शुक्रवार, 14 नवंबर 2014

प्रेम मंदिर - वृन्दावन

आज आपको भगवान श्री कृष्णा को समर्पित श्री कृपालु जी महाराज द्वारा बनवाए गए उत्तर प्रदेश के मथुरा के वृन्दावन में स्थित प्रेम मंदिर लिए चलता हूँ ! 54 एकड़ में फैले इस विशाल मंदिर का शिलान्यास जनवरी 2001 में कृपालु जी द्वारा ही किया गया और ये 17 फरवरी 2012 को जनता के लिए खोला गया ! यूँ तो ये मंदिर भगवन श्री कृष्णा को समर्पित है किन्तु इस दो मंजिला मंदिर के भूतल पर भगवान कृष्णा राधा जी के साथ और प्रथम मंजिल पर भगवान श्री राम सीता जी के साथ विराजमान हैं ! मथुरा से वृन्दावन जाते समय अटल्ला चुंगी से वृन्दावन के परिक्रमा मार्ग पर ही इसका रास्ता है ! इस्कॉन मंदिर से बिलकुल विपरीत दिशा में चलते जाइए , आप प्रेम मंदिर पहुँच जाएंगे ! लेकिन समय का विशेष ध्यान रखियेगा क्यूंकि ये मंदिर दोपहर को 12 बजे बंद हो जाता है और फिर शाम को साढ़े चार बजे ही खुलता है ! कोशिश करियेगा कि अँधेरे में इस मंदिर को देखें , क्यूंकि जब इस पर रौशनी पड़ती है तो इसकी खूबसूरती हज़ार गुना बढ़ जाती है !

आज ज्यादा लिखूंगा नहीं , आइये फोटो देखते हैं : 
 
 


प्रेम मंदिर का प्रवेश द्वार





यह फोटो इंटरनेट से प्राप्त करी गयी है

प्रेम मंदिर दिन के उजाले में












गोवर्धन पर्वत उठाते भगवन श्री कृष्ण

गोवर्धन पर्वत उठाते भगवन श्री कृष्ण

गोवर्धन पर्वत उठाते भगवन श्री कृष्ण


गोपियों संग रास रचाते भगवान  श्री कृष्ण ​


​थोड़ी थोड़ी शाम उतर रही है



एक फोटो भाईसाब यानी योगी सारस्वत जी का भी

मंदिर के एक कोने में गोपियाँ



ये कालिया नाग और इस पर श्री कृष्णा दोनों ही इधर उधर घूमते हैं







अद्भुत , अद्वितीय प्रेम मंदिर

अद्भुत , अद्वितीय प्रेम मंदिर

अद्भुत , अद्वितीय प्रेम मंदिर

अद्भुत , अद्वितीय प्रेम मंदिर







मंगलवार, 11 नवंबर 2014

पॉन्ग डैम

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तीन दिन हो गए थे हिमाचल में घूमते घूमते ! और जब हम 3 अक्टूबर को चिंतपूर्णी में थे तो रात में बारिश भी हो गयी थी जिसके कारण ठण्ड बढ़ गयी थी ! इसका असर ये हुआ कि बच्चों की नाक चलनी शुरू हो गयी ! हमारे पास आज यानि 4 अक्टूबर का पूरा दिन था , मन था कि कुल्लू निकल चलें , कुल्लू का दशहरा बहुत प्रसिद्द है , लेकिन दूर पड़ने और बच्चों की तबियत को देखकर पांग डैम का ही तय करना पड़ा ! पांग डैम ज्यादा दूर भी नहीं है चिंतपूर्णी से केवल 32 किलोमीटर की दूरी है दोनों के बीच ! यानी लगभग एक घंटे का रास्ता !

