गुरुवार, 26 फ़रवरी 2015

जगदीश मंदिर : उदयपुर

जगदीश मंदिर

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सिटी पैलेस अरावली पहाड़ियों पर बना हुआ है और इसकी हल्की सी चढ़ाई जगदीश मंदिर से ही शुरू हो जाती है ! ऑटो -गाड़ियां खड़ी करने की जगह नहीं मिल पाती लोगों को तो वो यहीं छोड़ देते हैं ! और कहते हैं कि सामने ही जगदीश मंदिर है आप देख के आओ , मैं यहीं खड़ा हूँ ! मैं यहीं खड़ा हूँ के चक्कर में वो अपने ऑटो को ले जाता है कहीं और ! उसे मालुम होता है कि अब आप 2 -3 घंटे से पहले नहीं आने वाले लौटकर ! सिटी पैलेस और जगदीश मंदिर को देखने और घूमने में इतना समय लग ही जाता है !


जगदीश मंदिर उदयपुर के दर्शनीय स्थलों में गिना जाता है ! असल में आप जिस होटल में रुके होते हैं वो आपको एक बुकलेट दे देते हैं कि सर ये ये जगह हैं उदयपुर में जहां आप जाना चाहेंगे ! आपकी मर्जी , आप कहाँ जाना चाहते हैं ? सिटी पैलेस देखने के बाद हम पैदल पैदल ही जगदीश मंदिर की तरफ निकल चले ! आप देखेंगे की सिटी पैलेस काम्प्लेक्स के अंदर और बाहर इंडिया और भारत जैसा ही अंतर है ! मतलब अंदर इंडिया जैसा एकदम साफ़ और सिटी पैलेस से बाहर निकलते ही भारत जैसा गंदा माहौल ! सिटी पैलेस के बाहर की गन्दगी दिखाई दे जाती है ! दौनों तरफ बाजार सजे हैं लेकिन गाहक मुझे तो नहीं दिखे ज्यादा ! आते होंगे शाम को !

सिटी पैलेस के बड़ा पोल की तरफ भगवान विष्णु ( लक्ष्मी नारायण ) को समर्पित जगदीश मंदिर मारू गुर्जर स्थापत्य कला ( मेवाड़ की पुरानी स्थापत्य कला ) में बना हुआ है जिसे 1651 में महाराणा जगत सिंह ने बनवाया ! पूरी 32 सीढ़ियां हैं जो बिल्कुल सीधी हैं ! आप अनुमान लगाएं कि 10 मीटर की चौड़ाई में अगर आप 32 सीढ़ियां बनावायें तो लगभग एकदम सीधी होंगी ! आधा दम तो सीढ़ियां चढ़ते ही निकल जाता है !

ऐसा कहते हैं कि इस मंदिर को बनाने में 15 लाख रुपये का खर्च आया था ! इस शानदार मंदिर के शिखर में नर्तकों , संगीतकारों , घुड़सवारों के मूर्तियां लगी हैं जो इसे अद्भुत और स्थापत्य के तौर पर विशिष्ट बनाती हैं। प्रवेश करते ही पत्थर के बने दो हाथी आपका स्वागत करने को तैयार हैं ! यहाँ गरुड़ की प्रतिमा इस तरह से स्थापित करी गयी है जैसे वो भगवान विष्णु के पहरेदार के रूप में कार्यरत हों।

दर्शन करने में बिलकुल भी परेशानी नहीं होती ! मुख्य मंदिर के आसपास इतनी जगह है कि भीड़ होने पर भी उसे नियंत्रित किया जा सकता है ! मंदिर की दीवारों पर जो कलाकृतियां हैं उन्हें देखकर एक बारी लगता है जैसे हम उदयपुर में नहीं बल्कि खजुराहो के मंदिर देख रहे हों !!


