मंगलवार, 7 जुलाई 2015

​ विष्णुपद मंदिर :गया और नेपाली मोनेस्ट्री:बोधगया

इस यात्रा वृतांत को शुरू से पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें !!


अब बोधगया में ऐसा कुछ नही बचा था जो देखने लायक हो। दोपहर के तीन बज रहे होंगे , सोचा पहले कहीं खाना खा लिया जाए फिर गया वापस निकलता हूँ। एक जगह खाना खाने के लिए बैठ गया तो सामने वाली टेबल पर एक और भाईसाब बैठे थे। बातचीत उन्होंने ही शुरू की - आप कहाँ से आये हैं ? मैंने बताया गाज़ियाबाद से। क्या क्या देख लिया ? मैंने बता दिया ! तुरंत बोले - नेपाल मोनेस्ट्री नही गए ? नेपाल मोनेस्ट्री भी है क्या यहां ? और उन्होंने पूरा रास्ता समझा दिया वहीँ टेबल पर बैठे बैठे। अभी तो पूरा समय था मेरे पास। ट्रेन गया से करीब साढ़े सात बजे है और अभी साढ़े तीन -चार बजे हैं। गरीब रथ में एक दिन पहले ही यानि गया पहुँचते ही आरक्षण करवा लिया था , वेटिंग मिली थी। लेकिन वेटिंग सिर्फ नाम की थी , दो। वो पक्की हो ही जानी थी और अगले दिन चार बजे तक पक्की हो भी गयी थी।


एक बात लिखना भूल गया। गया में भी कुछ स्थान हैं घूमने के लायक , जैसे विष्णुपद मंदिर। विष्णुपद मंदिर में पूर्वजों के लिए श्राद्ध करते हैं और ऐसी मान्यता है कि अगर आपने गया में पिंड दान कर दिया तो फिर आपको उन पूर्वजों का पिंड दान करने की जरुरत नही होती। कई सारे पाडा वहां आपको पिंडदान कराते हुए दिखाई देंगे। सही कहूँ तो वहां ज्यादातर वो ही लोग आते हैं जिन्हे पिंड दान करना होता है। मैंने भी पिता जी से जाने से पहले पूछा था , मैं भी पिंडदान कर आऊँ ? बोले -अभी तो मैं जिन्दा हूँ , मेरा पिंडदान कर देगा क्या तू ? खैर ये तो उनका मजाक था लेकिन मैं पिंडदान नही कर सकता था। दो कारण थे। एक तो मैं अधिकृत नही हूँ ! हमारे यहां श्राद्ध या पिंडदान केवल छोटा या बड़ा बेटा ही कर सकते हैं और मैं ठहरा बिलकुल बीच में , और दूसरी बात ये कि पिंडदान के समय धर्मपत्नी का होना अनिवार्य है और धर्म पत्नी मेरे साथ गया नही जा गई थी।


विष्णुपद मंदिर मैं सुबह सुबह ही पहुँच गया था। सोचा ये था कि जल्दी जाऊँगा तो धूप से बच जाऊँगा लेकिन लौटते लौटते धूप ने जकड लिया और फिर धूप सहन करने की शक्ति भी आ गयी और बोधगया पूरा धूप ही घूमा !  विष्णुपद मंदिर मतलब भगवान विष्णु के पद यानि पाँव।  भगवान विष्णु को समर्पित ये मंदिर फाल्गु नदी के किनारे है जहां बिहार के भूमिहार ब्राह्मण , पण्डों के रूप में कार्यरत हैं।  हालाँकि इसके निर्माण की तिथि स्पष्ट नहीं है लेकिन ऐसा कहा जाता है कि भगवान राम भी यहां सीता जी के साथ आये थे।  आज जो मंदिर हम देखते हैं उसका पुनर्निर्माण इंदौर की महारानी देवी अहिल्या बाई होल्कर ने 1787 ईस्वी में कराया था। 

 मंदिर में भगवान विष्णु की प्रतिमा है और उसके नीचे ही उनके पद यानि चरण हैं।  ऐसे बाहर फोटो लेने पर कोई रोक नही है किन्तु अंदर कैमरा ले जाना मना है।  आप चुपके से मोबाइल कैमरे से फोटो खींच सकते हैं अगर किसी का ध्यान आपकी तरफ नही जाता है तो।  वैसे बेहतर यही है कि अंदर फोटो न खींचे !