जिस होटल में हम रुके हुए थे , उसके सामने ही चाय की दूकान भी थी ! सुबह सुबह होटल से सामन लेकर चाय पी रहे थे , वहीँ उसी चाय वाले से पांग डैम जाने के लिए पूछा कि कैसे जाय जा सकता है ! मेरे दिमाग में एक ही रास्ता था - मसरूर रॉक के रास्ते देहरा से वापस होते हुए ! लेकिन जब उसने बताया कि वो रास्ता तो हमें करीब 48 -50 किलोमीटर पड़ेगा , तो मुझे उस आदमी के बताये गये रास्ते पर गौर करना पड़ा ! बोला आप अम्ब होते हुए जाओगे तो केवल एक घंटे में ही पांग पहुँच जाओगे ! मुझे उसकी बात पसंद आई , आनी भी थी ! लगभग 20 किलोमीटर का फासला था दोनों रास्तों में ! मैंने कहा तो बस कहाँ से मिलेगी -बोला यहीं से ! अभी अभी गयी है , 10 मिनट में दूसरी आ जायेगी ! और चाय ख़त्म करते करते दूसरी बस भी आ गयी ! सवारियों के नाम पर बस 15-16 लोग ! पाँव फैलाकर बैठो ! मैं सोच रहा था कि चिंतपूर्णी छोटा सा कोई क़स्बा होगा लेकिन इसे पार करते करते 10 मिनट लग गए होंगे ! मुझे हिमाचल में एक बात थोड़ी अलग सी लगी ! वहां चाय की हर दूकान में गैस सिलिंडर की बजाय बिजली चलित चूल्हा ( इंडक्शन चूल्हा ) उपयोग में लाते हैं ! क्या वहां बिजली सस्ती है ? अगर आपको कोई कारण पता हो तो जरूर बताएं !

बस घने जंगलों में से होती हुई निकलती जाती है ! ऐसे जंगल में से रास्ता मिलता है कि कहीं चीता न निकल आये अभी ! चिंतपूर्णी से निकालकर थोड़ी दूर पर ही शीतला माता का मंदिर है , मैं केवल बस में से उसके फोटो ले पाया ! रास्ते में अब भी दशहरा के पंडाल दिखाई दे रहे थे ! बीच में जब मैंने एक बार कंडक्टर से ऐसे ही पूछा - भाई अभी और कितना टाइम लग जाएगा ! तब उसने टाइम तो बताया ही साथ में ये और कह दिया कि हम आपको तलवाड़ा उतारेंगे , वहां से पांच पांच रूपया देकर आप टेम्पो से पांग डैम चले जाना ! ये तलवाड़ा कहाँ से आ गया ? फिर उसी ने बताया कि पांग डैम , फतेहपुर -जस्सुर रोड पर पड़ता है और हमारी बस चिंतपूर्णी से तलवाड़ा तक ही है ! हम्म्म ! समझ आ गया !

तलवाड़ा , असल में पंजाब में आता है ! मुकेरियां से करीब 40 किलोमीटर दूर ! और पांग डैम हिमाचल में ! हम 10 साढ़े दस के आसपास तलवाड़ा में थे ! उतरते ही चाय पी ! पीनी होती है , मजबूरी है ! मुझे हर दूसरे तीसरे घंटे चाय पीने का मन करता है , और अगर हर घंटे मिल जाए तो और भी सोने पे सुहागा ! खैर , चाय पीकर रोड क्रॉस करी और ऑटो वाले से पांग डैम जाने के लिए पूछा तो बोला 200 रूपये लगेंगे ! अरे -बस वाला तो कह रहा था पांच पांच रूपये में पांग पहुँच जाओगे ! बढ़िया सी प्राइवेट बस भी खड़ी थी वहीँ , उससे पूछा पांग डैम जाने के लिए ! बोला 20 रूपये लगेंगे एक सवारी के ! क्या दिक्कत है , बैठ लिए ! थोड़ी दूर जाकर ही एक बोर्ड लगा है पांग डैम की दूरी बताने वाला ! वहां लिखा था पांग डैम 5 किलोमीटर ! यानी बस वाले ने मुझसे करीब आठ किलोमीटर के 20 रूपये लिए हैं लेकिन उस भले आदमी ने जब किराया माँगा तो सिर्फ 30 रूपये ही लिए ! चार लोगों के ! चार पूरे नहीं हैं , दो पूरे और दो चौथाई ! गिनती चार की , वजन सवा दो का !