आइये फोटो देखते हैं : 

जगदीश मंदिर प्रवेश द्वार
जगदीश मंदिर प्रवेश द्वार








दीवारों पर  कलाकृतियां




दीवारों पर  कलाकृतियां

दीवारों पर  कलाकृतियां
मंदिर के खंभे भी आकर्षित करते हैं








दीवारों पर  कलाकृतियां

दीवारों पर  कलाकृतियां





                                                                             यात्रा जारी है :



सोमवार, 23 फ़रवरी 2015

चन्दरु की दुनियाँ


उर्दू के अज़ीम ओ तरीन अदीब कृष्ण चन्दर की एक बहुत ही प्रसिद्द कृति "चन्दरु की दुनियाँ " उर्दू साहित्य में विशिष्ट स्थान रखती है ! ये कृति मूल रूप में उर्दू में है , मैंने पढ़ी तो मुझे लगा आपके लिए भी इसको हिंदी में लिखना श्रेयस्कर होगा ! आइये पढ़ते हैं :

कराची में भी उसका यही धंधा था और बांदरे आकर भी यही धंधा रहा। जहां तक उसकी जात का तालुक था, कोई तकसीम नहीं हुई थी। वो कराची में भी सिद्धू हलवाई के घर की सीढ़ियों के नीचे एक तंग और अँधेरी कोठरी में सोता था और बान्दरे में भी उसे सीढ़ियों के अक़ब में ही जगह मिली थी। कराची में उसके पास एक मैला कुचला बिस्तर, जंग लगे लोहे का एक छोटा सा ट्रंक और एक पीतल का लोटा था। यहां पर भी वही सामान था । ज़हनी लगाव न उसे कराची से था न बम्बई से । सच बात तो ये है कि उसे ये मालुम ही न था कि ज़हनी लगाव कहते किसे हैं ? कल्चर किसे कहते हैं ? अलवतनी क्या होती है और किस भाव से बेचीं जाती है ? वो उन सब नए धंधों से वाक़िफ़ न था , बस उसे इतना याद कि जब उसने आँख खोली तो अपने आप को सिद्धू हलवाई के घर में बर्तन मांजने , झाड़ू लगाते , पानी भरते , फर्श साफ़ करते और गालियां खाते पाया । उसे उन बातों का कभी मलाल न हुआ क्योंकि उसे मालुम था कि काम करने और गालियां खाने के बाद ही रोटी मिलती है और उसकी किस्म वाले लोगों को ऐसे ही मिलती है। सिद्धू हलवाई के घर में उसका जिस्म तेज़ी से बढ़ रहा था और उसे रोटी की बहुत जरुरत थी और हर वक्त महसूस होती रहती थी। इसलिए वो हलवाई के दिए छोटे सालन के साथ उसकी गाली को भी रोटी के टुकड़े में लपेट के निगल जाता था।


उसके माँ बाप कौन थे , किसी को पता न था। खुद चन्दरु ने कभी उसकी जरुरत महसूस नहीं की थी। अलबत्ता , सिद्धू हलवाई उसे गालियां देता हुआ अक्सर कहा करता था कि वो चन्दरु को सड़क पर से उठाकर लाया है। उस पर चन्दरु ने कभी हैरत का इज़हार नहीं किया। न सिद्धू के लिए कभी उसके मन में प्रशंसा के बीज उगे। क्योंकि चन्दरु को कोई दूसरी जिंदगी याद ही नहीं थी।

