बड़े प्लेटफार्म पर बना है और आधार प्लेटफार्म आयताकार दीखता है। मंदिर लगभग इसके मध्य में स्थित है और मंदिर की तीन दीवारें एक से एक बेहतरीन , दुर्लभ विष्णु अवतार की मूर्तियां से और अन्य मूर्तियां से भी शोभायमान कर दी गयी हैं। मुख्य द्वार के दोनों तरफ गंगा -यमुना सहित अन्य देवी देवताओं की मूर्तियां सजाई हुई हैं। आप जब इसे देखेंगे तो स्वतः ही कहेंगे -वाओ ! क्या खूबसूरत मूर्तिकला है ! अद्भुत !!

विष्णुजी , शेषनाग की छाया में विश्राम लेते हुए






ये​ मुख्य प्रवेशद्वार है













आज इतना ही। अब आगे चलेंगे एक और खूबसूरत जगह देखने यहीं देवगढ़ में ही .....

इस जगह का एक वीडियो भी बनाया था। आप चाहें तो देख सकते हैं: https://www.youtube.com/watch?v=mIXLGVyI7Ng

10 टिप्‍पणियां:

सुशील कुमार जोशी ने कहा…

बहुत सुन्दर चित्र।

Madhulika Patel ने कहा…

बहुत सुंदर संकलन।आदरणीय शुभकामनाएँ ।

दिगम्बर नासवा ने कहा…

बहुत रोचक सफ़र देवगढ़ का ... आपकी फोटो ग्राफी तो कमाल की है ...
हर एंगल नापतोल के खींचा है जैसे ...

Jyoti Dehliwal ने कहा…

हमेशा की तरह बहुत सुंदर वर्णन एवं फोटोज।

magiceye ने कहा…

Beautifully captured! A visual treat!

सुशांत सिंघल ने कहा…

वाह, क्या बात है! जितना मनोरंजक वर्णन, उतने ही मनोरम चित्र भी ! आपने एक अनजानी किन्तु महत्वपूर्ण जगह के बारे में जानकारी दी, इसके लिये हार्दिक आभार, भाई योगी सारस्वत !

jyoti yadav ने कहा…

Beautifully captured! A visual treat!

संतोष सिंह ने कहा…

सुंदर शब्दचित्र एवं फोटोग्राफी के लिए हार्दिक आभार।

बेनामी ने कहा…

अद्भुत संयोग

बेनामी ने कहा…

अद्भुत संयोग