पांग डैम उत्तर गए ! वीरान सा डैम ! लेकिन आये हैं तो देखेंगे ! जहां बस ने उतारा उससे थोड़ी ही दूरी पर एक पुलिस पिकेट है ! उधर ही चल दिए ! और लोग भी थे लेकिन वो सब कर्मचारी ही थे वहां के ! पुलिस वाले से घूमने के लिए पूछा तो उसने एक बार तो निराश कर ही दिया ! बोला आपको परमिशन लानी पड़ेगी ! मैंने पूछा -परमिशन कहाँ से लाऊँ ! ऐसा तो कुछ नही लिखा नेट पर ! लेकिन वो कहाँ मानने वाला था -बोला आपको तलवाड़ा से परमिशन लेकर आनी पड़ेगी , BBMB से , BBMB मतलब भाखड़ा ब्यास मैनेजमेंट बोर्ड , तभी आप यहां घूम सकते हो ! इतनी देर में और लोग भी उस पिकेट के पास आ गये थे , सब खाली ही घूम रहे थे ! मैंने उस पुलिस वाले को सारी राम कहानी सुना दी कि बच्चों का मन था देखने का , हमें पता भी नहीं था कि इसके लिए परमिशन चाहिए होती है ! आखिर में मेरे पहचानपत्र देखकर और अन्य कर्मचारियों के हस्तक्षेप के बाद उसने परमिशन दे ही दी और हमने अपना सामान भी उसकी पिकेट में ही रख दिया !

पांग डैम पर फोटो खीचना मना है लेकिन चुपके चुपके तो खींच ही सकते हैं ! ऐसा ही मैंने भी किया , इसलिए जितने फोटो मिलेंगे वो चोरी छिपे खींचे गए हैं ! मनाही बस ऐसी ही है , ज्यादा सख्त नहीं है , बस किसी की नजर न पड़े ! पांग डैम को महाराणा प्रताप सागर भी कहते हैं , ये ब्यास नदी पर 1975 में बनाया गया था ! ब्यास नदी , रोहतांग दर्रे के पास स्थित ब्यास कुण्ड से निकलती है ! जब ये डैम बनाया गया था तब ये भारत में सबसे ऊँचा डैम हुआ करता था ! जितना घूम सकते थे , उतना घूम लिया तो फिर वहां के कैफेटेरिया में घुस गए ! खाने को बिस्कुट के अलावा कुछ नहीं था और पीने को चाय के अलावा कुछ नहीं ! चाय ही पी ! मैंने उसे 20 का नोट दिया ! 10 रुपये चाय के हिसाब से , बोला खुले दे दो , मैंने कहा कितने , बोला चार रुपये ! इतनी सस्ती , चाय तो बढ़िया थी ! तब उसने बताया कि ये सरकारी कैंटीन है ! सच में सरकारी होने का अपना एक अलग मजा है ! ज्यादा सरकारी हो जाओ तो संसद की कैंटीन में 2 रूपया 50 पैसे में बढ़िया खाना मिल जाएगा !

डैम से ही पठानकोट के लिए सीधी बस मिल गयी ! एकदम बढ़िया , वीडियो कोच ! और 6 बजे शाम को पठानकोट बायपास उतार दिया ! बायपास से ही टैम्पो मिल गया , मैंने कहा स्टेशन ! बोला हाँ , बैठो ! बैठ गए ! पता नहीं कहाँ उतार गया , ये कह के कि लो जी आ गया स्टेशन ! दिख तो रहा था ! हम दूसरी साइड में थे ! चलते चलते जब स्टेशन पहुंचे तब असलियत पता चली , ये असल में पठानकोट छावनी स्टेशन था ! शायद चक्की दा बाग़ ! और हमें ट्रेन पकड़नी थी पठानकोट जंक्शन से ! फिर से टैम्पो पकड़ा और तब कहीं जाकर पठानकोट जंक्शन पहुंचे ! अभी तक पेट में चाय बिस्कुट के अलावा कुछ भी नहीं गया था ! तो पहले तय किया कि कुछ खाया जाए ! पठानकोट जंक्शन स्टेशन से बाहर रोड पर आकर बहुत से ठीक ठाक खाने के होटल हैं ! ख़ा पीकर वापस पठानकोट जंक्शन पहुंचे ! और 11 बजे रात को अपनी ट्रेन पकड़ी ! अगली सुबह गाजियाबाद !