उसे बस इतना मालुम था कि कुछ ऐसे लोग होते हैं जिनके माँ बाप होते हैं , कुछ ऐसे लोग होते हैं जिनके माँ बाप नहीं होते। कुछ लोग घरवाले होते हैं , कुछ लोग सीढ़ियों के नीचे सोने वाले होते हैं ; कुछ लोग गालियां देते हैं , कुछ लोग गालियां सहते हैं ; एक काम करता है , दूसरा काम करने पर मजबूर करता है। बस ऐसी है ये दुनिया और ऐसी ही रहेगी। दो खानो में बनी हुई। यानि एक वो जो ऊपर वाले हैं , दूसरे वो जो नीचे। ऐसा क्यों है और ऐसा क्यों नहीं है और जो है वो कब , क्यों , कैसे बेहतर हो सकता है ? वो ये सब कुछ नहीं जानता था। और न उस किस्म की बातों से कोई दिलचस्पी रखता था। अलबत्ता जब कभी वो अपने दिमाग़ पर बहुत ज़ोर देकर सोचने की कोशिश करता था तो उसकी समझ में यही आता था कि जिस तरह वो सट्टे के नंबर का दांव लगाने के लिए कभी कभी हवा में सिक्का उछाल कर टॉस कर लेता था उसी तरह उसके पैदा करने वाले ने उस के लिए टॉस कर लिया होगा और उसे इस खाने में डाल दिया होगा,  जो उसकी किस्मत थी।


यह कहना भी गलत होगा कि चन्दरु को अपनी किस्मत से कोई शिकायत थी , हरगिज़ नहीं। वो एक खुशमिज़ाज , सख्त मेहनत करने वाला , भाग भाग कर जी लगाकर खुश मिजाजी से काम करने वाला लड़का था। वो रात दिन अपने काम में इस कदर मशगूल था कि उसे बीमार पड़ने की भी कभी फुर्सत नहीं मिली।


कराची में तो वो एक छोटा सा लड़का था। मगर बम्बई आकर तो उसके हाथ पाँव और खुले और बढे। सीना चौड़ा हो गया था। गंदमी रंग साफ़ होने लगा था। बालों में लच्छे से पड़ने लगे थे और आँखें ज्यादा रोशन और बड़ी मालूम होने लगीं थीं । उस की आँखें और होंठ देखकर मालूम होता था कि उसकी माँ जरूर किसी बड़े घर की रही होगी।

चन्दरु को भगवान ने सुनने की शक्ति तो दी थी किन्तु वो बोल नहीं सकता था। आमतौर पर गूँगे बहरे भी होते हैं। मगर वो सिर्फ गूंगा था , बहरा न था। इसलिए हलवाई एक दफ़ा उसे बचपन में एक डॉक्टर के पास ले गया । डॉक्टर ने चन्दरु का मुआइना करने के बाद हलवाई से कहा कि चन्दरु के हलक में कोई पैदाइशी नुक्श है मगर ऑपरेशन करने से ये नुक्श दूर हो सकता है और चन्दरु को बोलने के लायक बनाया जा सकता है। मगर हलवाई ने कभी उस नुक्श को ऑपरेशन के ज़रिये दूर करने की कोशिश नहीं की। सिद्धू ने सोचा ये तो अच्छा है कि नौकर गाली सुन सके मगर उसका जवाब न दे सके।

चन्दरु का यही नुक्श सिद्धू की निगाह में उसकी सबसे बड़ी खूबी बन गया। इस दुनिया में मालिकों की आधी जिंदगी इसी फ़िक्र में गुजर जाती है कि किसी तरह वो अपने नौकरों को गूंगा कर दें। इसके लिए कानून पास किये जाते हैं , पार्लियमेंटें सजाई जाती हैं , अखबार निकाले जाते हैं , पुलिस और फ़ौज़ के पहरे बिठाए जाते हैं। सुनो , मगर जवाब न दो !

और चन्दरु तो पैदाइशी गूंगा था। यकीनन सिद्धू ऐसा भी भला नहीं है कि उसका ऑपरेशन करवाये !