नेपाली मोनेस्ट्री का रास्ता महाबोधि मंदिर से बिलकुल पहले गया की तरफ से जाते हुए सीधे हाथ पर है। वहां एक बोर्ड भी लगा है लेकिन उस रास्ते पर जाते हुए एक बार तो लगा , यार गलत आ गया। सूअरों का झुण्ड इधर उधर घूम रहा था , झोपड़ियों में से बच्चों की आवाज़ आ रही थी , लगता था जैसे यहां देखने लायक कुछ नही हो सकता। इतने में एक झोंपड़ी से कोई निकला , अधनंगा सा। उसे पूछा भाई इधर नेपाली मंदिर कहाँ है ? बोला वो तो पीछे रह गया। पीछे ? हाँ - वो थोड़ा सा पीछे ! पीछे लौट लिए भाई। ओह तो ये है !! नेपाल बहुत गरीब देश है और उसकी गरीबी इस मोनेस्ट्री में भी झलकती है। न कोई चहल पहल , न कोई उत्सुकता। गेट बंद था , मैंने खुद ही अंदर हाथ डाल के खोल लिया। शांत सा माहौल। सामने एक भिक्षु दिखाई दिए , पास पहुंचा तो वो अपनी जैकेट सुखा रहे थे। भाई कितनी बदबू आ रही थी उनकी जैकेट से। जैसे 10 -20 साल से नहीं धोई हो। फिर एक अपाहिज लड़का एक कमरे में से निकल कर आया। हाँ जी ? मैंने कहा भाई मुझे मोनेस्ट्री देखनी थी। आ जाओ जी ! उसने मेरे लिए ही मोनेस्ट्री खोली और मैं अकेला ही उस मोनेस्ट्री में इधर उधर घूमता रहा। कभी ये ड्रम बजाया तो कभी वो ड्रम बजाया।


बार बार गया से मित्रों के फ़ोन आ रहे थे। पंडित जी आ जाओ। होटल छोड़ना है। पांच बज गए हैं। लेकिन मैंने उनसे अपना सामान भी स्टेशन मंगवा लिया और मैं सीधा स्टेशन ही पहुंचा। बोधगया से गया। इस रास्ते में कैंट भी आता है। जब इधर से गया था तो एक तोप देखी थी बाहर खड़ी हुई , सोचा कि लौटते हुए इसकी एक फोटो खींचूँगा। टेम्पो से लौटते हुए खींच भी ली , लेकिन बाहर खड़े संतरी ने इतना तेज डांटा कि अगला फोटो लेने की हिम्मत नही हुई।

तो अब चलते हैं वापिस गाज़ियाबाद । दो दिन की इस यात्रा में गर्मी तो बहुत झेली लेकिन आनंद भी बहुत आया।   ये यात्रा वृतांत लिखते समय एक खबर आई है गया से कि वहां के एक ही मोहल्ले के छह बच्चों ने आईआईटी प्रवेश परीक्षा में सफलता हासिल की है , बहुत बहुत बधाई उन सभी छात्रों को ! 





​​विष्णुपद मंदिर

​​विष्णुपद मंदिर







पिंडदान प्रक्रिया

विष्णुपद मंदिर













 ये रोग भारत से कब मिटेगा ?

ये फोटू इंटरनेट से ली गयी है



ये भगवान विष्णु का पाँव (पद )  ! इसीलिए इस मंदिर का नाम है विष्णुपद मंदिर






नेपाली मॉनेस्ट्री

नेपाली मॉनेस्ट्री













ये फोटू इंटरनेट से ली गयी है

इन ड्रम के पास एक लकड़ी सी रखी रहती है जिससे इन्हे बजाते हैं ! मैंने भी खूब हाथ आजमाए



ये फोटू भी इंटरनेट से ली गयी है



 ये गया स्टेशन पर एक कलाकृति 

 ये गया स्टेशन पर एक कलाकृति ! इसमें ऐसा नही है कि गांधी जी तस्वीर बुद्ध से नीचे लगी है बल्कि ये दो अलग अलग दीवारों पर हैं , फोटो में एक साथ दिख रही हैं !!

एक कलाकृति ये भी



विष्णुपद मंदिर में एक वृक्ष है जिसे पवित्र मानते हैं और उसकी परिक्रमा करते हैं !!
एक कलाकृति ये भी
ये आर्मी केंट का वो फोटो जिसे लेने पर मुझे डांट खानी पड़ी

और ये अपना गाज़ियाबाद स्टेशन !


गया और बोधगया की यात्रा का समापन हो रहा है आज ! मिलेंगे जल्दी ही कहीं और की यात्रा का वर्णन लेकर ! जय राम जी की!!





शुक्रवार, 3 जुलाई 2015

Japanese Language Lesson-3

​इस ब्लॉग पोस्ट को शुरू से पढ़ने  के लिए कृपया यहाँ क्लिक करें ! और अगर आप पिछली पोस्ट पर जाना चाहते हैं तो यहाँ क्लिक करिये !