चिंतपूर्णी से करीब 5 किलोमीटर दूर शीतला माता मंदिर ! बस में बैठे ही लिया था ये फोटो

पॉन्ग डैम

पॉन्ग डैम

पॉन्ग डैम

पॉन्ग डैम

ये सामने जो शिलापट दिखाई दे रहा है , इस पर डैम बनाने के दौरान स्वर्गवासी हुए लोगों के नाम लिखे हैं




ये सामने एक स्टेचू दिख रही है , इसे इंजन में प्रयोग में आने वाले कनेक्टिंग रोड और पिस्टन से बनाया गया है









पठानकोट छावनी स्टेशन पर खड़ी एक ट्रेन में तोप भी थीं , मेरे बेटे ने तस्वीर खेंच ली
पठानकोट जंक्शन के बाहर भारतीय रेलवे का चेहरा (मैस्कॉट ) 

काले बादलों से झाँकता चाँद

अब ये यात्रा समाप्त होती है ! जल्दी ही मिलेंगे एक और यात्रा वृतांत लेकर ! जय हिन्द 

बुधवार, 5 नवंबर 2014

हिमाचल यात्रा -तीसरा दिन : चिंतपूर्णी मंदिर

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ज्वालाजी के दर्शन करने के पश्चात करीब 2 बजे हम बाहर आ गए ! पेट में चूहे उछाल मारने लगे थे तो सबसे पहले खाने का स्थान देखा गया ! बस स्टैंड के ही पीछे बहुत सारे रहने और खाने के लिए होटल हैं , उनमें से ही एक में घुस गए ! ये अच्छा था कि उस होटल में ज्यादा भीड़ भाड़ नहीं थी , खाना खाया और चाय पी ! बच्चों के लिए बिस्कुट के दो -तीन पैकेट लिए और फिर तैयार ! बस स्टैंड पर पता किया तो चामुण्डा जी दूर पड़ रही थी , असल में वो कांगड़ा से ज्यादा नजदीक हैं लेकिन वो रास्ता हम छोड़ आये थे पीछे इसलिए उधर वापस जाने का कोई मतलब नही था और हमारा कोई ऐसा प्रीप्लान भी नहीं था कि हमें ये ये जगह घूमनी हैं , जहां मन करे उधर ही मुंह उठाके चल दो ! और यही हुआ , देखा कि चिंतपूर्णी की बस खड़ी है और ये ज्यादा दूर भी नहीं है तो बैठ गए चिंतपूर्णी के लिए ! 35 किलोमीटर दूर है ज्वालाजी से चिंतपूर्णी ! किराया लिया 50 रूपये प्रति सवारी ! जैसा मैंने पहले भी कहा कि हिमाचल में आपको पल पल पर बस मिलेगी और भीड़ नाम को भी नही ! लेकिन इस रास्ते में भीड़ कुछ ज्यादा हो गयी , बच्चों को गोद में लेकर बैठना मुश्किल सा हो गया तो मैंने बस कंडक्टर से दोनों बच्चों के लिए एक टिकट और ले लिया यानी 50 रुपये और देने पड़ गए , लेकिन इसका फायदा ये हुआ कि बच्चों और उनकी माँ को डबल सीट वाली एक पूरी सीट मिल गयी और आराम से सुविधाजनक रूप से यात्रा संपन्न हो गयी ! ज्वालाजी से ऐसे तो कंडक्टर ने बताया था कि ज्यादा से ज्यादा एक घंटा लगेगा चिंतपूर्णी तक लेकिन सवारियों के चक्कर में उसने डेढ़ घंटा लगा दिया ! देहरा , ढलियारा होते हुए आखिर चिंतपूर्णी पहुंचे ! तीन दिनों के बाद आज पहली बार कांगड़ा जिले से बाहर आये हैं ! बहुत बड़ा है कांगड़ा और मुझे लगता है कि भारत के सबसे बड़े जिलों में कोई न कोई नंबर जरूर होगा कांगड़ा का ! देहरा क़स्बा जैसा ही है लेकिन वहां धर्म शाला , चंडीगढ़ , जालंधर की बसें खड़ी देखकर लग रहा था कि यहां बसों का ठहराव है ! हाँ , उस दिन दशहरा था और देहरा बस स्टैंड के पास ही दशहरा की झांकियां भी निकल रही थीं , न सुन्दर थीं और न ज्यादा बड़ी ! लेकिन परंपरा है , और परम्पराओं को निभाया जाना अच्छा लगता है !