ज़ारी रहेगी :

बुधवार, 18 फ़रवरी 2015

उदयपुर : सिटी पैलेस


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मेवाड़ जितना समृद्ध आज दीखता है उतना ही समृद्ध पहले भी रहा होगा ! अगर आप उनके बनाये हुए किले और महल देखें तो उस वक्त के मेवाड़ की झलक और कल्पना आँखों में तैरने लगती है ! इसी समृद्ध स्थान को देखने के लिए हमने सहेलियों की बाड़ी और सुखाड़िया सर्किल के बाद सीधा रुख किया सिटी पैलेस का ! आइये सिटी पैलेस चलते हैं और उसके विषय में जानते हैं !

उदयपुर का प्रसिद्द सिटी पैलेस लगभग 400 वर्ष बूढा हो चला है ! इसे महाराणा उदय सिंह ने 1559 में बनवाना शुरू किया और फिर उनकी मृत्यु के बाद और राजाओं ने इसके निर्माण को जारी रखा ! अरावली पहाड़ियों में लेक पिछोला के पास बने इस भव्य महल के पीछे एक किवदंती हवा में फैली हुई सी रहती है ! महाराणा उदय सिंह जब लेक पिछोला ( उस वक्त तो ये गन्दी संदी सी कोई पोखर ही रही होगी ) के आसपास शिकार के लिए गए हुए थे तब उन्हें यहां एक पहाड़ी पर साधू महाराज तपस्या करते हुए मिले ! महाराणा ने उन्हें प्रणाम कर आशीर्वाद लिया तो साधू ने उन्हें बताया कि तुम्हारे बुरे दिन शुरू होने वाले हैं इसलिए बेहतर है कि अपनी राजधानी चित्तोड़ से यहां ले आओ ! महाराणा उदय सिंह ने उनकी बात का ध्यान रखते हुए अपनी राजधानी को चित्तोड़ से उदयपुर ले जाने का फैसला कर लिया ! एक ज्ञान की बात ये भी है कि चित्तोड़ आने से पहले उनकी राजधानी उदयपुर के पास नागदा में थी। चित्तोड़ से लगभग 80 साल शासन चलाने के बाद सिसोदिया वंश के महाराणा उदय सिंह को जब लगने लगा कि वो चित्तोड़ पर मुगलों के हाथों अपना शासन गंवा सकते हैं तब उन्होंने राजधानी उदयपुर ले जाने का निश्चय कर लिया ! और वहां उन्होंने सिटी पैलेस के निर्माण की नींव रखी जिसमें सबसे पहले उन्होंने शाही आँगन " राय आँगन " बनवाया ! सन 1572 ईस्वी में महाराणा उदय सिंह की मृत्यु के बाद परमवीर महाराणा प्रताप ने शासन संभाला और सिटी पैलेस का निर्माण अनवरत जारी रहा ! उनके बाद भी इसकी भव्यता को और राजाओं ने भी चार चाँद लगाने में कोई कसर बाकी नहीं रहने दी !

सन 1736 ईस्वी में मराठाओं ने मेवाड़ पर आक्रमण कर दिया और ज्यादातर माल लूट खसोट लिया और उसके साथ ही इस भव्य महल को तहस नहस कर दिया ! इसके बाद किसी ने भी इस महल की सुध नहीं ली ! लेकिन जब अंग्रेज़ों की नजर इस अनमोल खजाने पर पड़ी तो उन्होंने इसका पुनर्निर्माण कराया और उसे आज के समय की भव्यता प्रदान करी ! भारत जब आज़ाद हुआ और सरदार पटेल के नेतृत्व में 1949 में रियासतों को भारत गणराज्य में सम्मिलित किया गया तो मेवाड़ भी राजस्थान की अन्य रियासतों के साथ भारत में शामिल हो गया और इसके साथ ही महाराणा उदय सिंह के वंशजों ने इस महल पर अपना अधिकार खो दिया लेकिन कालांतर में उन्होंने कोर्ट के माध्यम से और ट्रस्ट बनाकर इसे वापस अपने अधिकार क्षेत्र में ले लिया !