​जापानी भाषा में पांच स्क्रिप्ट होती हैं। हिरागाना , काताकाना , कांजी , सूजी और रोमा जी। ज्यादातर हीरागना उपयोग में लाई जाती है। ​काताकाना लिपि में विदेशी लोगों और देशों के नाम लिखे जाते हैं , जैसे अगर मुझे अपना नाम लिखना हो या आपको अपना नाम लिखना हो तो आपको काताकाना में ही लिखना होगा। कांजी वहां की सबसे प्रचलित पुरानी लिपि है और सूजी लिपि में हम रोमन भाषा के अंकों या शब्दों को ज्यूँ का त्यों प्रयोग करते हैं जैसे यदि जापानी भाषा के पैराग्राफ में अंग्रेजी के 1 , 2 ,3 लिखे हैं तो वो सूजी लिपि कही जायेगी और अगर पैराग्राफ में जापानी अंकों जैसे ईची , नी , सान,  शी … का उपयोग किया गया है तो वो रोमा जी ( rooma ji ) लिपि कहलाएगी। जापानी भाषा वर्तमान में हिंदी या अंग्रेजी की तरह बाएं से दायें लिखी जाती है और ऐसे ही पढ़ी जाती है। हाँ , एक बात का विशेष ध्यान रखियेगा , जब हम किसी का नाम पुकारते हैं तो उसके साथ सान शब्द का उपयोग जरूर करते हैं।
जैसे :

अगर आप मुझे पुकारते हैं तो बस पहला नाम लीजिये योगी + सान = योगी सान। यानि आप मुझे योगी सान कहेंगे।

सान का एक और मतलब होता है जापानी भाषा में ? हाँ ! तीन ! सान मतलब तीन ! लेकिन यहां उससे कुछ भी लेना देना नहीं है ! बच्चो के नाम के साथ आप प्यार से चान (chan ) लगा सकते हैं

जैसे अगर मैं अपने बच्चे का नाम लूँ तो वो हो जाएगा , पारितोष + चान = पारितोष चान।

want to read it from starting ? click here . If you want to jump on very last post , you may click here

There are five scripts in japanese language , these are Hiragana , Katakana , Kanji, Suuji and Roomaji . all the foreigner names are written in Katakana script whether they are peoples or countries. Mostly Hiragana script is used in Japanese language as a common script. Kanji is the oldest script of japanese language . In Suuji , there are Roman numbers like 1,2, 3 in japanese language paragraphs and if there are japanses numbers like ichi , ni , saan , shi ...... then it is known roomaji script. japanese language is written like Hindi or English from left to right and the same way of reading.

Here in japanese culture you are required to call a person with saan after his/ her primary name . as my name is Yogi saraswat so if you want to call me then

Yogi + saan = Yogi Saan.

so don't be confuse that in Japanese saan means "three" . This is language and a word can have other meanings also.

You may call a child with "chan" . for example If I call my son Paritosh then I should call him as :

Paritosh + chan = Paritosh Chan .


 ​​अभी आज इतना सीखिये फिर और भी शब्द आएंगे !

Learn these letters now , more letters are waiting !!












Practice Sheet :
Here Practice Sheet for Ka , Ki , Ku , Ke and Ko  is below :     

                          Hiragana Practice sheet for ga, gi , gu , ge go :





More Practice Sheets are available on next posts :
                                                                                                        ​पढ़ाई आगे जारी रहेगी :Continue....

  

बुधवार, 1 जुलाई 2015

थाई मॉनेस्ट्री


इस यात्रा वृतांत को शुरू से पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें !!


बौद्ध धर्म से सम्बंधित मॉनेस्ट्री देखते देखते पक तो नही गए आप ? आज फिर  मोनेस्ट्री ले चलता हूँ आपको ।  थाई यानि थाईलैंड की मोनेस्ट्री।  इसे जवाहर लाल नेहरू के कहने पर दो देशों के बीच सम्बन्ध प्रगाढ़ करने के लिए 1956 ईस्वी में बनाया गया था।  ये भारत में अपनी तरह का विशिष्ट और एकमात्र थाई मंदिर है।  इस मंदिर में थाई स्थापत्य को बेहतरीन रूप में प्रदर्शित किया गया है।  कहते हैं इस मंदिर की छतों में सोने से डिज़ाइन बनाई गयी है।  मंदिर बिलकुल मुख्य रोड के किनारे है इसलिए ढूंढने और चलने में किसी तरह की कोई परेशान करने वाली बात ही नही है।  




आइये फोटो देखते हैं : 






प्रवेश द्वार


बाहर की दीवार


मुख्य मंदिर या मोनेस्ट्री

बताते हैं ये मूर्ति सोने की है !!





थोड़ा और नजदीक चलते हैं !!





ये मेहमानो के लिए , हम मेहमान नहीं थे !

दरवाजे पर डराने के लिए ? ऐसे  भूतों से तो बच्चे भी डरते !!



छोटे बुद्ध

छोटे बुद्ध






चलते हैं !!


                                                                                           

                                                                                                               यात्रा तो अभी जारी है :