ऐसा माना जाता है कि चिंतपूर्णी मंदिर को माई दास नाम के सारस्वत ब्राह्मण ने छपरोह गाँव में छब्बीस पीढ़ियों पहले स्थापित किया था ! बाद में यही छपरोह गाँव चिंतपूर्णी हो गया ! उनके वंशज आज भी चिंतपूर्णी में ही रहते हैं और चिंतपूर्णी मंदिर में पूजा अर्चना करते हैं ! किवदंतियों के अनुसार भक्त माई दास के पिता पटियाला राज्य के अथूर गाँव में रहते थे और वो माँ दुर्गा के बहुत बड़े भक्त थे ! उनके तीन पुत्र थे -देवी दस , दुर्गा दस और माई दास ! माई दास भी पिता की तरह माँ दुर्गा के भक्त थे और सदैव पूजा पाठ और भजन कीर्तन में ही लगे रहते ! उनके भाइयों को ये सब पसंद नहीं आता था ! कालांतर में पूरा परिवार ऊना जिले के अम्ब के पास रापोह गाँव में आ गया ! एक बार माई दास ससुराल जा रहे थे , थके हारे बेचारे एक पेड़ के नीचे बैठ गए , जल्दी ही खर्राटे लेने लगे तो उन्हें सपने में एक बहुत सुन्दर कन्या दिखाई दी ! माई दास अचानक से उठे लेकिन जब कुछ न दिखा तो फिर ससुराल की तरफ चल दिए ! वापसी में फिर उसी बरगद के पेड़ के नीचे बैठकर सो गए ! फिर से वोही कन्या सपने में आई ! अब बड़े परेशान, तो आँखें बंदकर के बोले -माँ अगर तुम मानती हो कि मैं तुम्हारा सच्छा भक्त हूँ तो कृपया मेरे सामने आओ ! माँ चारभुजा के वेश में शेर पर सवार होकर उपस्थित हुईं और माई दास से कहा कि तुम यहीं मेरा मंदिर बनाकर मेरी पूजा करो ! मैं यहीं इस बरगद के नीचे पिंडी के रूप में स्थापित रहूंगी ! लेकिन माई दास को घने जंगल में शेर-चीतों का डर था और फिर उसे वहां पानी का कोई स्रोत भी नजर नही आ रहा था ! भक्त की इस बात को महसूस कर माँ ने माई दस से इशारा करके कहा - जाओ उस पत्थर वहां से हटाओ , जैसे ही माई दास ने पत्थर हटाया वहां से प्राकृतिक जल धारा फूट निकली ! माई दास ने वहां मंदिर बनवाया और धीरे धीरे उस मंदिर की महिमा दूर दूर तक होने लगी !