सिटी पैलेस क्योंकि निजी हाथों में है और उदयपुर जाने वाला हर कोई व्यक्ति इसे अपनी लिस्ट में जरूर शामिल करता है तो मुझे लगता है इसी का फायदा उन लोगों ने उठाया है ! 115 रुपये का टिकेट है एक वयस्क का और बच्चे का 55 रुपये का ! बच्चे का मतलब 5 साल से ऊपर के बच्चे का ! तो इस तरह हमें देने पड़ते 340 रूपये ! दो वयस्क और दो बच्चे ! लेकिन थोड़ी सी चोरी कर ली ! बच्चों का टिकट नहीं लिया ! सिटी पैलेस काम्प्लेक्स में एक हायर सेकण्ड्री स्कूल भी है , और जिस समय हम वहां पहुंचे , उस स्कूल के बच्चे बाहर निकल कर आ रहे थे , स्वाभाविक है भीड़ सी हो गयी और इसी चक्कर में हम अंदर चले गए ! न हमसे किसी ने बच्चों का टिकट माँगा , न हमने बताया ! पूरे 110 रूपये बचा लिए !


अंदर जाकर बहुत सी दुकानें सजी हुई हैं ! ज्यादातर इंडियन क्राफ्ट और कपड़ों की ! लोग भी वीआईपी ही अंदर जाते हैं , न मेरी हैसियत थी इतना महंगा कुछ लेने की , न मुझे जरुरत थी ! मैं नहीं गया ! महल के अंदर ज़नाना महल , मर्दाना महल भी हैं जो निश्चित रूप से महिलाओं और पुरुषों के लिए अलग अलग बनवाए होंगे ! सिटी पैलेस को अगर महलों का समूह कहा जाए तो गलत नहीं होगा ! इसमें अलग अलग समय पर अलग अलग राजाओं द्वारा बनवाए गए महल हैं ! जैसे राजा अमर सिंह ने बनवाया तो अमर महल , भोपाल सिंह ने बनवाया तो भोपाल महल आदि आदि ! इस महल में महाराणा प्रताप और उनके वंशजों और पूर्वजों की आदमकद तसवीरें लगी हैं , उनका सामान रखा हुआ है ! लेकिन कैमरे की भी टिकट लगती है ! भले ही टिकट महंगा है लेकिन आप जब एक बार अंदर जाकर इसकी खूबसूरती और इसकी भव्यता देखते हैं तो निस्संदेह टिकट भूल जाते हैं !


इसी सिटी पैलेस में घूमते वक्त एक जापानी पर्यटक से मुलाकात हो गयी ! जापानी पर्यटक स्वभाव से बड़े शर्मीले और एकांतवासी होते हैं ! इन्हें आप आसानी से पहिचान भी सकते हैं ! इनका मुंह थोड़ा चपटा सा और येल्लोयिश ( पीला सा ) होता है ! हो सकता है वो चीनी हो , मंगोलियन या कम्बोडिया का भी हो ! यानी पूर्व एशिया का ! तो मैंने सोचा इसे पहले पूछ कर पक्का कर लेता हूँ कि जापानी ही है ! भरोसा ऐसे भी था कि हिंदुस्तान में चीनी या मंगोलियन पर्यटक बहुत कम आते हैं , जापानी ज्यादा आते हैं ! भगवान की कृपा से ठीक ठाक जापानी भाषा मुझे आती है ! मैंने पूछा - अनातावा निहोंजिन देस का ? जब उसने हाई कर दिया ! फिर तो पक्का हो ही गया कि बन्दा जापानी ही है और फिर करीब 15 मिनट तक मैं उसका और वो मेरा दिमाग चाटता रहा !

आज इतना ही ! राम राम जी !!


 आइये फोटो देखते हैं  :


इस महल में "रॉयल आँगन" सबसे पहले बनवाया गया था ! नेट से फोटो उतारी है
चेतक सर्किल 

सिटी पैलेस प्रवेश द्वार

सिटी पैलेस प्रवेश द्वार

सिटी पैलेस प्रवेश द्वार

ओपन एयर रेस्तौरेंट

ओपन एयर रेस्तौरेंट
भारत की शानदार विरासत उदयपुर का सिटी पैलेस











ये महल के अंदर के दृश्य हैं
 


ये महल के अंदर के दृश्य हैं







ये महल के अंदर के दृश्य हैं


ये महल के अंदर के दृश्य हैं



ये महल के अंदर के दृश्य हैं

ये महल के अंदर के दृश्य हैं
भारत की शानदार विरासत उदयपुर का सिटी पैलेस
भारत की शानदार विरासत उदयपुर का सिटी पैलेस


भारत की शानदार विरासत उदयपुर का सिटी पैलेस

भारत की शानदार विरासत उदयपुर का सिटी पैलेस

सूरज पोल ! पोल राजस्थान में दरवाज़ों को बोलते हैं
शानदार फव्वारा

सोमवार, 9 फ़रवरी 2015

​ सहेलियों की बाड़ी और सुखाड़िया सर्कल

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उदयपुर जैसे शहर में , जहां देखने के लिए पग पग पर खज़ाना भरा हो , आपके पास समय और अपना वाहन ( किराए पर भी ) होना बहुत जरुरी हो जाता है अन्यथा आप कम जगह देखकर ही वापस लौटने को मजबूर हो जाएंगे ! मोती मगरी और फ़तेह सागर लेक देखने के बाद अब चलते हैं सहेलियों की बाड़ी और सुखाड़िया सर्कल !

पहले राजा महाराजाओं के समय में जब किसी राजकुमारी का ब्याह होता था तो उस राजकुमारी के साथ ही उसकी सेविकाओं , सहेलियों को भी दहेज़ में उसके साथ ही भेज दिया जाता था ! सहेलियों की बाड़ी भी 48 ऐसी ही सेविकाओं या सहेलियों को समर्पित एक स्मारक है ! उदयपुर शहर के उत्तर में स्थित इस बगीचे को महाराणा भोपाल सिंह ने दहेज़ में आईं  ऐसी ही 48 सेविकाओं के मनोरंजन स्थल के रूप में बनवाया था जो आज एक दर्शनीय स्थल बन चुका है ! इस बात को दोहराना चाहूंगा कि यहां भी 10 रूपये का टिकट लगता है अंदर जाने के लिए ! इस गार्डन में देखने के लिए सुन्दर से फाउंटेन और एक संग्रहालय है ! ये संग्रहालय विज्ञान और जीव विज्ञान को ज्यादा समर्पित कहा जा सकता है ! ये संग्रहालय है तो बहुत छोटा सा लेकिन इस छोटी सी जगह में उन्होंने बहुत कुछ दिखाने और इसे मनोरंजक के साथ साथ ज्ञानवर्धक बनाने की कोशिश जरूर की है ! अलग अलग तरह के मगरमच्छ , डायनासोर का विकास और पतन , लेंस के विभिन्न रूप और सबसे बड़ी बात भारत द्वारा छोड़े गए मंगलयान का एक सुन्दर मॉडल वहां रखा है जिसको लेकर उत्सुकता रहती है ! बच्चों को बहुत कुछ समझाया जा सकता है ! अंततः 10 रूपये में बुरा नहीं है !