चिंतपूर्णी मंदिर के विषय में कुछ कहानियाँ प्रचलित हैं , पहले वो बता दूँ फिर आगे चलता हूँ ! चिंतपूर्णी , जिसे छिन्नमस्तिका शक्ति पीठ भी कहते हैं , भारत के सात मुख्य और 51 शक्तिपीठ में से एक है और ये हिमाचल प्रदेश के ऊना जिले में पड़ता है ! छिन्नमस्तिका का अर्थ होता है विभाजित या कटा हुआ सर या माथा ! ऐसा कहा जाता है कि जब भगवन विष्णु ने शिव के तांडव को शांत करने के लिए सती के शरीर को 51 भागों में काट दिया तो वो हिस्से इधर उधर बिखर गए और सती का माथा , यानि ललाट इस स्थान पर गिरा ! और इसीलिए इसे बहुत महत्वपूर्ण और पवित्र शक्तिपीठ माना जाता है !


मार्कण्डेय पुराण के अनुसार माँ चंडी ने राक्षसों के साथ हुए भयंकर युद्ध में उन्हें पराजित कर दिया लेकिन उनकी योगिनी , जया और विजया अब भी खून के लिए लालायित थीं तो माँ चंडी ने स्वयं ही अपना सिर काट के उनकी प्यास को शांत किया ! इसिलए माँ के एक रूप में उन्हें अपना ही सर हाथ में लिए हुए दिखाया जाता है जिसमें उनके अगल बगल में जया और विजया को खून की धार पीते हुए भी देखते हैं ! छिन्नमस्तिका का अगर सरल शब्दों में अर्थ देखें तो समझ आता है छिन्न भिन्न मस्तिष्क ! यानी इससे ये सन्देश मिलता है कि मस्तिष्क का शरीर से अलग होना अर्थात भौतिक वस्तुओं ( शरीर ) को दिमाग से , मन से दूर रखना !


इसी के साथ एक बात और प्रचलत है कि छिन्नमस्तिका देवी की रक्षा के लिए चारों दिशाओं में भगवान शिव अपने रूप में विराजमान रहेंगे ! पूर्व में कालेश्वर महादेव , पश्चिम में नारायण महादेव , उत्तर में मुचुकुन्द महादेव और दक्षिण में शिव बारी ! यहां ये बात धयान देने योग्य है कि चारों दिशाओं में उपस्थित भगवान शिव , चिंतपूर्णी मंदिर से सामान दूरी पर स्थित हैं !


चिंतपूर्णी में कांगड़ा के मुकाबले ज्यादा , बेहतर और सस्ते होटल उपलब्ध हैं ! हमने जहां बस ने उतारा उसके पास में तीन सौ रुपये में एक होटल में कमरा ले लिया और जाते ही बस बिस्तर पर पसर गए ! रात को आठ बजे के आसपास निकले होंगे दर्शन के लिए ! बीच में एक जगह पराठे भी खा लिए ! पराठे कुछ महंगे हैं , आलू का एक पराठा 25 रूपये का ! गाज़ियाबाद में पहलवान ढाबे पर रायते के साथ बहुत बड़ा पराठा 25 रूपये में मिल जाता है ! खैर आलू इतना महंगा है तो पराठा भी महंगा मिलेगा ! रात को 10 साढ़े दस बजे वापस आये होंगे ! भीड़ उस दिन भी थी , होनी भी थी ! सब के पास छुट्टियां थीं और पवित्र दिन भी था विजयादशमी का !



आज बस इतना ही ! अगले दिन की बात अगली पोस्ट में :



मंदिर जाते समय हनुमान जी की एक बड़ी सी मूर्ति मिलती है रोड के किनारे! ​ये डबल हनुमान हैं ​​




छिन्नमस्तिका मुख्य मंदिर
मंदिर बहुत छोटा है ! इसके बाहर एक टीवी स्क्रीन लगा रखा है जिसमें ज्यादा बढ़िया पिंडी दर्शन हो सकता है





यह चित्र इंटरनेट से लिया गया है !

यह चित्र इंटरनेट से लिया गया है !

एक फोटो मेरे बड़े बेटा हर्षित की भी 






यात्रा जारी है :