अब आइये थोड़ा सा और आगे चलते हैं। बस पास में ही एक और जगह है देखने लायक ! ये मुफ्त है , हाहाहा ! कोई टिकट नहीं ! पहली जगह मिली है उदयपुर में , जहां टिकट नहीं लगता ! ये है सुखाड़िया सर्किल ! मोहन लाल सुखाड़िया के नाम पर बना सर्किल ! उदयपुर में या ये कहूँ कि राजस्थान में आपको ज्यादातर चौराहों के नाम ऐसे ही मिलते हैं , सुखाड़िया सर्किल , चेतक सर्किल फलां फलां और एक नजर ज़रा उत्तर प्रदेश के शहरों के चौराहों के नाम भी देखते चलें , मंदिर चौपला , हाथी पाड़ा चौराहा , गधा पाड़ा चौराहा ! अपना अपना तरीका , अपनी अपनी सोच ! सुखाड़िया सर्किल , राजस्थान के प्रथम मुख्यमंत्री और उदयपुर के निवासी मोहन लाल सुखाड़िया के नाम पर है जिसे 1970 में बनवाया गया ! इसमें 21 फुट ऊँचा तीन स्तरीय शानदार फाउंटेन लगा हुआ है ! रात के समय अगर आप इसे देखेंगे तो एक बार लगेगा कि आप किसी भारतीय शहर के फाउंटेन को नहीं बल्कि यूरोप के किसी शहर में हैं ! बोटिंग करना चाहें तो भी ठीक है लेकिन मैंने किसी को भी बोट में बैठे हुए नहीं देखा ! शायद इस वज़ह से कि लोग फ़तेह सागर से बोटिंग का मजा लेकर आते हैं फिर इतनी छोटी सी जगह में कौन बोटिंग करना चाहेगा , दो दो बार पैसे कौन खर्च करेगा एक ही चीज के लिए ?

आइये अब भारतीय लोक कला मंदिर चलते हैं ! यहां कठपुतली डांस देखेंगे ! राजस्थान और गुजरात के कारीगरों , लोक कलाओं , नृत्यों और वहां की संस्कृति के विषय में जानेंगे ! सन 1952 में पदम भूषण देवीलाल सामर द्वारा स्थापित इस संस्थान में आप राजस्थान की ग्रामीण वेशभूषा , गहने , खेल खिलोने और उनकी संस्कृति से सम्बंधित कलाकृतियां देख सकते हैं ! टिकेट लगता है ! लेकिन 15 मिनट का कठपुतली डांस आपको ये आभास कराता है कि आपके पैसे बेकार नहीं गए ! पहले यहां के संग्रहालय में घूमिये , राजस्थान से थोड़ा परिचित होइए फिर कठपुतली डांस देखिये ! एक बात कहना चाहूंगा , अगर कोई उदयपुर से मेरा ब्लॉग पढता है तो भैया उन्हें कहिये कि संग्रहालय की दशा थोड़ी सी सुधार लें ! वर्षों से वो ही कपडे पहना रखे हैं पुतलों को और वो इतने गंदे हो चुके हैं कि अगर आप उन्हें झाड़ें तो 2-2 किलो गर्द जम पड़ी होगी उन पर ! साफ़ किया जा सकता लेकिन शायद सरकारी होने की वज़ह से कोई ध्यान नहीं देता ? मोदी जी का स्वच्छता सन्देश उधर पहुंचा नहीं है अभी शायद !


आज इतना ही , ज्यादा हो जाएगा फिर ! राम राम जी


आइये फोटो देखते हैं :



सहेलियों की बाड़ी का प्रवेश द्वार
सहेलियों की बाड़ी का प्रवेश द्वार
सहेलियों की बाड़ी का प्रवेश द्वार



फाऊन्टेन में सुन्दर कलाकृति
दोबारा से  प्रवेश द्वार की फोटो ! इस बार खाली था
सुखाड़िया सर्किल



सुखाड़िया सर्किल

सुखाड़िया सर्किल


सुखाड़िया सर्किल , रात के समय


सुखाड़िया सर्किल , रात के समय
लोक कला मंडल में कठपुतली डांस
लोक कला मंडल में कठपुतली डांस
लोक कला मंडल में कठपुतली डांस
लोक कला मंडल में कठपुतली डांस


और ये डांस प्रोग्राम के जज साब ! कभी कभी ये भी हाथ पाँव चला लेते हैं डांस के लिए 

यात्रा जारी है   :